राष्ट्र की एकता में हिन्दी भाषा का योगदान

भाषा सागर की तरह हमेशा बहती रहती है। यह रुकना नहीं जानती है। यही भाषा की स्वभाविक प्रकृति और प्रवृति है। भाषा एक सामाजिक शक्ति है, जिसे मनुष्य अपने पूर्वजों से सीखता है और अपने आने वाली पीढ़ियों को देता है। आने वाली पीढ़ी उसका आगे विकाश करती है। भारत एक विशाल देश है। यहाँ… Continue reading राष्ट्र की एकता में हिन्दी भाषा का योगदान

एन. गोपि के साहित्य में व्यक्त वृद्ध जीवन का समाजिक और मानसिक यथार्थ

आचार्य एन. गोपी तेलुगू भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित कविता संग्रह- ‘कालान्नी निद्र पोनीव्वनु’ के लिए इन्हें सन् 2000 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध कवि, साहित्यिक और आलोचक आचार्य एन. गोपि को प्रोफेसर कोठापल्ली जयशंकर पुरस्कार के लिए चुना गया है। आचार्य एन. गोपी एक प्रसिद्ध लेखक हैं।… Continue reading एन. गोपि के साहित्य में व्यक्त वृद्ध जीवन का समाजिक और मानसिक यथार्थ

श्री कुप्पल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा ‘कुवेम्पू’ : व्यक्तित्व और कृतित्व

सार: कुपल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा ‘कुवेम्पू’, कवि, नाटककार, उपन्यासकार, आलोचक तथा जीवनी लेखक थे। वे 20वीं सदी के सबसे महान कन्नड़ कवियों में से एक हैं। इनका जन्म 20 दिसंबर 1904 ई. को चिकमगलूर के कोप्पा में तथा निधन 11 नवंबर 1994 मैसूर, कर्नाटक में हुआ। वे ज्ञानपीठ पुरस्कार पानेवाले प्रथम कन्नड़ लेखक थे। उन्हें साहित्य… Continue reading श्री कुप्पल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा ‘कुवेम्पू’ : व्यक्तित्व और कृतित्व

सगुण भक्ति की विशेषताएँ तथा सूरदास

 और तुलसीदास के भक्ति साहित्य ईश्वर की 'सगुण' और 'साकार' रूप में विश्वास करने वाले भक्त कवियों को 'सगुण' भक्ति का नाम दिया गया है। वैष्णव भक्ति के उद्भव के साथ ही सगुण भक्तिधारा विकसित हो गई थी। भक्ति प्राचीन कालीन भारतीय वैदिक भक्ति का ही विकसित रूप है। 'सगुण' का अर्थ होता है परमसत्ता… Continue reading सगुण भक्ति की विशेषताएँ तथा सूरदास

भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग है

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार भक्ति काल की समय सीमा संवत् (1375-1700) तक मानी जाती है। हिंदी साहित्य के इतिहास में भक्तिकाल का महत्व अधिक है। हिंदी साहित्य के स्वर्ण-युग कहने का तात्पर्य है- वह काल जिसमें रचित साहित्य अपने पूर्ववर्ती  या परवर्ती काल में रचित साहित्य से उत्कृष्ट कोटि का रहा हो इस दृष्टि… Continue reading भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग है

हिंदी गद्य विधा का वैश्विक स्तर पर महत्व

जन जन की है भाषा हिंदी, जन समूह की जिज्ञासा हिंदी। जन जन में रची बसी है, जन मन की  अभिलाषा  हिंदी॥ वैश्विकरण का शाब्दिक अर्थ होता है किसी भी स्थानीय या क्षेत्रीय वस्तुओं का विश्व स्तर पर रूपांतर होना, 21वीं शताब्दी को अगर वैश्विकरण की शदी कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आज वैश्विकरण… Continue reading हिंदी गद्य विधा का वैश्विक स्तर पर महत्व

हिंदी का भविष्य आशंकाएँ, चुनौतियाँ और संभावनाएँ

हिंदी भाषा का भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन वैश्वीकरण और तकनीक के तीव्र विस्तार के इस दौर में उसके सामने अनेक गंभीर आशंकाएँ, चुनौतियाँ और अपार संभावनाएँ भी उपस्थित हैं। हिंदी केवल भारत में सर्वाधिक बोली और समझी जाने वाली भाषाओं में से एक नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति, लोकजीवन, भावबोध और… Continue reading हिंदी का भविष्य आशंकाएँ, चुनौतियाँ और संभावनाएँ

समकालीन हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन

भूमिका- भारत विभिन्नताओं में एकता का देश है। सदियों से भारतीय समाज में अनेक वर्ण, जाति, धर्म तथा संप्रदाय के लोग एक साथ मिलकर रहते आये हैं। आदिवासी समुदाय भी अनेक क्रिया-कलापों के साथ संगठित रूप से रहते हैं। आज भी बहुत से आदिवासी जंगलों पहाड़ों और दुर्गम प्रदेशों में रहकर अपना जीवन यापन करते… Continue reading समकालीन हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन

हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में पुरुष विमर्श : एक विवेचन

परिवर्तन, विकास, क्रांति ये प्रकृति के शाश्वत नियम हैं। हर युग में क्रांतियाँ और आंदोलन हुए हैं, आज भी हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। जिसके फलस्वरूप व्यवस्था में परिवर्तन हुआ है और निरंतर विकास का मार्ग प्रसस्त होता रहा है। पृथ्वी पर जब से जीवन की उत्पति हुई है, तब से निरंतर… Continue reading हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में पुरुष विमर्श : एक विवेचन

‘छायावाद’ में शैव दर्शन

छायावादी काव्य हिंदी साहित्य महत्त्वपूर्ण काव्य-आंदोलन है, जिसमें आत्मानुभूति, प्रकृति-सौंदर्य, रहस्यबोध, प्रेम, सौंदर्य और मानवीय चेतना के साथ भारतीय दार्शनिक परंपराओं का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। इनमें शैव दर्शन, विशेषतः कश्मीर शैव दर्शन, की छाप जयशंकर प्रसाद के काव्य में सबसे अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। प्रसाद की कामायनी को इस दृष्टि… Continue reading ‘छायावाद’ में शैव दर्शन