नीरव नभ की श्यामल छाया मेंकिसने यह करुणा-दीप जलाया?किस वीणा के मूक स्वरों नेअश्रु-संगीत जगत में गाया? वह तुम ही थीं-वेदना की वेणु पर जीवन का राग सुनाती,निशा की नीरव गोद में बैठपीड़ा की ज्योति जगाती। तुम्हारी पंक्तियों मेंदुख की मंदाकिनी बहती है,हर अक्षर में मानोआत्मा की अनुगूँज रहती है। नील गगन की उदास चाँदनी-सीतुम्हारी… Continue reading नीरव वेदना की दीपशिखा: महादेवी
Category: poems
मेरी कविताएँ
कलम है जीवन की नैया (कविता)
कलम है जीवन की नैया,शब्द बने इसके पतवार,सोच के सागर पार कराती,दिखलाती सत्य का संसार। अज्ञान की काली घटाओं में,यह दीपक बन जलती है,झूठ, भ्रम और अंधकार को,क्षण भर में ही छलती है। जहाँ मौन बोझिल हो जाए,वहाँ कलम स्वर पाती है,दबी हुई हर पीड़ा को,काग़ज़ पर उतार लाती है। सत्ता से प्रश्न पूछे जो,वह… Continue reading कलम है जीवन की नैया (कविता)
“करुणा की दीपशिखा : महादेवी”
वेदना की वीणा परसजाया जिसने संगीत जीवन का शब्दों में आँसू पिरोकरमानवता का दीप जलाया। वह स्वर थी नीरव पीड़ा का,वह करुणा की गहरी धारा थी,हिंदी के नभ में चाँद बनीवह काव्य-गगन की तारा थी। मृदुल भाव की मंद बयार,संवेदना का अमर उजाला,हर पंक्ति में झरता दिखताहृदय का निर्मल नीर निराला। नारी के मौन संतापों… Continue reading “करुणा की दीपशिखा : महादेवी”
क्यों जिंदगी इम्तिहान लेती है?
पता नहीं क्यों? जिंदगी इतना, इम्तिहान क्यों लेती है? खुशियों को राहें छीन, गम ही गम देती है जो ढूँढ़ता है चैन, उसे वह भटकाती है दिल के उजाले को, वह अक्सर धूँधला बनाती हैं कभी आशाओं की दीप जलाती है तो कभी वह आँसुओं से बुझाती है हँसी के पल दिखाकर वह न जाने… Continue reading क्यों जिंदगी इम्तिहान लेती है?
“नीर भरी संध्या की वेणु”
नीलिमा के नीरव आँगन मेंकिसने यह दीप जलाया है?किसके करुण कपोलों सेअश्रु-मोती झर आया है? शायद किसी विरही बादल नेमन की पीड़ा गाई होगी,या चाँदनी की मौन लहर नेअंतर की वीणा छेड़ी होगी। वन की पथराई छाया मेंजब पवन सिसकियाँ भरता है,तब लगता है कोई प्राची सेमूक व्यथा का पत्र धरता है। ओ अज्ञात पथिक!तुम्हारे… Continue reading “नीर भरी संध्या की वेणु”
अज्ञेय की कविता ‘साँप’
अज्ञेय की कविता ‘साँप’ : विवेचना ‘साँप’ कविता में कवि साँप को प्रतीक बनाकर नगरीय सभ्यता में रहने वाले मनुष्य के दोगले और कुटिल चरित्र पर तीखा व्यंग्य करते हैं। कवि कहता है कि साँप नगर में तो बस गया है, पर वह सभ्य नहीं बन पाया। इसके माध्यम से कवि यह संकेत देता है… Continue reading अज्ञेय की कविता ‘साँप’
पोखरा ठकुराइन का (कविता)
एक दिन पोती ने दादी से पूछा-“दादी, ये बताओ न,सब कुछ ठकुराइन का ही क्यों है?” दादी मुस्कुराईं,झुर्रियों में छिपी कहानियों का पन्ना खोला-“क्यों बेटी, क्या पूछा तूने?” पोती बोली- पोखरा ठकुराइन का,कुआँ ठकुराइन का,तो फिर पानी किसका दादी?जिससे सबकी प्यास बुझे,उसपर भी उनका ही अधिकार है क्या? फुलवारी ठकुराइन की,आम-इमली ठकुराइन की,तो फिर फूलों… Continue reading पोखरा ठकुराइन का (कविता)
पुकार गौरैया की (कविता)
प्रकृति की गोद में रहती,नन्ही-सी प्यारी गौरइया।सबेरे गीत सुनाती सबको,जगाती अपने नौनिहालों को। था पेड़ों पर उसका घरौंदा,फूलों से महका था आँगन।मानव ने जब कटवाए पेड़,लूट गया उसका मधुर जीवन। रोकर फिर, बोली गौरइया —“अब घर मैं कहाँ बनाऊँगी?कहाँ मिलेगा ठिकाना मुझको,अपने बच्चे कैसे पालूँगी?” बच्चों ने दी उसको हिम्मत —“मत रो, हम लाएँगे हरियाली।हम… Continue reading पुकार गौरैया की (कविता)
‘नदी के द्वीप’-‘अज्ञेय’ (कविता) महत्वपूर्ण तथ्य
*यह कविता अज्ञेय द्वारा 11 दिसंबर, 1949 ई. को इलाहबाद में लिखी गयी। *यह 1965 ई. में आये उनके काव्य संग्रह ‘हरी घास पर क्षण भर’ में संकलित है। यह ‘प्रतीकात्मक’ कविता है। *‘नदी’ परंपरा और संस्कृति का प्रतीक है और ‘द्वीप’ व्यक्तित्व का प्रतीक है। *विशिष्ट व्यक्तित्व होना दुर्भाग्य नहीं सौभाग्य की बात है।… Continue reading ‘नदी के द्वीप’-‘अज्ञेय’ (कविता) महत्वपूर्ण तथ्य
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (संघ प्रार्थना)
“नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोऽहम्।” अर्थ- हे! सदा सुख-स्नेह और प्यार करने वाली मातृभूमि, मैं तुझे सदैव नमस्कार करता हूँ। तूने हमें सुख से लालन-पालन किया है। “महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थेपतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥” अर्थ- हे पुण्यभूमि! हे मंगलमयी मातृभूमि! तेरी सुरक्षा और सेवाकार्य में मेरा यह शरीर समर्पित हो। मैं तुझे बारंबार… Continue reading राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (संघ प्रार्थना)