एक ख़ामोशी ही काफ़ी है

जब तक हम साथ हैं,तब तक सब कुछ सही हैथोड़ी हँसी, थोड़ी नाराज़गी,कुछ शिकवे, कुछ शिकायतें,कुछ अनकही-सी बातें...इन सबके बीचरिश्ता अभी ज़िंदा है। जब तक हम लड़ते हैं,एक-दूसरे से उलझते हैं,अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं,तब तक समझोहम एक-दूसरे के लिएमहत्त्वपूर्ण हैं। जब तक गुस्सा है,तब तक परवाह है,जब तक शिकायत है,तब तक उम्मीद… Continue reading एक ख़ामोशी ही काफ़ी है

फ़ौजी की तनख़्वाह नहीं, उसके त्याग को समझो, वर्दी की कीमत तुम क्या जानो ?

यह घटना लद्दाख के मिनिमार्ग चेक पोस्ट पर पर्यटकों और सुरक्षा कर्मियों के बीच हुई तीखी बहस को लेकर है। वीडियो के वायरल होने के बाद मामला सोशल मीडिया पर चर्चा में है। करीब पाँच घंटे की देरी से यात्रियों में नाराजगी बढ़ी। ट्रैफिक नियंत्रण और सुरक्षा जाँच  को लेकर पर्यटकों में असंतोष दिखा। वीडियो… Continue reading फ़ौजी की तनख़्वाह नहीं, उसके त्याग को समझो, वर्दी की कीमत तुम क्या जानो ?

‘प्रेमचंद के फटे जूते’ की प्रासंगिकता (हरिशंकर परसाई)

"जब समाज अपनी विसंगतियों को सामान्य मानने लगे, तब व्यंग्यकार का मौन सबसे बड़ा अपराध होता है। हरिशंकर परसाई ने यह अपराध कभी नहीं किया। उन्होंने लिखा भी, बोला भी और समाज को आईना भी दिखाया।" इस लेख के माध्यम से हम हिंदी व्यंग्य साहित्य के उस अप्रतिम रचनाकार को स्मरण करने का प्रयास करेंगे… Continue reading ‘प्रेमचंद के फटे जूते’ की प्रासंगिकता (हरिशंकर परसाई)

शब्दों में भरकर संवेदना

शब्दों में भर संवेदना मैं तुम्हारी पीड़ा तक पहुँची हूँ, संदर्भों, साक्ष्यों और स्मृतियों के सहारे,जहाँ इतिहास मौन था, और साहित्य ने बोलना सीखा। अन्याय की हर दीवार पर, तुम्हारे जीवन की दरारें हैं,जिनसे झाँकता है, सदियों का दबा हुआ सच। तुम्हारी जिजीविषा ने सिखाया, संघर्ष केवल प्रतिरोध नहीं,एक सतत रचना है, मनुष्य बने रहने… Continue reading शब्दों में भरकर संवेदना

15 अगस्त 2026

आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। यह 15 अगस्त केवल एक तारीख नहीं, बल्कि भारत के संघर्ष, त्याग, आत्मसम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक है। 15 अगस्त 1947 को हमारा देश लगभग दो सौ वर्षों की औपनिवेशिक दासता से स्वतंत्र हुआ था। यह स्वतंत्रता हम सबकों उपहार में नहीं मिली है। इसके पीछे असंख्य… Continue reading 15 अगस्त 2026

मुंशी प्रेमचंद के कथा साहित्य में दलित जीवन दर्शन

“जब किसी मनुष्य को उसकी जाति के कारण पानी भरने का अधिकार भी न मिले, जब उसके श्रम का सम्मान न हो, जब उसके जीवन का मूल्य उसके जन्म से तय किया जाए- तब यह केवल एक व्यक्ति का दुःख नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता है। ऐसे समय में साहित्य मौन नहीं रह सकता।… Continue reading मुंशी प्रेमचंद के कथा साहित्य में दलित जीवन दर्शन

प्राकृतिक चिकत्सा और गाँधी जी

कोई नहीं समस्या जिसका, समाधान न हो योग से, सतयुग  में वापसी हो सकती है, योग के प्रयोग से प्राकृतिक चिकित्सा, चिकित्सा के साथ एक जीवन पद्धति भी है। जिसमे प्राकृतिक विधि-विधानों के द्वारा मानव के शरीर में होने वाले रोगों का उपचार किया जाता है। यह चिकित्सा पद्धति आज की सभी चिकित्सा पद्धतियों से… Continue reading प्राकृतिक चिकत्सा और गाँधी जी

पेपर लीक की घटनाएँ विद्यार्थियों और अभिभावकों पर प्रभाव

भारत में पेपर लीक घटना पहली बार नहीं हुई हैं। हर बार की तरह इस बार भी NEET PAPER के साथ यह घटना हुई है। और सिस्टम ऐसा ही रहा तो आने वाले समय में भी ऐसी घटनाएँ होती रहेगी। नया सिस्टम जरूर बनाया जाता है, नई घोषणाएँ भी जाती हैं, लेकिन कुछ समय बाद… Continue reading पेपर लीक की घटनाएँ विद्यार्थियों और अभिभावकों पर प्रभाव

शब्द, जो इतिहास बन गए

तुमने अपने जीवन कोकाग़ज़ पर नहीं,आग के पन्नों पर लिखा हैहर अक्षर में तेरेअपमान की राखऔर प्रतिरोध की चिनगारी है। तुम्हारी आत्मकथासिर्फ़ कथा नहीं,एक सामाजिक दस्तावेज़ है,जहाँ पीड़ा रोती नहींप्रश्न बनकर खड़ी हो जाती है। तुम्हारे शब्ददया नहीं माँगते,वे न्याय का घोष करते हैं-मनुष्य होने का अधिकारकिसी जाति की जागीर नहीं। जिस समाज ने तुम्हें… Continue reading शब्द, जो इतिहास बन गए

आस्था नहीं, भावनाओं का व्यापार (इमोशनल ब्लैकमेल)

आजकल सोशल मीडिया, विशेषकर यूट्यूब पर एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती जा रही है। कुछ लोग भगवान के चित्र, भजन और धार्मिक वीडियो का सहारा लेकर लोगों की भावनाओं का व्यापार कर रहे हैं। वीडियो के बीच-बीच में आवाज़ आती है- “इस वीडियो को तुरंत लाइक करें, शेयर करें, सब्सक्राइब करें। ऐसा नहीं किया… Continue reading आस्था नहीं, भावनाओं का व्यापार (इमोशनल ब्लैकमेल)