प्रयोगवाद के महत्वपूर्ण तथ्य और कथन

प्रयोगवाद का समय: 1943- 1952

1943 ई. में अज्ञेय द्वारा ‘तारसप्तक’ का प्रकाशन हुआ था।

1952 ई. में अज्ञेय ने ‘नई कविता’ का प्रवर्तन किया था।

अतः अज्ञेय ‘प्रयोगवाद’ और ‘नई कविता’ दोनों के प्रवर्तक है।

प्रयोगवाद का अर्थ: 1943 से 1952 के बीच अज्ञेय और उनके

समर्थक कवियों द्वारा काव्य के क्षेत्र में भाषा, भाव. शैली, काव्यरूप, प्रतीक, विधान आदि स्तरों पर नवीन प्रयोग किया गया अतः अज्ञेय और उनके समर्थकों द्वारा जिस काव्यधारा का प्रवर्तन किया गया उसे प्रयोगवाद के नाम से जाना गया। 

  • ‘प्रयोगवाद’ शब्द का प्रयोग सबसे पहले नंददुलारे वाजपेयी ने 1944 ई. में ‘प्रयोगवादी रचनाएँ’ नामक निबंध में किया था। यह निबंध ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।
  • अज्ञेय ने इस विचारधारा के लिए प्रयोगवाद शब्द का विरोध कर इसके लिए ‘नयी कविता’ शब्द का ही प्रयोग किया।
  • हिंदी में प्रयोगवाद का आगमन ब्रिटेन के ‘न्यू सिग्नेचर’ आन्दोलन के प्रभाव स्वरुप हुआ।
  • 1932 ई. में स्टेफन स्पेंडर, आडेन, लेहमेन एवं एम्सन ने एक संयुक्त काव्य संकलन ‘न्यू सिग्नेचर’ के नाम से निकालकर आन्दोलन का सूत्रपात किया।
  • प्रयोगवादी आलोचकों के महत्वपूर्ण कथन:
  • डॉ. नगेंद्र के अनुसार- “हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद नाम उन कविताओं के लिए रूढ़ (प्रचलित) हो गया जो कुछ नये भाव बोधों, संवेदनाओं तथा उन्हें प्रेषित करनेवाले शिल्पगत चमत्काओं को लेकर शुरू-शुरू में तार सप्तक के माध्यम से 1943 ई. में प्रकाशन में आई।”
  • डॉ. नगेंद्र के अनुसार- “प्रयोगवाद एक शैलीगत विद्रोह है जो प्रगतिवाद की प्रतिक्रिया स्वरुप उत्पन्न हुआ।”
  • धर्मवीर भारती के अनुसार- “प्रयोगवादी कविता में भावना है किंतु हर भावना के सामने प्रश्न चिह्न लगा हुआ है।”
  • शिवदान सिंह के शब्दों में- “ प्रयोगवाद पाश्चात्य साहित्य के प्रतीकवाद का अनुकरण मात्र है।”
  • डॉ. गंपतिचंद्र गुप्त के अनुसार- “1943 इ. में अज्ञेय के नेतृत्व में हिंदी कविता के क्षेत्र में एक नये आंदोलन का प्रवर्तन हुआ जिसे अब तक विभिन्न संज्ञाएँ (नाम) प्रयोगवाद, प्रपद्यवाद, नयी कविता आदि नाम प्रदान की गई।”
  • अज्ञेय के अनुसार- “प्रयोगवाद कोई वाद नहीं है तथा न हम कोई वादी है। ठीक इसी तरह कविता का भी कोई वाद नहीं होता है। कविता अपने आप में इष्ट या साध्य नहीं है। अतः हमें प्रयोगवादी कहना उतना ही सार्थक या निरर्थक है जितना हमें कवितावादी कहना।”
  • अज्ञेय के अनुसार- “प्रयोगशील कवि मोती खोजने वाले गोताखोर है।”
  • गोविंद शर्मा ‘रजनीश’ के शब्दों में – “ वस्तुतः नयी कविता प्रयोगवाद का ही विकसित रूप है।”
  • अज्ञेय के अनुसार- “ये सात कवि किसी एक स्कूल के नहीं अपितु अलग-अलग धाराओं के हैं। ये वास्तव में राही नहीं अपितु नई राहों के अन्वेषी है।”
  • अज्ञेय के अनुसार- “प्रयोगशील कविता में नये सत्यों, कई यथार्थताओं का जीवित बोध भी है। उन सत्यों के साथ नये रागात्मक संबंध भी है और उनको पाठक या सहृदय तक पहुँचने यानि साधारणीकरण की शक्ति है।”
  • केशरी कुमार के अनुसार- “प्रयोगवाद दृष्टिकोण का अनुसंधान है।”
  • रघुवीर सहाय के अनुसार- “प्रयोगवाद कलात्मक अनुभव का क्षण है।”
  • नंददुलारे वाजपेयी के शब्दों में- “प्रयोगवाद बैठे ठाले का धंधा है।”
  • नंददुलारे वाजपेयी के शब्दों में- “उदेश्यहीन प्रयोग चाहे वे भाव, भाषा, शैली किसी भी स्तर पर हो कविता से दूर जाकर केवल प्रयोगवाद ही कहलाएंगे।”
  • लक्ष्मीकांत के अनुसार- “प्रयोगवाद ज्ञात से अज्ञात की ओर बढ़ने की जागरूकता है।”
  • डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में- “चरम व्यक्तिवाद ही प्रयोगवाद का केंद्र बिंदु है।”
  • डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में- “जिस प्रकार संदेह एक हद के बाद संदेहवाद हो जाता है, उसी प्रकार प्रयोग भी एक हद के बाद प्रयोगवाद हो जाता है।”
  • डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में– “प्रयोगवाद कोरे रुपवाद से अधिक व्यापक प्रवृत्ति तथा विचारधारा का वाहक है।”
  • अशोक वाजपेयी के अनुसार- “मुक्तिबोध कठिन समय के कठिन कवि हैं, उनकी कविताओं का स्थापत्य स्थिर और सुपरिभाषित नहीं है।”
  • सुमित्रानंदन पंत के शब्दों में– “प्रयोगवादी काव्य जहाँ अपनी शैली तथा रूप-विधान में अतिवैयक्तिक हो जाता है, वहाँ भावना में जनवादी।”
  • रामविलास शर्मा के शब्दों में- “मानव का हृदय क्षुद्र इस्पात नहीं है, भय से सिहर उठे, वह तरु का पात नहीं है।”
  • रामविलास शर्मा के शब्दों में- “प्रयोगवादी कविता में नये युग से उत्पन्न अनास्था, शंका, घुटन, कुंठा भग्नाशा की व्याकुल भावना दिखायी पड़ती है। ये कवी एक नये मार्ग का अनुसंधान करने के लिए व्याकुल हैं।”
  • शमशेरबहादुर सिंह ने कहा- “ यह कविता नहीं मेरी डायरी है।”

प्रयोगवादी रचनाकारों का सही आरोही कालानुक्रम:

  1.  स. ही. वा. अज्ञेय- 1911 – 1987
  2.  शमशेर बहादुर-  1911 – 1993
  3.  भवानी प्रसाद मिश्र- 1914 – 1985
  4.  मुक्तिबोध- 1917 – 1964
  5.  प्रभाकर माचवे -1917 – 1991
  6.  भारत भूषण अग्रवाल- 1919 – 1975

7. गिरिजा कुमार माथुर- 1919 – 1994

8. नरेश मेहता- 1922 – 2000

9. लक्ष्मीकांत वर्मा- 1922 – 2002

10. विजयदेव नारायण साही- 1924 – 1982

11. धर्मवीर भारती- 1926 – 1997

12. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना- 1927 – 1983

13. कुँवर नारायण सिंह- 1927 – 2017

14. रघुवीर सहाय- 1929 – 1990

15. श्रीकांत वर्मा- 1931 – 1986

16. केदारनाथ सिंह- 1934 – 2018

17. ‘धूमिल’- 1936 – 1975

उपर्युक्त दिए गए प्रयोगवाद के कवियों में वैसे तो सभी महत्वपूर्ण है, किंतु अधिक सवाल जिनसे पूछे जाते है। वे

अंडरलाइन वाले अधिक महत्वपूर्ण हैं।

जय हिंद

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