ग़ज़ल : दरकती दीवारें

दरकती दीवारों में अब घर नज़र नहीं आता, रिश्तों में पहले-सा वो असर नज़र नहीं आता। हर शख़्स के चेहरे पर मुस्कान तो है लेकिन, आँखों में किसी के अब संवेदना नज़र नहीं आता। आँगन में कभी गूँजती थीं हँसी की किलकारियाँ, अब घर में कोई हँसता हुआ नज़र नहीं आता। दीवार उठी ऐसी कि… Continue reading ग़ज़ल : दरकती दीवारें

मैं समय हूँ

मैं समय हूँ।मेरा जन्मसृष्टि के प्रथम स्पंदन के साथ हुआ।मैं बीते हुए युगों में भी था,आज भी हूँ,और आने वाले अनंत युगों तक रहूँगा। मैंने देखा है-अनंत काल सेपृथ्वी पर आधिपत्य की लड़ाई चलती रही है। लाखों वर्ष पूर्वइस धरती परडायनासोर जैसे महा बलशाली जीवों का साम्राज्य था,पर कालचक्र के एक ही झटके नेउनके अस्तित्व… Continue reading मैं समय हूँ

संघर्ष से शिखर तक

नरेंद्र दामोदरदास मोदी का 76वां जन्मदिन वडनगर की गलियों में जब,नन्हे बालक ने आँखें खोलीं,छोटा-सा घर, सीमित साधन,पर सपनों की दुनिया बोली। जीवन-मंत्र बनाया मेहनत को,पग-पग सीखा आगे बढ़ना,पिता संग चाय की दुकान परसीखा लोगों से मिलना-जुड़ना। न था अपना राजमहल,न सुख-सुविधाओं का संसार,पर मन में कुछ कर गुजरने काजलता था इक दृढ़ अंगार। कभी… Continue reading संघर्ष से शिखर तक

‘परिंदा’ उड़ गया

न कोई राजमहल,न कोई विरासत का ताज,काँटों की पगडंडी थी,आँखों में था एक आगाज़। मुंबई की गलियों में पला,संघर्षों से नाता जोड़ा,सिक्के नहीं थे जेब में मगर हौसलों की उड़ान ऊँची थी। कभी रंगों से सपने रचे,कभी मंच पर शब्द जिए,चेहरे पर जितने भाव थे,सब उसने रक्त से सिए । जब आया वह पर्दे पर,तब… Continue reading ‘परिंदा’ उड़ गया

‘यूट्यूब’ विश्वविद्यालय

आज के युग का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय,न ईंटों का, न ऊँची दीवारों का।खुला है द्वार जिसका हर पल, नाम है उसका – यूट्यूब विश्वविद्यालय। जूता सिलाई से चंडी-पाठ तक,हर विद्या का मिलता ज्ञान।सीखे कोई खेती, या सीखे कंप्यूटर,बने कोई कलाकार, या बने विद्वान। दिखता स्क्रीन पर गुरु का चेहरा,शिष्य बैठे घर पाठ है पढ़ता।न घंटी… Continue reading ‘यूट्यूब’ विश्वविद्यालय

कोसी नदी : बिहार का शोक

कोसी नदी : बिहार का शोक मैं हिमालय की गोद में जन्मी,बर्फीली चट्टानों को चीरती,कहीं अरुण, कहीं सुनकोसी,कहीं तमोर बनकर बहती हूँमैं तीन धाराओं का संगम,पहाड़ों की बेटी हूँ। नेपाल की घाटियों से उतरजब मैदानों की ओर चली,अपने साथ हिम का पानी,पहाड़ों की मिट्टी,और सदियों की स्मृतियाँ लाई। मैं कोसी हूँ,किसी ने मुझे सप्तकोसी कहा,किसी… Continue reading कोसी नदी : बिहार का शोक

औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती है

औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।रीतियों की कठोर भट्ठी में,रिवाजों की आँच परधीरे-धीरे पकाई जाती है। बचपन से ही कहना शुरू कर दिया जाता“धीरे बोलो, कम बोलो,जोर से मत हँसो, सिर झुकाकर चलो,बड़े सपने मत देखो।" उसे सभी सिखाते हैघर-आँगन की जिम्मेदारी,और भाई के हाथों मेंसौंप दी जाती है दुनिया सारी। बचपन से ही… Continue reading औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती है

एक ख़ामोशी ही काफ़ी है

जब तक हम साथ हैं,तब तक सब कुछ सही हैथोड़ी हँसी, थोड़ी नाराज़गी,कुछ शिकवे, कुछ शिकायतें,कुछ अनकही-सी बातें...इन सबके बीचरिश्ता अभी ज़िंदा है। जब तक हम लड़ते हैं,एक-दूसरे से उलझते हैं,अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं,तब तक समझोहम एक-दूसरे के लिएमहत्त्वपूर्ण हैं। जब तक गुस्सा है,तब तक परवाह है,जब तक शिकायत है,तब तक उम्मीद… Continue reading एक ख़ामोशी ही काफ़ी है

शब्दों में भरकर संवेदना

शब्दों में भर संवेदना मैं तुम्हारी पीड़ा तक पहुँची हूँ, संदर्भों, साक्ष्यों और स्मृतियों के सहारे,जहाँ इतिहास मौन था, और साहित्य ने बोलना सीखा। अन्याय की हर दीवार पर, तुम्हारे जीवन की दरारें हैं,जिनसे झाँकता है, सदियों का दबा हुआ सच। तुम्हारी जिजीविषा ने सिखाया, संघर्ष केवल प्रतिरोध नहीं,एक सतत रचना है, मनुष्य बने रहने… Continue reading शब्दों में भरकर संवेदना

तिलचट्टा (कॉकरोच)

यह कविता उन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को समर्पित है, जिन्होंने वर्तमान समय में इस पार्टी को बनाया हैं। यह कविता उन लोगों को भी समर्पित है जिन्होंने इस ‘घिनौनी कीट’ को सोशल मिडिया पर बड़ी मात्रा में समर्थन दिया। तेल चट्टा, काला साया,गंदे कोनों और अँधेरी में पाया।नाली, कूड़े, सीलन, गंदगी,यही ‘कॉकरोच’ की है जिंदगी।… Continue reading तिलचट्टा (कॉकरोच)