श्री कुप्पल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा ‘कुवेम्पू’व्यक्त्तित्व और एवं कृतित्व

परिचय: कुपल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा ‘कुवेम्पू’, कन्नड़ साहित्य के क्षेत्र में ‘कुवेम्पू’ के नाम से विख्यात हैं। वे भारतीय कवि नाटककार, उपन्यासकार और आलोचक तथा जीवनी लेखक थे। मुख्य तौर पर उन्हें 20वीं सदी के सबसे महान कन्नड़ कवियों में से एक माना जाता है। कुवेम्पू का जन्म 20 दिसंबर 1904 ई. को चिकमगलूर के कोप्पा में एक साधारण परिवार में हुआ था। इनका निधन 11 नवंबर 1994 मैसूर, कर्नाटक में हुआ।

‘कुवेम्पू’ जी ने रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु बनाया था। कुवेम्पू कन्नड़ भाषा के महान लेखक और कवियों में गिने जाते हैं। वे ज्ञानपीठ पुरस्कार पानेवाले प्रथम कन्नड़ लेखक थे। उन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में ‘पद्म भूषण’ से भी सम्मानित किया गया है। उनके द्वारा रचित एक महाकाव्य ‘श्री रामायण दर्शनम्’ के लिए 1955 ई. में उन्हें ‘साहित्य अकादमी’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। शिमोग्गा जिले के तीर्थहल्ली स्थित उनके पैतृक घर में एक बार चोर घुस गए। चोर उनके ‘पद्म भूषण’ पुरस्कार को चुरा कर ले गए लेकिन ‘ज्ञानपीठ’ और ‘पदम् श्री’ पुरस्कार को छोड़ दिए।

प्रारम्भिक जीवन और शिक्षा:

बचपन में कुवेम्पु को एक शिक्षक ने घर पर ही शिक्षा दी थी। वह अपनी मिडिल स्कूल की शिक्षा जारी रखने के लिए थिरथाहल्ली में एंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल में शामिल हो गए। उन्होंने अपनी निचली और माध्यमिक शिक्षा तीर्थहल्ली में कन्नड़ और अंग्रेजी भाषाओं में पूरी की और वेस्लेयन हाई स्कूल में आगे की शिक्षा के लिए मैसूर चले गए। इसके बाद, उन्होंने मैसूर के महाराजा कॉलेज में कॉलेज की पढ़ाई की और 1929 में कन्नड़ में स्नातक की उपाधि प्राप्त किया। 

परिवार:

कुवेम्पु के पिता का नाम वेंकटप्पा तीर्थइल्ली तथा माँ का नाम सिताम्मा कोप्पा था। वे मूल रूप से शिमोगा जिले के रहनेवाले थे। कुवेम्पू जब बारह वर्ष के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया था। 30 अप्रैल 1937 को कुवेम्पु जी का हेमवती से विवाह हुआ था। कुवेम्पु के दो बेटे, पूर्णचंद्र तेजस्वी और कोकिलोडाय चैत्र, और दो बेटियाँ, इंदुकला और थारिनी हैं। थारिनी का विवाह कुवेम्पु विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति के. चिदानंद गौड़ा से हुआ है। मैसूर में उनके घर को उदयरावी कहा जाता है। उनके पुत्र पूर्णचंद्र तेजस्वी एक बहुज्ञ थे, जिन्होंने कन्नड़ साहित्य, फोटोग्राफी, सुलेख, डिजिटल इमेजिंग, सामाजिक आंदोलनों और कृषि में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 

आजीविका:

1929 ई. में कुवेम्पू ने मैसूर के महाराजा कॉलेज में कन्नड़ भाषा के व्याख्याता के रूप में अपना नया जीवन शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने 1946 ई. में ‘सेंट्रल कॉलेज’, बैंगलोर में सहायक प्रोफ़ेसर के रूप में कार्य किया। 1946 ई. में वे फिर से मैसूर कॉलेज आ गए। 1955 ई. में वे मैसूर कॉलेज में प्राचार्य बने थे। 1956 ई. में उन्हें मैसूर विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में मनोनित कर लिया गया था। यहाँ वे सेवानिवृत्ति तक कार्यरत रहे। वे मैसूर विश्वविद्यालय से उस पद तक पहुँचने वाले प्रथम स्नातक थे।

साहित्य के क्षेत्र में योगदान:

1930 ई. में कुवेम्पू की पहली कविता संग्रह ‘कोलालू’ प्रकाशित हुआ। हालांकि उनको प्रसिद्धि उनके रामायण के रूपांतरण ‘श्री रामायण दर्शनम्’ से मिली। इस ग्रंथ में कुवेम्पू जी ने राम के चरित्र को एक नया दृष्टिकोण दिया है। ‘श्री रामायण दर्शनम्’ उनके द्वारा रचित महाकाव्य है। ‘श्री रामायण दर्शनम्’ के लिए कुवेम्पू जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। ग्रंथ की मूल धारा में उर्मिला के त्याग की महिमा ध्वनित हुई है। मंथरा के साथ भी कुवेम्पू जी की मानवीय दृष्टि जाग्रत हुई है। इसमें मंथरा का कंलक धूल गया है और वह रक्त, मांस तथा हृदय से परिपूर्ण एक व्यक्ति बनकर प्रस्तुत होती है। गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं में अपनी लेखनी का जादू बिखेरने वाले कुपल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा ‘कुवेम्पू’ को साहित्य जगत में बेहद प्रसिद्धि ‘कुवेम्पू’ के नाम से ही मिली। कुवेम्पू जी ने कन्नड़ रंगमंच में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इनके चौदह नाटकों के साथ यमना सोलू ने 1927 ई. में सावित्री कि पौराणिक वीरता का जश्न मनाया। कुवेम्पू जाती व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करनेवाले पहले कन्नड़ कट्टरपंथी में से एक थे। इन्होंने 1928 ई. में ब्राह्मणवादी मूल्यों ‘माजलगारा’ (मेहतर) द्वारा उत्पन्न अछूतों की सामाजिक बुराई को चित्रित किया। 1930 ई. में अशुभ ‘स्मासना कुरुक्षेत्र’ (कुरुक्षेत्र श्मशान भूमि) को प्रतीकात्मक रूप से महाभारत युद्ध की त्रासदी को दर्शाया। 1931 ई. में ‘महारात्री’ (मोमेंट्स नाईट) में सिद्धार्थ के जीवन और त्याग को दस दृश्यों में नाटकीय रूप दिया। 1931 ई. में ही इनका वाल्मिकीय भाग्य (वाल्मीकियन भाग्य) भगवान् राम द्वारा सीता के परित्याग का प्रसिद्ध प्रकरण था। 1944 ई. में विवादास्पद ‘शुद्र तपस्वी’ ने रामायण में वर्णित शुद्र संत संबुक की उदात्तता पर प्रकाश डाला और ब्राह्मणवाद की कथित श्रेष्ठता पर सवाल उठाया। 1947 ई. में ‘बेरलगे कोरल’ (ए थ्रोट फॉर ए थंब) स्व निर्मित व्यक्ति एकलव्य की कथा पर एक दार्शनिक नाटक था। 1963 ई. में चंदमहासा ने शास्त्रीय शैली और परिपाटी के माध्यम से इसी नाम के नायक के जीवन का वर्णन किया है। 1974 में ‘कनीना’ (वर्जिन बॉर्न) ने जन्म की दुर्घटना और मनुष्य के आतंरिक मूल्य के बीच विरोधाभास को उजागर करते हुए, काम और परशुराम के बीच पौराणिक मुठभेड़ को दर्शाया है।

कुवेम्पू ने 1930-31 के बीच बच्चों के दो नाटक लिखे एक का नाम ‘नन्ना गोपाल’ (माई गोपाल) और दूसरा ‘मोदन्ना तम्मा’ (द क्लाउड्स लिटिल ब्रदर्स) है। 1930 ई. में उन्होंने ‘बिरूगली’ (टेम्पेस्ट) शेक्सपियर के नाटक के समानांतर कर्नाटक के ‘केलाडी साम्राज्य’ के इतिहास को स्वतंत्र रूप से पेश करती है। 1945 ई. में ‘हेमलेट’ पर आधारित ‘रक्ताक्षी’ (ब्लडी-आइड मेडेन) बिदानूर साम्राज्य की ऐतिहासिक घटनाओं को उधार लेकर यौन और राजनीतिक पहलुओं का भारतीयकरण करती है। इनके सभी नाटक काव्यात्मक है जो अपनी मधुर कन्नड़ संस्कृति के लिए जाने जाते है।1

कुवेम्पू ने 1965 ई. में ‘नेनापिना डोनियाली’ (इन द बोट ऑफ मेमोरी) प्रकाशित किया यह कुवेम्पू की विस्तृत आत्मकथा है। निर्देशक गिरीश कर्नाड ने 1999 ई. में ‘कनरु हेग्गडिथी’ नाम की एक फिल्म बनाई थी, जो कुवेम्पू के उपन्यास ‘कनरु सुबम्मा हेग्गडिथी’ पर आधारित थी। फिल्म की कहानी आजादी के पहले के एक परिवार की थी। वर्ष 2000 ई. में कन्नड़ भाषा के इस फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। इनकी इस फिल्म के प्रसिद्ध होने के बाद इनके इस उपन्यास की तकरीबन 2000 प्रतियाँ बिकी थी।2

 ‘कुवेम्पू’ जी मूलतः प्रकृति के कवि हैं। उनकी काव्य चेतना के निर्माण में प्रकृति का विशेष प्रभाव है किन्तु प्रकृति ने उन्हें पलायनवादी नहीं बनाया उनकी विकास परंपरा ने उन्हें गंभीर चिंतक बनाया। ‘कुवेम्पू’ जी विकासवादी कवि थे। जिस प्रकार एकानुजीवी अमीबा विकसित होते-होते मानव के रूप में परिणत हुआ है उसी प्रकार मानवों को भी विकास के पथ पर अग्रसर होना है। किन्तु यह सिर्फ बहिर्विकास नहीं है, केवल बहिर्विकास ध्वंसात्मक है। सब प्रकार के बहिर्विकासों  को अंतर्विकास में परिणत होना है। इस अंतर विकास के लिए मानव में तीव्र अभीप्सा का रहना नितांत वांछनीय है। इसी अभीप्सा के कारण भांगकीट न्याय की भाँति मानव भी देव बन सकता है। उन्होंने इस कविता के चर्चा करते हुए लिखा है-

“हारैसु  हारैसु  हारैसु, जीव

हारैसु नीनागुवन्नेगं  देव!

हारैसि हारैसि हारैसि

अन्न तानादुदै प्राण;

हारैसि हारैसि हारैसि

हारिदुदो नीरधिय मौन!

हारैसि हारैसि हारैसि

प्राण गुदिसिवु मनोज्ञान

हारैसि हारैसि हारैसि

सिद्धियात्मात्मविज्ञान” !

अथार्त हे जीव! तुम अभीप्सा करो, कामना करो जबतक तुम देव न बनो तब तक अभीप्सा करते रहो। अभीप्सा करते-करते अन्न प्राण बना, अभीप्सा करते-करते ही सागर की मछली उड़ने लगी। इसी अभीप्सा के कारण तैरनेवाली मछली उड़नेवाली पंक्षी बन गई। अभीप्सा करते-करते प्राण में मनोविज्ञान का उदय हुआ। इसीप्रकार की तीव्र अभीप्सा के कारण आत्मविज्ञान की सिद्धि हुई। अतः तुममे उसप्रकार की उत्कट, अभीप्सा रहनी है।3

‘कुवेम्पू’ जी चैतन्यवादी कवि थे। वे जड़ और चेतन में किसी प्रकार का कोई भेद नहीं मानते है। जड़ निरंतर अभीप्सा के कारण ही चेतन बन जाता है। कविता की इन पंक्तियों से यही ज्ञात होता है-

“हारैसि हारैसि हारैसि

हसुरनुसुदुर्वो कल्लुमण्णु;

हारैसि हारैसि हारैसि

कुरुडु जड्कुदिसियत कण्णु!

हारैसि हारैसि हारैसि

चित उरुळदुदु सुत्ति सुरूलि;

हारैसि हारैसि हारैसि

मृत् अरळवुदो अत्ते मरलि” !

कवि कहते हैं कि अभीप्सा करते-करते प्रस्तर खंडों में मृतपिण्डों में शस्यों का उदय हुआ। इसी सतत अभीप्सा के कारण ही अंध जड़ में चैतन्य का नेत्र फुट पड़ा। इसी अभीप्सा में रत रहने के कारण जड़ जगत में चैतन्य का उदय हुआ। इसी निरंतर अभीप्सा के कारण ही हमारी यह मृण्मयी वसुंधरा देवभूमि बनेगी।

‘कुवेम्पू’ जी का विचार था कि इस जगत में एक प्रकार की पूर्ण दृष्टि स्थापित होगी। उन्होंने एक जगह लिखा है- “जागतिक जीवन अनेकता से एकता की ओर चल रहा है, अनेकता का नाश करेवाली एकता की ओर नहीं समन्वयात्मक एकता की ओर। तत्परिणाम एक पूर्ण दृष्टि सिद्ध हो रही है। इस पूर्ण दृष्टि एवं समन्वय बुद्धि के परिणामस्वरूप एक प्रकार की सर्व समानता का समता भाव उदित हो रहा है।”4

‘कुवेम्पू’ जी की सूक्ष्म चेतना मार्क्सवादी आदर्शों और सर्वथा निरपेक्ष भौतिक यथार्तों में लिप्त रहकर परितोष नहीं पा सकता। यहाँ तक कि उनको उससे विरक्ति हो गई। उसी तत्वों को भारतीय भावभूमि में प्रतिष्ठापित करनेवाला तत्व है सर्वोदय। अतः सर्वोदय, जिसमे हिंसा के लिए स्थान नहीं है, जिसमे मानवीय उच्च मूल्यों के प्रति आस्था है।

‘कुवेम्पू’ जी की आध्यात्मिकता साम्प्रदायिक नहीं है, मनोवैज्ञानिक है। उसमे अध्यात्मिक मानववाद, जिसे हम आध्यात्मिक विकासवाद भी कह सकते हैं, मानव हृदय विभूतियों का परम विकास है। उनकी रामायण भी इसी विकासवाद की व्याख्या मात्र है। पंत जी की तरह ‘कुवेम्पू’ जी ने भी राम कथा को युग विकास की चेतना के विकास की व्याख्या के रुप में जीव की अन्नमय भूमिका से आनंदमय भूमिका की ओर यात्रा का इतिहास कहा है। किन्तु इस विकास परंपरा में भौतिकता का परिष्कार है, तिरस्कार नहीं है, उन्नयन है। आज के समय में कलह, कोलाहल आदि से ताड़ित एवं व्यथित होते हुए भी कवि आशावादी रहा है। उसकी यह ध्रुव धारणा है कि मानवता का विकास दैवत्व में अवश्य होगा, किन्तु उसके लिए मानव में अभीप्सा, निरंतर साधना और कामना की आवश्यकता है। जिसे पंत जी नवचेतनवाद या नवमानववाद कहते हैं, वही भाव ‘कुवेम्पू’ जी के काव्यों में भी दिखाई देता है।5

विश्वकल्याण के लिए ‘कुवेम्पू’ जी अरविंद को इतिहास की सबसे बड़ी देन मानते है। उनका यहाँ तक विचार है कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि जब विश्व के सब प्रधान विश्वविद्यालयों में अरविंददर्शन के लिए ही स्वतंत्र पीठ की स्थापन होगी। उन्होंने लिखा है- जड़ और चेतन शान्त एवं अनन्त, क्षर एवं अक्षर सबमें उन्होंने सत्य की प्रतिष्ठा की है-

“चेतन मुर्तियु आ कल्लु

तेगे जड़वेंबुदु  सुळळू” !

अथार्त चैतन्य मूर्ति है वह प्रस्तरखण्ड, छोडो, जड़ नामकी वस्तु ही मिथ्या है।

“चैतन्यके जड़वेंबुदु

कविभावके भाषे।”

अथार्त जड़ चैतन्य के लिए, कवि भाव के लिए भाषा का जो संबंध है, वही संबंध जड़ एवं चेतन में है।

“स्थूल जड़ जगवेल्ल

ध्यान दृष्टिगे भावविन्यासदंददि

वेधवागुतिदे। कविदर्शनके जड़विल्ल;

जड़वेंबुदेल्ल चेतनेय नटने यलीले।”

अथार्त सभी स्थूल एवं जड़ जगत ध्यान दृष्टि को भावविन्यास की भाँति दृष्टिगत हो रहा है। कवि के दर्शन में जड़ वस्तु है ही नहीं, जड़ चैतन्य की नाट्य लीला है।

शिव तत्व को खोज तो कवि ने सर्वत्र की है। ‘कुवेम्पू’ जी का यहाँ तक विचार है कि शिव ही काव्य का नेत्र है -:

“शिव काणदे कवि कुरुडनो

 शिव काव्यय कण्णो।”

अथार्त शिव को देखे बिना कवि अन्धा है, शिव ही काव्य का नेत्र है।6

‘कुवेम्पू’ जी की यह ध्रुव धारणा है कि दर्शन के बिना काव्य बन सकता है, किन्तु महाकाव्य नहीं, चिरंतर काव्य नहीं। अतः क्रांतिदर्शी कवि को अस दर्शन के द्वारा मानवता के विकास-पथ को अलोकित करना है। ‘कुवेम्पू’ जी युगचेतना की ओर सतर्क हैं वे निरे आशावादी नहीं है, वर्तमान परिस्थितियों के प्रति गाढ़ विषाद भी उनके मन में हैं किन्तु सुदूर भविष्य के ज्योतिर्मय दिनों की आशा उन्हें धीरज बाँधती है। ‘कुवेम्पू’ जी ने मानवता को नाश के स्थान पर निर्माण का, जड़ के स्थान पर चैतन्य का, वैषम्य के स्थान पर समन्वय का, घृणा के स्थान पर प्रेम का संदेश दिया है।

‘कानुरु हेग्गडिति’ कुवेम्पू जी का बृहद उपन्यास है, जिसे मलेनाडु (पर्वत प्रदेश) का महाभारत कह सकते हैं। यह मानव एवं प्रकृति के संघर्ष एवं प्रेम की व्यंजना करनेवाली मार्मिक कृति है। इस उपन्यास में सैकड़ों पात्र हैं। यह वहाँ के कृषक एवं श्रमजीवियों के जीवन की आशा-आकांक्षा, राग-विराग का रत्न दर्पण है। उनकी कहानियाँ ‘मेरे देवता तथा अन्य कहानियाँ’ आदि स्वामी विवेकानंद, रामकृष्ण आदि जीवनियाँ ‘मले नट्टी चित्र’ आदि गद्य चित्र कन्नड़ की श्रीवृद्धि करने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। जीवन का ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है, जिसका स्पर्श ‘कुवेम्पू’ जी ने नहीं किया हो।     

कर्नाटक प्रदेश का राज्यगान ‘जय भारत जननिय तानुजाते’ कन्नड़ भाषा के सुप्रसिद्ध राष्ट्रकवि कुवेम्पू द्वारा रचा गया है। इसी कविता को कर्नाटक सरकार ने 6 जनवरी, 2004 ई. को ‘राज्य गीत’ के रूप में घोषित कर दिया। इस कविता में कवि ने एक ऐसे कर्नाटक की कल्पना की है जो भारतीय राज्यों के संघ में अपनी स्थिति को पहचानती है, वह अपने सगी बहनों के साथ शांतिपूर्ण अस्तित्व में विश्वास करती है, लेकिन असुरक्षा और भय के बजाय आत्मविश्वास और ताकत की स्थिति से उसका आत्मसम्मान और गरिमा बरकरार रखती है। शायद यही वह उदार चेतना वाला अविस्मरणीय भाव है जिससे कर्नाटक वासी तकनीकी कौशल और आध्यात्मिक विकास में खुद को आगे बढ़ाते हुए जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय राष्ट्र को मजबूती प्रदान कर रहे हैं।

कर्नाटक का राज्यगीत (हिंदी में अनुवादित)

जय भारत माँ की सुपुत्री, जय हे कर्नाटक माता!

जय सुंदर नदी वनों की धरा

जय हे गुणी ऋषिओं का बसेरा!

भूदेवी के मुकुट की नवमणी,

चंदन व सोने की सुंदर संपदा,

जहाँ राम और कृष्ण ने अवतार लिया

उस भारत माँ की सुपुत्री, जय हे कर्नाटक माता!

जहाँ माता की लोरी वेदघोष हो.

जहाँ सपूतों का धैर्य मातृभूमि की शान हो!

हरित पहाड़ियों की श्रृंखला जो गले का हार हो!

जहाँ कपिल. पतंजलि, गौतम, महावीर जन्मे,

जय भारत माँ की सुपुत्री, जय हे कर्नाटक माता!

शंकर रामानुज, विद्यारण्यक, बसवेश्वर,

मध्व की दिव्य भूमि!

कवि रन्न, षडक्षरी, पोन्न, पंप, लाकुमिपति, जन्न की धारा!

कवि कुमारव्यास का मंगल-धाम! जहाँ कोयल रूपी

कवियों ने, धरती को धन्य किया!

नानक, रामानंद, कबीर की धरती,

उस भारत माँ की सुपुत्री, जय हे कर्नाटक माता!

जहाँ तैलप, होय्सलों ने साम्राज्य किया. शिल्पकार

डंकण, जकण की प्रियभूमि! कृष्ण, शरावति, तुंगा,

कावेरी का जिसे वरदान मिला, चैतन्य, परमहंस,

विवेकानंद की धरती, उस भारत माँ की सुपुत्री,

जय हे कर्नाटक माता

सभी संप्रदायों का शांति वन, धरती जिसने कलाप्रिय

को किया आकर्षित! हन्दू क्रिश्चियन, मुसलमान,

पारसी जैनों का गुलिस्ताँ! जनक से राजाओं का धाम!

गायक और संगीतकारों की धरती!

कन्नड़ बोली थिरकती ऐसे घर में! जो है कन्नड़ माता

की संतानों के देह! भारत माँ की सुपुत्री,

जय हे कर्नाटक माता!

जय सुंदर नदी वनों की भूमि,

जय हे गुणी ऋषियों की धारा7

निःसंदेह ‘कुवेम्पू’ जी आधुनिक कन्नड़ साहित्य के क्षेत्र में अग्रगण्य हैं। उनका संपूर्ण साहित्य समस्त मानवता की मंगलकामना करता है। इसमें विभिन्न प्रकार के प्रगीतों का मधुर स्वर गूँज रहा है। पद्य और गद्य दोनों में ही ‘कुवेम्पू’ जी ने अपनी मानवीयता का दर्शन कराया है। इनकी कृतियों में भावुकता एवं आवेश की झंझा के साथ लोकमंगल की मलयानिल भी है और इनमे कवि की कल्पना चित्रमय एवं रसमय होकर आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति के ठोस धरातल पर व्यक्त हुई है।8  

113वें जन्मदिन के दिन पर गूगल ने उनका बेहतरीन डूडल बनाकर याद किया:

इस महान साहित्यकार को उनके 113वें जन्मदिन के दिन गूगल ने उनका बेहतरीन डूडल बनाकर याद किया। गूगल ने अपने इस डूडल में यह दिखाया कि कुपल्ली वेंकटप्पा पुट्टप्पा एक बड़े पत्थर पर प्रकृत्ति के बीच में बैठकर कुछ लिख रहे हैं। उसके साथ गूगल कन्नड़ भाषा के अंदाज में सफ़ेद रंग का ‘लोगो’ (Logo) दिखाया है।

कुवेम्पू जी के मुख्य विचार:

(क) जाति व्यवस्था के प्रति आक्रोश. लेखक का लेखन जाति व्यवस्था और धार्मिक अनुष्ठानों के प्रति उनके आक्रोश को दर्शाता है। शूद्र तपस्वी (अछूत संत) इस दर्शन का उदाहरण है।

(ख) लेखक का मानना ​​था कि भारतीय समाज में असमानता के लिए जाति व्यवस्था जिम्मेदार है।

(ग) प्रकृति का चमत्कार। उनकी कविताएँ भी उनके चारों ओर प्रकृति के चमत्कारों का प्रतिबिंब थीं। इसका उदाहरण उनकी पूवु (द फ्लावर) शीर्षक कविता में पाया जा सकता है।  

सुबह की ओस के बीच

हरियाली के पार चलना

और शाम को वह डरावना होता है

साँस लेते समय,

हे फूल, मैं तुम्हारा गाना सुनता हूं

हे फूल, मैं तुम्हारे प्यार को हरा देता हूँ!

कुवेम्पु द्वारा प्राप्त पुरस्कार

ज्ञानपीठ पुरस्कार – 1967
पद्म भूषण – 1958
साहित्य अकादमी पुरस्कार – 1955
राष्ट्रीय कवि – 1964
पम्पा पुरस्कार – 1987
पद्म विभूषण – 1988
कर्नाटक रत्न – 1992

‘कुवेम्पू’ जी की रचनाएँ:


(क) कुवेम्पु उपन्यासों की ग्रंथ सूची

कानुरू सुब्बम्मा हेग्गदाती (1936), मालेगालल्ली मदुमगलु (1967)

(ख) आधुनिक महाकाव्य (महाकाव्य)

श्री रामायण दर्शनम, खंड-1 (1949), खंड-2 (1957), चित्रांगदा

(ग) कविता संग्रह

कोलालु (1930), पांचजन्य (1936), नविल्लू (1937), किंदारिजोगी मट्टू इतारा कवानागालु (1938), कोगिले मट्टू सोवियत रूस (1944), शूद्र तपस्वी (1946), काव्य विहार (1946), किंकिनी (1946), अग्निहंसा (1946), प्रेमा कश्मीरा (1946), चंद्रमंचके बा चकोरी (1954), इक्षुगंगोत्री (1957), कब्बिगना कैबुट्टी, पक्षीकाशी, जेनागुवा, कुटीचाका, कादिरदाके, कथाना कवनगालु

(घ) नाटक

बिरुगाली महरा (1930)
त्रि (1931)
स्मशाना कुरूक्षेत्रम (1931)
जलगारा (1931)
रक्ताक्षी (1932)
शूद्र तपस्वी (1944)
बेराल्गे कोरल (1947)
यमना सोलु
चंद्रहास
बलिदाना


(ङ) निबंध

मालेनादिना चित्रगालु (1933)

(च) आत्मकथा

नेनापिना डोनियाली (1980) पुरुष

(छ) कहानियों का संग्रहनादिना

चित्रगालु (1933), संन्यासी मट्टू इतारे कटेगालु (1937), नन्ना देवरू मट्टू इटारा कटेगलु (1940)

(ज) साहित्यिक आलोचना

आत्मश्रीगागी निरंकुशमतिगलागी (1944), काव्यविहार (1946), तपोनंदन (1951),विभूति

पूजे (1953), द्रोपदीया श्रीमुडी (1960), विचारक्रांतिगे आह्वना (1976), साहित्यप्रचार

(झ) जीवनी

स्वामी विवेकानन्द (1926), श्री रामकृष्ण परमहंस (1934),गुरुविनोदने देवरेडेगे

(ञ) बच्चों के लिए कहानियाँ

बोम्मनहलिया किंदारी जोगी(1936), मारी विजनानी (1947), मेघापुरा (1947), नन्ना

माने (1947), नन्ना गोपाला, अमलाना कथे

(ट) अनुवाद

गुरुविनोदने देवरेडेगे, जनप्रिय वाल्मिकी रामायण

(ठ) कुवेम्पु की विज़ुअल मीडिया मूवीज़ में कृतियाँ

कनूरू हेग्गाडिथी, गिरीश कर्नाड द्वारा निर्देशित ।

(ड) नाटक

मालेगालाडल्ली मदुमागालु

निष्कर्ष: अपने शुरुआती दिनों में कुवेम्पु ने अपना साहित्यिक कार्य अंग्रेजी में बिगिनर्स म्यूज़ नामक कविता संग्रह के साथ शुरू किया। हालाँकि, बाद में उन्होंने अपनी मूल भाषा कन्नड़ अपना ली थी और कन्नड़ को शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए आंदोलन का नेतृत्व भी किया। कन्नड़ साहित्य में उनके योगदान को पहचानने के लिए, राज्य सरकार ने उन्हें दो पुरस्कारों से सम्मानित किया – 1958 में राष्ट्रकवि और 1992 में कर्नाटक रत्न। उन्हें कन्नड़ को नए शब्द, वाक्यांश और शब्दावली देने का श्रेय दिया जाता है।

मूलत: ये जमीन से जुड़े पुरुष थे। इन्होंने हमेशा समाज की समस्याओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया। उनकी रचनाओं में मानवता और प्रकृति से प्रेम स्पष्ट दिखाई देता है। देश और समाज ने भी उनके योगदान का भरपूर सम्मान किया।

संदर्भ ग्रंथ:

  1. https://www-indianetzone-com.translate.goog/30/kuvempu
  2. https://m.bharatdiscovery.org/india
  3. Karnataka State Open University, Mysore, कर्नाटक संस्कृति और कन्नड़ साहित्य

हिंदी एम.ए– प्रथम पत्र, इकाई-29, कुवेम्पू जी का व्यक्त्तित्व एवं कृतित्व, पृष्ठ सं–29,30

  • Karnataka State Open University, Mysore, कर्नाटक संस्कृति और कन्नड़ साहित्य

हिंदी एम.ए. – प्रथम पत्र, इकाई-29, कुवेम्पू जी का व्यक्त्तित्व एवं कृतित्व, पृष्ठ सं – 31

  • Karnataka State Open University, Mysore, कर्नाटक संस्कृति और कन्नड़ साहित्य

हिंदी एम.ए. – प्रथम पत्र, इकाई-29, कुवेम्पू जी का व्यक्त्तित्व एवं कृतित्व, पृष्ठ सं – 32

  • Karnataka State Open University, Mysore, कर्नाटक संस्कृति और कन्नड़ साहित्य

हिंदी एम.ए. – प्रथम पत्र, इकाई-29, कुवेम्पू जी का व्यक्त्तित्व एवं कृतित्व, पृष्ठ सं – 32

हिंदी एम.ए. – प्रथम पत्र, इकाई-29, कुवेम्पू जी का व्यक्त्तित्व एवं कृतित्व, पृष्ठ सं – 34

कुंजी शब्द:

उत्कट – तीव्र, उग्र

अभीप्सा- प्रबल इच्छा

माजलगारा – मेहतर

परितोष – संतोष, इच्छा पूर्ति से होनेवाली प्रसन्नता

विरक्ति – अप्रशन्नता, उदासीन, खिन्नता 

ताड़ित – दंडित

प्रस्तर- पत्थर मार्मिक- प्रभावशाली

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