वर्तमान युग में ‘अंधा युग’ गीतिनाट्य की प्रासंगिकता

वर्तमान युग में ‘अंधा युग’ गीतिनाट्य की  प्रासंगिकता

‘अंधा युग’ अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक सूत्र में बाँधते हुए यह संकेत देता है कि क्रोध, घृणा, स्वार्थ और लालच जैसे गुण किसी भी सभ्यता को भीतर से खा जाता है। नाटक हमें यह समझाता है कि इतिहास बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन मनुष्य की प्रवृत्तियाँ यदि नहीं बदली, तो विनाश की पुनरावृत्ति अनिवार्य हो जाती है। इसी के साथ, यह नाटक एक साधारण मनुष्य की त्रासदी को भी मार्मिक ढंग से दर्शाता है। आज मानव व्यवस्था सत्ता के चक्रों में इतना जकड़ा हुआ है कि उसके पास अपने भविष्य को चुनने की स्वतंत्रता नहीं रह जाती। उसकी आकांक्षाएँ, उसके सपने और उसकी इच्छाएँ गलत निर्णयों की बलि बन जाती हैं। इस प्रकार ‘अंधा युग’ केवल महाभारत के घटनाक्रम की पुनर्व्याख्या नहीं है, बल्कि आधुनिक मनुष्य की विवशता, सामाजिक तंत्र की क्रूरता और नैतिक पतन की गहन पड़ताल भी है। इस तरह हम देखते हैं कि यह नाटक आज के दौर में भी सार्थक है, क्योंकि यह हमें चेतावनी देता है कि यदि मानवीय विवेक जागृत नहीं होगा तो, हर युग अपने भीतर एक नया ‘अंधा युग’ कर सकता है।

‘अंधा युग’ वर्तमान युग में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखता है क्योंकि यह युद्ध की निरर्थकता, मानवीय मूल्यों के पतन, सत्ता के अंधापन और आम आदमी की हताशा को दर्शाता है। यह नाटक अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ जोड़ता है और दिखाता है कि कैसे क्रोध, घृणा और लालच के कारण विनाश होता है, जो आज की दुनिया में भी उतनी ही प्रासंगिक है। यह नाटक एक साधारण मानव की नियति को भी दर्शाता है जो व्यवस्था में फंसा हुआ महसूस करता है और जिसके पास चुनने की स्वतंत्रता नहीं है। पहले ही अंक में नाटक का कथन है –

टुकड़े-टुकड़े   हो   बिखर  चुकी  मर्यादा

उसको  दोनों   ही  पक्षों  ने  तोड़ा  है

पाण्डव ने कुछ कम कौरव ने कुछ ज्यादा1

‘अंधा युग’ काव्य नाटक की रचना धर्मवीर भारती ने सन् 1954 ई. में की थी। यह नाटक स्वतंत्रोत्तर भारत के सामाजिक, नैतिक और वैचारिक संकटों की पृष्ठभूमि में लिखा गया एक अत्यंत महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज़ है। इसकी रचना के समय विश्व द्वितीय विश्वयुद्ध (1939–1945) की भीषण विभीषिका से गुजर चुका था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुए नरसंहार, रक्तपात और विध्वंस ने लेखक के संवेदनशील मन को गहराई तक झकझोर दिया था। धर्मवीर भारती ने इस विनाश को केवल वाह्य घटना के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर मानव जीवन के विघटन के रूप में अनुभव किया। उन्होंने देखा कि किस प्रकार विज्ञान और प्रगति के नाम पर मनुष्य अपने ही अस्तित्व के विनाश की ओर ले जा रहा है। इस रचना के समय संसार में तृतीय विश्वयुद्ध का भय व्याप्त था। यह भय केवल युद्ध की संभावनाओं का नहीं था, बल्कि उससे भी अधिक चिंता का विषय यह था कि मानव-मूल्यों का तीव्र ह्रास हो रहा था। मनुष्य की संवेदनशीलता, करुणा, नैतिकता और विवेक धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे थे।

‘अंधा युग’ इसी नैतिक अंधकार का प्रतीक है। इसमें धर्मवीर भारती ने महाभारत के युद्धोत्तर काल का चित्रण करते हुए उस समय के राजनीतिक षड्यंत्रों, सामाजिक पतन और नैतिक अंधत्व को आधुनिक युग से जोड़कर प्रस्तुत किया है। उन्होंने लिखा है कि- जब मनुष्य अपनी मर्यादाओं को भूलकर पशुवत आचरण करने लगता है, तब सभ्यता विनाश के कगार पर पहुँच जाती है।

साहित्य मानव जीवन में सभ्यताओं की प्रगति का प्रतीक है। यह समाज के मूल्यों एवं सभ्यता का विस्तार करने में सहायक है। इसी संदर्भ में धर्मवीर भारती ने ‘अंधा युग’ की रचना की जो पहली बार देखने और पढ़ने में तो महाभारत की प्रसंगों की रचना लगती है किन्तु उस समय की देशकाल एवं वातावरण का अध्ययन किया जाता है तो यह प्रतीत होता है कि यह रचना भूतकाल में हुई घटनाओं एवं उनसे हुई भीषण क्षति को रेखांकित करती हुई वर्तमान की समस्याएँ हैं।

‘अंधा युग’ महाभारत के 18वें दिन से लेकर भगवान् श्री कृष्ण की मृत्यु तक की घटनाओं पर आधारित है। इस नाट्य गीत में कुल 5 अंक हैं, जिनके माध्यम से लेखक ने युद्ध के पश्चात उत्पन्न निराशा, अंधकार, मूल्य-संकट और मानवता के पतन को क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया है। श्रीकृष्ण की मृत्यु को प्रतीकात्मक रूप में दिखाया गया है। यह केवल एक देवता की मृत्यु नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और मानवता के अंत का संकेत है। कृष्ण की मृत्यु के साथ ही यह संदेश दिया गया है कि जब मनुष्य अपने भीतर के विवेक और न्याय-बोध को समाप्त कर देता है, तो संसार ‘अंधा युग’ बन जाता है। नाटक के प्रारम्भ में ही लेखक लिखते हैं-

“युद्धोपरांत,
यह अंधा युग अवतरित हुआ
जिसमें स्थितियाँ, मनोवृत्तियाँ, आत्माएँ सब विकृत हैं”

है एक बहुत पतली डोरी मर्यादा की

पर वह भी उलझी है दोनों ही पक्षों में2

युद्ध की विभीषिका को दर्शाते हुए यह नाटक आरम्भ होता है। युद्धों ने मानवता पर किस तरह से हमला किया है, इसका चित्रण इसमें बड़ी सूक्ष्मता से किया है। यह काव्य नाटक कर्म-भाग्य व आस्था-अनास्था के द्वंद्व को आरम्भ से अंत तक चित्रित करता है। नाटक में पात्रों की प्रतीकात्मकता ने इसके सौंदर्य में अभिवृद्धि की है। युयुत्सु, संजय, अश्वत्थामा, धृतराष्ट्र, गांधारी से लेकर प्रहरी तक अपनी प्रतीकात्मकता से वो सब सिद्ध करते हैं जो आधुनिक मनुष्य के संकट व पीड़ाएँ हैं।

धर्मवीर भारती ने युद्ध की विभीषिका से लेकर आधुनिकताबोध के फलस्वरूप उपजे संकट को वाणी दी है। वहाँ एक प्रहरी कहता है –

“अंधे राजा की प्रजा कहाँ तक देखे”?3

युद्ध के उपरांत स्थितियाँ, मनोवृत्तियाँ एवं आत्माएँ सब कुछ विकृत हो जाती है। जीवन के प्रति कोई आसक्ति शेष नहीं रहा जाती है। केवल अतीत की त्रुटियों पर क्षोभ से भविष्य की पटकथा लिखना इतना आसन नहीं होता। अनास्था के इस भीषण वातावरण में कवि ने कहा है- “यह कथा ज्योति की है, अंधों के माध्यम से- ‘तमसो माँ ज्योतिर्गमय’ अथार्त अंधकार से प्रकाश की ओर गमन का संदेशवाहक है। यह भारतीय मूल्यबोध आने का निर्माण कर रहा है जो हमारी आस्थावादी सम्यक दृष्टि का विस्तार है। अँधा युग युद्ध के विरुद्ध एक सशक्त अपील है, क्योंकि युद्ध मानव मूल्यों में नकार का उदाहरण है। मर्यादा का बिखराव, रक्तपात और विनाश युद्ध का अंतिम सत्य है। इसमें दोनों ही पक्षों को अपना आत्मतत्व खोना पड़ता है। कवि के दृष्टि में महाभारत का परिणाम भी कुछ ऐसा ही रहा होगा-

भय का अंधापन, ममता का अंधापन

अधिकारों का अंधापन जीत गया

जो कुछ सुन्दर था, शुभ था, कोमलतम था

वह हार गया…द्वापर युग बीत गया।4

बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य में जिसे विकास का पर्याय माना जाता है, उसमें नैतिक और सामाजिक मूल्यों के लिए स्थान कम दिखाई दे रहा है। भारती जी की दृष्टि में यही स्थिति मनुष्य को अंधे युग की ओर अग्रसर कर रही है। मानवीय मूल्यों का निरंतर पतन, मानव चरित्र में हीनता का समावेश और मानव द्वारा अनुशासन और मर्यादाओं की सीमाओं का टूटना ये सभी घटक समाज को विनाश की दिशा में ढकेल रही है। वर्तमान समाज में व्यक्तिगत स्वार्थ, मोह, लोभ, प्रतिस्पर्धा और उपभोगवादी वृत्ति आदि से प्रभावित होकर मानव आज अंधकार की ओर बढ़ रहा है। इस अंधे युग में सर्वसाधारण का जीना दुष्कर हो रहा है। धर्मवीर भारती जी ने इस संबध में ‘अंधा युग’ की स्थापना में अपनी आशंका व्यक्त की है।

राजशक्तियाँ लोलुप होंगी,

जनता उनसे पीड़ित होकर

गहन गुफाओं में छिप-छिप कर दिन काटेगी।

(गहन गुफाएँ वे सचमुच की या अपने कुंठित अंतर की)5

इस नाटक में जहाँ एक ओर आस्था और अनास्था, सत्‌ और असत्‌, आदर्श और यथार्थ, भाव और कला, काव्यत्व और दृश्यत्व है, वहीं दूसरी ओर व्यापक जीवनसत्य का उद्घाटन भी है। जिस तरह से आशा, सौंदर्य, उन्नति, आस्था, क्षमा, निर्माण आदि शुभत्व जीवन के सच हैं उसी तरह कुंठा, निराशा, रक्तपात, प्रतिशोध, विकृति, कुरूपता और अंधापन भी जगत का उतना ही कड़वा सच है। इनसे घबराने के बजाय इनका तत्परता से सामना करना चाहिए। सच का सामना हर आदमी को करना पड़ता है। इससे भागना क्यों? मनुष्य होने के नाते इन कुरूपताओं, विद्रूपताओं, अंधत्व पर विजय प्राप्त करना हर आदमी का लक्ष्य होना चाहिए।

पर शेष अधिकतर हैं अंधे

पथ भ्रष्ट, आत्महारा, विगलित

अंतर की अंध गुफाओं के वासी

यह कथा उन्हीं अंधों की है

या कथा ज्योति की है अंधों के माध्यम से।6

अंधा युग में अंधों के माध्यम से ज्योति की कथा कही गई है। प्रकाश की कथा कही गई है। अंधेरे के बिना प्रकाश नहीं और प्रकाश के बिना अंधेरा नहीं। जिन लोगों की मति पर अंधकार हावी है, वे अंधे हैं, या अपनी अंध गुफाओं के वासी हैं। ऐसे लोग तो अंधकार में ही जीते हैं। इसलिए वे अशुभ, अमंगल, कुरूपता, विद्रूपता, कुण्ठा, संत्रास, विडंबना और वेदना में जीते हैं। उनका बाहरी आभा मंडल शुभत्व मंडित भले ही हो लेकिन वे भीतर ही भीतर अपने अंधकार को जी रहे होते हैं। ऐसे लोग अपने भीतरी अंधकार और बाहरी ज्योति के बीच समन्वय नहीं कर पाते है। ऐसे में ‘अशुभ अंधकार’ जीत जाता है और ‘शुभ प्रभु’ मर जाता है।

हिंदी साहित्य में पौराणिक कथाओं पर आधारित अनेक रचनाएँ समय–समय पर लिखी गई हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए डॉ. धर्मवीर भारती ने अंधायुग की रचना की, जो महाभारत के युद्धोत्तर परिदृश्य को आधार बनाकर आधुनिक संदर्भों में मानव-मूल्यों के पतन, नैतिक संकट और सामाजिक विघटन को उजागर करती है। बच्चन जी ने अंधा युग से पूर्व रचे गए गीतिनाट्यों को एकांकी गीतिनाट्य माना है, जबकि अंधा युग को वे पूर्ण गीतिनाट्य की संज्ञा देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि अंधायुग अपनी संरचना, भाषा, विचार और नाटकीय प्रभावशीलता के कारण एक विशिष्ट और परिपूर्ण कृति के रूप में स्वीकार किया गया है। डॉ. धर्मवीर भारती साहित्य और समकालीनता के परस्पर संबंध को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि- “किसी भी युग का अच्छा साहित्यकार अपनी समकालीन समस्याओं और चुनौतियों से दूर नहीं रह सकता है।”7

उनके अनुसार प्रत्येक रचनाकार को अपने समय में उपस्थित सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक और मानवीय प्रश्नों से साक्षात्कार करना आवश्यक है। समाज का गहन अध्ययन ही उसे उन समस्याओं का सही बोध कराता है, जिनके समाधान की दिशा वह अपनी रचनाओं के माध्यम से सुझा सकता है। इसी प्रक्रिया के फलस्वरूप साहित्यकार एक उच्च कोटि की, सार्थक और प्रभावशाली रचना करने में सफल और सक्षम होता है।

युद्ध का ऐलान होते ही सत्य और धर्म मानो अपने आधार खो देते हैं। वे किसी एक पक्ष में स्थिर नहीं रह पाते, क्योंकि युद्ध की अंधी आँधियों में मनुष्य का विवेक डगमगा जाता है। अंधी प्रवृत्तियों से प्रभावित मानव अपने भीतर का मनुष्यत्व खो बैठता है। उसके सामने न तो कोई नैतिक मापदंड रहता है और न ही कोई आदर्श। वह केवल हिंसा और प्रतिशोध की दिशा में बहने लगता है, जहाँ संवेदनाएँ मौन हो जाती हैं। आधुनिक बोध के संदर्भ में अंधा युग का यह केंद्रीय विचार अत्यंत सार्थक प्रतीत होता है। युद्ध में सबसे पहले सत्य ही घायल होता है। सत्य की कराह कोई सुनना नहीं चाहता। उसकी आह को रणभूमि के कोलाहल में अनसुना कर दिया जाता है। उसे निर्ममता से रौंद दिया जाता है और उसके बाद मर्यादाओं का तिनका-तिनका बिखरने लगता है। नैतिक मान्यताएँ, जो समाज की नींव होती हैं, युद्ध की विभीषिका के बीच छटपटाते निर्बल पक्ष की भाँति टुकड़ों में बँट जाती हैं। अंततः युद्ध केवल भू-सीमाओं का संघर्ष नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और सत्य की पराजय का भी प्रतीक बन जाता है। यह वह अँधेरा है जिसमें मनुष्य स्वयं को खो देता है, और मानवता अपनी राह नहीं पहचान पाती है। यहाँ याचक द्वारा व्यक्त किया गया है-

जब कोई भी मनुष्य

अनासक्त होकर चुनौती देता है इतिहास को’

उस दिन नक्षत्रों की दिशा बदल जाती है।8

वर्तमान में चल रहे कुछ प्रमुख युद्ध और संघर्ष:

1. रूस – यूक्रेन युद्ध

2. इज़राइल – ईरान (प्रॉक्सी संघर्ष)

3. सूडान गृह-युद्ध

4. सेहेल क्षेत्र संघर्ष (पश्चिम और मध्य अफ्रीका)

5. म्यांमार गृह-युद्ध

6. इथियोपिया – Fano विद्रोह (Amhara क्षेत्र)

निष्कर्ष: आज विश्व के सामने एक बहुत बड़ा संकट यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है कि हमने दो विश्व युद्ध और कई क्षेत्रीय युद्धों से क्या सिखा है? विश्व की दो बड़ी शक्तियाँ पूरे विश्व को अलग-अलग उलझनों में डालकर अपना राजनीतिक और आर्थिक लाभ के लिए विश्व को बाजार बना दिया है। रोज नये – नये विध्वंशकारी हथियारों का आविष्कार और प्रयोग हो रहा है। अपना-अपना हथियार बेंचने के लिए कूटनीतिक चाल चली जा रही है जिससे शांति के प्रयास दब कर रह जाते हैं। जो महाशक्तियाँ कोरोना काल में जीवन रक्षक वैक्सीन को भी बाजार में एक उत्पाद की तरह उपयोग कर रही थी वही देश अब अपना रॉकेट तथा मिसाइल बेंचने के लिए, उन्हीं देशों का इस्तेमाल कर रही हैं। शांति समझौता के लिए जिम्मेदार संस्थाएँ भी उनकी हाथों में कठपुतली बन कर रह गई हैं। मानव जाति के लिए आवश्यक है कि वह हिंसा और प्रतिशोध की प्रवृत्तियों को त्याग कर मानवीय मूल्यों को अपनाए। सनातन संस्कृति में समूचे विश्व को एक परिवार माना गया है – वसुधैव कुटुम्बकम। वर्तमान समय में युद्धों के विनाशकारी परिणाम और मानव कल्याण के लिए निरंतर प्रयास के दिशा में धर्मवीर भारती का अंधा युग रौशनी दिखाने का काम करता है।  

सन्दर्भ ग्रन्थ:

  1. डॉ. धर्मवीर भारती, अंधा युग, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण-1986, पृ.सं. 13
  2. डॉ. धर्मवीर भारती, अंधा युग, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण-1986, पृ.सं. 12
  3. डॉ. धर्मवीर भारती, अंधा युग, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण-1986, पृ.सं. 16
  4. डॉ. धर्मवीर भारती, अंधा युग, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण-1986, पृ.सं. 13
  5. डॉ. धर्मवीर भारती, अंधा युग, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण-1986, पृ.सं. 12
  6. डॉ. धर्मवीर भारती, अंधा युग, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण-1986, पृ.सं. 12
  7. पाण्डेय, रामकिंकर, शोध दिशा (शोध पत्रिका)- धर्मवीर भारती का साहित्य चिंतन, शोध पत्र, बिजनौर.उ.प्र. श्री लक्ष्मी ऑफसेट प्रिंटर्स, शोध अंक- 54, पृ.सं. 383,384
  8. डॉ. धर्मवीर भारती, अंधा युग, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण-1986, पृ.सं. 26

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