रामरस (नमक) salt

हमारे जीवन में रामरस का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। जिस प्रकार राम के बिना जीवन अधूरा है। उसी प्रकार रामरस के बिना भोजन अधूरा है। हम चाहे जितना भी जायकेदार भोजन बना ले और उसमे नमक नहीं डाले तो भोजन का जायका ही बिगड़ जाता है। नमक रसोईघर की सबसे महत्वपूर्ण वस्तु है। यह… Continue reading रामरस (नमक) salt

नमस्कार का मीठा फल

‘नमस्कार’ या ‘प्रणाम’ करना ‘संस्कार’ और ‘सम्मान’ दोनों है। प्रणाम एक यौगिक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भी है। भारत में दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार और प्रणाम करने की परम्परा रही है। नमस्कार करने से सामने वाला व्यक्ति अपने आप विनम्र हो जाता है। ‘नमस्कार’ ‘नमः’ धातु से बना है। नमः का अर्थ होता है ‘नमन करना’… Continue reading नमस्कार का मीठा फल

सुशीला (संस्मरण)

सावन का महीना था। गांव में चारों तरफ हरियाली ही हरियाली दिखाई दे रही थी। कभी रिमझिम हल्की सी फुहार, कभी जोर से बरसात, कभी काली घटाओं का घिरना और चले जाना तो कभी बिजली कड़कना और जोर से बरसना। ये सभी प्राकृतिक क्रियाएं मन को बहुत ही लुभा रही थी। गाँव के सभी लोग… Continue reading सुशीला (संस्मरण)

खुद्बुदी चिरैया

प्रकृति का हर प्राणी, हर जीव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में एक दूसरे पर निर्भर हैं। हमारे देश में पक्षियों की बहुत सारी प्रजातियाँ पाई जाती है। गौरया उनमे एक छोटी सी चिड़िया है। यह एक घरेलू चिड़िया है। जहाँ लोग रहते है, वही पर यह नन्हीं चिड़िया रहना पसंद करती है। गौरया मानव के… Continue reading खुद्बुदी चिरैया

ईश्वर के नाम पत्र

हे परमेश्वर!   चरण स्पर्श  हे प्रभू! बहुत दिनों से मेरे मन में कुछ विचार आ रहे थे। मन बहुत ही चिंतित और व्याकुल था। मैं अपने अंतर्मन की बात किससे कहूँ। यह समझ में नहीं आ रहा था। लोगों से कहने पर वे तो हँसेंगे या मजाक उड़ाएंगे। रहीम कवि ने कहा था- “रहिमन… Continue reading ईश्वर के नाम पत्र

भाषा एवं संस्कृति के प्रसार में अनुवाद की भूमिका

आज के युग को यदि अनुवाद का युग कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति होने से आज विश्व सिमट कर छोटा होता जा रहा है। यातायात और संचार के साधनों में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है जिसके फलस्वरूप हम भौगोलिक सीमाओं को पार कर बड़े-बड़े और दूर-दूर के देशों से… Continue reading भाषा एवं संस्कृति के प्रसार में अनुवाद की भूमिका

भारतीय संस्कृति और राष्ट्र

भूमिका- भारतीय संस्कृति प्राचीन एवं गौरवपूर्ण है। विश्व संस्कृति के इतिहास में इसका विशिष्ठ स्थान है। इस संस्कृति को समृद्ध और समुन्नत बनाने में हमारे ऋषियों, मुनियों, साधू-संतों, दार्शनिकों, विचारकों, आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गुरु वेदव्यास, बाल्मीकि, कालिदास, स्वयंभू, पुष्पदंत, संत तुलसीदास, संत कबीर दास, गरुनानक देव, गुरुगोविंद सिंह, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, जयशंकर… Continue reading भारतीय संस्कृति और राष्ट्र

द फिलास्फी ऑफ बम

दुर्गा भाभी 07 अक्तूबर 1902 – 14 अक्तूबर 1999 दुर्गा भाभी एक ऐसी महान क्रांतिकारी महिला थीं, जिसने भारत की आजादी के लिए अपने पति तक को न्योछावर कर दिया। मुझे कवि श्यामपाल सिंह की वे पंक्तियाँ याद आ रही हैं जो उन्होंने ‘चंद्रशेखर आजाद’ के बारे में लिखा था- ‘स्वतंत्रता  रण के रणनायक  अमर… Continue reading द फिलास्फी ऑफ बम

छायावाद में मुकुटधर पाण्डेय की भूमिका (आलेख)

हिन्दी साहित्य को पढ़ना और पढ़ाना जितना आसान समझा जाता है, असल में यह उतना आसन है नहीं। हिन्दी साहित्य में अनेक विधाएं हैं। उन सभी विधाओं में काव्य और काव्य की विधा में ‘छायावाद’ का तो कुछ कहना ही नहीं। छायावाद हिन्दी साहित्य की अत्यंत समृद्ध, सौन्दर्यशालिनी, सशक्त एवं कलात्मक काव्यधारा रही है। हिन्दी… Continue reading छायावाद में मुकुटधर पाण्डेय की भूमिका (आलेख)

गोत्र (Lineage)

विवाह के पश्चात् हर बेटी या लड़की को उसके पिता का गोत्र छोड़कर पति का गोत्र अपनाना होता है। यह एक परम्परा है। इस परम्परा के पीछे कुछ कारण अवश्य होंगे। उसे जानने और समझने का प्रयास करते हैं। पहले इसका वैज्ञानिक कारण जानने का प्रयास करते हैं। हम सभी जानते हैं कि स्त्री में… Continue reading गोत्र (Lineage)