जन्म- 27 सितंबर 1931 ई. उ.प्र. में बिजनौर जिले के राजपुर नवादा गाँव में हुआ था।
निधन- 30 दिसंबर 1975 ई. भोपाल में हुआ।
पिता- चौधरी भगवत सहाय और माता- रामकिशोरी देवी थी।
रचना – ‘साये में धूप’ (ग़ज़ल संग्रह)
रचनाकार – दुष्यंत कुमार
प्रकाशन वर्ष – 1975 ई.
संकलित ग़ज़लें- 64
समर्पित – छोटे भाई मुन्नू जी को
धन्यवाद/आभार – कमलेश्वर के लिए इसकी भूमिका दुष्यंत कुमार ने लिखी है- इनकी भूमिका 5 स्वीकारोक्तियाँ हैं-
‘मैं स्वीकार करता हूँ…’ नाम से लिखी है।
मैं स्वीकार करता हूँ… कि ग़ज़लों को भूमिका की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए; लेकिन, एक कैफ़ियत इनकी भाषा के बारे में ज़रूरी है। कुछ उर्दू-दाँ दोस्तों ने कुछ उर्दू शब्दों के प्रयोग पर एतराज़ किया है। उनका कहना है कि शब्द ‘शहर’ नहीं ‘शह्र’ होता है, ‘वज़न’ नहीं ‘वज़्न’ होता है।
मैं उर्दू नहीं जानता, लेकिन इन शब्दों का प्रयोग यहाँ अज्ञानतावश नहीं, जानबूझकर किया गया है। यह कोई मुश्किल काम नहीं था कि ‘शहर’ की जगह ‘नगर’ लिखकर इस दोष से मुक्ति पा लूँ, किंतु मैंने उर्दू शब्दों को उस रूप में इस्तेमाल किया है, जिस रूप में वे हिन्दी में घुल-मिल गये हैं। उर्दू का ‘शह्र’ हिन्दी में ‘शहर’ लिखा और बोला जाता है; ठीक उसी तरह जैसे हिन्दी का ‘ब्राह्मण’ उर्दू में ‘बिरहमन’ हो गया है और ‘ॠतु’ ‘रुत’ हो गई है।
उर्दू और हिन्दी अपने-अपने सिंहासन से उतरकर जब आम आदमी के बीच आती हैं तो उनमें फ़र्क़ कर पाना बड़ा मुश्किल होता है। मेरी नीयत और कोशिश यही रही है कि इन दोनों भाषाओं को ज़्यादा से ज़्यादा क़रीब ला सकूँ। इसलिए ये ग़ज़लें उस भाषा में लिखी गई हैं जिसे मैं बोलता हूँ। ग़ज़ल की विधा बहुत पुरानी, किंतु विधा है, जिसमें बड़े—बड़े उर्दू महारथियों ने काव्य-रचना की है। हिन्दी में भी महाकवि निराला से लेकर आज के गीतकारों और नये कवियों तक अनेक कवियों ने इस विधा को आज़माया है। परंतु अपनी सामर्थ्य और सीमाओं को जानने के बावजूद इस विधा में उतरते हुए मुझे संकोच तो है, पर उतना नहीं जितना होना चाहिए था। शायद इसका कारण यह है कि पत्र-पत्रिकाओं में इस संग्रह की कुछ ग़ज़लें पढ़कर और सुनकर विभिन्न वादों, रुचियों और वर्गों की सृजनशील प्रतिभाओं ने अपने पत्रों, मंतव्यों एवं टिप्पणियों से मुझे एक सुखद आत्म-विश्वास दिया है। इस नाते मैं उन सबका अत्यंत आभारी हूँ।
…और कम्लेश्वर! वह इस अफ़साने में न होता तो यह सिलसिला यहाँ तक न आ पाता। मैं तो-
हाथों में अंगारों को लिए सोच रहा था,
कोई मुझे अंगारों की तासीर बताए।”
महत्वपूर्ण पंक्तियाँ–
* कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए।
* कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।
* इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।
* खँडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही
अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही।
* भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ
आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ।
* ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल, लोगो
कि जैसे जल में झलकता हुआ महल, लोगो।
* मरना लगा रहेगा यहाँ जी तो लीजिए
ऐसा भी क्या परहेज़, ज़रा-सी तो लीजिए।
* हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
* आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
घ्रर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख।
* “सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
* मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।”
* न हो कमीज़ तो पाँवों से पेट ढक लेगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए।
* वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता,
मैं बकरार हूँ आवाज में असर के लिए।
* “रह-रह आँखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
आगे और बढ़ें तो शायद दृश्य सुहाने आएँगे।
* मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे।”
जय हिंद