कौशल्या नंदेश्वर बैसंत्री की आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ में दलित महिलाओं के संघर्ष और जीवन उत्पीड़न की गाथा है। महिलाओं को समाज में अपने-आपको साबित करने के लिए ‘दोहरा संघर्ष’ करना होता है। ‘दोहरा अभिशाप’ आत्मकथा मात्र दलित महिलाओं की वेदना नहीं, समाज की संपूर्ण महिलाओं की वेदना है। यह आत्मकथा दलित समाज में महिला जीवन के तमाम संघर्षों का चिट्ठा खोलती है। यह आत्मकथा अन्य आत्मकथाओं की तरह सिर्फ पीड़ा, घृणा, जुगुप्सा आदि भावों का संचालन नहीं करती है, बल्कि यह लेखिका के स्वयं के संघर्षों और उनके माँ-बाप के संघर्षों से भरे जीवन का भी चित्रण करती है। लेखिका ने दलित समाज की अच्छाई और बुराई सभी का विवरण अपनी आत्मकथा में किया है। इस आत्मकथा में उन्होंने अपने परिवार के तीन पीढ़ीयों की स्त्री का ब्योरा लिखा है। लेखिका की नानी-आजी, माँ भागेरथी और स्वयं कौसल्या बैसंत्री। उन्होंने भारतीय समाज में दलित स्त्री की आजादी और आवाज को बुलंद किया है। जातीयता के नाम पर लेखिका को कितनी मानसिक यातनाएँ सहनी पड़ी और आस-पास की समानांतर कितनी ही स्त्री इस पीड़ा में छटपटा रही हैं इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है।
लेखिका की मां भागेरथी की संघर्षमय जीवनगाथा में एक अनपढ़, गरीब, दलित मजदूर स्त्री की ताकत हमारे सामने प्रकट होती है, जो हिमालय की सी अटल है। अपने लड़के और लड़कियों को पढ़ाने के लिए यह स्त्री थका देने वाली मेहनत के बाद भी सुकून महसूस नहीं करती है। अपने निश्चय पर अडिग रहती है। लड़कियों को आजादी की किरण खुद मुहैया कराती है। लेखिका की मां का संघर्ष प्रत्येक स्त्री को वह ताकत देता है जिससे स्त्री अपनी आने वाली पीढि़यों को आजादी की राह दिखाने की हिम्मत करती है। लेखिका ने अपनी आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ में गरीबी, अभाव, अशिक्षा, अज्ञान, अंधकार, सामाजिक असमानता, अंधविश्वास और जातीय नफरत से बच्चों, स्त्रियों और विशेषकर दलित बालिकाओं के मानसिक स्तर पर पड़ रहे प्रभावों का मार्मिक वर्णन किया है।
मुक्ति की कामना औरतों की जिंदगी का अभीष्ट है। हिंदी में लिखी पहली दलित आत्मकथा कौसल्या बैसंत्री की ‘दोहरा अभिशाप’ का निचोड़ भी यही है। कौसल्या अपने जीवन की कथा कहते हुए जीवन की कठिनाइयों का वर्णन करती हैं। साथ ही वे बिना किसी लफ्फाज़ी के इस बात की स्थापना करती हैं कि स्त्रियों की मुक्ति का एक ही तरीका है ‘शिक्षा’। शिक्षा का महत्व उन्हें डॉ. आंबेडकर के दर्शन से मिला है, क्योंकि छोटी-सी उम्र में ही वह उनके आंदोलन से जुड़ गई थीं। हालांकि आंदोलन से जुड़ने के बावजूद वह एक ऐसे व्यक्ति से विवाह करती हैं, जो अपनी तमाम शिक्षा के बावजूद अपनी पत्नी के लिए अंततः ‘मर्द’ ही साबित हुआ। पितृसत्ता के अपमानजनक चक्र से मुक्ति पाने का फैसला करने में कौसल्या जी को 40 साल लग गए। दरअसल हुआ यह कि पितृसत्ता के अभिशाप से मुक्ति पाने के लिए शादी के इतने सालों के बाद अपने पति के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत करने और कोर्ट में केस करने का उन्होंने साहस किया था। उनका यह कदम प्रेरणादायक है। क्योंकि आज भी पढ़ी-लिखी औरतें अपमान सहते हुए अलग होने का फैसला नहीं कर पाती हैं।
अपनी आत्मकथा की भूमिका में कौसल्या घोषणा करती हैं–
“मैं लेखिका नहीं हूँ, न साहित्यकार लेकिन अस्पृश्य समाज में पैदा होने से जातीयता के नाम पर जो मानसिक यातनाएँ सहन करनी पड़ीं, इसका मेरे संवेदनशील मन पर असर पड़ा। मैंने अपने अनुभव खुले मन से लिखे हैं। पुरुष प्रधान समाज औरतों का खुलापन बर्दाश्त नहीं करता। पति तो इस ताक में रहता है कि पत्नी पर अपने पक्ष को उजागर करने के लिए चरित्रहीनता का ठप्पा लगा दे। लेखिका भूमिका में लिखती है कि- “पुत्र, भाई, पति सब मुझ पर नाराज़ हो सकते हैं, परंतु मुझे भी तो स्वतंत्रता चाहिए कि मैं अपनी बात समाज के सामने रख सकूँ। मेरे जैसे अनुभव और भी महिलाओं को हुए होंगे। परंतु समाज और परिवार के भय से अपने अनुभव समाज के सामने उजागर करने से डरती हैं और घुटन में जीती हैं। समाज की आँख खोलने के लिए ऐसे अनुभव सामने आने की ज़रूरत है।”1
आज़ादी की यह चाह कौसल्या बैसंत्री को विरासत में मिली थी। उनकी आजी (नानी) के माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे। उन्हें उनके भाई-भाभी ने उन्हें पाला था। बचपन में ही उनकी शादी हो गई और गौना होने से पहले आजी के पति की मौत हो गई। कौसल्या कहती हैं–
“अस्पृश्य समाज में कोई विधवा दुबारा शादी करना चाहे तो उसके लिए कोई रोक-टोक तो थी ही नहीं। तलाकशुदा औरत को भी दूसरा घर करने में समाज को कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन वह औरत किसी कुंवारे आदमी से शादी नहीं कर सकती थी। ज़ाहिर है कौसल्या की आजी की शादी भी एक बड़े उम्र के शादीशुदा आदमी मोडकूजी साहूकार से कर दी गई। कौसल्या कहती हैं कि उस समय दो पत्नी रखना बुरा नहीं माना जाता था। पर इस दूसरी शादी की विधि अलग थी और इसे विवाह न कह कर ‘पाट’ कहते थे।” लेखिका की नानी का भी पाट हुआ था। जहाँ उनका विवाह हुआ था, वह घर ठीक-ठाक था, आजोबा (नाना) एक साहूकार थे। वे पहले से ही शादी-शुदा थे, जिससे उन्हें एक बेटा और बेटी थी। कौशल्या की नानी खुबसूरत और साहसी महिला थी। आजी घर का सारा काम करती और पहली पत्नी उस पर रोब झाड़ती रहती और बीड़ी बनाने वालों से सिर्फ गप्पे हाँकती रहती थी। आजोबा बड़े गुस्सैल थे। आजी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। बात-बात पर गाली-गलौज, मारपीट रोज़ की बात थी। आजी से बिना किसी कारण के झगड़ा करते थे और कभी-कभी हाथ भी उठा दिया करते थे। बिना किसी कारण के इन सभी बातों से उबकर आजी घर छोड़ने का निश्चय कर लेती है और एक दिन चुपचाप अपने तीनों बच्चों के साथ घर छोड़ देती है। लेकिन रास्ते में मुश्किलें उनका पीछा नहीं छोड़ रही थीं। उनकी बीचवाली बेटी सरस्वती को तेज़ बुखार था, बीच रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया। “आजी ने अपने दिल पर पत्थर रखा मन को काबू किया और पास में वही एक गड्ढे को और गहरा करके उन्होंने अपने जिगर के टुकड़े को दफना दिया तथा अपने दोनों बच्चों को लेकर रोते हुए नागपुर तक की यात्रा की। बाद में उनका बेटा श्रवण भी जिंदगी की लड़ाई 18 साल की उम्र में टायफाइड के कारण हार गया और उसकी मौत हो गई। तमाम तकलीफ़ें उठाकर उन्होंने अपने दम पर अपनी बेटी यानि कौसल्या की माँ की परवरिश की। इतना कुछ हो जाने के बाद भी वह हिम्मत नहीं हारी। किसी तरह नागपुर पहुँचकर वहाँ वह ईंट पत्थर ढ़ोने का काम करने लगी। दलित लोगों को रोजाना काम पर जाने से ही खाने का इंतजाम हो पाता है। यही कारण है कि दलित परिवार के बच्चे पढ़ नही पाते हैं। वे भी किसी काम में लग जाते हैं। लेखिका की माँ चाहती थी कि बच्चे पढ़े-लिखें क्योंकि उनपर अंबेडकर के भाषण का प्रभाव था। लेखिका लिखती हैं- ‘पढो-लिखो शिक्षित बनो और आगे बढ़ो।’ का प्रभाव पड़ चुका था।
कौसल्या के माता-पिता बहुत मेहनती थे। डॉ. आंबेडकर के प्रभाव में उन्होंने तमाम गरीबी के बावजूद अपने बच्चों को पढ़ाया। वे दोनों जीवन-भर मजदूरी और संघर्ष करते रहे। उनके बाबा ने 18 साल तक एक बेकरी में काम किया। इस दौरान उनकी पगार एक रुपया भी नहीं बढ़ी। बाद में उनकी माँ ने उन्हें इस नौकरी को छोड़ देने को कहा। बाबा कबाड़ी का काम करने लगे। अंत में माँ और बाबा दोनों नागपुर की इम्प्रेस मिल में काम करने लगे। “आई और बाबा जिस बस्ती में रहते थे, उसका नाम था- खलासी लाइन्स।….मेरा जन्म इसी खलासी लाइन्स में 8-9-26 को हुआ था।”
कौसल्या जब दस बरस की थीं तब उनकी आजी (नानी) की मौत हो गई। उनकी आजी का उनके ऊपर गहरा प्रभाव था। “आजी के पास मरते समय एक गठरी और एक पीतल का लोटा था। गठरी खोलने पर उसमें चार-पांच गज सफ़ेद कपड़ा था और एकदम नया और एक छोटे कपड़े की थैली में कुछ रुपए बंधे थे, साथ में सिंदूर अबीर-गुलाल और विठोबा के मंदिर का प्रसाद था। आजी हर दम कहा करती थीं कि वह अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगी, किसी पर बोझ नहीं बनेंगी। अपने कफ़न का सामान भी वह खुद जुटाएंगी और उन्होंने अपनी बात पूरी करके दिखाई।”2
स्वाभिमान की यह लहर कौसल्या जी तक उनकी आई (मां) से होती हुई आई थी। इसके बाद कौसल्या बैसंत्री अपने जीवनानुभवों को पन्ने-दर-पन्ने दर्ज करती रहीं। उनके आई-बाबा (माता-पिता) अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए जी-तोड़ संघर्ष करते हैं। बच्चों को पढ़ाने के कारण उन्हें बस्ती और समाज वाले बहुत कुछ सुनाते थे, लेकिन वे किसी की कुछ नहीं सुनते थे। उनको पढ़ाने की खातिर उनके माता-पिता को बहुत संघर्ष करना पड़ा। वह लिखती हैं–
“जब बड़ी भिड़े कन्याशाला में पांचवीं में प्रवेश लिया तब स्कूल की फीस ज़्यादा थी। …बाबा ने हमारी हेड मिस्ट्रेस से बहुत विनती की कि वे फीस नहीं दे सकते। बहुत मुश्किल से वह मान गई और कहा कि अच्छी पढ़ाई-लिखाई न करने पर स्कूल से निकाल देगी। बाबा ने हेड मिस्ट्रेस के चरणों के पास अपना सर झुकाया दूर से, क्योंकि वे अछूत थे, स्पर्श नहीं कर सकते थे। बाबा का चेहरा कितना मायूस लग रहा था उस वक्त! मेरी आंखें भर आई थीं। अब भी इस बात को याद करके बहुत व्यथित हो जाती हूं। अपमान महसूस करती हूं। जाति-पांति बनाने वाले का मुंह नोंचने का मन करता है। अपमान का बदला लेने का मन करता है।”
जैसे-जैसे कौसल्या पढ़ाई करती गईं, उनकी चेतना जागृत और विकसित होती गई। उनके समाज के लोगों ने अपनी शैक्षणिक समस्याओं को लेकर एक समिति बनाई थी। ‘अस्पृश्य विद्यार्थी परिषद’। उस वक्त वह नौवीं कक्षा में पढ़ती थीं। वह इस संगठन की उप-सचिव थीं। 1943 में नागपुर में इसका अधिवेशन किया गया। उनके घर में संगठन से जुड़े लड़के आते थे। इसके लिए भी समाज परिवार के लोग बुरा-भला कहते थे। लेकिन वे लोग चुपचाप पढ़े जाते। कल्पना करने की बात यह है कि 40 के दशक में जब औरतों का सांस लेना दूभर था, उस वक्त उनके माता-पिता समाज से पंगा ले रहे थे। दलित समाज को यह ताकत डॉ. आंबेडकर के विचारों से मिली थी। कौसल्या बैसंत्री लड़कपन से ही उनके प्रभाव में आ गई थीं। वह लिखती हैं कि उन्होंने उनका पहला भाषण दस साल की उम्र में नागपुर के कस्तूरचंद पार्क में सुना था। वहां डॉ. आंबेडकर ने कहा था– “अगर हिंदू हमें अपनी बराबरी का नहीं समझेंगे तो हम धर्मांतरण करेंगे।”
वह कहती हैं कि डॉ. आंबेडकर के विचारों का अस्पृश्य समाज के लोगों के ऊपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। यह प्रभाव पड़ना स्वभाविक ही था, क्योंकि उन्होंने ही पहली बार अस्पृश्य समाज में यह बोध जगाया कि वे भी इंसान हैं। इस देश पर उनका हक़ है, उन्हें भी सम्मानित जीवन जीने का अधिकार है। डॉ. आंबेडकर ने उनकी हिम्मत बढ़ाई और अपने मानवीय हक़ के वास्ते लड़ने के लिए प्रेरित किया। आज जो भी उन्नति अस्पृश्य समाज कर रहा है और करने के लिए अग्रसर हो रहा है, यह बाबा साहब की देन है। वह बताती हैं कि अस्पृश्यों की बस्तियों में चक्की में गेहूं पीसती हुई औरतें बाबा साहब के गीत गाती थीं। लड़का पैदा होने पर उसे झूले में डालने के समय और बच्चे के जन्म दिवस पर भी बाबा साहब के गीत गाए जाते और कामना की जाती कि बच्चा बाबा साहब जैसा बने।
कौसल्या अपनी बस्ती की औरतों की कहानी सुनाती हैं। ज़्यादातर औरतें मेहनतकश लेकिन ज़्यादातर पितृसत्ता के दंश से दुखी। ठुमी अपने पति की दूसरी पत्नी है, जो सुबह से शाम तक काम करती है और हर साल बच्चा पैदा करती है। उनके घर में ढेर सारे बच्चे थे। बच्चों के लिए बाज़ार से पुराने कपड़े आते। उनके घर में हमेशा आलू-बैगन की सब्जी बनती थी।
एक अन्य महिला सोगी मरे हुए जानवर का मीट बेचती थी। एक अन्य महिला रामकुंवर मिल में काम करती थी। उसका पति जयराम निठल्ला था। पहली तारीख को मिल के गेट पर खड़ा हो कर पत्नी की पगार छीन लेता। उसकी पत्नी को मिल में ही किसी से इश्क हो गया। इसकी उसे सज़ा मिली। उसे निर्वस्त्र करके गधे पर बस्ती में घुमाया गया। अपमान बर्दाश्त न कर पाने के कारण उसने कुंए में छलांग लगा दी और मर गई। और अंततः एक कहानी बन गई।
समाज में स्त्री का दर्जा मात्र एक दासी का है, चाहे वह दलित हो या सवर्ण स्त्री। लेकिन समाज में दलित स्त्रियों का तिहरा शोषण होता है। एक तो दलित महिलाएँ दिन-रात मजूरी करती खटती है। दलित होने के कारण उनका शोषण तो होता ही है साथ ही स्त्री होने के कारण भी सवर्ण पुरुषों के साथ-साथ पति के शोषण का भी शिकार होना पड़ता है। इस संबंध में लेखिका लिखती है- “सखाराम की औरत दिहाड़ी पर मजदूरी कर रही थी वह सीमेंट-ईंट ढोकर मिस्त्री को देती थी वह देखने में सुन्दर थी। मिस्त्री बदमाश था। वह आते-जाते उसे छेड़ता था। एक दिन उसने सीमेंट का गोला बनाकर उसकी छाती पर मारा उस औरत ने उसे गालिया दी परंतु वह बेशर्म हँसता रहा। साथ में वहाँ खड़े मजदूर भी उसे देखकर हँस रहे थे। यह बात उस औरत ने अपने पति से कही। पति का काम था जाकर उस बदमाश को डांटे-फटकारे। परंतु उसने अपनी औरत को डांटना शुरू कर दिया मारा और कहने लगा कि और औरतें भी तो वहाँ काम करती है, उन्हें वह कुछ नहीं कहता और तुम्हे ही क्यों छेड़ता है? तुम ही बदचलन हो, यह कहकर उसे रात भर घर से बाहर रखा। वह बिचारी घर के पीछे रात भर डर-डर के रही और सवेरे उसे गधे पर बैठाया गया बस्ती से बाहर निकालने के बाद वह बेचारी झाड़ी में छिपी रही, क्योंकि उसके बदन पर पूरे कपड़े नहीं थे। वह रात में बस्ती के कुएँ में कूद गई सबेरे उसका शरीर पानी के ऊपर तैर रहा था। उसके माँ-बाप आए और कहने लगे कि इसने हमारी नाक कटवाई, अच्छा ही हुआ कि यह कुलटा मर गई।3
अपनी बस्ती का जिक्र करते हुए कौसल्या बताती हैं– “बस्ती में ज़्यादा घर मिट्टी के थे। कुछ घास-फूस की झोपड़ियां भी थीं, पर बहुत कम। जो थोड़े पैसे वाले थे, उनके मकान ईंट के थे। ऐसे घर पूरी बस्ती में 5-6 ही होंगे।… ज्यादातर महार जाति के अछूत यहां रहते थे। कुल 10-15 घर आंध्र प्रदेश के चमारों के थे। क़रीब 30-40 घर सफ़ाई कर्मियों के थे। मांग (अछूत) जाति के भी लगभग 15 घर थे।…महार लोगों की संख्या बस्ती में ज़्यादा थी।… महार जाति के कुछ लोग नागपुर के इम्प्रेस और मॉडल मिल में काम करते थे… मांग जाति से महार लोग छुआछूत बरतते थे…”
बाबा साहब की जलाई लौ हमेशा उनके अंदर जलती रही। संभवतः इसी कारण से जातीय अपमान का दंश उन्हें बहुत सालता था। वे कहती हैं– “मैं अस्पृश्य हूं, यह भावना मन से कभी जाती ही नहीं थी।”4 लेकिन, स्कूल में, समाज में हर जगह तमाम जातीय उत्पीड़न और अपमान का सामना करते हुए भी उन्होंने बाबा साहब द्वारा दिए गए शिक्षा का मूल मंत्र कभी नहीं त्यागा।
21 वर्ष की आयु में कौसल्या बैसंत्री की शादी बिहार के रहने वाले देवेंद्र कुमार से हुई। तब वह एम.ए, एल.एल.बी करके बनारस विश्वविद्यालय से डीलिट कर रहा था। उस समय के हिसाब से अपनी बड़ी उम्र के दबाव, देवेंद्र कुमार की उच्च शिक्षा और सामाजिक कामों की सक्रियता के कारण कौसल्या ने दबे मन से इस विवाह के लिए हामी भर दी थी। देवेंद्र से विवाह के लिए हामी भरने का खामियाजा लेखिका को जिंदगी भर ‘तू ही मेरे पीछे पड़ी थी’ कहकर चुकाना पड़ा। लेखिका कहती है- “मैंने शादी कि थी जरुर, पर यह कोई बड़ा अपराध नहीं था। मैंने कोई जोर जबरदस्ती नहीं की थी। फिर भी मुझसे बार-बार कहता था कि तुम्हे कोई नहीं मिला, इसलिए मेरे साथ शादी की। एक बार मेरे छोटे लड़के ने टोका कि आपकी शादी को चालीस साल हो गए और आप बार-बार इसकी रट लगाते हो तब वह उसके ऊपर नाराज हो गया।”5 दलित होने के बावजूद देवेंद्र कुमार भयंकर सामंती आदमी था। किसी भी समस्या में अपनी पत्नी से सलाह लेना उसकी मर्दानगी के ख़िलाफ़ था। वह घर चलाने के लिए एक पैसा उनके हाथ में नहीं रखता। सब्जी आदि के लिए गिन कर पैसा रखता। बाकि तेल, साबुन, चीनी सब अपनी अलमारी में बंद रखता। बाद में वह लेबर इंस्पेक्टर हो गया। कौसल्या का जीवन नरक बन चुका था। वह बात-बात पर गंदी गालियाँ देता और भयंकर क्रूरता से मारता। उनके पति से उन्हें दुःख के अलावा कुछ नहीं मिला। वह जिद्दी, घमंडी और क्रूर था। वह मानता था पत्नी सिर्फ खाना बनाने और उसकी शारीरिक भूख मिटाने के लिए होती है वह कहती है- “देवेन्द्र कुमार को सिर्फ खाना बनाने और उसकी शारीरिक भूख मिटाने के लिए चाहिए थी।”6 आज़ाद रहने वाली कौसल्या पति की गुलाम बनकर रह गई। इतनी पढ़ी-लिखी लड़की विवाह संस्था में दासी बन गई। वह कौसल्या के प्रति हमेशा असम्पृक्त रहता। ख़ासतौर से जब उनके बच्चे होते तो वह उनकी खैरख्वाह लेने भी नहीं जाता।
भोपाल के हमीदिया अस्पताल में पैदा हुए उनके पाँचवे बच्चे की पैदाइश का ज़िक्र उन्होंने विस्तार से किया है। जिस दौरान पता होने के बावजूद वह दौरे पर निकल जाता है और लौटने के बाद भी उससे मिलने तक नहीं आता। अपने पति के बारे में वे भूमिका में लिखती हैं- “मेरे उच्च शिक्षित पति, लेखक और भारत सरकार में उच्च पद पर सेवारत रहे। उन्हें ताम्रपत भी मिला है और स्वतंत्रता सेनानी की पेंशन भी। पति ने मेरी कभी कदर ही नहीं की बल्कि रोज-रोज के झगड़े, गालियों से मुझे मजबूरन घर छोड़ना पड़ा और कोट केश करना पड़ा।”7
कौसल्या अपमान के घूंट पीकर रह जाती हैं। वह लिखती हैं– “क्या ऐसे पति से प्यार श्रद्धा हो सकती है? इस प्रसंग की याद आते ही मेरा खून खौलने लगता है।”8 डॉ. धर्मवीर लेखिका को आरोपित करते हुए लिखते हैं-“यदि वे अच्छे हाथ-पाँव लेकर भी द्विज नारी की तरह भरण-पोषण पर पालनेवाली डायनासोर की नस्ल की औरत न होती तो दलित कानून का सहारा लेकर अपने जीवन की धरा को पूर्णतया बदल सकती थी। पति के अत्याचार सहने में जो लाचार है वह द्विज नारी है क्योंकि ब्राह्मण विवाह की वजह से तलाक लेने का विकल्प नहीं है। लेकिन नारी निठल्ला होकर ही शिकायत कर सकती है कि उसका पति क्रूर है।”9 इतना अपमान झेलने के बाद भी इस रिश्ते से निकलने का फैसला करने में उन्हें 40 साल का वक्त लगा।
भोपाल से वह दिल्ली आ गई। उनके बच्चे बड़े हो गए थे। उन्होंने एक बार फिर से अपना सामजिक काम शुरू किया और दलितों तथा महिलाओं के संघर्ष के साथ जुड़ गईं। 24 जून, 2011 को वे भगवान् को प्यारी हो गई।
कौसल्या बैसंत्री की पूरी आत्मकथा में उनकी लेखन शैली बिलकुल बिखरी-बिखरी है, अधिक तारतम्यता नहीं है। जैसे किसी की जीवन डायरी के लिखे पन्ने हों जिन्हें पुनर्सृजित कर दिया गया हो। लेकिन मुझे लगता है शायद यही उसकी खूबसूरती भी है। उनकी समूची जिंदगी भी तो कितनी बिखरी-बिखरी थी। इसलिए उनकी इस आत्मकथा की अपनी एक भाषा शैली है, अपना व्याकरण है और सबसे जुदा अपना एक सौंदर्यशास्त्र है। मूलतः मराठी भाषी होते हुए, हिंदी में लिखना एक चुनौती भी थी। दरअसल सभी साहित्यकार अपनी भाषा अपने साथ भी लेकर आते हैं। कौसल्या बैसंत्री की भी अपनी अलग भाषा है, जो बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात कहती चलती हैं और यही उनका सौन्दर्यशास्त्र भी है।
इस तरह कौसल्या यह बताने की कोशिश करती हैं कि एक ओर तो औरतें घिनौने पितृसत्ता की मार झेल रही थीं तो दूसरी ओर उनका पूरा परिवार, समाज दलित होने का अपमान झेल रहा था। इसे ही कौसल्या बैसंत्री ‘दोहरा अभिशाप’ कहती हैं शायद!
सन्दर्भ ग्रंथ:
- दोहरा अभिशाप- कौशल्या बैसंत्री, कौसल्या बैसंती व उनकी आत्मकथा ‘दोहरा अभिशाप’ का आवरण पृष्ठ
- दोहरा अभिशाप- कौशल्या बैसंत्री, पृ.सं. 29
- दोहरा अभिशाप, पृ. सं. 56
- दोहरा अभिशाप. पृ. सं. 53
- दोहरा अभिशाप. पृ. सं. 105
- दोहरा अभिशाप. पृ. सं. 106
- दोहरा अभिशाप, पृ. सं. 07
- दोहरा अभिशाप, पृ. सं. 07
- हँस पत्रिका, दलित विशेषांक, अंक-1, अगस्त- 2004, संपादक- राजेन्द्र यादव,
दिल्ली, पृ. सं. 70