कोई नहीं समस्या जिसका, समाधान न हो योग से, सतयुग में वापसी हो सकती है, योग के प्रयोग से प्राकृतिक चिकित्सा, चिकित्सा के साथ एक जीवन पद्धति भी है। जिसमे प्राकृतिक विधि-विधानों के द्वारा मानव के शरीर में होने वाले रोगों का उपचार किया जाता है। यह चिकित्सा पद्धति आज की सभी चिकित्सा पद्धतियों से… Continue reading प्राकृतिक चिकत्सा और गाँधी जी
सुंदर विचार
पेपर लीक की घटनाएँ विद्यार्थियों और अभिभावकों पर प्रभाव
भारत में पेपर लीक घटना पहली बार नहीं हुई हैं। हर बार की तरह इस बार भी NEET PAPER के साथ यह घटना हुई है। और सिस्टम ऐसा ही रहा तो आने वाले समय में भी ऐसी घटनाएँ होती रहेगी। नया सिस्टम जरूर बनाया जाता है, नई घोषणाएँ भी जाती हैं, लेकिन कुछ समय बाद… Continue reading पेपर लीक की घटनाएँ विद्यार्थियों और अभिभावकों पर प्रभाव
शब्द, जो इतिहास बन गए
तुमने अपने जीवन कोकाग़ज़ पर नहीं,आग के पन्नों पर लिखा हैहर अक्षर में तेरेअपमान की राखऔर प्रतिरोध की चिनगारी है। तुम्हारी आत्मकथासिर्फ़ कथा नहीं,एक सामाजिक दस्तावेज़ है,जहाँ पीड़ा रोती नहींप्रश्न बनकर खड़ी हो जाती है। तुम्हारे शब्ददया नहीं माँगते,वे न्याय का घोष करते हैं-मनुष्य होने का अधिकारकिसी जाति की जागीर नहीं। जिस समाज ने तुम्हें… Continue reading शब्द, जो इतिहास बन गए
आस्था नहीं, भावनाओं का व्यापार (इमोशनल ब्लैकमेल)
आजकल सोशल मीडिया, विशेषकर यूट्यूब पर एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती जा रही है। कुछ लोग भगवान के चित्र, भजन और धार्मिक वीडियो का सहारा लेकर लोगों की भावनाओं का व्यापार कर रहे हैं। वीडियो के बीच-बीच में आवाज़ आती है- “इस वीडियो को तुरंत लाइक करें, शेयर करें, सब्सक्राइब करें। ऐसा नहीं किया… Continue reading आस्था नहीं, भावनाओं का व्यापार (इमोशनल ब्लैकमेल)
समय समाज और साहित्य
समय ना ठहरा है कभी, बदली कभी न चाल। जिसके जैसे कर्म हैं, उसका वैसा हाल ।। समय 'लेटिन' भाषा का शब्द है। समयका निर्माण सृष्टि के निर्माण के साथ हुआ होगा। समय पिछले युगों में था, इस युग में है और आनेवाले युग में भी रहेगा। जब तक सृष्टि रहेगा समय भी साथ… Continue reading समय समाज और साहित्य
लोकतंत्र का क्षरण : जब विरोध की भाषा गाली बन जाए
“असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, किंतु मर्यादा उसका प्राण है” भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यहाँ विचारों की विविधता को शक्ति माना गया है। यही कारण है कि इस देश में सरकारें बदलती हैं, नीतियाँ बदलती हैं, सत्ता बदलती है, परंतु लोकतंत्र की मूल भावना अक्षुण्ण रहती है। किंतु जब विरोध की… Continue reading लोकतंत्र का क्षरण : जब विरोध की भाषा गाली बन जाए
विंध्य के माथे पर नर्मदा का तिलक
प्रकृति जब चित्रकार बनती है, तब वह रंगों से नहीं, ऋतुओं से चित्र बनाती है। उसकी तूलिका बादलों में भीगती है, पर्वतों पर ठहरती है और नदियों में बहने लगती है। कहीं वह हिमालय के श्वेत मस्तक पर हिम का मुकुट सजाती है, तो कहीं समुद्र के गले में लहरों की माला डाल हिलोरे लेती… Continue reading विंध्य के माथे पर नर्मदा का तिलक
‘तिरस्कार’ और ‘संतप्त’ आत्मकथा में अभिव्यक्त दलित पीड़ा
दलित साहित्यकार सूरजपाल चौहान का जन्म 20 अप्रैल 1955 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के फुसावाली नामक गाँव में हुआ था। उनके माता-पिता सिर पर मैला और जूठन उठाने का काम करते थे। इसी कार्य से उनके परिवार का गुजारा चलता था। उनके परिवार में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं था। लेखक की माँ ठाकुरों… Continue reading ‘तिरस्कार’ और ‘संतप्त’ आत्मकथा में अभिव्यक्त दलित पीड़ा
‘दोहरा अभिशाप’ आत्मकथा में अभिव्यक्त दलित स्त्री का संघर्ष
कौशल्या नंदेश्वर बैसंत्री की आत्मकथा 'दोहरा अभिशाप' में दलित महिलाओं के संघर्ष और जीवन उत्पीड़न की गाथा है। महिलाओं को समाज में अपने-आपको साबित करने के लिए ‘दोहरा संघर्ष’ करना होता है। 'दोहरा अभिशाप' आत्मकथा मात्र दलित महिलाओं की वेदना नहीं, समाज की संपूर्ण महिलाओं की वेदना है। यह आत्मकथा दलित समाज में महिला जीवन के तमाम… Continue reading ‘दोहरा अभिशाप’ आत्मकथा में अभिव्यक्त दलित स्त्री का संघर्ष
मुर्दहिया आत्मकथा में अभिव्यंजित स्त्री-जीवन
डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा मुर्दहिया केवल एक दलित लेखक का जीवन वृत्त नहीं बल्कि यह भारतीय ग्रामीण समाज की सामाजिक, जातिगत और लैंगिक असमानताओं का गहन दस्तावेज भी है। तुलसीराम ने अपने जीवन के अनुभवों के माध्यम से यह दिखाया है कि दलित समाज में स्त्री पर दोहरा शोषण होता है। तुलसीराम ने अपनी बहुचर्चित… Continue reading मुर्दहिया आत्मकथा में अभिव्यंजित स्त्री-जीवन