रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ‘उर्वशी’ भूमिका

‘उर्वशी’ रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित एक काव्य नाटक है। यह 1961 ई० में प्रकाशित हुआ था। इस काव्य में दिनकर ने ‘उर्वशी’ और ‘पुरुरवा’ के प्राचीन आख्यान को एक नये अर्थ से जोड़ना चाहा है। इसके लिए 1972 ई० में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था।

इस कृति में ‘पुरुरवा’ और ‘उर्वशी’ दोनों अलग-अलग तरह की प्यास लेकर आये हैं। पुरुरवा धरती पुत्र है और उर्वशी देवलोक से उतरी हुई नारी है। पुरुरवा के भीतर देवत्व की तृष्णा है। उर्वशी सहज निश्चित भाव से पृथ्वी का सुख भोगना चाहती है।

‘उर्वशी’ प्रेम और सौन्दर्य का काव्य है। प्रेम और सौन्दर्य की मूल धारा में जीवन दर्शन सम्बन्धी अन्य छोटी-छोटी धाराएँ आकर मिल जाती हैं। प्रेम और सुन्दरता का विधान कवि ने बहुत व्यापक धरातल पर किया है। कवि ने प्रेम की छवियों को मनोवैज्ञानिक धरातल पर पहचाना है।

दिनकर की भाषा में हमेशा एक प्रत्यक्षता और सादगी दिखी है, परन्तु उर्वशी में भाषा की सादगी अलंकृति और अभिजात्य की चमक पहन कर आयी है- शायद यह इस कृति को वस्तु की माँग रही हो। रामधारी सिंह दिनकर की यह महत्वपूर्ण कृति ‘गीतिनाट्य’ है।

‘उर्वशी’ खंडकाव्य भूमिका:

‘पुरुरवा’ और ‘उर्वशी’ की कथा कई रूपों में मिलती है। उसकी व्याख्या भी कई प्रकार से की गई है। राजा पुरुरवा सोमवंश के ‘आदि’ पुत्र थे। इनकी राजधानी प्रयाग के पास, प्रतिष्ठानपुर में थी। पुराणों में कहा गया है कि जब मनु और श्रद्धा को संतान की इच्छा हुई तब उन्होंने वशिष्ठ मुनि से यज्ञ करवाया था। श्रद्धा की मनोकामना थी कि वे कन्या की माता बनें। मनु की इच्छा थी कि उन्हें पुत्र की प्राप्ति हो। किन्तु इस यज्ञ से उन्हें कन्या की प्राप्ति हुई। मनु की निराशा से द्रवित होकर वशिष्ठ मुनि ने उसे पुत्र बना दिया। मनु के इस पुत्र का नाम ‘सुद्दुम्न’ पड़ा।

युवा होने पर सुद्दुम्न, एक बार आखेट करते हुए किसी अभिशप्त वन में चले गए। जहाँ शापवश, वे युवा नर से युवती नारी बन गए और उनका नाम ‘इला’ हो गया। इसी इला का प्रेम चन्द्रमा के नवयुवक पुत्र ‘बुद्ध’ से हो गया। इन्हीं से पुरुरवा की उत्पत्ति हुई थी। पुरुरवा को ‘एल’ भी कहते है। उनसे चलने वाले वंश का नाम ‘चन्द्रवंश’ है।

उर्वशी के उत्पति के विषय में दो अनुमान हैं। पहला यह कि अमृत मंथन के समय समुद्र से अप्सराओं का जन्म हुआ, उसमें उर्वशी का भी जन्म हुआ था। दूसरा यह कि नारायण ऋषि की तपस्या में विघ्न डालने के कारण जब इंद्र ने उनके पास अनेक अप्सराएँ भेजी, तब ऋषि ने अपने ऊरू को ठोंक कर एक ऐसी नारी को उत्पन्न कर दिया, जो उन सभी अप्सराओं से अधिक रूपवती थी। यही नारी ‘उर्वशी’ हुई थी। उसका नाम उर्वशी इसलिए पड़ा क्योंकि वह ऊरू से जन्मी थी।

भागीरथी की जांघ पर बैठने के कारण गंगा का भी एक नाम उर्वशी है। देवी भगवत के अनुसार, बदरीनाथ धाम में जो देवी-पीठ है, उसे उर्वशी-तीर्थ कहते हैं। नर नारायण की तपस्या-भूमि बदरीनाथ धाम में ही थी। सम्भव है, उर्वशी तीर्थ उसी का स्मारक हो।

इस कथा का प्राचीनतम उल्लेख ‘ऋग्वेद’ में मिलता है, किन्तु उस सूक्त में इतना ही विदित है कि उर्वशी पुरुरवा को छोड़कर चली जाती है और पुरुरवा उनके विरह में डूब जाते हैं। एक दिन उर्वशी जब पुरुरवा से मिली तब उसने बताया कि वह गर्भवती है। लेकिन उसने लौटकर फिर उनके साथ रहना स्वीकार नहीं किया। बाद में चलकर शतपथ ब्राह्मण और पुराणों में इस कथा का जो पल्लवन हुआ, उसमें  यह कहा गया है कि उर्वशी के गर्भ से पुरुरवा के छह पुत्र हुए थे। सबसे बड़े का नाम ‘आयु’ था।

कहते हैं, ‘निरुक्त’ के अनुसार, आयु का अर्थ भी मनुष्य होता है। (डॉ. फतह सिंह)। इस दृष्टि से ‘मनु’ और ‘इड़ा’ तथा ‘पुरुरवा’ और ‘उर्वशी’, ये दोनों ही कथाएँ, एक ही विषय को व्यंजित करती हैं। सृष्टि-विकास की जिस प्रक्रिया में कर्तव्य पक्ष का प्रतीक मनु और इड़ा का आख्यान है। उसी प्रक्रिया का भावना-पक्ष पुरुरवा और उर्वशी की कथा में कहा गया है।

सर विलियम विलसन ने अनुमान लगाया था कि पुरुरवा-उर्वशी की कथा अन्योक्ति परक है। इस कथा का वास्तविक नायक ‘सूर्य’ और नायिका ‘ऊषा’ है। इन दोनों का मिलन कुछ ही काल के लिए होता है बाद में वे प्रतिदिन बिछुड़ जाते हैं।

किन्तु, इस कथा को लेने में वैदिक आख्यान की पुनरावृति अथवा वैदिक प्रसंग के प्रत्यावर्तन मेरा ध्येय नहीं रहा। मेरी दृष्टि में ‘पुरुरवा’ सनातन नर का प्रतीक है और ‘उर्वशी’ सनातन नारी की।

उर्वशी शब्द का अर्थ होगा ‘उत्कट अभिलाषा’, ‘अपरिमित वासना’, इच्छा अथवा कामना और पुरुरवा शब्द का अर्थ है, वह व्यक्ति जो नाना प्रकार का रव करे, नाना ध्वनियों से आक्रान्त हो।

उर्वशी चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक् तथा श्रोत की कामनाओं के प्रतीक है; पुरुरवा रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द से मिलनेवाले सुखों से उद्वेलित मनुष्य है। पुरुरवा द्वंद्व में है, क्योंकि द्वंद्व में रहना मनुष्य का स्वभाव होता है। मनुष्य सुख की कामना भी करता है और उससे आगे निकलने का प्रयास भी।

नारी नर को छूकर तृप्त नहीं होती है और न नर नारी के आलिंगन में संतोष मानता है। कोई शक्ति है जो नारी को नर तथा नर को नारी से अलग रहने नहीं देती, और जब वे मिल जाते हैं, तब भी, उनके भीतर किसी ऐसी तृषा का संचार करती है, जिसकी तृप्ति शरीर के धरातल पर अनुपलब्ध है।

नारी के भीतर एक और नारी है, जो अगोचर और इन्द्रियातीत है। इस नारी का संधान पुरुष तब पाता है, जब शरीर की धारा, उछालते-उछालते उसे मन के समुद्र में फेंक देती है। जब दैहिक चेतना से परे, वह प्रेम की दुर्गम समाधि में पहुँच कर निस्पंद हो जाता है।

और पुरुष के भीतर भी एक और पुरुष है, जो शरीर के धरातल पर नहीं रहता, जिससे मिलने की आकुलता में नारी अंग-संज्ञा के पार पहुँचना चाहती है।

परिरम्भ-पाश में बंधे हुए प्रेमी, परस्पर एक दूसरे का अतिक्रमण करके, उसे ऐसे लोक में पहुँचाना चाहते हैं, जो किरणोंज्जवल और वायवीय है।

इन्द्रियों के मार्ग में अतीन्द्रिय धरातल का स्पर्श, यही प्रेम की आध्यात्मिक महिमा है।

देश और काल की सीमा से बाहर निकलने का एक मार्ग योग है, किंतु उसकी दूसरी राह नर-नारी-प्रेम के भीतर से भी निकलती है, मनुष्य का यह अनुमान अत्यंत प्राचीन है। तंत्र-साधना के मूल में ऐसा कोई-न-कोई विश्वास रहा होगा; सहजमार्गियों के मन में ऐसी कोई-न-कोई भावना काम करती होगी; अभिनव मनोविज्ञान के भीतर भी ऐसी कोई-न-कोई प्रेरणा क्रियाशील है।

काम-सुख की इन्हीं निरंकार झंकृतियों का आख्यान मनोविज्ञान उदात्तीकरण की भाषा में करता है। प्रेम की एक उदात्तीकृत स्थिति वह भी है जो समाधि से मिलती-जुलती है। जिसके व्यक्तित्व का देवोपम विकास हुआ है, जिसके स्नायविक तार चेतना और सजीव हैं तथा जिसका मन, स्वभाव से ही, उर्ध्वगामी और उड्डयनशील है, उसे काम के स्पर्श मात्र से इस समाधि का बोध होता है।

तत्पारिणस्पर्शसौख्यं परमनुभवती सच्चिदानन्दरूपम्

तत्रासीत् वारणभिन्ना रमरणतिरपे: योगनिंद्रा गतेव। 

मनुष्य के इस द्वंद्व का, साकार से ऊपर उठकर निराकार तक जाने की इस आकुलता अथवा ऐन्द्रियता से निकलकर अतीन्द्रिय जगत् में आँख खोलने की इस उमंग का प्रतीक पुरुरवा है।

किंतु, उर्वशी द्वंदों से सर्वथा मुक्त है। देवियों में द्वंद्व नहीं होता, वे त्रिकाल अनुद्विग्न, निर्मल और निष्पाप होती हैं। द्वंदों की कुछ थोड़ी अनुभूति उसे तब होती है, जब वह माता अथवा पूर्ण मानवी बन जाती है, जब मिट्टी का रस उसे पूर्ण रूप से अभिसिक्त कर देता है।

भावना और तर्क, ह्रदय और मस्तिष्क, कला और विज्ञान अथवा नुरुद्देश्य आनंद और सोद्देश्य साधना, मानवीय गुणों के ये जोड़े नवीन मनुष्य को भी दिखाई देते हैं और वे प्राचीन मानव को भी दिखाई पड़े थे। मनु और इडा का आख्यान तर्क, मस्तिष्क, विज्ञान और जीवन की सोद्देश्य साधना का आख्यान है; वह पुरुषार्थ के अर्थ-पक्ष को महत्व देता है। किंतु, पुरुरवा-उर्वशी का आख्यान भावना, हृदय, कला और नुरुद्देश्य आनंद की महीमा का आख्यान है; वह पुरुषार्थ के काम-पक्ष का महात्म्य बताता है।

जैसे पुरुषार्थ के तीन अंग कहे गए हैं, वैसे ही, मनुष्य के आतंरिक व्यक्तित्व के धरातल भी तीन हैं। मनुष्य के सारे व्यक्तित्व, समग्र जीवन का आधार उसकी जैव भावनाओं का धरातल है। यह वह धरातल है जिस पर मनुष्य और पशुओं में भेद नहीं है और यही धरातल सबसे प्रबल और सबसे प्राचीन भी है। मनुष्य को पशुओं से भिन्न करनेवाले, बुद्धि और आत्मा के दो धरातल, बाद को, उत्पन्न हुए। वैसे आत्मा तो पशुओं में भी है, किंतु, सदसद् विवेक की शक्ति, जो मानवता का प्रधान गुण है, पशुओं में नही होती।

किंतु, मनुष्य ने जिस परिणाम में बुद्धि अर्जित की, उसी परिणाम में उसने सहज प्रवृत्ति (इंस्टिंक्ट) की शक्ति को खो दिया। तब भी, बुद्धि थोड़ी पशुओं में भी है और सहज प्रवृत्ति, कभी-कभी, मनुष्य में भी झलक मारती है। भेद यह है कि पशु का सारा जीवन सहज प्रवृत्ति से चलता है, केवल उसके किनारे-किनारे बुद्धि की हलकी झालर विद्यमान है। और मनुष्य के सारे जीवन का आधार बुद्धि है, सहज प्रवृत्ति, कभी-कभी ही, बिजली की तरह उसमें कौंध जाती है।

तब भी, मनुष्य का सर्वोत्तम काव्य दर्शन और विज्ञान के आशातीत आविष्कार, ये सब-के-सब सम्बुद्धि (इनटुइशन) से संकेतित होते हैं, जो बहुत कुछ सहज प्रवृत्ति के ही समान है।

अर्थ और काम ये जैव धरातल के पुरुषार्थ हैं, धर्म का जन्म आत्मा के धरातल पर होता है। बुद्धि इन दोनों धरातलों की सेविका और सहायक है। किंतु, अर्थ की सेवा वह जिस सहजता से करती है, उसी सहजता से वह धर्म और काम की सेवा नही कर सकती।

अर्थ के उपकरण भोजन, छाजन, मोटर, महल, सेना, समाज और मनुष्य के सारे भौतिक अभियान हैं, जो बुद्धि के वृत्त में पड़ते हैं। किंतु, काम के अंग कला, सुरुचि, सौंदर्यबोध और प्रेम हैं, जो मुख्यतः सम्बुद्धि से संकेतित होते हैं। इसी प्रकार बुद्धि, धर्म को भी सिद्ध नहीं करती। धर्म बराबर सम्बुद्धि से प्रेरणा पाता है।

धर्म का जन्म आत्मा के धरातल पर होता है, किंतु सार्थकता उसकी तब है, जब वह जैव धरातल पर आकर हमारे आचरणों को प्रभावित करे।

कला, सुरुचि, सौंदर्यबोध और प्रेम, इनका जन्म जैव धरातल पर होता है, किंतु सार्थकता उनकी तब सिद्ध होती है जब वे ऊपर उठकर आत्मा के धरातल को स्पर्श करते हैं।

साहित्य के नौ मूल भावों में से रति, क्रोध, भय और घृणा, ये मूल भाव भैंस में भी होते हैं, किंतु पशुओं में जो भाव अनगढ़ और कुरूप हैं, मनुष्य में आकर वे अनेक रंग-रूपों में बदल कर निस्सीम हो गए हैं, क्योंकि मनुष्य में बुद्धि और कल्पना की शक्ति है, जो पशुओं में नहीं है।

पशुओं में जो प्रेरणा ऋतु-धर्म से एकाकार है, मनुष्यों में वह ऋतु-धर्म का बंधन नहीं मानती, न वह प्रजासृष्टि की सीमा पर समाप्त होती है। काम शक्ति पशु-जगत में अवश्यकता और उपयोग की सीमा में है। मनुष्य में आकर वह ऐसे आनंद का कारण बन गई है जो निष्प्रयोजन, निस्सीम और निरुद्देश्य है। वह नित्य नये-नये पुलकों की रचना करती है, नयी-नयी कल्पनाओं को जन्म देती है और मनुष्य को नित्य नवीन स्फुरणों से अनुप्राणित रखती है। यह सच है कि काम के क्षेत्र में पशुओं को जो स्वाधीनता प्राप्त है, वह मनुष्यों को नही है। किंतु कामजन्य स्फुरणों, प्रेरणाओं और सुखों का जो अनंत-व्यापी प्रसार मनुष्य में है, वह कल्पनाहीन जंतुओं में नहीं हो सकता। और मनुष्य में भी जो लोग पशुता से जितनी दूर हैं, वे काम के सूक्ष्म सुखों का स्वाद उतना ही अधिक जानते हैं।

कामजन्य प्रेरणाओं की व्याप्तियाँ सभ्यता और संस्कृति के भीतर बहुत दूर तक पहुँची है। यदि कोई युवक किसी युवती को प्रशंसा की आँखों से देख ले, तो दूसरे ही दिन से उस युवती के हाव-भाव बदलने लगते हैं, उसे पोशाक और प्रसाधन में नवीनता की आवश्यकता अनुभूत होने लगती है, उसके बोलने, चलने और देखने में एक नयी भंगिमा उत्पन्न हो जाती है।

और इसी प्रकार जब कोई नारी प्रशंसा भरी-दृष्टि से किसी पुरुष को देख लेती है, तब अनगढ़-से-अनगढ़ पुरुष के भीतर भी कोई कल्पक जाग उठता है, कोई कविता सुगबुगाने लगती है, सौंदर्य की कोई तृषा जग कर उसे आईने के पास ले जाती है।

काम की ये जो निराकार झंकृतियाँ हैं, वे ही उदात्तीकरण के सूक्ष्म सोपान हैं। त्वाचाएँ, स्पर्श के द्वारा, सुन्दरता का जो परिचय प्राप्त करती हैं, वह अधुरा और अपूर्ण होता है। पूर्णता पर वह तब पहुँचता है, जब हम सौंदर्य के निदिध्यासन अथवा समाधि में होते हैं।

कला, साहित्य और विशेषतः काव्य में भौतिक सौंदर्य की महिमा अखंड है। फिर भी, श्रेष्ठ कविता, बराबर भौतिक से परे भौतिकोत्तर सौंदर्य का संकेत देती है, फिजिकल को लाँघ कर ‘मेटा-फिजिकल’ हो जाती है।

प्रेम में भी भूत से ऊपर उठकर भूतरोत्तर होने की शक्ति होती है, रूप के भीतर डूबकर अरूप का सन्धान करने की प्रेरणा होती है।

अपने स्थूल से स्थूल रूप में भी, प्रेम एक मानव का दूसरे मानव के साथ एकाकार होने का सबसे सहज, सबसे स्वाभाविक मार्ग है; किंतु विकसित और उदात्त हो जाने पर तो वह मनुष्य को बहुत कुछ वही शीतलता प्रदान करता है, जो धर्म का अवदान है।

धर्मादर्थों अर्थत: कामः कामाद्धर्म-फलोदय: (पद्दमपुराण)      

धर्म से अर्थ और अर्थ से काम की प्राप्ति होती है, किंतु, काम से फिर हमें धर्म के ही फल प्राप्त होते हैं।

जीवन के सूक्ष्म आनंद और निरुद्देश्य सुख के जितने भी सोते है, वे कही-न-कहीं. काम के पर्वत से फूटते हैं। जिसका काम कुंठित, उपेक्षित अथवा अवरुद्ध है, वह आनंद के अनेक सूक्ष्म रूपों से वंचित रह जाता है। हीन केवल वही नहीं है, जिसने धर्म और काम को छोड़कर केवल अर्थ को पकड़ा है; न्यायत: उकठा काठ तो उस साधक को भी कहना चाहिए, जो धर्म-सिद्धि के प्रयास में अर्थ और काम दोनों से युद्ध कर रहा है

धर्मार्थकामं सममेव सेव्यं, यः एकसेवी स नरो जघन्य:।

पुरुरवा और उर्वशी का प्रेम मात्र शरीर के धरातल पर नहीं रुकता, वह शरीर से जन्म लेकर मन और प्राण के गहन, गुह्य लोकों में प्रवेश करता है, रस के भौतिक आधार से उठकर रहस्य और आत्मा के अंतरिक्ष में विचरण करता है।

पुरुरवा के भीतर देवत्व की तृषा है। इसलिए, मर्त्य लोक के नाना सुखों में वह व्याकुल और विषण्ण है।

उर्वशी देवलोक से उतरी हुई नारी है। वह सहज, निश्चिन्त भाव से पृथ्वी का सुख भोगना चाहती है।

पुरुरवा की वेदना समग्र मानव-जाति की चिरंतन वेदना से ध्वनित है।

किंतु, मानवता की यह वेदना उत्पन्न कहाँ से होती है? मानव-मन का यह दु:साध्य संघर्ष आता है कहाँ से?

आत्मा का धरातल मनुष्य को ऊपर खींचता है और जैव धरातल का आकर्षण नीचे की ओर है। जब पशुओं से अलग होने लगा, यह वेदना तभी से उसके साथ हो गयी। मानवता ही मनुष्य की वेदना का उत्तम नाम है।

मनुष्य ने देवताओं की जो कल्पना कर रखी है, उसके गज से अपने-आपको नापने में वह असमर्थ है।

यदि मनुष्य अपनी गरदन तानकर मस्तक से नक्षत्रों को छूने का प्रयास करे, तो उसके पाँव जमीन से उखड़ जाते हैं, वह वायु में निस्सहाय उड़ने वाला पत्ता बन जाता है।

और यदि वह पाँव जमाकर धरती पर खड़ा रहे, तो अपने मस्तक से वह नक्षत्र तो क्या, सामान्य वृक्षों में मौलि को भी नहीं छू सकता।

    मनुष्य की कल्पना का देवता वह है, जो जल में उतरने पर भी जल से नहीं भींगता, जिसकी गरदन समुद्र की ऊँची-से-ऊँची लहरों से भी हाथ भर ऊँची दिखाई देती है।

किंतु, मनुष्य का भाग्य ऐसा नहीं है। वह तरंगों से लड़ते-लड़ते भी उनसे भींग जाता है और बहुधा लहरे उसे बहाकर औघट घाट में फेंक देती हैं, भँवर का जाल बनाकर उसे नीचे पातल में गाड़ देती है।

तब भी संघर्ष करना मनुष्य का स्वभाव है।

वह जल के समान सूर्य की किरणों पर चढ़कर आकाश पहुँचता है और बादलों के साथ पृथ्वी पर लौट आता है। और सूर्य की किरणें, एक बार फिर, उसे आकाश पर ले जाती है।

स्वर्ग और पृथ्वी के बीच घटित इस निरंतर आवागमन से मनुष्य का निस्तार कभी होगा या नहीं, इसका विश्वसनीय ज्ञान नए मनुष्य को छोड़कर चला गया है। इसलिए मैं इस विषय में मौन हूँ कि पुरुरवा जब संन्यास लेकर चले गए, तब उनका क्या हुआ।

एक ओर देवत्व की ऊँची-ऊँची कल्पनाएँ; दूसरी ओर उफनाते हुए रक्त की अप्रतिहत पुकार और पग-पग पर घेरनेवाली ठोस वास्तविकता की अभेद्द चट्टानें, जो हुक्म नहीं मानतीं, जो पिघलना नहीं जानतीं।

आदमी हवा और पत्थर के दो छोरों के बीच झटके खाता है, और झटका खाकर, कभी इस ओर, और कभी उस ओर मुड़ जाता है। कभी प्रेम! कभी संन्यास!

और संन्यास प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर सकता, न प्रेम संन्यास को क्योंकि प्रेम प्रकृति और परमेश्वर संन्यास है और मनुष्य को सिखलाया गया है कि एक ही व्यक्ति परमेश्वर और प्रकृति, दोनों को प्राप्त नहीं कर सकता।

उर्वशी पूछती है, क्या ईश्वर और प्रकृति दो हैं?

क्या ईश्वर प्रकृति का प्रतिबल है, उसका प्रतियोगी है?

क्या दोनो एक साथ नहीं रह सकते?

क्या प्रकृति ईश्वर का शत्रु बनकर उत्पन्न हुई हैं?

अथवा क्या ईश्वर ही प्रकृति से रुष्ट है?

प्रकृति और परमेश्वर की एकता की एक अनुभूति, संन्यास और प्रेम के बीच संतुलन की एक झाँकी महर्षि च्यवन के चरित्र में झलक मारती है। जो नदी पुरुरवा के भीतर बेचैन होकर गरज रही है, वही च्यवन में आकर स्वच्छ, सुस्थिर, शीतल और मौन है।

संन्यास में समाकर प्रेम से और प्रेम में समाकर संन्यास से बचना जितना कठिन है, संन्यास और प्रेम के बीच संतुलन बिठाना, कदाचित, उससे कठिन कार्य है।

मनोविज्ञान जिस साधना का संकेत देने लगा है, वह वैराग्य नहीं, रोगों से मैत्री का संकेत है; वह निषेध नहीं स्वीकृति और समन्वय का संकेत है; वह संघर्ष नहीं, सहज, स्वच्छ, प्राकृतिक जीवन की साधना है।

देवता वह नहीं, जो सब कुछ को पीठ देकर, सबसे भाग रहा है। देवता वह है, जो सारी आसक्तियों के बीच अनासक्त है, सारी स्पृहाओं को भोगते हुए भी निस्पृह और निर्लिप्त है।

फिर वही बात! पानी पर चलों, पानी का दाग नहीं लगे।

किंतु, पानी पर चलकर भी पानी के दाग से बचता कौन है?

क्या वह, जो औशीनरी और सुकन्या के साथ है? अथवा वह भी, जो उर्वशी के प्रेम में है?

क्या वह, जो च्यवन की पत्नी है? अथवा वह भी, जो पुरुरवा के गोद में है?

प्रश्नों के उत्तर, रोगों के समाधान मनुष्यों के नेता दिया करते हैं।

कविता की भूमि केवल दर्द को जानती है, केवल बेचैनी को जानती है, केवल वासना की लहर और रुधिर के उत्ताप को पहचानती है।

और वेदना की भूमि चूँकि पुरुरवा के संन्यास पर समाप्त नहीं हुई, इसलिए, औशीनरी की व्यथा ने कविता को वहाँ समाप्त होने नहीं दिया।

किंतु, नेता-की-सी एक बात एक जगह मैं भी कह गया हूँ।

जब देवी सुकन्या यह सोचती हैं कि नर-नारी के बीच संतुलन कैसे लाया जाए, तब उनके मुँह से यह बात निकल पड़ती है कि यह सृष्टि, वास्तव में, पुरुष की रचना है इसीलिए, रचयिता ने पुरुषों के साथ पक्षपात किया, उन्हें स्वत्व-हरण की प्रवृत्तियों से पूर्ण कर दिया। किंतु पुरुषों की रचना यदि नारियाँ  करने लगें, तो पुरुष की कठोरता जाती रहेगी और वह अधिक भावप्रवण एवं मृदुलता से युक्त हो जाएगा।

इस पर ‘आयु’ यह दावा करता है कि मैं ही तो वह पुरुष हूँ, जिसका निर्माण नारियों ने किया है।

आयु का कहना ठीक था। और वह प्रसिद्ध राजा भी हुआ, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में आया है। किंतु, उल्लेख इस बात का भी है कि युवक राजा सुश्रवा ने आयु को जीतकर उसे अपने अधीन कर लिया था।

फिर वही बात!

पुरुष की रचना पुरुष करे तो वह त्रासक होता है; और पुरुष की रचना नारी करे तो वह लड़ाई में हार जाता है।

समस्या युद्ध की हो अथवा प्रेम की कठिनाइयाँ सर्वत्र सामान हैं।

एकांत में कोई नहीं मानता कि बघनखां पहनना अच्छा काम है। किंतु बाहर आते ही उसे हर कोई पहनना चाहता है, क्योंकि और लोग बघनखे पहने हुए हैं।

युक्ति तो यही कहती है कि नकाब पहनकर असली चहरे को छिपा लेने से पुण्य नहीं बढ़ता होगा। फिर भी, हर आदमी नकाब लगाता है, क्योंकि नकाब पहने बिना घर से निकलने की, समाज की ओर से; मनाही है।

किंतु उस प्रेरणा पर तो मैंने कुछ कहा ही नहीं, जिसने आठ वर्ष तक ग्रसित रखकर यह काव्य मुझसे लिखवा लिया।

अकथनीय विषय!

शायद अपने से अलग मैं उसे देख नहीं सकता; शायद, वह अलिखित रह गई; शायद, वह इस पुस्तक में व्याप्त है।

पटना

23 जून, 1961                रामधारी सिंह ‘दिनकर’

जय हिंद

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