मुर्दहिया आत्मकथा में अभिव्यंजित स्त्री-जीवन

डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा मुर्दहिया केवल एक दलित लेखक का जीवन वृत्त नहीं बल्कि यह भारतीय ग्रामीण समाज की सामाजिक, जातिगत और लैंगिक असमानताओं का गहन दस्तावेज भी है। तुलसीराम ने अपने जीवन के अनुभवों के माध्यम से यह दिखाया है कि दलित समाज में स्त्री पर दोहरा शोषण होता है।

तुलसीराम ने अपनी बहुचर्चित आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में अनेक स्त्री-जीवन का मार्मिक चित्रण किया है। इस आत्मकथा में एक ओर उत्पीड़ित स्त्री-जीवन के चित्र मिलते हैं, वहीं दूसरी ओर विद्रोही स्त्री के भी दर्शन होते हैं। लेखक के परिवार की स्त्रियों की चर्चा करें तो लेखक की दादी, माँ, चाची, बुआ आदि हैं। उसके बाद गाँव की दलित-श्रमिक स्त्रियाँ, काल्पनिक स्त्री-पात्र जैसे- भुत्नियाँ, चुड़ैल, देवियाँ और गाँव के बाहर से आनेवाली चुड़िहारिन, शिक्षित, अशिक्षित महिलाएँ भी हैं जो लेखक को गाँव से बाहर पढ़ाई करते समय आते जाते मिलती हैं।

परिवार की स्त्रियों की बात करें तो ‘मुर्दहिया’ में खासकर लेखक ने अपनी दादी को नायिका के रूप में प्रस्तुत किया है। लेखक लिखते है कि- “मेरी दादी का नाम ‘मुसड़िया’ था। वह सौ वर्ष से भी अधिक जिन्दा रही। उनके चेहरे तथा बाँहों से लटकते हुए चिचुके चमड़े उसकी लंबी उम्र को प्रमाणित करते थे। गाँव वालों का कहना था कि मेरी दादी ने कौआ का माँस खाया है, इसलिए वह मरती नहीं है। गाँव में यह किंवदंती फैली हुई थी कि कौवे का माँस खानेवाला बहुत दिन तक जिंदा रहता है।”1 लेखक ने अपनी दादी को मुर्दहिया में वैद्य, कथा वाचिका और भविष्य के बारे में सोचने-जानने वाली बताया है। वह एक जुझारू दलित औरत के रूप में सामने आती हैं, जो अपने अधिकारों के लिए लड़ती हैं। दादी बालक तुलसीराम को बेहद प्यार करती हैं। तुलसीराम के बीमार पड़ने पर उसे ठीक करने के लिए जितने भी जतन हो वह सब कुछ करती हैं। तुलसीराम को भी अपनी दादी से बहुत लगाव है। दादी के बीमार पड़ने पर तुलसीराम चिंताग्रस्त हो जाते हैं और उनके मरने की आशंका के डर से वह अपने गाँव के देवी ‘चमरियाँ माई’ से प्रार्थना करता हैं – ‘हे चमरियां माई, मैं भले ही मर जाऊं किंतु हमारी दादी न मरे।’2 उस समय का मुझे छोटे बच्चों को बहलाने वाला खेल ‘घुंटू-मुंटू’ बहुत याद आता है। दादी रोते हुए बच्चों को चुप कराने के लिए एक लघुकथा गाती थी- “कड़ा-कड़ा कौआ, नेपाल क बेटउआ, नेपाल गइलै डिल्ली, उठाइके लिअउलै पिल्ली, खेलावा हो कौआ, खेलावा हो कौआ।”3 दादी के गर्भ में अनेक कहानियाँ छिपी हैं। जैसे- भूतप्रेत, चुड़ैल, नागिन, अंग्रेज़ी राज के ब्राह्मणों के दमन आदि। तुलसीराम को जब चेचक निकली तो दादी ‘जय चमरिया माई’, जय चमरिया माई की बार-बार रट लगाते हुए अंगियारी करती रहती थी। दादी चमरिया माई की अटूट भक्तिन थी। दादी मेरी माँ से अधिक मेरे लिए रोती थी।”4 बालक तुलसीराम की चेचक से जान तो बच गई पर दाई आँख चली गई और चेहरे पर दाग पड़ गए। जिसके कारण दादी को अब मुझसे और भी अधिक प्यार हो गया। दादी मुझे रात में भी अपने पास सुलाती और हमेशा मेरे मुँह पर हाथ फेरते हुए चमरिया माई से विनती करती रहती।’5 दादी अपने बेटे-बहुओं से छिपाकर तुलसीराम को अपने बिस्तौरिया वाले सैंतीस सिक्के, जो उनको उनके पति ने दिए थे, उसे दिखाती और बार-बार गिनकर रखती है। यदि घर में कोई खाने का सामान आता तो दादी कुछ हिस्सों को तुलसीराम के लिए छिपाकर रख देती थी। दादी के अटूटप्यार का वर्णन करते हुए तुलसीराम कहते हैं- “इसी तरह जाड़े के दिनों में कौड़ा तापते हुए वह आलू तथा ताजा मटर की छिम्मी भूना करती थी तथा अन्य बड़े बच्चों से छिपाकर सिर्फ मुझे ही खाने को देती थी।”6

दादी ने ही लेखक को भय से लड़ने के तरीके बताए थे। ‘दादी मुझे अक्सर, याद दिलाती थी कि किसी झाड़ी से गुज़रते हुए ‘जै राम जमेदर’ जरूर दोहराते जाना। ऐसा कहने से नाग-नागिन भाग जाते हैं। मैं दादी की सारी बातों का पालन करता था और जब भी किसी कंजास से गुजरता, मैं ‘जै राम जमेदर’, ‘जै राम जमेदर’ रटता जाता, किन्तु इस मंत्र की गुत्थी न दादी जानती थी और न ही गाँव का कोई अन्य व्यक्ति ही। दादी इस तरह की अनसुलझी गुत्थियों का एक ‘साइक्लोपीडिया’ थी। लेखक की दादी फक्कड़ बाबा की हत्या के बाद अपने घर को भूतों से भय मुक्त करने के लिए और खानदानी भूतबाबा को प्रसन्न करने के लिए मुझे चाचा के साथ चढ़ावा चढ़ाने के लिए भेजती है। लेखक का कथन है – “इस चढ़ावे के बाद दादी का कहना था कि अब फक्कड़ बाबा की हत्या का बदला लेने के लिए किसी अन्य भूत को हमारे खानदानी भूतबाबा हमारे परिवार के आसपास भटकने नहीं देंगे। दादी की इस बात से घर के सारे लोग पूर्ण रूपेण आश्वस्त हो गए”।7

लेखक ने मुर्दहिया में अपनी दादी को गाँव की अनुभवी और लोक-ज्ञान से संपन्न स्त्री के रूप में चित्रित किया है। दादी भले ही अशिक्षित थी लेकिन लोक-चिकित्सा जड़ी बूटी और घरेलू उपचारों में उसे गहरा ज्ञान था। गाँव के लोग इन्हें “वैद्य” कहते थे क्योंकि वे कई बीमारियों का इलाज देशी नुक्सा और परंपरागत ज्ञान से करती थीं। लेखक ने दादी को वैद्य कहकर यह दिखाया है की ग्रामीण और दलित स्त्रियाँ भले ही औपचारिक शिक्षा से वंचित रही हों परन्तु उनके पास जीवन का अनुभव और लोकबुद्धि थी। दादी का यह वैदत्व केवल औषधीय ज्ञान नहीं बल्कि जीवन की समझ का प्रतीक था। वह अपनी दृढ इच्छाशक्ति, स्वाभिमान और व्यावहारिक ज्ञान से पूरे परिवार की आधारशिला थी।

दादी की हार्दिक इच्छा थी कि लेखक खूब पढ़े-लिखे- ‘दादी हमेशा कहती रहती थी कि खूब पढ़ के रंगरेज जइसन बनिया।8 दादी की ऐसी बातों से मुझे बहुत राहत मिलती थी। लेखक का भरोसा जाग जाता है कि दादी पढ़ाई के लिए विक्टोरिया वाले सिक्के दे देगी।

लेखक जब छठी कक्षा में पहुँचा तो परिवार के अन्य सदस्य लेखक का नाम स्कूल में नहीं लिखवाना चाहते थे। बात पैसे की भी थी और तब बड़ी मुश्किल से दादी की जिद पर मुझे चार आना मिला, जो छठी कक्षा में नाम लिखवाने की फीस थी। यह चवन्नी इस बात की गारंटी थी कि अब छठी से लेकर दसवीं कक्षा तक की पढ़ाई का मार्ग खुल गया।’ दादी का प्रकृति प्रेम भी अदूभुत था। गाँव में पेड़ कटने पर दादी कहती- ‘पेड़ कटाने से आसमान उदास लगता है।’9

मुर्दहिया में तुलसीराम ने जितना दादी का विशद वर्णन किया है। उसके मुकाबले अपनी माँ का थोड़ा कम किया है। लेखक की माँ मेहनती और घर के काम में जुटे रहने वाली महिला थी। लेखक लिखते हैं कि उनके पिता को मछली पकड़ने में महारत हाशिल थी। उन्हें ‘मछरमरवा’ के रूप में पौराणिक ख्याति प्राप्त थी। पिता चाहते थे कि मैं भी उनकी तरह बनू। बाद में लेखक की माँ ने बताया कि जिस चारपाई पर लेखक पैदा हुए थे उस चारपाई के नीचे उनके पिता ने जिन्दा मछली पकड़कर डाल दिया। यह एक प्रकार का टोटका था, उनका विश्वास था कि लेखक बड़ा होने पर अपने पिता की तरह ‘मछरमरवा’ के रूप में ख्याति प्राप्त करे। एक दलित खेत मजदूर और मजदूरनी की आकांक्षा इससे ज्यादा और क्या हो सकती थी। लेखक के पैदा होने पर अनेक अंधविश्वास भरे कर्मकांड किए गए थे। गाँव में चेचक की बीमारी फैलने पर लेखक की एक आँख चली गई थी। मुझे लोग कनवा-कनवा कहकर पुकारते थे। जिससे मेरी माँ आहत हो सिसकियाँ भरते हुए चुप हो जाया करती थी। कारण था उन व्यक्तियों का क्रूर व्यवहार।

लेखक की माँ उनके लिए पिता के साथ मजदूरी करती थी। घर में दीवाली के समय गरीबी भगाने के प्रंसग का वर्णन करते हुए लेखक कहता है- “दीवाली का त्यौहार आने पर मेरी माँ परम्परा के अनुसार अनाज पछोरने वाले सूप को एक लकड़ी से भद-भद पीटते हुए रात की अंतिम घड़ी में घर के एक-एक कोने में जाती और साथ में ज़ोर-ज़ोर से अर्द्धगायन शैली में ‘सूप पीटो दरिददर खेदो’ का जाप भी करती रहती। गाँव की अन्य महिलाएँ भी ऐसा ही करतीं, किन्तु कोई भी घर के दरिद्रता भगा पाने में सफल नहीं हुई।”10

लेखक अपनी माँ को खेतों में जी तोड़ मेहनत करते देखकर बहुत दुखी रहते हैं जब वे सातवीं कक्षा में पहुँचे तब लेखक की माँ को रतौंधी होने लगा था। वे लिखे हैं – ‘उसी समय मेरी माँ को रात में दिखाई देना बंद हो गया था। वह टोटका स्वरूप रात के अंधेरे में सरसों के तेल से मिट्टी की ढकनी में कपास की बाती जलाकर कुछ यूँ ही ढूंढने निकल पड़ती थी। कौतुहलवश किसी ने पूछ लिया कि क्या ढूंढ रही हो कुछ खो गया है क्या? तब वह तुरन्त यह कहते हुए घर में वापिस आ जाती कि वह ‘रतौंधी ढूंढ रही थी’। अपनी माँ पर हुए अत्याचार का वर्णन करते हुए लेखक कहता है- ‘इस बीच हमारे घर में भी एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई। मेरी माँ बस्ती के किसी भी व्यक्ति से बात करती पिताजी तुरन्त उसके चरित्र पर उंगली उठाना शुरू कर देते थे। वे माँ को बहुत भद्दी-भद्दी गालियाँ देने लगते थे। माँ के प्रति अन्याय देख लेखक के मन में पिता के लिए नफ़रत पैदा हो गया, और माँ के प्रति सहानुभूति- ‘मेरी इस घृणा की पराकाष्ठा शीघ्र ही पिताजी के प्रति हिंसा में बदल गई।

सन् 1961 के ही जाड़ों की बात है, पिताजी माँ को मारने के लिए फरूही लेकर दौड़े। मैं वहीं खड़ा था। मैंने बहुत ज़ोर से पिताजी को तमाचा मारा। उन्होंने मुझे उलटकर वैसे ही मारा। “उनका तमाचा इतना ज़ोर का था। मैं कुछ देर के लिए चौंधिया सा गया। मुझे कुछ पल के लिए कुछ भी दिखाई नहीं दिया। मुझे ऐसा लगा मानो मैं अंधा सा हो गया। किन्तु इस घटना का परिणाम यह हुआ कि आगे पिताजी माँ को मारने से घबराने लगे। बस्ती के सभी लोगों ने मुझे सही ठहराया।”11 जिस समय लेखक ने अपनी माँ के ऊपर होने वाले अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़ी उस समय वह मात्र 12 साल के थे।

लेखक ने जब नौवीं पास की तो उसके सामने 10वीं की पढ़ाई जारी रखने की समस्या थी। घर के सभी लोग लेखक की पढ़ाई छुड़वाना चाहते थे, जिससे लेखक बहुत दुखी था। अपने बेटे को दुखी देखकर “माँ फूट-फूट कर रोने लगती, किन्तु वह बेबस थी, वह कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं थी। आखिरकार जुलाई आ गई, घर वालों के विरोध के बावजूद मैं सुबह बिना कुछ खाए खाली पेट स्कूल जाने लगा। घर पर सामूहिक संयुक्त परिवारिक जीवन में व्यक्तिगत रूप से भोजन की व्यवस्था मेरे लिए असंभव थी। बाद में ऊबकर मेरी माँ रात के अपने खाने में से आधा खाना बचाकर ताखा में रख देती थी, जिसे न चाहते हुए भी मैं खाकर स्कूल चला जाता था। माँ के इस त्याग से द्रवित होकर सुबह खाते हुए मैं अक्सर रो पड़ता था।”12

माँ और दादी के अलावा मुर्दहिया में सिर्फ ऐसा नहीं कि माँ को केवल अपने बेटे से ही प्यार है| अपितु वे तुलसीराम के साथ पढ़ने वाले जमींदार के लड़के चिंतामणि जिसको मिर्गी का दौरा पड़ता था, उसके लिए भी वह वात्सल्य रखती थी। उसके लिए भी ‘मेरी माँ शंकर भगवान से प्रार्थना करते हुए उसकी मिर्गी ठीक हो जाने की गुहार लगाती’।

मुर्दहिया में दादी और माँ के अलावा कई और दलित स्त्री पात्र हैं। सुभगिया और किसुनी भौजी हैं, जो लेखक से अपनी चिट्ठी पढ़वाती और लिखवाती हैं। सुभगिया तुलसीराम के गाँव की लड़की है, जो देखने में बहुत सुन्दर है। ‘हमारी बस्ती में रहने वाले जलंधर नाम के बूढ़े दलित की जवान बेटी थी। वह बड़ी सुन्दर थी। कुछ माह पहले उसका गौना बिसराम नामक एक ऐसे युवक के साथ हुआ था जो कलकत्ता के सियालदह स्टेशन के आसपास घोड़े की तरह खींचने वाला ठेला रिक्शा खींचता था। इस ठेले को बंगाल में ‘टाना रिक्शा’ कहते हैं। वह बराबर सुभगिया को चिट्ठी लिखता रहता था। लेखक गाँव का एकमात्र पढ़ा-लिखा था। लेखक को पढ़ना तो आ गया था पर रूक-रूक कर। चिट्टी के अंत में लिखा था- ‘लिखता हूँ खत खून से स्याही न समझना। मरता हूँ तेरी याद में जिन्दा न समझना।’ चिट्ठी का यह शायरी सुनकर सुभगिया दहाड़ मार-मार कर रोने लगी। उसे लगा शायद उसके पति जिन्दा नहीं है।”13

दलित औरतों में किसुनी भौजी का वाकया भी बार-बार आता है, जब वह अकाल के समय लेखक से चिट्ठी लिखवाती है। लेखक इन दलित स्त्रियों की वर्णन शैली से कई बार इतना प्रभावित हो जाता है कि वह इनके दुख में खुद भी डूबता उतरता है – “मैं तो स्वयं अपने दुख में डूबता उतरता फिरता था, किन्तु गाँव की रोती हुई मशीनों जैसी महिलाओं से मैं अत्यंत विचलित हो जाता था। अनेक बार उनके आँसुओं में मेरे भी आँसू शामिल हो जाते थे।”14

किसुनी भौजी ऐसी ही थी, जिसका पति मुन्नीलाल कतरास की कोइलरी में कोयला काटता था। वह अपनी अद्भूत वर्णन ‘यमक’ शैली में चिठ्टी लिखवाती थी। लेखक का मानना था कि ‘यदि वह पढ़ती तो, शायद दुखांत साहित्य में बहुत कुछ गढ़ती’। उसके द्वारा लिखवाई गई चिठ्टी में किसुनी भौजी की पीड़ा का चित्र खींचकर अपना मर्म उद्घाटित करता है – “हे खेदन के बाबू, हम कवन-कवन बतिया लिखाई? बबुनी बहुत बिलखले। ऊ रोई-रोई के मर जाले। हमरे छतिया में दूध ना होला। दूहै जाईला त बकेनवा लात मारै ले। बन्सुवा मजदूरी में खाली सड़ल सड़ल सावां दे ला। ऊपर से वोकर आंखि बड़ी शैतान हौ। संझिया क रहरिया में गवुंवा के मेहरिया सब मैदान जा लीं, त ऊ चोरबत्ती बारै ला।, रकतपेवना हमहूं के गिद्ध नाई तरेरैला। चोटवा से पेटवा हरदम खराब रहै ला। हम का खिआईं का खाईं समझ में न अवैला। बबुनी के दुधवा कहंवा से लिआईं? जब ऊ रोबैले, त कब्बो कब्बो हम वोके लेई के बहरवां जाईके बोली ला कि देख तोर बाबू आवत हउवैं, त ऊ थोरी देर चुप हो जाले। तू कइसे हउवा? सुनी ला की कोइलरी में आगि लगि जालें। ई काम छोड़ि दा। गवुवै में मजूरी कई लेहल जाई। सतुवै से जिनगी चलि जाई। येहर बड़ी मुसकिल में बीतत हौ। अकेलवै जियरा ना लागैला, ऊपरा से खइले क बड़ा टोटा हौ। हो सके त बीस रूपया भेजि दा। जब अइहा त तलसी बाबू के एक जिस्ता कागद जरुर लेहले अइहा, ई है सब कर चिट्ठिया लिखै लं। ई बडा तेज हउवै। अउर का लिखाई हम? थोर लिखना, ढेर समझना।”15 ये दलित महिलाएँ लेखक से सिर्फ चिठ्टी ही नहीं लिखवती थी बल्कि तुलसीराम की चिंता भी करती थी। एक बार बकैना भैंस द्वारा नीचे गिराए जाने पर तुलसीराम को बहुत चोट लगी तब किसुनी भौजी इस बात से बहुत दुखी हो गई। एक दिन उसने लेखक को अपने घर बुलाकर समझाया।- “हे बाबू ई सब हवा-बतास से बचि के रहिहा। इनकर गुस्सा जान लेउवा होला।”16 लेखक के भाग जाने पर किसुनी भौजी दुखी होती हुई बोली- ‘देसवा तूं छोड़ि देवा बाबू त हमार चिट्ठिया के लिखी?’17

‘सोमरिया’ यह चुल्ली की पत्नी है। यह भी दलित मजदूरिन महिला है, जो लेखक की निगाह में एक अनोखी औरत है। सप्ताह के हर दिन के नाम वाली औरतें- जैसे सोमालिया, मंगरी, बुधिया, बेफइया, सुखिया, सनीचरी तथा अतवरिया ये सभी हमारी बस्ती में रहती थीं। सोमरिया, गाँव मे चुगलखोरी के लिए बहुत प्रसिद्ध थी। उसकी एक अनोखी आदत यह थी कि उसके घर से कोई भी छोटी-मोटी चीज़ खो जाती, तो वह अपनी झोपड़ी के पास वाले कुएँ पर रात में सबके सो जाने के बाद सन्नाटे में खड़ी होकर जोर-जोर से भद्दी-भद्दी गलियाँ देते हुए खोये हुए सामान का नाम लेकर बिना किसी को इंगित किए उसे लौटा देने का हांका लगाती थी। अगर लहसुन या प्याज भी उसके घर से गायब हो जाती, तो उसके लिए भी उसी शैली में वह रात के सन्नाटे में वापिस करने की माँग दोहराती रहती। उसकी यह शैली इतनी आतंकित कर देती थी कि कई बार गाँव के लोग उस छोटी-मोटी सामग्री को अपने घर में से ले जाकर उसकी झोपड़ी के पास रख देते थे, ताकि वह रोज-रोज कुएं पर सोता पड़ने पर शोर न मचावे। गाँव के लगभग सभी लोगों का विश्वास था कि सोमरिया को जब किसी चीज़ की आवश्यकता होती, वह एक जालसाजी के तहत उसे चोरी चले जाने का नाटक करते हुए उस कुएं पर हांक लगाती थी, ताकि लोग उसकी माँग को मुफ्त में पूरा कर दें।”18

दलित महिलाओं के क्रम में लेखक ने ‘नट’ जाति की औरतों का वर्णन किया है। लेखक नट औरतों की सुन्दरता की बात करते हुए कहते हैं – “सोफी की बहु तथा दोनों बेटियाँ सौन्दर्य के मामले में अपरम्पार संपन्न थीं। किन्तु भूख उन्हें भी लगती थी, पर उसे मिटाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं होता था। धीरे-धीरे मजबूरी में उनका सौन्दर्य काम में आने लगा। गाँव के कुछ अभद्र ब्राह्मण युवक संध्या के समय मुर्दहिया के पास उस मुहाने पर लगता था कि स्वयं भूतों की चौकीदारी करने लगे। उन नटनियों का सौन्दर्य मुर्दहिया की उन्हीं कंटीली झाड़ियों के पीछे प्राय: गुम होता रहा।”19 सोफी की बड़ी बेटी ललती जिसे समस्त ग्रामीणवासी ‘नटिनिया’ के नाम से पुकारते थे, वह मुझसे अंग्रेजी सीखने के लिए अति उत्सुक हो गई थी। वह पूर्णरुपेण अनपढ़ थी, किंतु अंग्रेजी सीखने के लिए अति उत्सुक। नटनिया ‘अप्रतिम, मोहक होने के साथ अत्यंत कुशल नर्तकी थी…नाचना किसी से सीखा नहीं था, किन्तु उसे देखते ही ऐसा लगता था जैसे कि मानो नाचते ही पैदा हुई थी। उसके अंग-प्रत्यंग नृत्यकला के कल पुर्जे जैसे लगते थे। यहाँ तक कि संध्या होते ही मुर्दहिया से चरकर लौटीं गाय-भैसों की ‘बांव-बांव’ वाली धुन पर भी वह नृत्य की दो चार छलांगे लगा लेती थी। हम जब मुर्दहिया पर गोरू चराने जाते, नटनिया अपनी झोपड़ी से निकलकर हम सबके बीच आ जाती और सबके साथ ‘लखनी ओल्हापाती’ तथा ‘चिल्हिया चिल्होर’, आदि सारे खेल खेलती। हम प्रायः अपनी गोरू हांकने वाली लाठियों को किसी मेड़ या झाड़ी से ओठगांकर दो सूखी लकड़ियों से लाठी पर नगाड़े की तरह बजाना शुरू कर देते थे, जिसके साथ ही शुरू हो जाती थी नटिनिया की अनोखी नृत्यकलाएं। “शायद दुनिया की वह पहली नर्तकी थी, जो मेरे जैसे नौसिखुए लट्ठवादकों की लक्कड़ ध्वनि पर किसी श्मशान पर यूँ नाचने लगती थी। कालांतर में नृत्यकला में उसकी स्वाभाविक सहजता ने ही उसे बदनामी का शिकार बना दिया।” 20

लालती को इंगलिश सीखने की इतनी अधिक इच्छा थी, वह अक्सर कहती- ‘हमहुं के रिंगरेजिया पढ़ाव रे बाबू’ वह ऐसा कहते हुए एकदम दीन-हीन हो जाती थी। मैंने शुरू से उसे चिकनी जमीन पर खपड़े से लिखकर कुछ अक्षर सिखाने की कोशिश की, किंतु उसके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता था। एक दिन वह आवां से निकला हुआ नया थपुआ कलर आई। वह कहने लगी, मैं दुधिया से थपुआ पर लिखकर पढ़ाऊ। मैं वैसा ही करने लगा। ‘ए बी, सी, डी’ तो उसने पहले ही रट लिया था। किंतु लिखना असंभव हो गया था। मैं उसके हाथ में दुधिया पकड़कर लिखवाता, किन्तु जब वह स्वयं लिखती तो उसका हाथ कांपने लगता। तमाम कोशिशों के बावजूद मैं उसे लिखना नहीं सीखा पाया।”21 वह इस बात का जिद्द करने लगी कि अंग्रेजी बोलना सीख जाए। उसने मुझसे पहला अंग्रेजी अनुवाद पूछा: ‘पिपरा पे गिधवा बइठल हउवैं’ लेखक ने बताया- ‘वल्चर्स आर सिटिंग आन पीपल ट्री।’ यह वाक्य उसे इतना भाया कि उसने इसे तुरन्त रट लिया और यही वाक्य उसके जीवन का तकियाकलाम बन गया। वह लेखक को जब देखती, ‘वल्चर्स आर सिटिंग आन पीपल ट्री।’ नटिनिया की विचित्र बोली शैली में बोले जाने वाले इस वाक्य ने शीघ्र ही गाँव में कुतूहल के साथ कोहराम मचा दिया। मेरे घरवाले मुझे कहने लगे: “ई त वारिया निकरि गयल‘ अर्थात ‘यह आवारा हो गया है।”22

लेखक जब दसवीं पास करने के बाद गाँव छोड़कर शहर आजमगढ़ जाने के एक रात पहले अपना बक्सा नटनिया के घर में रखता है। ‘नटनिया दुख दर्द भरे आवाज़ पूछती है- “अब लउटि के ना अइबे का रे बाबू”लेखक के जवाब न देने पर नटनिया लेखक के द्वारा सिखाई इंगलिश भूलकर पूछती है- ‘पिपरा पे गिधवा बइठल हउवे’ बोलकर एक बड़ा प्रतीकात्मक उद्बोधन करती है। लेखक के घर की दुलरियो भाभी जो एक मनोरोग कि पीड़ित होने पर एक दलित औरत जो औझेती का काम करती है तथा लोग उसे उसे ‘चंमैनियां’ के नाम से पुकारते थे, उससे रोज भभूत लाने को कहती, चंमैनिया का भभूत खाते ही दुलरिया भाभी को पेट दर्द बंद हो जाता। बाद में लेखक कहीं से भी राख लाकर दे देता, जिसे वह खाकर ठीक हो जाती।

इसी तरह गाँव में चुड़िहारिन, धोबिन, गोदना गोदने वाली औरतों, मजदूर खेत में काम करती औरतों के साथ भी लेखक की संवेदना जुड़ती है। औरतें धान की रोपनी करती थीं| दलित मजदूरिनें हमेशा एक लोकगीत की कुछ पंक्तियां दिनभर गाती रहती थीं, जो इस प्रकार था- ‘अरे रामा परि गय बहुआ रेत, चलब हम कइसे ऐ हरि।’ भूख और गरीबी के शिकार सबसे ज्यादा औरतें होती हैं और उनपर मार भी सबसे ज्यादा पड़ती हैं। एक कहावत के अनुसार- धोबी की बिटिया के न नइहरे सुख न ससुरे सुख अर्थात धोबी की बेटी को मायके तथा ससुराल दोनों जगह कपड़े धोने ही पड़ते हैं।”23

लेखक जब दसवीं से आगे की पढ़ाई करने के लिए आजमगढ़ अम्बेडकर होस्टल में रहता है। अहमदी बीबी वहाँ एक सरकारी सफाई कर्मचारी थी, जो अंबेडकर हॉस्टल तथा उसके सामने वाली सड़क पर झाड़ू लगाया करती थी। उस समय अंबेडकर हॉस्टल में कोई शौचालय नहीं था। हॉस्टल के पीछे बाढ़ से बचने के लिए लाल डिग्गी का ऊँचा बाँध बनाया गया था। उसी के पास एक सार्वजनिक शौचालय था। एक टूटे-फूटे कमरे में गोल छेद के आसपास बस दो ईंटे रखे हुए होते थे और नीचे जमीन पर एक घड़ा रख दिया जाता था। मैलों से भरे इन घड़ों को दो महिला सफाईकर्मी सुबह-शाम उठाकर लाल डिग्गी बाँध से उस पार फेंक आती थीं। वे दिनभर पान चबाया करती थीं। जाहिर है जिस प्रकृति का उनका काम था उसमें पान सहयोगी का करता था। काम खत्म करने के बाद वे एक पान की दुकान से दूसरी पर चलायमान रहती थी। किसी से भी वे बड़ी आसानी से हंसी मजाक कर लेती थी। किन्तु यदि जरा भी अनबन हो गई तो गोली की रफ्तार से उनके मुँह से गालियाँ फूट पड़ती थीं। इतना ही नहीं वे तुरन्त बाल्टी भर मैला उठा लाती और अंधाधुंध लोगों पर फेंकना शुरू कर देती थीं।”24

मुर्दहिया के दलित स्त्री पात्र गाँव के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी जानवर, आदि के लिए बेहद संवेदनशील थी। दादी पेड़ काटने पर कहती है- ‘पेड काटने पर गाँव उदास हो जाता है। दलित बस्ती की मजदूरिनें बंसुपांडे को बगुला मारने पर अक्सर गालियाँ देती रहती थी, क्योंकि दलित कभी बगुलों को मारकर नहीं खाते। पिछले अकाल की भुखमरी में भी किसी दलित ने बगुलो को कभी नहीं मारा।”25 अकाल के दिनों में जब गाँव के सारे जल स्रोत सूख जाते तब दलित औरतें इन पक्षियों की प्यास का बहुत ध्यान रखती- “ये प्यासे कौवे चोंच फैलाए हाँफते हुए घरों के आसपास मंडराते रहते थे क्योंकि जंगल में खाद्य सामग्री तो दूर, पानी भी नहीं मिलता था। मेरी दादी समेत अनेक बूढ़ी महिलाएँ मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर घर के बाहर रख देती थी, जहाँ अनेक पक्षी चें-चें करते हुए आ जाते थे।”26

दलित महिलाओं में अन्य पात्रों में चमरिया मैय्या और शीतला माता का ज़िक्र कई बार आया है, जिन्हें पुजौरा चढ़ाया जाता है। गैर दलित महिलाओं में सवर्ण स्त्रियाँ है जो लेखक के सम्पर्क में किसी ना किसी तरह आईं। यहाँ दो गैर दलित छात्राओं का वर्णन है, जिसमें एक आशा है जो गाँव के पंड़ित की बेटी है। आशा कक्षा पाँच में पढ़ती थी। देर से दाखिल होने के कारण वह पढ़ाई में लेखक की मदद लेती थी। लेखक को भैया भी कहती है। क्योंकि तुलसीराम के पिता आशा के पिता के हलवाहे थे। आशा का घर आना जाना भी था। एक दिन वह स्कूल के पास वाले नाले के पास अकेली खड़ी थी। मैं दूर से ही देख रहा था। उसमें पानी भरा होने के कारण लेखक उसको अपने कंधे पर बैठाकर नाला पार करा देता है। जिसकी सजा आशा को उसकी पढ़ाई छुड़वाकर बारह साल की उम्र में ही शादी कर दी गई – “वह मुश्किल से बारह साल की थी, किन्तु अनहोनी का भय भयानक था, इसलिए साल भर के ही अन्दर उसकी ससुराल ढूंढ़ ली गई। विदाई के समय मेरी माँ भी वहाँ मौजूद थी। घर आकर माँ ने बताया कि डोली में बैठते समय पंडित की बेटी रो-रोकर कहती रही कि ‘हमार पढ़ैया छूटि गयल हो बाब’। जाहिर है शिक्षा से यदि एक ‘गुलाम पुत्र’ इतना कुछ हासिल कर सकता था, तो फिर मालिक कि पुत्री न जाने कितना आगे जाती? किन्तु एक मात्र अदना अफवाह ने उसका सब कुछ छीन लिया और वह अपनी ससुराल में सिर्फ मालकिन बनकर रह गई।”27

कुछ दिन बाद पास के ही गाँव में गौना की बरात आई थी। बरात के साथ एक नौटंकी आई थी, उसका नचनिया ही दुल्हा था। वह रात के अँधेरे में गाँव की एक लड़की को लेकर भाग गया। गौना वाली लड़की की दूसरी शादी कर दी गई। लेखक का कथन है- “इस घटना के बाद मठिया की अन्य लड़की श्यामा जो हमारे ही स्कूल में सातवें दर्जे में पढ़ती थी, उसकी शामत आ गई, लोग कहने लगे कि यह बाल खोलकर स्कूल जाती है, बेशवा हो गई है। अत: उसकी पढ़ाई छुड़ा दी गई।”28

लेखक जब दसवीं पढ़ने के बाद आजमगढ़ आता है तब एक ऐसी शहरी छात्रा का वर्णन करता है जो दिन में तो कालेज की पढ़ाई करती है परन्तु रात में कोठे पर नाचती है- ‘देव नारायण नर्तकी का ऊपरी हिस्सा देखकर बताते है कि वह कितनी सुन्दर थी। सौन्दर्य वर्णन के साथ ही वे बोल पड़े “ई त स्टूडेंट जइसन लगति हौ। ऐसा सुनते ही दीपचन्द बोल उठे तोहार कलास फेलो होई”।

मुर्दहिया की सबसे मार्मिक घटना सुदेस्सर पांडे की माँ का देहांत ‘खरवांस’ यानी बहुत अपसकुन वाले महीने में हो जाता है। हिन्दु धर्म के अंध विश्वास के चलते गाँव के पट्टीदार अमिका पांडे ने ‘पतरा’ देखकर बताया कि अभी पंद्रह दिन खरवांस है इसलिए मृत माँ का दाह संस्कार नहीं हो सकता। यदि ऐसा किया गया तो माता जी नर्क भोगेंगी। उन्होंने सुझाव दिया की माता जी की लाश को मुर्दहिया में एक जगह कब्र खोदकर गाड़ दिया जाए तथा पद्रंह दिन बाद निकालकर लाश को जलाकर दाह-संस्कार हिन्दू रीति से किया जाए’। “मेरे पिताजी मुझे लेकर मुर्दहिया पर कब्र खोदने गए। वे फावड़े से कब्र खोदते रहे और मैं मिट्टी हटाता रहा। जब कब्र तैयार हो गई तो सुदेस्सर पांडे अपनी पट्टीदारों के साथ लाश को लाकर उस, कब्र में डाल दिए। तुरन्त उसको मिट्टी से पाट दिया गया। दफनाने से पहले टोटकावश सुदेस्सर पांडे ने कफ़न के एक कोने में सोने की मुनरी गठिया दी थी। एक अंधविश्वास के अनुसार किसी लाश के कफ़न में सोना बांधने से वह जल्दी नही सड़ेगी।”29

लेखक और पिता जी की जिम्मेदारी थी रोज लाश को देखना कहीं लाश को सियार खोदकर ना खा जाए या फिर कहीं चोर डाकू इस सोने की मुनरी के लालच में कब्र खोदकर लाश बाहर न कर दे। आखिर पन्द्रह दिन बाद जब अमिका पांडे ने उस दैवी पतरे के अनुसार समय तय निर्धारित किया तब सुदेस्सर पांडे अपनी माँ की कब्र मिट्टी दो चार पावड़ें मिट्टी हटाकर दूर खड़े हो गए पर लगातार लेखक और उनके पिता कब्र से मिट्टी हटाते रहे- ‘यकायक उस सड़ी लाश की दुर्गन्ध से सारा वातावरण डगमगा गया। सुदेस्सर पांडे भी मुँह पर गमछा बांधे दूर भाग गए, और वही पिता जी से कहते रहे कि वे सोने वाली मुनरी को पहले ढूंढकर कफ़न से निकाल लें। यह एक अजीब स्थिति थी। उस दिन मेरे मन में पहली बार यह बात समझ में आई थी कि किसी के लिए माँ की लाश की अपेक्षा सोना कितना प्रिय होता था। पिता जी ने मुझे भी गमछा मुँह पर बाध लेने को कहा। मैंने वैसा ही कर लिया। उस समय सारे ब्राह्मण वहाँ से चम्पत हो गए। सिदेस्सर पांडे भी दूर ही खड़े रहे पिताजी ने जैसे-तैसे सड़ी लाश को पैर की तरफ से पकड़ लिया। अपार दुर्गन्ध और घृणा से मजबूर हम दोनों ने उस लाश को बाहर कफ़न से छुड़ाकर निकाला, उस सोने की मुनरी को रगडकर पिताजी ने सुदेस्सर पांडे के हवाले कर दिया। वे बड़ी मुश्किल से मुँह-नाक बांध लाश के पास आया और आग जलाकर चिता को जला दिए। पांडे पुत्र भागकर दूर चले गए। वहाँ सिर्फ मैं और पिताजी खड़े रहे और लाश जलाता रहा।”30

मुर्दहिया में तमाम स्त्री पात्र चाहे वे दलित हो या गैर दलित अपनी पूरी संवेदना दु:ख पीड़ा के साथ सामाजिक धार्मिक और संस्कार जन्य गरिमाहीन मट्टी में तपते हुए दीखते हैं। उनके होने का सवाल सबके सामने बार-बार प्रश्न चिन्ह की तरह खड़े हो जाते हैं जिससे किसी भी तरह से ध्यान हटाना नामुमकिन हो जाता है। इस आत्मकथा के माध्यम से लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि भारतीय समाज की सच्ची तब तक संभव नहीं जब तक स्त्री और दलित दोनों की मुक्ति न हो।

संदर्भ ग्रंथ:

  1. तुलसीराम, ‘मुर्दहिया’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सातवाँ संस्करण, पृ.सं. 10
  2. तुलसीराम, ‘मुर्दहिया’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सातवाँ संस्करण, पृ.सं. 28
  3. मुर्दहिया पृ.सं. 28
  4. मुर्दहिया, पृ.सं.12
  5. मुर्दहिया, पृ.सं.13
  6. मुर्दहिया, पृ.सं. 29
  7. मुर्दहिया, पृ.सं. 47
  8. मुर्दहिया, पृ.सं. 83
  9. मुर्दहिया, पृ.सं. 130
  10.  मुर्दहिया, पृ.सं. 63
  11.  मुर्दहिया, पृ.सं. 126
  12.  मुर्दहिया, पृ.सं. 150
  13.  मुर्दहिया, पृ.सं. 36
  14.  मुर्दहिया, पृ.सं. 89
  15.  मुर्दहिया, पृ.सं. 90
  16.  मुर्दहिया, पृ.सं. 91
  17.  मुर्दहिया, पृ.सं. 111
  18.  मुर्दहिया, पृ.सं. 79
  19.  मुर्दहिया, पृ.सं. 73
  20.  मुर्दहिया, पृ.सं. 116
  21.  मुर्दहिया, पृ.सं. 117
  22.  मुर्दहिया, पृ.सं. 117
  23.  मुर्दहिया, पृ.सं. 72
  24.  मुर्दहिया, पृ.सं. 174
  25.  मुर्दहिया, पृ.सं. 135
  26.  मुर्दहिया, पृ.सं. 68
  27.  मुर्दहिया, पृ.सं. 114
  28.  मुर्दहिया, पृ.सं. 125
  29.  मुर्दहिया, पृ.सं. 50
  30.  मुर्दहिया, पृ.सं. 51

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