सफ़र की धूप में अब सहारा बनी है लाठी,ज़िंदगी के मोड़ की किनारा बनी है लाठी। कभी जो थामती थी उँगली किसी बच्चे की,अब उसी हाथ की पुकार बनी है लाठी। थके हुए कदमों को हर रोज़ सहलाती है,दर्द के हर सफ़र की दुलार बनी है लाठी। समय ने छीन ली रफ़्तार जब उम्र से,धीमी… Continue reading लाठी (गज़ल)
Author: इंदु सिंह
पीढ़ी दर पीढ़ी का प्यार
आज की पीढ़ी का प्यार बोलता है,हर पल शब्दों में खुद को तोलता है।सिर्फ मोबाइल और स्क्रीन पे दिल धड़कते हैं,इमोजी में जज़्बात रोज़ चमकते हैं। “आई लव यू” के संदेश सुबह-शाम,हर तस्वीर में रिश्तों का नाम।दुनिया को दिखाने की है होड़ बड़ी,भावनाओं की राह कहीं जाती मुड़ी। पहले की पीढ़ी का प्यार बोलता नहीं… Continue reading पीढ़ी दर पीढ़ी का प्यार
बिहार- भूत, वर्तमान, भविष्य और भूगोल
जिस गंगा की धारा नेकालजयी गीत सुनाए हैंजहाँ खेतों की हरियाली नेजीवन के स्वर सजाए हैं। यह वही है बिहार -भारत के मस्तक परअनुभव का तिलक लगाए हैं। भूतकाल में यह भूमि केवल भूमि नहीं, पुरखों की स्मृतियों का मान है कण-कण में गूँजता इसके अनगिनत इतिहास का गान है। पाटलिपुत्र की वीथियों मेंराजनीति ने… Continue reading बिहार- भूत, वर्तमान, भविष्य और भूगोल
लब्जों को बयाँ करती ‘आँखें’
ये आँखें…दो लकीरें नहीं,आत्मा की दरारें हैं-जहाँ से दर्दबिना आवाज़ किए रिसता है। कोरों पर जमे आँसूकभी गिरते नहीं,बस नमक बनकरअंदर ही अंदर जख़्मों को कुरेदते हैं। हमने गौर किया है-जब कोई बहुत गहराई से मुस्कुराता है,तो उसकी आँखें क्यों नम हो जाती हैं?क्योंकि वहाँ सत्य रहता है,और सत्य अक्सर अकेला होता है। इन आँखों… Continue reading लब्जों को बयाँ करती ‘आँखें’
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : ‘परशुराम की प्रतीक्षा’
Parshuram Ki Pratiksha कविता संग्रह-महत्वपूर्ण तथ्य रचना- ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ कविता संग्रह (खंडकाव्य) रचनाकाल- 1962/63 ई. के आसपास लिखा गया था। इसमें कुल 18 कविताएँ हैं, जिसमें ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ प्रमुख हैं। इस संग्रह में 15 नयी कविताएँ और 3 ‘सामधेनी’ से ली गई है। ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ कविता पाँच खंड में हैं। यह कविता… Continue reading रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : ‘परशुराम की प्रतीक्षा’
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : कुरुक्षेत्र का साँतवा सर्ग महत्वपूर्ण तथ्य
रचना- ‘कुरुक्षेत्र’, कुल 7 सर्ग हैं। रचनकार- रामधारी सिंह ‘दिनकर’ प्रकाशन वर्ष- 1946 ई. काव्यरूप- ‘कुरुक्षेत्र’ प्रबंधात्मक महाकाव्य है। इसे आधुनिक युग की गीता कहा गया है। यह द्वितीय युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित रचना है। इसका नायक ‘कुरुक्षेत्र’ हैं। इस युद्ध में शांति की समस्याओं का चित्रण किया गया है। यह ‘प्रतीकात्मक’ रचना है।… Continue reading रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : कुरुक्षेत्र का साँतवा सर्ग महत्वपूर्ण तथ्य
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ : ‘बादल राग’ (कविता) महत्वपूर्ण तथ्य
* सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित ‘बादल राग’ कविता में बादलों को ‘क्रांति’ का प्रतीक माना गया है, जो शोषक वर्ग के लिए भय और शोषित वर्ग के लिए आशा का संचार करते हैं। * यह कविता आम आदमी (लघुमानव) के दुःख को दर्शाती है। बादलों के माध्यम से क्रांति लाकर नवनिर्माण की कामना करती है,… Continue reading सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ : ‘बादल राग’ (कविता) महत्वपूर्ण तथ्य
दुष्यंत कुमार त्यागी : ‘साये में धूप’ (ग़ज़ल संग्रह)
जन्म- 27 सितंबर 1931 ई. उ.प्र. में बिजनौर जिले के राजपुर नवादा गाँव में हुआ था। निधन- 30 दिसंबर 1975 ई. भोपाल में हुआ। पिता- चौधरी भगवत सहाय और माता- रामकिशोरी देवी थी। रचना - ‘साये में धूप’ (ग़ज़ल संग्रह) रचनाकार - दुष्यंत कुमार प्रकाशन वर्ष - 1975 ई. संकलित ग़ज़लें- 64 समर्पित – छोटे… Continue reading दुष्यंत कुमार त्यागी : ‘साये में धूप’ (ग़ज़ल संग्रह)
वर्णों का उच्चारण स्थान और प्रयत्न (भाग–1: उच्चारण स्थान)
(Pronunciation effort and its Classification: Part-1) उच्चारण स्थान- किसी वर्ण का उच्चारण करते समय अन्दर से आने वाला श्वास वायु जिस स्थान पर आकर रूकती है या जहाँ पर बिना रोके उसके निकलने का मार्ग बनाया जाता है। वही उस वर्ण का उच्चरण स्थान कहलाता है। लक्षण- किसी भी वर्ण को बोलते समय वायु तथा जिह्वा मुख के… Continue reading वर्णों का उच्चारण स्थान और प्रयत्न (भाग–1: उच्चारण स्थान)
अविकारी शब्द ‘अव्यय’
अविकारी शब्द या अव्यय: ऐसे शब्द जिनके स्वरुप में लिंग, वचन, काल, पुरुष एवं कारक आदि के प्रभाव से कोई विकार नहीं होता अथार्त परिवर्तन नहीं होता है। वे अविकारी शब्द कहलाते हैं। अविकारी को ही ‘अव्यय’ कहते हैं। ‘अव्यय’ दो शब्दों के मिलने से बना है- अ + व्यय = अव्यय। ‘अ’ का अर्थ… Continue reading अविकारी शब्द ‘अव्यय’