ऋग्वेद में आई वैदिक संस्कृति की पहली कथा ‘उर्वशी’ और राजा ‘पुरुरवा’ की कथा है। इसका काल विद्वानों ने 1600 ई.पू. माना है। साहित्य और पुराण में उर्वशी सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी। स्वर्ग की इस अप्सरा की उत्पत्ति नारायण की जंघा से मानी जाती है। पद्मपुराण के अनुसार इनका जन्म कामदेव के ‘उरु’ से हुआ था।
श्रीमद्भागवत के अनुसार यह स्वर्ग की सर्वसुंदरी अप्सरा थी। एक बार इंद्र की राजसभा में नाचते समय वह राजा पुरुरवा के प्रति क्षण भर के लिए आकृष्ट हो गई। इस कारण उनके नृत्य का ताल बिगड़ गया। इस अपराध के कारण राजा इंद्र ने रुष्ट होकर उसे मृत्युलोक में रहने का अभिशाप दे दिया। मृत्युलोक में उसने पुरुरवा को अपना पति चुना। इसके लिए उसने तीन शर्तें रखी कि- प्रथम मैं तुम्हे निर्वस्त्र अवस्था में नहीं देखूँ, दूसरा उर्वशी के इच्छा के प्रतिकूल समागम न करे और तीसरा उसके दो मेष उससे कभी अलग नहीं हो। शर्त के अनुसार यदि वह पुरु को नग्न अवस्था में देख ले या पुरुरवा उसकी इच्छा के प्रतिकूल समागम करे अथवा उसके दो मेष उससे अलग स्थानांतरित कर दिए जाएं तो वह उनसे संबंध विच्छेद कर स्वर्ग जाने के लिए स्वतंत्र हो जाएगी। पुरुरवा ने उर्वशी के शर्तों को मंजूर कर लिया।
उर्वशी और पुरुरवा बहुत समय तक पति-पत्नी के रूप में साथ-साथ रहे। इनके नौ पुत्र आयु, अमावसु, श्रुतायु, दृढ़ायु, विश्वायु, शतायु आदि उत्पन्न हुए। अधिक अवधि बीतने पर गंधर्वों को ऊर्वशी की अनुपस्थिति अप्रिय लगने लगी। गंधर्वों ने विश्वाबसु को उसके मेष चुराने के लिए भेजा। उस समय पुरुरवा नग्नावस्था में थे। आहट पाकर वे उसी अवस्था में विश्वाबसु को पकड़ने दौड़े। अवसर का लाभ उठाकर गंधर्वों ने उसी समय प्रकाश कर दिया। जिससे उर्वशी ने पुरुरवा को नंगा देख लिया। आरोपित प्रतिबंधों के टूट जाने पर ऊर्वशी श्राप से मुक्त हो गई और पुरुरवा को छोड़कर स्वर्ग लोक चली गई। महाकवि कालीदास के संस्कृत महाकाव्य विक्रमोर्वशीय नाटक की कथा का आधार यही प्रसंग है।
आधुनिक हिंदी साहित्य में रामधारी सिंह दिनकर ने इसी कथा को अपने काव्यकृति का आधार बनाया और उसका शीर्षक भी उर्वशी रखा। महाभारत की एक कथा के अनुसार एक बार जब अर्जुन इंद्र के पास अस्त्र विद्या की शिक्षा लेने गए तो उर्वशी उन्हें देखकर मुग्ध हो गई। अर्जुन ने ऊर्वशी को मातृवत भाव से देखा। अतः उसकी इच्छा पूर्ति न करने के कारण। इन्हें शापित होकर एक वर्ष तक पुरुसत्व से वंचित रहना पड़ा।
उर्वशी स्वर्गलोक की अप्सरा थी। एक बार वह तथा उसकी सखी अन्य अप्सरा, चित्रलेखा दोनों भूलोक पर भ्रमण के लिए गयीं। वहाँ एक असुर की उन पर दृष्टि जा पड़ी और उसने उनका अपहरण कर लिया। वह उन्हें एक रथ में लिये चला जा रहा था और वे जोर-जोर से विलाप कर रही थीं कि भूलोक के एक राजा पुरुरवा ने उनका चीत्कार सुन लिया। पुरुरवा सिंह के समान निर्भीक था। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के असुर पर आक्रमण कर दिया। अन्ततः उसने असुर को तलवार के घाट उतार दिया।
उर्वशी विजेता पुरुरवा के प्रेम में पड़ गयी और पुरुरवा उस सुन्दर अप्सरा का रसिक प्रेमी बन गया। किन्तु उर्वशी को स्वर्गलोक लौटना पड़ा और पुरुरवा उसके लिए बेचैन रहने लगा। पुरुरवा की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? उसने अपने बचपन के मित्र राजविदूषक को अपनी व्यथा कह सुनायी। एक दिन वह अपने उद्यान में बैठा उससे उर्वशी के सम्बन्ध में बातें कर रहा था कि उर्वशी उसके पीछे आ खड़ी हुई। यद्यपि वह दिखलाई नहीं पड़ रही थी। उसने पुरुरवा को अपने उपस्थित होने का ज्ञान कराया और दोनों परस्पर आलिंगन में बँध गये। ठीक उसी समय स्वर्गलोक से एक दूत आया और उसने उर्वशी को देवराज इन्द्र का सन्देश सुनाया। इन्द्र ने उसे आज्ञा दी थी कि वह तत्काल स्वर्गलोक पहुँचकर एक विशेष नृत्यनाटिका में भाग ले। लाचार होकर उर्वशी को लौट जाना पड़ा। किन्तु उर्वशी
का मन नृत्य में नहीं लग रहा था। अनजाने में ही वह पुरुरवा को पुकार बैठी। नृत्यनाटिका के रचयिता भरतमुनि ने क्रुद्ध होकर तुरन्त उसे शाप दे दिया। ‘‘तुमने मेरी नाटिका में चित्त नहीं रमाया। तुम भूलोक जाकर वहाँ पुरुरवा के साथ मनुष्य की भाँति ही रहो।’’
उर्वशी पुरुरवा से प्रेम तो करती थी। किन्तु मृत्युलोक में नहीं रहना चाहती थी। अतएव देवराज इन्द्र के पास पहुँचकर घुटनों के बल गिड़गिड़ाने लगी कि वह उसको शाप-मुक्त कर दें। इन्द्र को अपनी प्रिय अप्सरा पर दया आयी। वह बोले, ‘‘उर्वशी, तुम भूलोक जाओ, किन्तु तुम अधिक दिन वहाँ नहीं रहोगी।’’ अतएव उर्वशी को पुरुरवा के पास जाना पड़ा। उसे उसके पास आने का हर्ष था, किन्तु साथ ही स्वर्गलोक के सारे आनन्द से वंचित होने का दुख भी था।
पुरुरवा ने उसके लिए सारा भूलोक छान मारा। वह पर्वतों, घाटियों में भटकता रहा। विक्षिप्त होकर वह कभी-कभी वन की लताओं को उर्वशी समझ कर उनका आलिंगन कर लेता। जब वन में वृक्षों से होकर पानी की बूँदें गिरतीं, तो उसे उनमें उर्वशी के पदचाप सुनाई पड़ते। जब आकाश स्वच्छ होता और चिड़ियाँ चहचहाती होतीं, तो उसे उर्वशी के हँसने और गाने का भ्रम होता। जब आकाश मेघाच्छन्न होता, तो उसे लगता कि उर्वशी छिपी हुई है और सहसा ही उसे मिल जाएगी, किन्तु उसकी खोज व्यर्थ गयी, उर्वशी उसे प्राप्त न हो सकी। अनेक वर्षों के उपरान्त उर्वशी को उस पर दया आयी और उसके सम्मुख प्रकट हुई। उसने कहा, ‘‘तुम मुझे वर्ष में अन्तिम दिन ही पा सकोगे।’’ और इस प्रकार वर्ष में एक दिन ही वह पुरुरवा को प्राप्त हो पाती, वर्ष के शेष दिनों वह उसकी विरह-वेदना में जला करता, उसकी खोज किया करता, किन्तु कभी नहीं खोज पाता, उस सौन्दर्य, लावण्य, मोहकता और भव्यता के प्रतीक को और फिर यहीं से साहित्य की शुरुआत भी हुई।
यह कथा पाँच अंकों का है:
1. प्रथम अंक सूत्रधार- सूत्रधार और नटी के परस्पर संवाद से उर्वशी की प्रेमकथा प्रारंभ होती है।
2. दूसरा अंक- यह कथा दो तथ्यों को लेकर है। पहला पतिव्रता स्त्री की ‘मति’ और दूसरा पुरुष का ‘स्वभाव’।
3. तीसरा अंक- उर्वशी रूपी काम वृक्ष का तना है। इसमें एक ओर दाम्पत्य की निर्मल लहरियाँ है तो वही दूसरी ओर पुरुष की गहन गंभीरता भी है।
4. चौथा अंक- चयवन सुकन्या के आश्रम में उर्वशी के पुत्र ‘आयु’ का पालन-पोषण होता है हुआ दिखाया गया है।
5. पाँचवां अंक- उर्वशी राजा पुरुरवा के पास चली आती है।
‘उर्वशी’ के पुरुष पात्र:
पुरुरवा- वेदकालीन प्रतिष्ठानपुर के विक्रमी ‘एल’ राजा, नायक
महर्षि च्यवन- प्रसिद्ध भृगुवंशी, वेदकालीन महर्षि
सूत्रधार- नाटक का शास्त्रीय आयोजक, अनिवार्य पात्र
आयु- पुरुरवा-उर्वशी का पुत्र
महामात्य- पुरुरवा के मुख्य सचिव
विश्व्मना- राज ज्योतिषी , कंचुकी, सभाषद, प्रतिहारी, प्ररंब्ध आदि।
उर्वशी के नारीपात्र:
उर्वशी- अप्सरा, यह नायिका है
सुकन्या- च्यवन ऋषि की सहधर्मिणी
अपाला- उर्वशी की सखी
नटी- शास्त्रीय पात्री, सूत्रधार की पत्नी
औशीनरी- पुरुरवा पत्नी, प्रतिष्ठानपुर की महारानी
अप्सराएँ- सहजन्या, रम्भा, मेनका, चित्रलेखा
जय हिंद