नटराज (शिव) की मुद्रा का अर्थ
अग्नि (हाथ में) – सृष्टि का संहार और परिवर्तन।
डमरू – सृष्टि की उत्पत्ति और नाद।
अभय मुद्रा – भय से मुक्ति।
उठाया हुआ पैर – मोक्ष और मुक्ति का मार्ग।
अपस्मार पर रखा पैर – अज्ञान और अहंकार पर विजय।
नटराज, भगवान शिव का वह दिव्य स्वरूप है जिसमें वे ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में तांडव करते हैं। इस स्वरूप में शिव एक बौने राक्षस अपस्मार को अपने दाहिने पैर के नीचे दबाए हुए दिखाई देते हैं।
अपस्मार कौन था?
पुराणों और शैव परंपरा के अनुसार, अपस्मार एक असुर (दानव) था जो अज्ञान, अहंकार, भ्रम और आध्यात्मिक अंधकार का प्रतीक माना जाता है।
“अपस्मार” शब्द का अर्थ विस्मृति या चेतना का लोप हो जाना भी माना जाता है।
कथा के अनुसार, कुछ ऋषियों को अपने ज्ञान और तप का अत्यधिक अभिमान हो गया। वे यह मानने लगे थे कि संसार केवल उनके ही कर्मकांडों से चलता है। तब शिव ने उनके अहंकार को दूर करने के लिए नटराज का रूप धारण किया।
ऋषियों ने अपने मंत्र के बल से अनेक शक्तियाँ उत्पन्न कीं। उन्होंने एक भयंकर बाघ, विषैले सर्प और अंत में अपस्मार नाम का असुर को शिव पर आक्रमण करने के लिए भेजा। शिव ने बाघ की खाल धारण कर ली, सर्प को आभूषण बना लिया और अपस्मार को अपने पैर तले दबा दिया।
शिव ने अपस्मार को मारा क्यों नहीं?
यह कथा का सबसे गहरा पक्ष है। शिव अपस्मार का वध नहीं करते, बल्कि उसे दबाकर रखते हैं। इसका अर्थ है कि अज्ञान और अहंकार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, परंतु ज्ञान और चेतना के नियंत्रण में रखा जा सकता है।
जब तक मनुष्य सजग रहता है, तब तक अपस्मार अर्थात अज्ञान उसके ऊपर हावी नहीं होता।
इस प्रकार नटराज का तांडव केवल नृत्य नहीं, बल्कि यह संदेश है कि ज्ञान, चेतना और सत्य के प्रकाश से अज्ञान और अहंकार पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
जय हिन्द