
*यह कविता अज्ञेय द्वारा 11 दिसंबर, 1949 ई. को इलाहबाद में लिखी गयी।
*यह 1965 ई. में आये उनके काव्य संग्रह ‘हरी घास पर क्षण भर’ में संकलित है। यह ‘प्रतीकात्मक’ कविता है।
*‘नदी’ परंपरा और संस्कृति का प्रतीक है और ‘द्वीप’ व्यक्तित्व का प्रतीक है।
*विशिष्ट व्यक्तित्व होना दुर्भाग्य नहीं सौभाग्य की बात है।
*जिस प्रकार नदी ‘द्वीप’ और बड़े भूखंड को जोड़ती है उसी प्रकार हमारी परंपरा हमें अपने समाज और इतिहास से जोड़ती है।
*कविता में आए प्रतीकों के दो-दो अर्थ हैं- पहला प्राकृतिक है (द्वीप, नदी, भूखण्ड) और दूसरा मानवीय (शिशु, माँ, पिता) और ये दोनों मिलकर प्रकृति और मनुष्य के अविभाज्य सृष्टि-संबंध को अभिव्यक्त करते हैं।
*‘द्वीप’ का अर्थ है ‘टापू’। द्वीप वह भूभाग है, जो चारों ओर से जल से घिरा रहता है और इसका निर्माण ‘नदी’ से ही हुआ है। ‘नदी’ यहाँ वंश-परम्परा एवं माँ की प्रतीक है, ‘द्वीप’ व्यक्ति का प्रतीक है और’ भूखंड’ समाज एवं पिता का प्रतीक है।
*कवि ‘नदी’, ‘द्वीप’ एवं ‘भूखंड’ के प्रतीकात्मक अर्थ द्वारा हमें ये बताना चाहते हैं कि ‘नदी’ एक माँ की तरह अपने पुत्र यानि ‘द्वीप’ को संस्कार देती है, उसके स्वभाव को माँजती है। ‘द्वीप’ की अपनी एक अलग पहचान है। वह अपनी निजता खोकर भी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाता है, वरन् ‘नदी’ के अस्तित्व के लिए भी खतरा बन जाता है। समाज से जुड़कर ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को असली पहचान मिलती है। समाज यहाँ ‘भूखंड’ है, जो द्वीप का पिता भी है। पिता के बिना बच्चे की पहचान अधूरी है।
*नदी एवं द्वीप के अटूट सम्बन्ध को माँ एवं पुत्र के रूप में दिखाते हुए कवि ने द्वीप द्वारा प्रसन्न मुद्रा में नदी को अपनी जननी स्वीकारते हुए कहा है…
“माँ है वह! इसी से हम बने हैं”
*द्वीप नदी का आभार मानते हुए कहता हैं- उसी से उनको आकार, कोण, गोलाइयाँ, उभार एवं रेतीले किनारे मिले हैं। नदी से ही उनका अस्तित्व है, ठीक उसी तरह जैसे माँ बच्चे को जन्म देती है उसे नीति का, जीवन मूल्यों का, प्यार, विश्वास और मान्यताओं का संस्कार देती है, उसके मन को गढ़ती है। संस्कृति वैसे ही व्यक्तित्व की रूपरेखा, चाल-चलन, चरित्र और मानवीय मूल्य-बोध को गढ़ती है।
*इस कविता में परंपरा और संस्कृति को माँ तथा समाज व इतिहास को पिता के रूप में देखा गया है।
‘नदी के द्वीप’ (कविता)
हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर
स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।
माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप।
हम धारा नहीं हैं।
स्थिर समर्पण है हमारा, हम सदा से द्वीप
हैं स्रोतस्विनी के।
किंतु हम बहते नहीं हैं।
क्योंकि बहना रेत होना है।
हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।
पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे. सहेंगे।
बह जाएँगे।
और फिर हम चूर्ण होकर भी कभी क्या धार बन सकते?
रेत बनकर हम सलिल को तनिक गँदला ही करेंगे।
अनुपयोगी ही बनाएँगे।
द्वीप हैं हम!
यह नहीं है शाप। यह अपनी नियती है।
हम नदी के पुत्र हैं। बैठे नदी की क्रोड में।
वह बृहत भूखंड से हम को मिलाती है।
और वह भूखंड अपना पितर है।
नदी तुम बहती चलो।
भूखंड से जो दाय हमको मिला है, मिलता रहा है,
माँजती, संस्कार देती चलो। यदि ऐसा कभी हो
तुम्हारे आह्लाद से या दूसरों के,
किसी स्वैराचार से, अतिचार से,
तुम बढ़ो, प्लावन तुम्हारा घरघरा उठे –
यह स्रोतस्विनी ही कर्मनाशा कीर्तिनाशा घोर काल,
प्रावाहिनी बन जाए –
तो हमें स्वीकार है वह भी, उसी में रेत होकर।
फिर छनेंगे हम, जमेंगे हम, कहीं फिर पैर टेकेंगे।
कहीं फिर भी खड़ा होगा नए व्यक्तित्व का आकार।
मात:, उसे फिर संस्कार तुम देना।
इस कविता में द्वीप स्वयं कवि अज्ञेय के व्यक्तित्व का प्रतिरूप है। द्वीप पर कवि के प्रखर व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट लक्षित होती है।
जय हिंद