रामस्वरूप चतुर्वेदी जी के महत्वपूर्ण कथन

हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास (1986)

  • संसार को समझना दर्शन का काम है, उसे बदलना राजनीति का और उसकी पुनर्रचना साहित्य का दायित्व है। इसी रूप में यहाँ साहित्य का विकास समझने का यत्न हुआ है।
  • भाषा, साहित्य और संस्कृति के संपृक्त सन्दर्भ में यह हिंदी साहित्य के साथ संवेदना का इतिहास भी होने का यत्न करता है। इसे, तब, हिंदी साहित्य के इतिहास की तरह पढ़ा जाना चाहिए और साहित्य की तरह भी।
  • रामचंद्र शुक्ल सांस्कृतिक मूल्यों के लिए रामचरितमानस  को भले केंद्र में रखते हों, पर उनकी आलोचना और इतिहास-विवेक उनके युगीन सृजन छायावाद से जुड़कर ही पुष्ट हुआ है। (शुक्ल जी के विषय में रामस्वरूप चतुर्वेदी का कथन)
  • चंदबरदाई-कबीर-जायसी-तुलसी-देव भारतेंदु के कृतित्व को न सिर्फ उनके युगीन संदर्भों में रखकर समझा जा सकता है, और न केवल समकालीन संदर्भों में, इतिहासकार का यह दायित्व है कि इन दोनों युगों का रिश्ता और क्रिया-प्रतिक्रिया स्पष्ट करते हुए वह रचनाकार के संप्रेषण को प्रशस्त करे, और व्यापक परंपरा के अंतर्गत उसका मूल्यांकन करे।
  • इतिहास की इस प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए यह भी जरुरी है कि हम युग विशेष की संवेदना को समझे, और उस युग के साहित्य में उसकी साझेदारी का विश्लेषण कर सकें। अभी तक के इतिहासों में सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का इतिवृत्त कथन अलग होता है, और साहित्य-धारा का दिग्दर्शन अलग। यहाँ प्रयत्न यह है कि साहित्य और संवेदना को एक साथ देखा-परखा जा सके।
  • पुराने समय में राजा का मनोरंजन तरह-तरह से किया जाता था⃓ आज उस स्थिति में उपभोक्ता आ गया है, जो इस समय में मुहाविर में राजा कहा जा रहा है। यों, मनोरंजन संचार और साहित्य की सीमा रेखाएँ जैसे बदलने का यत्न चल रहा हो। ऐसे समय में साहित्य के इतिहासकार का दायित्व है कि वह इस परिदृश्य का विवेकपूर्ण निराकरण करे।
  • भाषा विज्ञान में जिन्हें बिहारी, पूर्वी हिंदी, पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी और पहाड़ी कहा गया है, इन बोली, रूपों और जातीय क्षेत्रों की सर्जनात्मक निष्पति ही हिंदी भाषा और साहित्य है।
  • हिंदी मध्यदेशीय, और कहा जाए तो भारतवर्ष की संशलिष्ट भाषा-संस्कृत की वास्तविक प्रतिनिधि है।
  • यह  रोचक तथ्य है कि समकालीन हिंदी साहित्य का नेतृत्व जिन दो कवियों ने किया है यानी अज्ञेय और  मुक्तिबोध, तकनीकी ढंग से उनकी मातृभाषा क्रमशः पंजाबी और मराठी कही जाएगी।
  • आदिकाल के प्रसंग में हमने परिलक्षित किया था कि यहाँ मनुष्य का ईश्वर की महिमा से युक्त रूप में वर्णन हुआ है, जब भी भक्तिकाल में यह चित्रण ईश्वर का मनुष्य के रूप में हुआ है, आगे फिर रीतिकाल में ईश्वर और मनुष्य दोनों का मनुष्य रूप में चित्रण होता है। आधुनिक काल में आकर मनुष्य सारे चिंतन का केंद्र बनता है, और ईश्वर की धारण व्यक्तिगत आस्था के रूप में स्वीकृत होती है। साहित्य या कि कलाओं में उसका चित्रण प्रसांगिक नहीं रह जाता।
  • काव्य के स्तर पर यह समझ सकना आसान है कि प्रेम और भक्ति दोनों का उद्देश्य एक ही है- ‘अहं’ का बलिदान।
  • इलियट के साक्ष्य पर तो कहा जा सकता है कविता भी अपने अहं भाव में निष्कृति है। यों प्रेम और भक्ति की समानांतर प्रक्रिया कविता या कला में दृष्टव्य है, जो मूलतः ‘ऐहिक’ है।
  • पुनर्जागरण दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट से उत्पन्न रचनात्मक उर्जा है।
  • पुनर्जागरण का एक चिह्न यदि दो जातीय संस्कृतियों की टकराहट है तो दूसरा चिह्न यह भी कहा जायेगा कि वह मनुष्य के संपूर्ण तथा संश्लिष्ट रूप की खोज, और उसका परिष्कार करना चाहता है।
  • रामप्रसाद निरंजनी को ‘प्रथम प्रौढ़ गद्य-लेखक’ मानते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल अपने इतिहास के ‘आधुनिक काल’ में लिखते हैं, “यह पटियाला दरबार में थे और महारानी को कथा बाँच कर सुनाया करते थे। इनके ग्रन्थ को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि मुंशी सदासुख और लल्लूलाल से 62 वर्ष पहले खड़ी बोली का गद्य अच्छे परिमार्जित रूप में पुस्तकें आदि लिखने में व्यवहृत होता था। अब तक पाई गई पुस्तकों में यह ‘भाषा योगवासिष्ठ’ ही सबसे पुराना है। जिसमे गद्य अपने परिष्कृत रूप में दिखाई पड़ता है अतः यह कहने की गुंजाइश अब जरा भी नहीं रही कि खड़ी बोली गद्य की परंपरा अंग्रेजों की प्रेरणा से चली।”  इस प्रसंग में यह जोड़ना होगा कि ‘भाषा योगवासिष्ठ’ (1741) या कुछ आगे चल कर ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा किये गए बाइबल के अनुवाद मूलतः धार्मिक भावना से प्रेरित हैं।  
  • बीसवीं शदी के अंग्रेजी साहित्य में रविन्द्रनाथ ठाकुर की अंग्रेजी ‘गीतांजलि’ के भूमिका लेखक ‘येट्स’ ने लिखी थी।
  • पुनर्जागरण का भारतीय साहित्य में पहला प्रतिफलन माइकेल मधुसूदन दत्त के बंगला काव्य ‘मेघनाथ-वध’ (1861) को माना गया है।
  • रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘भारतेंदु युग और हिंदी भाषा की विकास परंपरा’ में ठीक ही लिखा है, “यह प्रतिज्ञा पत्र भारतीय स्वाधीनता के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाने योग्य है।”
  • यहाँ तक कि अपने जीवन का अंतिम संवाद उन्होंने नाटक की लक्षणा में ही बोला, “हमारे जीवन नाटक का प्रोग्राम नित नया-नया छप रहा है, पहिले दिन ज्वर की दूसरे दिन दर्द की, तीसरे दिन खाँसी की सीन हो चुकी है। देखें लास्ट नाईट कब होती है।” (यह कथन भारतेंदु के संदर्भ में है)
  • अंधेर नगरी को समकालीन क्लासिक की कोटि में गिना जा सकता है।
  • भारतेंदु ने अपनी व्यवस्था कुछ इस प्रकार रखी थी: विचार आंदोलन खड़ी बोली- गद्य यह एक पक्ष था, जबकि दूसरे पक्ष में थे: संस्कार-रचना-ब्रजभाषा-कविता। भारतेंदु विचारों से जितना आधुनिक थे उतने संस्कारों से नहीं। और यह स्वाभाविक था। पहले विचार बदलते हैं, तब संस्कार उनका अनुसरण करते हैं।
  • भारतेंदु युग के लिए इस दृष्टि से इस युग को ‘आधुनिक हिंदी का आदिकाल’ कहना एक विशेष सार्थकता रखता है।
  • रामनरेश त्रिपाठी का कृतित्व अपने समय के संदर्भ में बहुमुखी है। वे मूलतः कवि हैं, ग्राम गीतों के संकलन का आरंभिक कार्य उन्होंने किया, ‘कविता कौमुदी’ नाम से कई जिल्दों में हिंदी, उर्दू, बँगला आदि काव्य-धाराओं का आलोचनात्मक सामग्री के साथ संकलन संपादन किया। गद्य के क्षेत्र में, तुलसीदास और उनकी कविता पर विशेष आलोचनात्मक अध्ययन किया है। महामना मदनमोहन मालवीय की संस्मरणात्मक जीवनी लिखी है, और बाल साहित्य के क्षेत्र में विशेष कार्य किया है।
  • ‘प्रियप्रवास’ खड़ी बोली हिंदी का पहला महाकाव्य कहा जा सकता है। न केवल यह आधुनिक काल का प्रथम महाकाव्य है, वरन इसमें एक नयी और आधुनिक दृष्टि का उपोद्धात मिलता है।
  • मनुष्य और परम तत्व के बदलते हुए रिश्तों की समीक्षा के क्रम में हमने लक्षित किया था कि आधुनिक काल में मनुष्य संपूर्ण रचना और चिंतन के केंद्र में है, ईश्वर अब व्यक्तिगत आस्था का विषय है, चित्रण का नहीं।
  • पुराण कथा के प्रति कवि की दृष्टि में यह पहला महत्वपूर्ण परिवर्तन है, जिसका प्रभाव रचना के समूचे विधान में परिलक्षित होता है।
  • जैसे तुलसी मूलतः पारिवारिक जीवन के चितेरे हैं, वैसे ही आधुनिक काल में मैथिलीशरण गुप्त। दोनों का एक मूल स्रोत रामकथा है, जो भारतीय परिवार की उज्जवलतम गाथा है।
  • भारतेंदु के बारे में लिखते है- “कविता द्विवेदी युग में उनका संस्कार है, गद्य में विचार।”
  • “विचारों की तेजस्विता और कथन-लालित्य का अपूर्व सामंजस्य उनके निबंधों में समाहित है जैसे कबीर और रवीन्द्रनाथ टैगोर दोनों एक जगह पर मिल जाए।”
  • समाज के हित में जैसी क्रांति की सतत प्रक्रिया काम्य है, वैसे ही रचना के हित में प्रयोग की।
  • कविता उत्कृष्ट शब्दों का उत्कृष्ट क्रम है।
  • छायावाद महज संध्या-सुंदरी, चाँदनी रात या नौका विहार का चित्र नहीं है। वह मूलतः शक्ति काव्य है।
  • नयी कविता में समग्र मनुष्य की बात ही नहीं कही गई है, मनुष्य के समग्र अनुभव-खंडों को संयोजित किया गया है।
  • आधुनिक साहित्य में मानवीय व्यक्तित्व व उसकी सर्जनात्मकता की सबसे गहरी चिंतना अज्ञेय के कृतित्व में मिलती है।
  • ‘अँधेरे में’ के लंबे खंडों में कवि की समस्या है समाज के उत्थान-पतन और आन्दोलन के बीच अपनी रचना के प्रेरक तत्त्वों का अभिज्ञान, रचना कैसे बाहर से अन्दर आती है फिर कैसे बाहर दूर-दूर तक परिव्याप्त हो जाती है।”
  • “मुक्तिबोध का काव्य संकलन ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ एक बड़े कलाकार की स्केच बुक लगता है।”
  • “अज्ञेय और उनके सहयोगी कवि शमशेर बात के कवि हैं मुक्तिबोध खबर के या भयानक बात के। इसलिए उनकी कविता में नाटकीयता और रहस्य का वातावरण है।”
  • कवि के रचनाशिल्प को देखकर लग सकता है कि जैसे एक विराट खंडहर पूरा नए तौर पर बनाया गया हो, जिसमें गुजरने पर भव्यता और एक खासतौर के अवसाद का एहसास एक साथ होता है।
  • भाषा में बोलचाल के गद्य का लहजा और लय में संगीत की चरम अमूर्तन इन दो परस्पर प्रतिरोधी मनः स्थितियों को उनकी कला साधती है।
  • “जीवन के कटुतम संघर्षों को लेकर उन्हें कविता में एकदम तरल बना सकना शमशेर के काव्य व्यक्तित्व की पहचान है।”
  • “चित्रकला, संगीत और कविता घुल-मिलकर उनके यहाँ रचना संभव करते हैं।”
  • “जागतिक संदर्भों में कम से कम रहने पर भी शमशेर में हमें एक पूर्ण रचना संसार दिखाई देता है।”
  • “उनकी काव्य भाषा में संज्ञापदों यानि शब्दों से कुछ अधिक महत्व सर्वनामों, क्रियापदों और अवयवों का है।”
  • मनुष्य जीवन की नियति को उसके समूचे विस्तार में देखने और प्रासंगिक बनाए रखना रघुवीर सहाय के कवि कर्म का केंद्रीय तत्त्व है।”
  • “राजनीति जैसे अखबारी विषय को कवि ने अनुभूति में ढाला है। यह समकालीन कविता की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। खासतौर से ऐसे परिवेश में जहाँ साहित्य अखबारनवीसी से उत्तरोतर आक्रांत होता जा रहा है।”
  • भाषा का रचाव ऐसा लगता है कि या तो भाषा ही भाषा लगती है या तो फिर अनुभूति का सीधा संस्पर्श होता है।
  • अज्ञेय चतुर्वेदी जी के प्रिय कवि हैं और रामचंद्र शुक्ल उनके प्रिय आलोचक। उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के दिखाए मार्ग पर ही अपनी आलोचना का विकास किया है। जिस प्रकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचना की सबसे बड़ी विशेषता ‘कवियों की विशेषताओं का अन्वेषण और उनकी अंतः प्रकृति की छानबीन’ मानते है, उसी प्रकार रामस्वरूप चतुर्वेदी आलोचना को ‘रचना की पुनर्रचना’ मानते है। रामचंद्र शुक्ल की भांति ही वे भी अपनी आलोचना में किसी भी विचारधारा से आतंकित नहीं होते और उनका अपनी जरुरत और देशकाल के अनुसार इस्तेमाल कर लेते हैं, किंतु रचनाकारों के प्रति आचार्य रामचंद्र शुक्ल की बेबाक और तटस्थ दृष्टीकोण रामस्वरूप चतुर्वेदी के पास नहीं है।
  • आज की कविता को जाँचने के लिए जो अब सचमुच ‘प्रास के रजतपाश’ से मुक्त हो चुकी है। अलंकारों की उपयोगिता अस्वीकार कर चुकी है, और छंदों की पायलें उतार चुकी है। काव्य भाषा का प्रतिमान ही शेष रह गया है, क्योंकि कविता के संगठन में भाषा प्रयोग की मूल और केंद्रीय स्थिति है।
  • “किसी भी रचना के लिए कोई भी पूर्वनिर्धारित मानदंड नहीं होना चाहिए। हृदय जब मुक्तावस्था में होगा, रचना भी मुक्त होगी, तो आलोचना जो अपेक्षाकृत बहुत बाद में विकसित हुई वृद्धावस्था में नहीं रह सकती।”
  • दूधनाथ सिंह के अनुसार- “वे आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद दूसरे आलोचक हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने की कठिन चुनौती स्वीकार की और ‘हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास’ लिखकर दिखा दिया। इस इतिहास में आधुनिक काल पर अधिक बल है। जिसके वे मास्टर आलोचक हैं। उन्होंने आधुनिक काल को ही   अपनी आलोचना के लिए चुना और उसमे भी आश्चर्यजनक रूप से कविता को।”
  • भोजपुरी क्षेत्र में प्रसाद, प्रेमचंद, रामचंद्र शुक्ल यानी आधुनिक काल के सबसे बड़े कवि- नाटककार, उपन्यासकार और आलोचक के रूप में जाना जाता है।
  • डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी की ख्याति नवलेखन और नयी कविता के महत्वपूर्ण आलोचकों में है। उन्होंने काव्य भाषा की सर्जनशीलता को अपनी आलोचना का केंद्र माना है।
  • डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने अंग्रेजी के ‘New Writing’ नामक आन्दोलन से नवलेखन को जोड़ा है, उनकी प्रमुख समीक्षा कृति ‘भाषा और संवेदना’ है। 
  • निराला के संदर्भ में डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते है-“आधुनिक युग के सर्वाधिक मौलिक क्षमता से संपन्न कवि  निराला है।”
  • डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार- “घनानंद के काव्य वैशिष्ठ्य, उनकी मौलिक स्वच्छंद गति तथा सर्जनात्मक भाषा प्रयोग में विकसित होता है और ये दोनों गुण एक दूसरे से परस्पर संबद्ध है।”
  • “घनानंद भाषा की वास्तविक शक्ति को पहचानकर उद्घाटित किया है।”
  • “घनानंद की स्वछंदता उनके बिंब विधान, प्रेम प्रयोग और प्रेम की मनः स्थितियों के चित्रण में सर्वत्र दिखती है।”
  • “घनानंद ने मौन के भाव को कारुणिक रूप में नहीं वरन दार्शनिक निष्पत्ति के रूप में ग्रहण किया है।”
  • “घनानंद का कृतित्त्व रीतिकाल की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों में से है।”
  • डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार- “अमीरदास के काव्य में रीति व भक्ति का अनूठा संयोग है।”
  • डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार- “रीतिकाल के जिन कवियों ने आचार्यत्व का ठीक से निर्वाह किया तथा लक्षणों के साथ मौलिक एवं सरस उदाहरणों का प्रयोग किया। प्रताप साही उन आचार्यों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।”
  • कबीर के सन्दर्भ में रामस्वरूप चतुर्वेदी के कथन है- “संस्कृत से मुक्तलोक संस्कृति को बनाने में उनका योगदान महत्वपूर्ण था।”
  • “बिना महाकाव्य लिखे वे (कबीर) हिंदी के महाकवि है।”
  • कामायनी के संदर्भ में रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं – “कामायनी आधुनिक समीक्षक और रचनाकार दोनों के लिए परीक्षा स्थल है।”

जय हिन्द

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