सहायक क्रिया के वे अंश जिनसे उस क्रिया व्यापार के प्रति वक्ता की मानसिक अभिवृत्ति या ‘मूड’ (Mood) का पता चले वे ‘वृत्ति’ कहलाते हैं। वृत्ति का ‘क्रिया (प्रयोजन) /क्रियार्थ’ भी कहते हैं।
क्रिया के जिस रूप से वक्ता अथवा लेखक के मन की स्थिति का ज्ञान होता है,, उसे ‘वृत्ति’ कहते हैं। जैसे- आज्ञा, संदेह, संभावना, संकेत, निश्चय, अनुरोध आदि मुख्य वृत्तियाँ हैं।
वक्ता अथवा लेखक कभी आज्ञा देने की स्थिति में होता है तो कभी वह अनुरोध करता है। कभी वह बात को निश्चय के साथ कहता है या लिखता है और कभी किसी ओर संकेत करके सम्भावना व्यक्त करता हैं।
इस प्रकार वृति/क्रियार्थ के छः प्रकार होते हैं-
1. आज्ञार्थक वृत्ति/विध्यर्थ वृत्ति
2. संभावनार्थक वृत्ति
3. सामर्थ्यसूचक वृत्ति
4. बाध्यतासूचक वृत्ति
5. निश्चयार्थ वृत्ति (भविष्यत वृत्ति)
6. संकेतार्थक वृत्ति।
1. आज्ञार्थक वृत्ति/विध्यर्थ वृत्ति-
जिस वृत्ति से या जिस क्रिया के रूप से आज्ञा, अनुरोध, चेतावनी, निषेध, प्रार्थना आदि का बोध कराया जाता है, उसे आज्ञार्थक वृत्ति/विध्यर्थ वृत्ति कहते हैं। इस वृत्ति को व्यक्त करने वाले चिह्न हैं- ‘शून्य (0)’, -ओ, -इए, -ना तथा -इएगा ये सभी प्रत्यय मूल क्रिया (धातु) के साथ लगते हैं, जैसे-
आज्ञा (क) तू यहाँ से चला जा। (+ शून्य प्रत्यय)
आज्ञा/अनुरोध (ख) तुम घर जाओ। (+ ओ प्रत्यय)
अनुरोध/प्रार्थना (ग) जल्दी लौट आइए। (+ इए प्रत्यय)
‘-ओ, -इए’, प्रत्यय प्रायः उसी समय कार्य करने के संबंध में आज्ञा, अनुरोध या प्रार्थना का भाव प्रकट करते हैं। ‘-ना तथा -इएगा’, अप्रत्यक्ष रूप से आज्ञा/अनुरोध का भाव प्रकट करते हैं, जैसे-
(क) शाम को मंदिर चले जाना। (+ ना)
(ख) अरे आ ही जाना शाम को। (+ ना)
(ग) ज़रूर आ जाइएगा। (+ इएगा)
(घ) मेरा काम अवश्य कर दीजिएगा। (+ इएगा)
2. संभावनार्थक वृत्ति-
संभावनार्थक वृत्ति से किसी क्रिया के भविष्य में होने के बारे में पता चलता है या स्थितियों का बोध हो उसे संभावनार्थक वृत्ति कहते हैं। संभावनार्थक वृत्ति से वक्ता कार्य आरंभ होने के प्रति संभावना तो प्रकट करता ही है साथ ही इच्छा, कामना, अनुरोध, अप्रत्यक्ष आदेश का भाव भी व्यक्त कर सकता है। इस वृत्ति के सूचक चिह्न हैं- -ए, -एँ, -ऊँ, जैसे-
(क) शायद कल बारिस आए। (अनुमान)
(ख) हो सकता है गाड़ी न मिले। (संभावना)
(ग) आप घर लौट जाएँ।
(घ) अब मैं किधर जाऊँ?
3. सामर्थ्यसूचक वृत्ति-
सामर्थ्य और संभावना को प्रकट करने के लिए जिस वृत्ति का प्रयोग होता है या किया जाता है, उसे सामर्थ्यसूचक वृत्ति कहते है। इस वृत्ति के सूचक चिह्न हैं- ‘सक’ तथा ‘पा’ प्रायः सकना से सामर्थ्य, अनुमति और संभावना तीनों का ही पता चलता है, जैसे-
(क) वह मिठाई बन सकती है। (सामर्थ्य)
(ख) वह चल नहीं सकता। (असामर्थ्य)
(ग) आज मेरे मित्र घर आ सकते हैं। (संभावना)
(घ) बारिश हो भी सकती है। (संभावना)
(ड़) आप यहाँ बैठ सकते हैं। (अनुमति)
(च) क्या मैं भी आपके साथ चल सकती हूँ। (अनुमति)
4. बाध्यतासूचक वृत्ति–
बाध्यतासूचक वृत्ति से किसी क्रिया या कार्य व्यापार के घटित होने के विषय में ‘बाध्यता’ का बोध होता है, उसे बाध्यतासूचक वृत्ति कहते हैं। हिंदी में इस बाध्यता को ‘ना है’, ‘ना चाहिए’, ‘ना पड़’ सूचक के रूप में दिखाया जाता है, जैसे-
(क) मुझे अब घर जाना है।
(ख) नौकरी के लिए दर-दर भटकना पड़ता है।
(ग) बीमारी में दवाई जरूर लेनी चाहिए।
(घ) यह काम तो करना ही है।
(ड़) अब तुम्हें परिश्रम करना चाहिए।
(च) मुझे उनकी हर बात माननी पड़ती है।
5. निश्चयार्थ वृत्ति (भविष्यत वृत्ति)
आधुनिक भाषा विज्ञान ‘काल’ के दो भेद ही मानता है- वर्तमान काल तथा भूतकाल। ‘भविष्यत् काल’ को ‘भविष्यत् वृत्ति’ या ‘निश्चयार्थक वृत्ति’ माना जाता है जैसे- ‘मैं कल आगरा जाऊँगा’ इस वाक्य में अभी क्रिया आरंभ नहीं हुई है, केवल वक्ता की मानसिक अभिवृत्ति का पता चल रहा है कि वक्ता उक्त कार्य को अवश्य करेगा। अन्य उदाहरण देखते है। जैसे-
1. अब गाड़ी नहीं मिलेगी।
2. वे अब चल दिए होंगे।
3. वह अब कभी मैच नहीं खेलेगा।
6. संकेतार्थक वृत्ति-
कुछ वाक्यों में दो क्रियाएँ होती हैं तथा दोनों मही कार्य-कारण-संबंध होता है। जैसे- छुट्टी होती तो हम घूमने चलते। जिस वृत्ति से दो कार्य और कारण के संबंध का बोध होता है, उसे संकेतार्थक वृत्ति कहते हैं। जैसे-
1. यदि तुम पढ़ते तो पास हो जाते।
2. यदि गाड़ी आती तो में भी आ जाता।
3. यदि आप चलते तो मैं भी चल लेता।
4. वर्षा होता तो फसल अच्छी होती।
5. यदि वह मेहनत करता तो अवश्य उतीर्ण होता।
जय हिन्द