यह कविता उन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को समर्पित है, जिन्होंने वर्तमान समय में इस पार्टी को बनाया हैं। यह कविता उन लोगों को भी समर्पित है जिन्होंने इस ‘घिनौनी कीट’ को सोशल मिडिया पर बड़ी मात्रा में समर्थन दिया। तेल चट्टा, काला साया,गंदे कोनों और अँधेरी में पाया।नाली, कूड़े, सीलन, गंदगी,यही ‘कॉकरोच’ की है जिंदगी।… Continue reading तिलचट्टा (कॉकरोच)
Category: poems
मेरी कविताएँ
लाठी (गज़ल)
सफ़र की धूप में अब सहारा बनी है लाठी,ज़िंदगी के मोड़ की किनारा बनी है लाठी। कभी जो थामती थी उँगली किसी बच्चे की,अब उसी हाथ की पुकार बनी है लाठी। थके हुए कदमों को हर रोज़ सहलाती है,दर्द के हर सफ़र की दुलार बनी है लाठी। समय ने छीन ली रफ़्तार जब उम्र से,धीमी… Continue reading लाठी (गज़ल)
पीढ़ी दर पीढ़ी का प्यार
आज की पीढ़ी का प्यार बोलता है,हर पल शब्दों में खुद को तोलता है।सिर्फ मोबाइल और स्क्रीन पे दिल धड़कते हैं,इमोजी में जज़्बात रोज़ चमकते हैं। “आई लव यू” के संदेश सुबह-शाम,हर तस्वीर में रिश्तों का नाम।दुनिया को दिखाने की है होड़ बड़ी,भावनाओं की राह कहीं जाती मुड़ी। पहले की पीढ़ी का प्यार बोलता नहीं… Continue reading पीढ़ी दर पीढ़ी का प्यार
बिहार- भूत, वर्तमान, भविष्य और भूगोल
जिस गंगा की धारा नेकालजयी गीत सुनाए हैंजहाँ खेतों की हरियाली नेजीवन के स्वर सजाए हैं। यह वही है बिहार -भारत के मस्तक परअनुभव का तिलक लगाए हैं। भूतकाल में यह भूमि केवल भूमि नहीं, पुरखों की स्मृतियों का मान है कण-कण में गूँजता इसके अनगिनत इतिहास का गान है। पाटलिपुत्र की वीथियों मेंराजनीति ने… Continue reading बिहार- भूत, वर्तमान, भविष्य और भूगोल
लब्जों को बयाँ करती ‘आँखें’
ये आँखें…दो लकीरें नहीं,आत्मा की दरारें हैं-जहाँ से दर्दबिना आवाज़ किए रिसता है। कोरों पर जमे आँसूकभी गिरते नहीं,बस नमक बनकरअंदर ही अंदर जख़्मों को कुरेदते हैं। हमने गौर किया है-जब कोई बहुत गहराई से मुस्कुराता है,तो उसकी आँखें क्यों नम हो जाती हैं?क्योंकि वहाँ सत्य रहता है,और सत्य अक्सर अकेला होता है। इन आँखों… Continue reading लब्जों को बयाँ करती ‘आँखें’
नीरव वेदना की दीपशिखा: महादेवी
नीरव नभ की श्यामल छाया मेंकिसने यह करुणा-दीप जलाया?किस वीणा के मूक स्वरों नेअश्रु-संगीत जगत में गाया? वह तुम ही थीं-वेदना की वेणु पर जीवन का राग सुनाती,निशा की नीरव गोद में बैठपीड़ा की ज्योति जगाती। तुम्हारी पंक्तियों मेंदुख की मंदाकिनी बहती है,हर अक्षर में मानोआत्मा की अनुगूँज रहती है। नील गगन की उदास चाँदनी-सीतुम्हारी… Continue reading नीरव वेदना की दीपशिखा: महादेवी
कलम है जीवन की नैया (कविता)
कलम है जीवन की नैया,शब्द बने इसके पतवार,सोच के सागर पार कराती,दिखलाती सत्य का संसार। अज्ञान की काली घटाओं में,यह दीपक बन जलती है,झूठ, भ्रम और अंधकार को,क्षण भर में ही छलती है। जहाँ मौन बोझिल हो जाए,वहाँ कलम स्वर पाती है,दबी हुई हर पीड़ा को,काग़ज़ पर उतार लाती है। सत्ता से प्रश्न पूछे जो,वह… Continue reading कलम है जीवन की नैया (कविता)
“करुणा की दीपशिखा : महादेवी”
वेदना की वीणा परसजाया जिसने संगीत जीवन का शब्दों में आँसू पिरोकरमानवता का दीप जलाया। वह स्वर थी नीरव पीड़ा का,वह करुणा की गहरी धारा थी,हिंदी के नभ में चाँद बनीवह काव्य-गगन की तारा थी। मृदुल भाव की मंद बयार,संवेदना का अमर उजाला,हर पंक्ति में झरता दिखताहृदय का निर्मल नीर निराला। नारी के मौन संतापों… Continue reading “करुणा की दीपशिखा : महादेवी”
क्यों जिंदगी इम्तिहान लेती है?
पता नहीं क्यों? जिंदगी इतना, इम्तिहान क्यों लेती है? खुशियों को राहें छीन, गम ही गम देती है जो ढूँढ़ता है चैन, उसे वह भटकाती है दिल के उजाले को, वह अक्सर धूँधला बनाती हैं कभी आशाओं की दीप जलाती है तो कभी वह आँसुओं से बुझाती है हँसी के पल दिखाकर वह न जाने… Continue reading क्यों जिंदगी इम्तिहान लेती है?
“नीर भरी संध्या की वेणु”
नीलिमा के नीरव आँगन मेंकिसने यह दीप जलाया है?किसके करुण कपोलों सेअश्रु-मोती झर आया है? शायद किसी विरही बादल नेमन की पीड़ा गाई होगी,या चाँदनी की मौन लहर नेअंतर की वीणा छेड़ी होगी। वन की पथराई छाया मेंजब पवन सिसकियाँ भरता है,तब लगता है कोई प्राची सेमूक व्यथा का पत्र धरता है। ओ अज्ञात पथिक!तुम्हारे… Continue reading “नीर भरी संध्या की वेणु”