दरकती दीवारों में अब घर नज़र नहीं आता, रिश्तों में पहले-सा वो असर नज़र नहीं आता। हर शख़्स के चेहरे पर मुस्कान तो है लेकिन, आँखों में किसी के अब संवेदना नज़र नहीं आता। आँगन में कभी गूँजती थीं हँसी की किलकारियाँ, अब घर में कोई हँसता हुआ नज़र नहीं आता। दीवार उठी ऐसी कि… Continue reading ग़ज़ल : दरकती दीवारें
सुंदर विचार
राष्ट्र की एकता में हिन्दी भाषा का योगदान
भाषा सागर की तरह हमेशा बहती रहती है। यह रुकना नहीं जानती है। यही भाषा की स्वभाविक प्रकृति और प्रवृति है। भाषा एक सामाजिक शक्ति है, जिसे मनुष्य अपने पूर्वजों से सीखता है और अपने आने वाली पीढ़ियों को देता है। आने वाली पीढ़ी उसका आगे विकाश करती है। भारत एक विशाल देश है। यहाँ… Continue reading राष्ट्र की एकता में हिन्दी भाषा का योगदान
एन. गोपि के साहित्य में व्यक्त वृद्ध जीवन का समाजिक और मानसिक यथार्थ
आचार्य एन. गोपी तेलुगू भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित कविता संग्रह- ‘कालान्नी निद्र पोनीव्वनु’ के लिए इन्हें सन् 2000 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध कवि, साहित्यिक और आलोचक आचार्य एन. गोपि को प्रोफेसर कोठापल्ली जयशंकर पुरस्कार के लिए चुना गया है। आचार्य एन. गोपी एक प्रसिद्ध लेखक हैं।… Continue reading एन. गोपि के साहित्य में व्यक्त वृद्ध जीवन का समाजिक और मानसिक यथार्थ
श्री कुप्पल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा ‘कुवेम्पू’ : व्यक्तित्व और कृतित्व
सार: कुपल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा ‘कुवेम्पू’, कवि, नाटककार, उपन्यासकार, आलोचक तथा जीवनी लेखक थे। वे 20वीं सदी के सबसे महान कन्नड़ कवियों में से एक हैं। इनका जन्म 20 दिसंबर 1904 ई. को चिकमगलूर के कोप्पा में तथा निधन 11 नवंबर 1994 मैसूर, कर्नाटक में हुआ। वे ज्ञानपीठ पुरस्कार पानेवाले प्रथम कन्नड़ लेखक थे। उन्हें साहित्य… Continue reading श्री कुप्पल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा ‘कुवेम्पू’ : व्यक्तित्व और कृतित्व
मैं समय हूँ
मैं समय हूँ।मेरा जन्मसृष्टि के प्रथम स्पंदन के साथ हुआ।मैं बीते हुए युगों में भी था,आज भी हूँ,और आने वाले अनंत युगों तक रहूँगा। मैंने देखा है-अनंत काल सेपृथ्वी पर आधिपत्य की लड़ाई चलती रही है। लाखों वर्ष पूर्वइस धरती परडायनासोर जैसे महा बलशाली जीवों का साम्राज्य था,पर कालचक्र के एक ही झटके नेउनके अस्तित्व… Continue reading मैं समय हूँ
सगुण भक्ति की विशेषताएँ तथा सूरदास
और तुलसीदास के भक्ति साहित्य ईश्वर की 'सगुण' और 'साकार' रूप में विश्वास करने वाले भक्त कवियों को 'सगुण' भक्ति का नाम दिया गया है। वैष्णव भक्ति के उद्भव के साथ ही सगुण भक्तिधारा विकसित हो गई थी। भक्ति प्राचीन कालीन भारतीय वैदिक भक्ति का ही विकसित रूप है। 'सगुण' का अर्थ होता है परमसत्ता… Continue reading सगुण भक्ति की विशेषताएँ तथा सूरदास
भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग है
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार भक्ति काल की समय सीमा संवत् (1375-1700) तक मानी जाती है। हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल का महत्व अधिक है। हिंदी साहित्य के स्वर्ण-युग कहने का तात्पर्य है- वह काल जिसमें रचित साहित्य अपने पूर्ववर्ती या परवर्ती काल में रचित साहित्य से उत्कृष्ट कोटि का रहा हो इस दृष्टि… Continue reading भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग है
संघर्ष से शिखर तक
नरेंद्र दामोदरदास मोदी का 76वां जन्मदिन वडनगर की गलियों में जब,नन्हे बालक ने आँखें खोलीं,छोटा-सा घर, सीमित साधन,पर सपनों की दुनिया बोली। जीवन-मंत्र बनाया मेहनत को,पग-पग सीखा आगे बढ़ना,पिता संग चाय की दुकान परसीखा लोगों से मिलना-जुड़ना। न था अपना राजमहल,न सुख-सुविधाओं का संसार,पर मन में कुछ कर गुजरने काजलता था इक दृढ़ अंगार। कभी… Continue reading संघर्ष से शिखर तक
‘परिंदा’ उड़ गया
न कोई राजमहल,न कोई विरासत का ताज,काँटों की पगडंडी थी,आँखों में था एक आगाज़। मुंबई की गलियों में पला,संघर्षों से नाता जोड़ा,सिक्के नहीं थे जेब में मगर हौसलों की उड़ान ऊँची थी। कभी रंगों से सपने रचे,कभी मंच पर शब्द जिए,चेहरे पर जितने भाव थे,सब उसने रक्त से सिए । जब आया वह पर्दे पर,तब… Continue reading ‘परिंदा’ उड़ गया
हिंदी गद्य विधा का वैश्विक स्तर पर महत्व
जन जन की है भाषा हिंदी, जन समूह की जिज्ञासा हिंदी। जन जन में रची बसी है, जन मन की अभिलाषा हिंदी॥ वैश्विकरण का शाब्दिक अर्थ होता है किसी भी स्थानीय या क्षेत्रीय वस्तुओं का विश्व स्तर पर रूपांतर होना, 21वीं शताब्दी को अगर वैश्विकरण की शदी कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज वैश्विकरण… Continue reading हिंदी गद्य विधा का वैश्विक स्तर पर महत्व