नालंदा (कविता)

जहाँ कभी जलता था ज्ञान का दीप आज खड़ा है वीरान खंडहरों के बीच लिखी है पत्थरों पर समय की कहानी झलकती है संस्कृति, दिखती है निशानी।  जहाँ गूँजा करते थे ज्ञान के गीत वहाँ गूँजते हैं अब सन्नाटे की गूँज थी चहल-पहल जहाँ विद्यार्थियों की अब उड़ते हैं सन्नाटे में मिट्टी और धूल। जहाँ… Continue reading नालंदा (कविता)

हाथों की लकीरें (कविता)

माथे की लकीरों को देखते ही उसने कहा, ओह! तुम्हारे तो भाग्य ही नहीं है!! कैसे रहोगी? कैसे जियोगी? खैर! दुखी होकर भी हमेशा तुम मुस्कुराती रहोगी मैं सोंची, उसे क्या पता, मैं भी जिद्दी हूँ, माथे की लकीरों को आत्मशक्ति से बदल सकती हूँ, मैं जानती थी, अपने आपको मन में दर्द था, आत्मशक्ति… Continue reading हाथों की लकीरें (कविता)

हमारी ‘हिन्दी’ (कविता)

सरस भाषा हिन्दी है, सरल भाषा हिन्दी है, सरस, सरल  और रुचिर  भाषा  हिन्दी है। मृदुल भाषा हिन्दी है, मधुर भाषा हिन्दी है, मृदुल, मधुर  और  कोमल भाषा हिन्दी है। कर्म भाषा हिन्दी है, धर्म भाषा हिन्दी है, कर्म, धर्म और  काव्य  भाषा  हिन्दी है। संस्कार भाषा हिन्दी है, संस्कृति भाषा हिन्दी है, संस्कार, संस्कृति… Continue reading हमारी ‘हिन्दी’ (कविता)

जीने की राह

जिन सपनों में जीना चाहीवे सपने बिखर गएदिल के अरमान अबआंसू बन बह गए। राह कौन सा अपनाऊं?यह सोचकर थक गई।दुनिया की भीड़ देखजीने की राह मिल गई।

फिर लौटूंगी (कविता)

सतरंगी रंगों की निशां देकर चली गई होली। अपनी निशान छोड़कर चली गई होली। दो दिन की खुशियाँ देकर चली गई होली। अगले वर्ष फिर आउंगी कह गई होली। ‘कोरोना’ से बचकर रहना फिर खेलने आऊँगी होली।

कैसे कहूँ? (कविता)

हँसकर आँसू छुपा लेती हूँ मुस्कुराकर दर्द सह लेती हूँ रात गम में गुजार लेती हूँ दिल को कैसे समझाऊं? सुनते तो सब हैं मुझे अपनी बात को कैसे बताऊँ? कोशिश तो की थी सुनाने की लेकिन किसी को कैसे सुनाऊं?

हाथ की लकीरें (कविता)

माथे की लकीरों को देखते ही, उसने कहा! ओह! तुम्हारे तो भाग्य ही नही है कैसे रहोगी? कैसे जियोगी? खैर! दुखी होकर भी हमेशा, तुम मुस्कुराती रहोगी उसे क्या पता, मैं क्या हूँ? मैं भी मानव हूँ माथे के लकीरों को, आत्मशक्ति से  बदल सकती हूँ मैं, मैं जानती थी, अपने आपको मन में दर्द… Continue reading हाथ की लकीरें (कविता)