तुमने अपने जीवन को
काग़ज़ पर नहीं,
आग के पन्नों पर लिखा है
हर अक्षर में तेरे
अपमान की राख
और प्रतिरोध की चिनगारी है।
तुम्हारी आत्मकथा
सिर्फ़ कथा नहीं,
एक सामाजिक दस्तावेज़ है,
जहाँ पीड़ा रोती नहीं
प्रश्न बनकर खड़ी हो जाती है।
तुम्हारे शब्द
दया नहीं माँगते,
वे न्याय का घोष करते हैं-
मनुष्य होने का अधिकार
किसी जाति की जागीर नहीं।
जिस समाज ने तुम्हें हाशिये पर रखा,
तुमने उसी हाशिये से, उसे चुनौती दी।
तुम्हारी स्मृतियाँ हमारे लिए
इतिहास का वह पाठ हैं,
जो किताबों में नहीं था,
पर जीवन में हर दिन घटता रहा।
तुम्हें पढ़ना
केवल साहित्य पढ़ना नहीं,
अपने समय की
आत्मा से संवाद करना है।
जय हिंद