रामधारी सिंह ‘दिनकर’ समग्र परिचय

रामधारी सिंह ‘दिनकर’

जन्म- 23 सितंबर 1908 ई. सिमरिया, मुंगेर बिहार

निधन- 24 अप्रैल 1974 ई.

पिता- रविसिंह और माता- मनरूप देवी थी।

काव्य गुरु- महावीर प्रसाद द्विवेदी

आध्यात्मिक गुरु- ये रामकृष्ण परमहंस को मानते थे।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के उपनाम

1. इन्होंने स्वयं को कहा- ‘दिनकर’

2. अज्ञेय- ‘समय सूर्य’

3. मुक्तिबोध- ‘राग व आग का कवि’

4. माखनलाल चतुर्वेदी- ‘युग की ज्वालभाल’

5. महादेवी वर्मा- ‘अग्नि संभव कवि’

6. द्वारिका प्रसाद सक्सेना- ‘अनल का कवि’

7. दिनकर छायावादोत्तर काल एवं प्रगतिवादी कवियों में सर्वश्रेष्ठ कवि थे।  रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपनी काव्य रचनाओं की शुरुआत हाई स्कूल से ही शुरू कर दी थी। सबसे पहले उन्होंने सुप्रसिद्ध साहित्यकार ‘रामवृक्ष बेनीपुरी’ द्वारा प्रकाशित ‘युवक’ पत्र में ‘अभिताभ’ नाम से अपनी रचनाएँ भेजनी शुरू की थी। इसके बाद इन्होंने 1928 ई. में प्रकाशित ‘बारदोली विजय’ उनका पहला काव्य-संग्रह था। उन्होंने मुक्तक-काव्य और प्रबंध-काव्य दोनों की रचना की। मुक्तक-काव्य में उनके कुछ गीति-काव्य भी हैं। कविताओं के अलावे उन्होंने निबंध, संस्मरण, आलोचना, डायरी, इतिहास आदि के रूप में विपुल गद्य लेखन भी किया।

* ‘दिनकर’ आधुनिक युग के श्रेष्ठ ‘वीर रस’ के कवि थे।

* इनकी पहली कविता ‘दीपक’ 1922 ई. (यह बलिदान का संदेश देनेवाली कविता है।

* राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता इनके काव्य की मूल थी। इस कारण इन्हें ‘युग-चरण’‘काल के चारण’ की संज्ञा दी गई है।

प्रबंधात्मक काव्य:

1. प्रणभंग- 1928 ई. खंडकाव्य

2. कुरुक्षेत्र- 1946 ई. महाकाव्य

3. रश्मिरथी- 1952 ई. खंडकाव्य

4. उर्वशी- 1961 ई. खंडकाव्य 

‘दिनकर’ के काव्य संकलन:

1. बारदोली विजय- 1928 ई.

2. रेणुका- 1935 ई.

3. हुंकार- 1939 ई.

4. रसवंती- 1940 ई.

5. द्वंद्वगीत- 1940 ई.

6. सामधेनी- 1947 ई.

7. बापू- 1947 ई.

8. धूप-छाँव- 1947 ई.

9. इतिहास के आँसू- 1951 ई.

10. धूप और धुआँ- 1951 ई.

11. मिर्च और मजा- 1951 ई.

12. दिल्ली- 1954 ई.

13. नीम के पत्ते- 1954 ई.

14. नील कुसुम- 1954 ई.

15. सूरज का काव्य- 1955 ई.

16. चक्रवाल- 1956 ई.

17. कवि श्री- 1957 ई.

18. सीपी और शंख- 1957 ई.

19. नये सुभाषित- 1957 ई.

20. कोयला और कवित्व- 1959 ई.

21. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ 1960 (यह 27 कविताओं का संकलन है) 

22. परशुराम की प्रतिज्ञा- 1963 ई.

23. मूर्ति तिलक- 1964 ई.

24. आत्मा की ऑंखें- 1964 ई.

25. दिनकर की सूक्तियाँ- 1965 ई.

26. संचयिता- 1973 ई.

24. रश्मिलोक- 1974 ई.

‘दिनकर’ की निबंध संग्रह:

1. मिट्टी की ओर- 1945 ई.

2. अर्धनारीश्वर- 1952 ई.

3. रेती के फूल- 1954 ई.

4. हमारी संस्कृति- 1956 ई.

5. उजली आग- 1956 ई.

6. वेणुवन- 1958

7. धर्म नैतिकता और विज्ञान- 1959 ई.

8. वट पीपल- 1961 ई.

9. साहित्य मुखी- 1968 ई.

10. आधुनिकता बोध- 1973 ई.

11. चेतना की शिखा- 1973 ई.

12. विवाह की मुसीबतें- 1974 ई.

‘दिनकर’ की आलोचनात्मक रचनाएँ:

1. काव्य की भूमिका- 1957 ई.

2. प्रसाद, पंत व मैथिलीशरण गुप्त- 1958 ई.

3. शुद्ध कविता की खोज 1960 ई.

‘दिनकर’ की रचना यात्रावृत्तांत:

1. देश-विदेश- 1951 ई. (इसमें 26 यात्रा वृत्तांत हैं। इन सभी यात्रा वृतांतों के माध्यम से इन्होंने राष्ट्रीयता का संदेश दिया गया है।)

2. मेरी यात्राएँ- 1970 ई.

डायरी- ‘दिनकर की डायरी’- 1973 ई.

‘दिनकर’ की सांस्कृतिक विषयक रचनाएँ:

1. संस्कृति के चार अध्याय- 1956 ई.

2. हमारी संस्कृति एकता- 1954 ई.

3. राष्ट्र भाषा और राष्ट्रीय एकता- 1956 ई.

‘दिनकर’ की अन्य रचनाएँ:

1. उजली आग- 1956 ई. (यह लघु कथाएँ एवं गीतों का संकलन है।)

2. शेष-निशेष- 1985 ई. (संस्मरण संग्रह)

3. लोकदेव नेहरू- 1965 ई.

4. संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ- 1969 ई. (समकालीन साहित्यकारों पर आधारित संस्मरण संग्रह)

‘दिनकर’ के विषय में विशेष तथ्य और साहित्यिक सम्मान:

1. ‘दिनकर’ 1952-1964 तक राज्य सभा के सदस्य रहे।

2. वे भारत सरकार के 1955-1971 तक हिंदी सलाहकार थे।

3. भागलपुर विश्वविद्यालय के वे 1964-1965 तक कुलपति रहे।

4. वर्ष 1946 में प्रकाशित ‘कुरुक्षेत्र’ रचना के लिए उन्हें काशी नागरी प्रचारिणी सभा, उत्तर प्रदेश और भारत सरकार से सम्मान मिला था।  

5. 1959 ई. में ‘संस्कृति के चार अध्याय’ रचना के लिए ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। 

6. भारत के प्रथम राष्ट्रपति ‘डॉ. राजेंद्र प्रसाद’ ने उन्हें वर्ष 1959 में ‘पद्म विभूषण’पुरस्कार से सम्मानित किया था। 

7. वर्ष 1961 में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध काव्य रचना ‘उर्वशी’ के लिए उन्हें ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। 

8. बिहार राज्य के राज्यपाल ‘जाकिर हुसैन’ जो बाद में भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने थे। उन्होंने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी को ‘डाक्ट्रेट’ की मानद उपाधि से सम्मानित किया था। 

9.वर्ष 1999 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में ‘डाक टिकट’ भी जारी किया था।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के महत्वपूर्ण रचनाओं के बारे में विशेष तथ्य:

बारदोली विजय (1928 ई.)

इस रचना में महात्मा गाँधी के संरक्षण में सरदार वल्लभ भाई पटेल द्वारा किए गए सत्याग्रह एवं विजय का वर्णन है। मुख्य रूप से इसमें राष्ट्रीयता का संदेश है।

रेणुका (1935 ई.) इस रचना में श्रृंगारिक भावनाओं का चित्रण है।

हुँकार (1939 ई.)

इस रचना में वर्तमान के प्रति मोहभंग होने का तथा अतीत के प्रति लगाव का वर्णन है। डॉ. बच्चन सिंह ने इस रचना को ‘वैतालिक का जागरण गान’ कहा है। इसमें प्रमुख कविताएँ है- दिल्ली, विपथगा, हाहाकार, अनल किरीट, प्रणति, हुँकार।

रसवंती (1940 ई.)

इस रचना में दिनकर की छायावादी कविताएँ है। जिनमें रहस्यवादिता और प्रकृति चित्रण की प्रमुखता है। इसमें प्रमुख कविताएँ है- वर्षा, पावस, बसंत और मैं, नारी, बसंत और कोकिल।

द्वंद्व गीत (1940 ई.)

यह रचना रहस्यात्मक द्वंद्व गीत कविताओं का संकलन है। यह मूलतः रुबाई संकलन है इसमें कुल 115 रुबाइयाँ है। प्रमुख रुबाइयाँ हैं- आस्था, वर्तमान, अतीत, पलायनवाद में द्वंद्व का चित्रण है।

सामधेनी (1947 ई.)

राष्ट्रीयता की भावना से संबंधित यह कविताओं का संकलन है। इसमें विश्व वेदना की अभिव्यक्ति भी हुई है।

उर्वशी (1961 ई.)

‘दिनकर’ जी को उर्वशी के लिए 1972 ई. में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ था। इस रचना को स्वयं कवि ने “कामाध्यतम” कहा है इसमें कुल 5 अंक हैं। इसमें पुरुरवा और उर्वशी के कथा का चित्रण है। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इस रचना को ‘गीतिकाव्य’ माना है।

परशुराम की प्रतीक्षा (1963 ई.)

चीनी आक्रमण के बाद भारतीय जनता व सैनिकों की निराशा को दूर करने के लिए लिखी गई रचना है। इसमें राष्ट्रीयता से संबंधित कविताओं का संकलन है।

‘परशुराम की प्रतीक्षा’ में संकलित महत्वपूर्ण कविताएँ-

एनाकी, पिनाकी, प्रलयंकर, हर-हर महादेव, सैनिक की शौर्यगाथा, आत्मोत्सर्ग। “परशुराम की प्रतीक्षा में ‘प्रलयंकर’ पिनाक की टंकार है। विक्रम का विक्रम है, प्रताप का प्रताप है, वीरों का हुँकार है, सिंहों का सिंहनाद है…विलासियों का लास्य नहीं समर का अट्टहास है।” (डॉ. विमल कुमार जैन)

कुरुक्षेत्र (1946 ई.)

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद युद्धों के कारण व समाधान खोजने का प्रयास। यह युद्ध और शांति पर आधारित रचना है। इसमें कुल-7 सर्ग हैं। यह रचना ‘महाकाव्य’ है। इसमें मंगलाचरण नहीं हुआ है। सातवाँ सर्ग ‘क्षेपक’ माना जाता है। इसमें

कुरुक्षेत्र- युद्ध और संसार का प्रतीक है।

युधिष्ठिर- शांति के इक्षुक व्यक्ति का प्रतीक है। और

भीष्मपितामह- संयुक्तराष्ट्र संघ का प्रतीक है।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के अनुसार- “कुरुक्षेत्र केवल एक काव्य रचना नहीं वर्तमान युग की आवश्यकता है। इसमें आत्माभिव्यक्ति मेरा उद्देश्य नहीं है अपितु युद्धों के बीच शान्ति की खोज मुख्य उद्देश्य है।”

जय हिंद

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