जैनेंद्र कुमार ‘अपना-अपना भाग्य’ कहानी

कहानी से संबंधित जैनेन्द्र कुमार का एक कथन है- “कहानी एक भूख है जो निरंतर समाधान पाने की कोशिश करती हैं।”

जैनेन्द्र कुमार का जन्म 2 जनवरी सन् 1905, में अलीगढ़ के कौडियागंज गाँव में हुआ था। उनके बचपन का नाम आनंदीलाल था।  

जैनेन्द्र कुमार हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक, कथाकार, उपन्यासकार और निबंधकार थे। इसके अलावे उन्होंने जीवनी संस्मरण और साक्षात्कार आदि भी लिखें हैं।

‘अपना-अपना भाग्य’ कहानी संग्रह ‘वातायन’ कहानी संग्रह में प्रकाशित हुई थी। 

कुछ लोगों का यह मानना है कि इस कहानी का पहला प्रकाशन कलकता से निकलने वाली ‘विशाल भारत’ पत्रिका में सन् 1929 ई. में हुआ था।

जैनेन्द्र कुमार की पहली कहानी- ‘खेल’ है जो 1928 ई. में ‘विशाल भारत’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।

अपना-अपना भाग्य कहानी 1931 ई. में लिखी गई थी, जो ‘वातायन’ कहानी संग्रह में संकलित है। यह कहानी संवाद शैली में लिखी गई है।  

कहानी ‘अपना-अपना भाग्य’ में जैनेन्द्र जी ने बड़े ही मार्मिक ढंग से एक गरीब बच्चे का चित्रण किया है। गरीब बच्चा सर्दी से मर जाता है क्योंकि अमीर लोगों ने उसके प्रति संवेदना नहीं दिखाई।

इस कहानी का अंत दुखांत है यह पाठक को सोचने के लिए विवश कर देता है कि सामाजिक विषमता की जो खाई है, उसमे मनुष्य इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है?

गरीब की उपेक्षित जीवन जीने की मज़बूरी और अमीर वर्ग के द्वारा निर्दयी व्यवहार को दिखाना ही लेखक का मुख्य उद्देश्य है।

कहानी का पात्र- दस वर्ष का अनाथ बच्चा, कथानायक और कथानायक का मित्र है।

यह कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई है और यह चार भागों में है।

‘अपना-अपना भाग्य’ कहानी का उद्देश्य:

अपना अपना भाग्य’ कहानी द्वारा लेखक ने अपने-अपने व्यक्तिगत स्वार्थों से ऊपर उठकर नैतिकता, परोपकार और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश दिया है।

प्रस्तुत कहानी के बालक की मृत्यु केवल इसलिए हो जाती है क्योंकि कोई उसकी मदद नहीं करता है। यदि समय पर उस बालक की सहायता होती तो न केवल वह जीवित ही रहता अपितु समाज का एक जिम्मेदार नागरिक भी बन सकता था।

लेखक इस कहानी द्वारा यह भी संदेश दे रहे हैं कि समाज के निचले तबके की ओर सभी की सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती है और उसका निर्वाह भी किया जाना चाहिए।

अपना-अपना भाग्य कहकर जिम्मेदारी से मुक्त होने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

‘अपना अपना भाग्य’ कहानी:

लेखक अपने मित्र के साथ नैनीताल में संध्या के समय बहुत देर तक निरुद्देश्य घूमने के बाद सड़क के किनारे की एक बेंच पर बैठे गए। नैनीताल की संध्या धीरे-धीरे उतर रही थी। रुई के रेशे  भाप से बादल हमारे सिरों को छू-छूकर बेरोक-टोक घूम रहे थे। हलके प्रकाश और अंधियारी से रंगकर कभी वे नीले दीखते, कभी सफ़ेद और फिर देर में अरुण पड़ जाते। वे जैसे हमारे साथ खेलना चाह रहे थे।

पीछे हमारे पोलो वाला मैदान फैला था। सामने अंग्रेजों का एक प्रमोद गृह था। जहाँ सुहावना, रसीला बाजा बज रहा था। और पार्श्व में था वही सुरम्य अनुपम नैनीताल।

ताल में किश्तियाँ अपने सफ़ेद पाल उड़ाती हुई एक-दो अंग्रेज यात्रियों को लेकर इधर से उधर और उधर से इधर खेल रही थी। कहीं कुछ अंग्रेज एक-एक देवी सामने प्रतिस्थापित कर, अपनी सुई-सी शक्ल की डोंगियों को, मानो शर्त बांधकर सरपट दौड़ा रहे थे। कहीं किनारे पर कुछ साहब अपनी बंसी डाले, सधैर्य, एकाग्र, एकस्थ, एकनिष्ठ मछली-चिंतन कर रहे थे। पीछे पोलो लॉन में बच्चे किलकारियाँ मारते हुए हॉकी खेल रहे थे।

शोर, मार-पीट, गाली-गलौज भी जैसे खेल का ही अंश था। इस तमाम खेल को उतने क्षणों का उद्देश्य बना, वे बालक अपना सारा मन, सारी देह, समग्र बल और समूची विधा लगाकर मानों ख़त्म कर देना चाहते थे। उन्हें आगे की चिंता न थी। बीते का ख्याल ना था। वे शुद्ध तत्काल के प्राणी थे। वे शब्द की सम्पूर्ण सच्चाई के साथ जीवित थे।

सड़क पर से नर-नारियों का अविरल प्रवाह आ रहा था और जा रहा था। उसका न ओर था न छोर। यह प्रवाह कहाँ जा रहा था और कहाँ से आ रहा था, कौन बता सकता है? सब उम्र के, सब तरह के लोग उसमें थे। मानो मनुष्यता के नमूनों का बाजार सजकर सामने से इठलाता निकला जा रहा हो।

अधिकार-गर्व में तने अंग्रेज उसमे थे और चिथड़ों से सजे घोड़ों की बाग़ थामे पहाड़ी उसमें थे, जिन्होंने अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान को कुचलकर शून्य बना लिया है और जो बड़ी तत्परता से दुम हिलाना सीख गए हैं।

भागते, खेलते, हंसते, शरारत करते लाल-लाल अंग्रेज बच्चे थे और पीली-पीली आँखें फाड़े, पिता की उंगली पकड़कर चलते हुए अपने हिन्दुस्तानी नौनिहाल भी थे। अंग्रेज पिता थे, जो अपने बच्चों के साथ भाग रहे थे। हंस रहे थे और खेल रहे थे उधर भारतीय पितृदेव भी थे, जो बुजुर्गी को अपने चारों तरफ लपेटे धन-संपन्नता के लक्षणों का प्रदर्शन करते हुए चल रहे थे।

अंग्रेज रमणियाँ थीं, जो धीरे-धीरे नहीं चलती थीं, तेज चलती थी। उन्हें न चलने से थकावट आती थी, न हंसने में मौत आती थी। कसरत के नाम पर घोड़े पर भी बैठ सकती थीं और घोड़े के साथ ही साथ जरा जी होते ही किसी-किसी हिन्दुस्तानी पर कोड़े भी फटकार सकती थी। वे दो-दो, तीन-तीन, चार-चार की टोलियों में निःशंक निरापद इस प्रवाह में मानो अपने स्थान को जानती हुई, सड़क पर चली जा रही थी।

उधर हमारी भारत की कुललक्ष्मी, सड़क के बिलकुल किनारे दामन बचाती और संभालती हुई, साड़ी की कई तहों में सिमट-सिमट कर, लोक-लज्जा, स्त्रीत्व और भारतीय गरिमा के आदर्श को अपने परिवेष्टनों में छिपाकर सहमी-सहमी धरती में आँख गाड़े, कदम-कदम बढ़ा रही थी।

इसके साथ ही भारतीयता का एक और नमूना था। अपने कालेपन को खुरच-खुरचकर बहा देने की इच्छा करनेवाला अंग्रेजीदां पुरुषोतम भी थे जो नेटिवों को देखकर मुंह फेर लेते थे। अंग्रेज को देखकर आँखे बिछा देते थे और दुम हिलाने लगते थे। वैसे वे अकड़कर चलते थे, मानो भारतभूमि को इसी अकड़ के साथ कुचल-कुचलकर चलने का उन्हें अधिकार मिला है।

घंटे के घंटे सरक गए अन्धकार गाढ़ा हो गया बादल सफ़ेद होकर जम गए मनुष्यों का वह ताँता एक-एक कर क्षीण हो गया अब इक्का-दुक्का आदमी सड़क पर छतरी लगाकर निकल रहा था। हम वहीं के वहीं बैठे थे सर्दी-सी मालुम हुई हमारे ओवरकोट भींग गए थे पीछे फिरकर देखा यह लाल बर्फ की चादर की तरह बिल्कुल स्तब्ध और सुन्न पड़ा था।

सब सन्नाटा था। तल्लीलाल की बिजली की रोशनियाँ दीप-मालिका-सी-जगमगा रही थीं। वह जगमगाहट दो मिल तक फैले हुए प्रकृति के जल दर्पण पर प्रतिबिंबित हो रही थी और दर्पण का काँपता हुआ, लहरें लेता हुआ, वह जल प्रतिबिम्बों को सौगुना, हजारगुना करके, उनके प्रकाश को मानो एकत्र और पूँजीभूत करके व्याप्त कर रहा था। पहाड़ों के सिरों पर की रोशनियाँ तारों-सी जान पड़ती थी।

हमारे देखते-देखते एक घने पर्दे ने आकर इन सबको ढक दिया। रोशनियाँ मानों मर गईं। जगमगाहट लुप्त हो गई। वे काले-काले भूत-से पहाड़ भी इस सफ़ेद पर्दे के पीछे छिप गए। पास की वस्तु भी न दीखने लगी। मानो यह घनीभूत प्रलय था। सबकुछ इस घनी गहरी सफ़ेदी में दब गया। एक शुभ महासागर में फैलकर संस्कृति के सारे अस्तित्व को डुबो दिया। ऊपर-नीचे, चारों तरफ़ वह निर्भेद, सफ़ेद शून्यता ही फैली हुई थी।   

ऐसा घना कुहरा हमने कभी नहीं देखा था। वह टप-टप टपक रहा था। मार्ग अब बिल्कुल निर्जन-चुप था। वह प्रवाह न जाने किन घोसलों में जा छिपा था। उस वृहदाकार शुभ्र शून्य में कहीं से ग्यारह बार टन-टन हो उठा जैसे कहीं दूर कब्र में से आवाज आ रही हो हम अपने-अपने होटलों के लिए चल दिए। रास्ते में दो मित्रों का होटल मिला दोनों वकील मित्र छुट्टी लेकर चले गए। हम दोनों होटल आगे बढ़े हमारा होटल आगे था।

ताल के किनारे-किनारे हम चले जा रहे थे। हमारे ओवरकोट तर हो गए थे। बारिस नहीं मालूम होती थी, पर वहाँ तो ऊपर-नीचे हवा से कण-कण में बारिस थी। सर्दी इतनी थी कि सोचा, कोट पर एक कम्बल और होता तो अच्छा होता।

रास्ते में ताल के बिल्कुल किनारे पर एक बेंच पड़ी थी। मैं जी में बेचैन हो रहा था। झटपट होटल पहुंचकर इन भींगे कपड़ों से छुट्टी पा, गरम बिस्तर में छिपकर सोना चाहता था, पर साथ में मित्रों की सनक कब उठेगी, कब थमेगी-इसका पता न था और वह कैसी क्या होगी-इसका भी अन्दाज नहीं था। उन्होंने कहा- “आओ, जरा यहाँ बैठो।”

हम उस चूते कुहरे में रात के ठीक एक बजे तालाब के किनारे उस भींगी बरफ-सी ठंडी हो रही लोहे की बेंच पर बैठ गए।

पांच, दस, पन्द्रह मिनट हो गए मित्र के उठने का इरादा न मालुम हुआ। मैंने खिसियाकर कहा,

“चलिए भी।”

“अरे जरा बैठों भी।”

हाथ पकड़कर जरा बैठने के लिए जब इस जोर से बैठा लिया गया तो और चारा न रहा- लाचार बैठे रहना पड़ा। सनक से छुटकारा आसान न था, और यह जरा बैठना जरा न था, बहुत था।

चुपचाप बैठे तंग हो रहा था, कुढ़ रहा था कि मित्र अचानक बोले-

“देखो…वह क्या है?”

मैंने देखा-कुहरे की सफेदी में कुछ ही हाथ दूर से एक काली-सी सूरत हमारी तरफ बढ़ी आ रही थी। मैंने कहा, “होगा कोई।”

तीन गज की दूरी से दीख पड़ा, एक लड़का सर के बड़े-बड़े बालों को खुजलाता चला आ रहा है। नंगें पैर है, नंगा सिर, एक मैली-सी कमीज लटकाए है। पैर उसके न जाने कहाँ पड़ रहे हैं, और वह न जाने कहाँ जा रहा है- कहाँ जाना चाहता है। उसके क़दमों में जैसे कोई न अगला न, न कोई पिछला है, न दायां, न बायां है।

पास ही चुंगी की लालटेन के छोटे-से प्रकाशवृत में देखा-कोई दस बरस का होगा। गोरे रंग का है। पर मैल से काला पड़ गया है आँखें अच्छी बड़ी पर रुखी हैं। माथा जैसे अभी से झुरियां खा गया है। वह हमें न देख पाया। वह जैसे कुछ भी नहीं देख रहा था। न नीचे की धरती, न ऊपर चारों तरफ फैला हुआ कुहरा, न सामने का तालाब और न बाकी दुनिया वह बस, अपने विकट वर्तमान को देख रहा था

मित्र ने आवाज दी-“ए!”

उसने जैसे जागकर देखा और पास आ गया।

“तू कहां जा रहा है?”

उसने अपनी सुनी आँखें फाड़ दी।

“दुनिया सो गई, तू ही क्यों घूम रहा है?”

बालक मौन-मूक फिर भी बोलता हुआ चेहरा लेकर खड़ा

रहा।

“कहां सोएगा?”

“यही कहीं।”

“कल कहां सोया था?”

“दुकान पर।”

“आज वहां क्यों नहीं?”

“नौकरी से हटा दिया।”

“क्या नौकरी थी?”

“सब काम। एक रुपया और जूठा खाना!”

“फिर नौकरी करेगा?”

“हां।”

“बाहर चलेगा?”

“हां।”

“आज क्या खाना खाया?”

“कुछ नहीं।”

“अब खाना मिलेगा?”

“नहीं मिलेगा!”

“यों ही सो जाएगा?”

“हां।”

“कहां।”

“यही कही।”

“इन्हीं कपड़ों में?”

बालक फिर आँखों से बोलकर मूक खड़ा रहा। आँखें मानो

बोलती थी- यह भी कैसा मूर्ख प्रश्न!

“माँ-बाप है?”

“हां।”

“कहां?”

“पंद्रह कोस दूर गाँव में।”

“तू भाग आया?”

“हाँ !”

“क्यों?”

“मेरे कई छोटे भाई-बहन हैं- सो भाग आया, वहां काम नहीं, रोटी नहीं। बाप भूखा रहता था और मारता था। माँ भूखी रहती थी और रोती थी। सो भाग आया। एक साथी और था। उसी गाँव का। मुझसे बड़ा था। दोनों साथ यहां आए। वह अब नहीं है।”

“कहाँ गया?”

“मर गया।”

“मर गया।”

“मर गया?”

“हाँ, साहब ने मारा, मर गया।”

“अच्छा, हमारे साथ चल।”

वह साथ चल दिया। लौटकर हम वकील दोस्तों के होटल में पहुंचे।

“वकील साहब!”

वकील लोग होटल के ऊपर के कमरे से उतर कर आए। कश्मीरी दोशाला लपेटे थे। मोज़े-चढ़े पैरों में चप्पल थी। स्वर में हलकी झुंझलाहट थी, कुछ लापरवाही थी।

“आ-हा फिर आप! कहिए।”

“आपको नौकर की जरुरत थी न? देखिए, यह लड़का है।”

“कहां से ले आए? इसे आप जानते हैं?”

“जानता हूँ- यह बेईमान नहीं हो सकता।”

“अजी, ये पहाड़ी बड़े शैतान होते हैं। बच्चे-बच्चे में गुल छिपे रहते हैं आप भी क्या अजीब हैं। उठा लाए कहीं से- लो

जी, यह नौकर लो।”

“मानिए तो, यह लड़का अच्छा निकलेगा।”

“आप भी… जी, बस ख़ूब हैं। ऐरे-गेरे को नौकर बना लिया जाए, अगले दिन वह न जाने क्या-क्या लेकर चंपत हो जाए।”

“आप मानते ही नहीं, मै क्या करूँ?”

“माने क्या ख़ाक? आप भी…जी, अच्छा मज़ाक करते हैं।… अच्छा, अब हम सोने जाते हैं।” और वे चार रूपये रोज के किराए वाले कमरे में सजी मसहरी पर सोने झटपट चले गए।

वकील साहब के चले जाने पर, होटल के बाहर आकर मित्र ने अपनी जेब में हाथ डालकर कुछ टटोला, पर झट कुछ निराश भाव से हाथ बाहर कर मेरी ओर देखने लगे।

“क्या है?”

“इसे खाने के लिए कुछ देना चाहता था।” अंग्रेजी में मित्र ने कुछ कहा, मगर दस-दस के नोट हैं।” “नोट ही शायद मेरे पास हैं, देखूं।”

सचमुच मेरे पास पॉकिट में भी नोट ही थे। हम फिर अंग्रेजी में बोलने लगे। लड़के के दांत बीच-बीच में कटकटा उठते थे। कड़ाके की सर्दी थी।

मित्र ने पूछा, “तब?”

मैने कहा, “दस का नोट ही दे दो।” सकपकाकर मित्र मेरा मुंह देखने लगे, “आरे यार! बजट बिगड़ जाएगा। हृदय में जितना दया है, पास में उतने पैसे तो नहीं हैं।”

“तो जाने दो, यह दया ही इस ज़माने में बहुत है।” मैने कहा, मित्र चुप रहे। फिर लड़के ने बोला, “अब आज तो कुछ नहीं हो सकता। कल मिलना। वह होटल ‘डी पब’ जानता है? वहीं कल दस बजे मिलेगा।”

“हाँ, कुछ काम देंगे हुजूर।”

“हां, हां, दूंढ़ दूंगा।”

“तो जाऊं?”

“हां”, ठंडी सांस खींचकर मित्र ने कहा, “कहां सोएगा?”

“यही कहीं बेंच पर, पेड़ के नीचे किसी दूकान की भट्टी में।”

बालक फिर उसी प्रेत-गति से एक ओर बढ़ा और कुहरे में मिल गया। हम भी होटल की ओर बढ़े। हवा तीखी थी। हमारे कोटों को पार कर बदन में तीर-सी लगती थी।

सिकुड़ते हुए मित्र ने कहा, “भयानक शीत है। उसके पास बहुत कम कपड़े…है।”

कपड़े…. ।”

“यह संसार है यार!” मैने स्वार्थ की फिलासफ़ी सुनाई, “चलो, पहले बिस्तर में गर्म हो लो, फिर और की चिंता करना।”

उदास होकर मित्र ने कहा, “स्वार्थ! जो कहो, लाचारी कहो, निष्ठुरता कहो या बेहयाई!”

दूसरे दिन नैनीताल- स्वर्ग के किसी काले गुलाम पशु के दुलारे का वह बेटा- वह बालक, निश्चित समय पर हमारे होटल ‘डी पब’ में नहीं आया। हम अपनी नैनीताल की सैर ख़ुशी-ख़ुशी ख़त्म कर चलने को हुए। उस लड़के की आस लगाते बैठे रहने की जरुरत हमने न समझी।

मोटर में सवार होते ही थे कि यह समाचार मिला कि पिछली रात, एक पहाड़ी बालक सड़क के किनारे, पेड़ के नीचे, ठिठुरकर मर गया!

मरने के लिए उसे वही जगह, वही दस बरस की उम्र और वही काले चीथड़ों की कमीज मिली। आदमियों की दुनिया ने बस यही उपहार उसके पास छोड़ा था।

पर बताने वाले ने बताया कि गरीब के मुँह पर, छाती मुठ्ठी और पैरों पर बरफ की हलकी-सी चादर चिपक गई थी। मानो दुनिया की बेहयाई ढकने के लिए प्रकृति ने शव के लिए सफेद और ठण्डे कफ़न का प्रबंध कर दिया था। सब सूना, और सोचा, अपना-अपना भाग्य। (यहाँ कहानी समाप्त होती है)

यह कहानी हमें दूसरों की मदद करने का पाठ सिखाती है। मनुष्य को अपनी मनुष्यता नहीं छोडनी चाहिए। यही तो एक अंतर है जो हमें जानवरों से अलग बनाता है।

डॉ. नामवर सिंह के अनुसार– “अपना-अपना भाग्य मानवीय संवेदना के मर जाने की कहानी है।”

जय हिन्द

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