औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती है

औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।रीतियों की कठोर भट्ठी में,रिवाजों की आँच परधीरे-धीरे पकाई जाती है। बचपन से ही कहना शुरू कर दिया जाता“धीरे बोलो, कम बोलो,जोर से मत हँसो, सिर झुकाकर चलो,बड़े सपने मत देखो।" उसे सभी सिखाते हैघर-आँगन की जिम्मेदारी,और भाई के हाथों मेंसौंप दी जाती है दुनिया सारी। बचपन से ही… Continue reading औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती है

एक ख़ामोशी ही काफ़ी है

जब तक हम साथ हैं,तब तक सब कुछ सही हैथोड़ी हँसी, थोड़ी नाराज़गी,कुछ शिकवे, कुछ शिकायतें,कुछ अनकही-सी बातें...इन सबके बीचरिश्ता अभी ज़िंदा है। जब तक हम लड़ते हैं,एक-दूसरे से उलझते हैं,अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं,तब तक समझोहम एक-दूसरे के लिएमहत्त्वपूर्ण हैं। जब तक गुस्सा है,तब तक परवाह है,जब तक शिकायत है,तब तक उम्मीद… Continue reading एक ख़ामोशी ही काफ़ी है

शब्दों में भरकर संवेदना

शब्दों में भर संवेदना मैं तुम्हारी पीड़ा तक पहुँची हूँ, संदर्भों, साक्ष्यों और स्मृतियों के सहारे,जहाँ इतिहास मौन था, और साहित्य ने बोलना सीखा। अन्याय की हर दीवार पर, तुम्हारे जीवन की दरारें हैं,जिनसे झाँकता है, सदियों का दबा हुआ सच। तुम्हारी जिजीविषा ने सिखाया, संघर्ष केवल प्रतिरोध नहीं,एक सतत रचना है, मनुष्य बने रहने… Continue reading शब्दों में भरकर संवेदना

तिलचट्टा (कॉकरोच)

यह कविता उन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को समर्पित है, जिन्होंने वर्तमान समय में इस पार्टी को बनाया हैं। यह कविता उन लोगों को भी समर्पित है जिन्होंने इस ‘घिनौनी कीट’ को सोशल मिडिया पर बड़ी मात्रा में समर्थन दिया। तेल चट्टा, काला साया,गंदे कोनों और अँधेरी में पाया।नाली, कूड़े, सीलन, गंदगी,यही ‘कॉकरोच’ की है जिंदगी।… Continue reading तिलचट्टा (कॉकरोच)

लाठी (गज़ल)

सफ़र की धूप में अब सहारा बनी है लाठी,ज़िंदगी के मोड़ की किनारा बनी है लाठी। कभी जो थामती थी उँगली किसी बच्चे की,अब उसी हाथ की पुकार बनी है लाठी। थके हुए कदमों को हर रोज़ सहलाती है,दर्द के हर सफ़र की दुलार बनी है लाठी। समय ने छीन ली रफ़्तार जब उम्र से,धीमी… Continue reading लाठी (गज़ल)

पीढ़ी दर पीढ़ी का प्यार

आज की पीढ़ी का प्यार बोलता है,हर पल शब्दों में खुद को तोलता है।सिर्फ मोबाइल और स्क्रीन पे दिल धड़कते हैं,इमोजी में जज़्बात रोज़ चमकते हैं। “आई लव यू” के संदेश सुबह-शाम,हर तस्वीर में रिश्तों का नाम।दुनिया को दिखाने की है होड़ बड़ी,भावनाओं की राह कहीं जाती मुड़ी। पहले की पीढ़ी का प्यार बोलता नहीं… Continue reading पीढ़ी दर पीढ़ी का प्यार

बिहार- भूत, वर्तमान, भविष्य और भूगोल

जिस गंगा की धारा नेकालजयी गीत सुनाए हैंजहाँ खेतों की हरियाली नेजीवन के स्वर सजाए हैं। यह वही है बिहार -भारत के मस्तक परअनुभव का तिलक लगाए हैं। भूतकाल में यह भूमि केवल भूमि नहीं, पुरखों की स्मृतियों का मान है कण-कण में गूँजता इसके अनगिनत इतिहास का गान है।  पाटलिपुत्र की वीथियों मेंराजनीति ने… Continue reading बिहार- भूत, वर्तमान, भविष्य और भूगोल

लब्जों को बयाँ करती ‘आँखें’

ये आँखें…दो लकीरें नहीं,आत्मा की दरारें हैं-जहाँ से दर्दबिना आवाज़ किए रिसता है। कोरों पर जमे आँसूकभी गिरते नहीं,बस नमक बनकरअंदर ही अंदर जख़्मों को कुरेदते हैं। हमने गौर किया है-जब कोई बहुत गहराई से मुस्कुराता है,तो उसकी आँखें क्यों नम हो जाती हैं?क्योंकि वहाँ सत्य रहता है,और सत्य अक्सर अकेला होता है। इन आँखों… Continue reading लब्जों को बयाँ करती ‘आँखें’

नीरव वेदना की दीपशिखा: महादेवी

नीरव नभ की श्यामल छाया मेंकिसने यह करुणा-दीप जलाया?किस वीणा के मूक स्वरों नेअश्रु-संगीत जगत में गाया? वह तुम ही थीं-वेदना की वेणु पर जीवन का राग सुनाती,निशा की नीरव गोद में बैठपीड़ा की ज्योति जगाती। तुम्हारी पंक्तियों मेंदुख की मंदाकिनी बहती है,हर अक्षर में मानोआत्मा की अनुगूँज रहती है। नील गगन की उदास चाँदनी-सीतुम्हारी… Continue reading नीरव वेदना की दीपशिखा: महादेवी

कलम है जीवन की नैया (कविता)

कलम है जीवन की नैया,शब्द बने इसके पतवार,सोच के सागर पार कराती,दिखलाती सत्य का संसार। अज्ञान की काली घटाओं में,यह दीपक बन जलती है,झूठ, भ्रम और अंधकार को,क्षण भर में ही छलती है। जहाँ मौन बोझिल हो जाए,वहाँ कलम स्वर पाती है,दबी हुई हर पीड़ा को,काग़ज़ पर उतार लाती है। सत्ता से प्रश्न पूछे जो,वह… Continue reading कलम है जीवन की नैया (कविता)