भारतेंदु, मैथिली, महावीर का अखिल संसार है हिंदी।
सुशोभित वीणावादिनी के सुरों का हार है हिंदी।
भुला रहे हैं जिसे हम पाश्चत्य के मोह में फँसकर।
उसी जननी स्वरुप भूमि का श्रृंगार है हिंदी।
हिंदी ‘स्वयंप्रभा’ है वह सत्ता की नहीं जनता की भाषा है और व्यापक जनसमर्थन से संपन्न है। भाषा मानव समाज की अप्रतिम उपलब्धि है। भाषा भावों, विचारों की अभिव्यक्ति और भाव संप्रेषण का सर्वसुलभ साधन है। मनुष्य के समस्त क्रियाकलाप एवं आचरण भाषा के माध्यम से ही संपन्न होते हैं। तात्विक रूप से भाषा ध्वनि प्रतीकों की एक व्यवस्था है। जिसके माध्यम से मानव समूह अपना विचार विनिमय करता है। मनुष्य और मनुष्य के बीच ध्वनि संकेतों का जो व्यवहार होता है, उसे ‘भाषा’ कहते हैं।
हिंदी हजार वर्षो से हमारे सांस्कृतिक विरासत एवं साहित्य की भाषा के साथ-साथ जनता की संपर्क भाषा के रूप में प्रचलित रही है। संस्कृत, पालि, प्राकृत, आदि अनेक बोलियों को इसने आत्मसात किया है। धर्म, दर्शन, अध्यात्म तथा साहित्य के क्षेत्र में पहले जिस काम को संस्कृत भाषा ने किया, आज वही कार्य हिंदी भाषा कर रही है। आज वेद, उपनिषद्, गीता, रामायण आदि की टीकाएँ हिंदी में उपलब्ध हैं। भक्तिकाल के कवियों जैसे- सूर, तुलसी, कबीर, रहीम आदि संत समाज ने भारतीय संस्कृति के ज्ञान संपदा को हिंदी में आपूरित कर दिया है। उन्नीसवीं सदी में भारतीय पुनर्जागरण के पुरोधा महर्षि दयानंद सरस्वती ने ‘वेदभाष्य’ और अपनी महान ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश भी हिंदी में लिखा है। इस प्रकार इसकी जड़ें हमारी सांस्कृतिक, दार्शनिक तथा धार्मिक पृष्ठभूमि में गहरी पैठ गई हैं। संस्कृत, पालि, प्राकृत अपभ्रंश, शौरसेनी, मागधी, अवधी, ब्रज, अरबी, फ़ारसी, उर्दू आदि की शब्द संपदा को आत्मसात कर यह भाषा समुच्चय बन गई है। हिंदी का प्रयोग हिंदू-मुसलमान, सिख, ईसाई सभी करते हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास के अध्ययन से यह बात सिद्ध है कि सिद्धों, नाथों, संतों तथा अनेक पंथों के आचार्यों ने भी इसे अपने ज्ञान अध्ययन तथा उपदेश के प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाया था। अमीर खुसरो, मलिक मुहम्मद जायसी, रसखान आदि सूफी संतों तथा कवियों ने हिंदी में काव्य रचनाएँ की हैं।
देश के स्वतंत्रता आन्दोलन में हिंदी के गीतों एवं नारों ने नवजागरण का मन्त्र फूंका था। चाहे रामप्रसाद विस्मिल की ‘सरफरोसी की तमन्ना हो’ या श्यामलाल गुप्ता का ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ का जागरण मंत्र, यह सब हिंदी के माध्यम से ही जनमानस में प्रसारित हुआ था। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व जिन महापुरुषों ने हिंदी को स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में परिकल्पना की थी उनमें बंगाल के राजा राममोहन राय का नाम आता है। उन्होंने संपूर्ण भारत को एकता के सूत्र में बाँधे रखने के लिए हिंदी को अनिवार्य बताया था। परवर्ती ब्राह्मसमाज के यशस्वी नेता केशवचंद्र सेन ने अपने लेख में लिखा था- “हिंदी अखिल भारत की जातीय भाषा या राष्ट्रभाषा बनने योग्य है। अभी जितनी भाषाएँ भारत में प्रचलित हैं, उनमे हिंदी भाषा लगभग सभी जगह प्रचलित हैं। हिंदी को यदि एकमात्र भाषा बनाया जाए तो देश में एकता स्थापित करने का काम सहज और शीघ्र संपन्न हो सकता है।” नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने कलकत्ता कॉंग्रेस का अध्यक्षीय भाषण हिंदी में पढ़ते हुए कहा था- “हिंदी प्रचार का उद्देश्य केवल यही है कि आजकल जो काम अंग्रेजी में किया जाता है, वह आगे चलकर हिंदी में किया जा सकता है।” महर्षि दयानंद ने अपने वैदिक धर्म के प्रचार का माध्यम हिंदी को ही बनाया और कहा था- “मेरी आँखें उस दिन को देखने को तरस रही हैं जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब एक भारतीय भाषा (हिंदी) समझने और बोलेने लग जाएँ।”
हिंदी भाषा ने भारत की स्वतंत्रता का अर्थ समझाया। यही भाषा है जो ऐतिहासिक स्वातंत्र्य-संघर्ष की साक्षी बनी। मातृभाषा के महत्व को बताते हुए हिंदी के महान साहित्यकार तथा खड़ी बोली हिंदी के जन्मदाता भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘भारत दुर्दशा’ निबंध में लिखा है-
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।।
अंग्रेजी पढिके जदपि, सब गुण होत प्रवीण। पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
इस प्रकार हम हिंदी को राष्ट्रीयता का पर्याय मानते हुए कह सकते हैं कि हिंदी भारत की भारती है, हिंदी हिन्दुस्तान की हिंदी है। यह हमारे राष्ट्रीय एकता का मूलसूत्र है। हिंदी भारत संघ की राजभाषा होने के साथ ही ग्यारह राज्यों और तीन संघ शासित क्षेत्रों की भी प्रमुख राजभाषा है। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल अन्य इक्कीस भाषाओं के साथ हिंदी का एक विशेष स्थान है। देश में तकनीकि और आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ अंग्रेजी पुरे देश पर हावी होती जा रही है। देश की राजभाषा हिंदी होने के बावजूद आज हर जगह अंगेजी का वर्चस्व कायम है। हिंदी जानते हुए भी लोग हिंदी में बोलने, पढ़ने या काम करने में हिचकते हैं। इसलिए सरकार का प्रयास है कि हिंदी के प्रचलन के लिए उचित माहौल तैयार की जा सके।
राजभाषा हिंदी के विकास के लिए खासतौर से राजभाषा विभाग का गठन किया गया है। भारत सरकार का राजभाषा विभाग इस दिशा में प्रयासरत है कि केंद्र सरकार के अधीन कार्यालयों में अधिक से अधिक कार्य हिंदी में हो। इसी कड़ी में राजभाषा विभाग द्वारा प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया जाता है। 14 सितंबर, 1949 का दिन स्वतंत्र भारत के इतिहास में बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसी दिन संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इस निर्णय को महत्व देने के लिए और हिन्दी के उपयोग को प्रचलित करने के लिए साल 1953 के उपरांत हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। 14 सिंतबर, 2017 को राजभाषा विभाग द्वारा नई दिल्ली के विज्ञान भवन में हिंदी दिवस समारोह के अवसर पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने कहा था, “हिन्दी अनुवाद की नहीं बल्कि संवाद की भाषा है। किसी भी भाषा की तरह हिन्दी भी मौलिक सोच की भाषा है।“
हिंदी दिवस के अवसर पर सरकारी विभागों में हिंदी की प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं। साथ ही हिंदी प्रोत्साहन सप्ताह का आयोजन किया जाता है। हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अनेक पुरस्कार योजनाएं शुरू की हैं। सरकार द्वारा हिंदी में अच्छे कार्य के लिए ‘‘राजभाषा कीर्ति पुरस्कार योजना’’ के अंतर्गत शील्ड प्रदान की जाती है। हिंदी में लेखन के लिए राजभाषा गौरव पुरस्कार का प्रावधान है। आधुनिक ज्ञान विज्ञान में हिंदी में पुस्तक लेखन को प्रोत्साहन देने के लिए भी सरकार पुरस्कार प्रदान करती है। इन प्रोत्साहन योजनाओं से हिंदी के विस्तार को बढ़ावा मिल रहा है।
केंद्र सरकार के कार्यालयों में हिंदी का अधिकाधिक उपयोग सुनिश्चित करने हेतु भारत सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा उठाए गए कदमों के परिणामस्वरूप कंप्यूटर पर हिंदी में कार्य करना अधिक आसान एवं सुविधाजनक हो गया है। इसी क्रम में राजभाषा विभाग द्वारा वेब आधारित सूचना प्रबंधन प्रणाली विकसित की गई है, जिससे भारत सरकार के सभी कार्यालयों में हिंदी के उत्तरोत्तर प्रयोग से संबंधित तिमाही प्रगति रिपोर्ट तथा अन्य रिपोर्टें राजभाषा विभाग को त्वरित गति से भिजवाना आसान हो गया है। सभी मंत्रालयों और विभागों ने अपनी वेबसाइटें हिंदी में भी तैयार कर ली हैं। सरकार के विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों द्वारा संचालित जन कल्याण की विभिन्न योजनाओं की जानकारी आम नागरिकों को हिन्दी में मिलने से गरीब, पिछड़े और कमजोर वर्ग के लोग भी लाभान्वित होते हुए देश की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।
देश की स्वतंत्रता से लेकर अभी तक हिंदी ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। भारत सरकार द्वारा विकास योजनाओं तथा नागरिक सेवाएँ प्रदान करने में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। हिंदी तथा प्रांतीय भाषाओं के माध्यम से हम बेहतर जन सुविधाएँ लोगों तक पहुँचा सकते हैं। हिंदी आम आदमी की भाषा के रूप में देश की एकता का सूत्र है। सभी भारतीय भाषाओं की बड़ी बहन होने के नाते हिंदी विभिन्न भाषाओं के उपयोगी और प्रचलित शब्दों को अपने में समाहित करके सही मायनों में भारत की संपर्क भाषा होने की भूमिका निभा रही है। हिंदी जन-आंदोलनों की भी भाषा रही है। हिंदी के महत्त्व को गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने बड़े सुंदर रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा था, ‘भारतीय भाषाएँ नदियाँ हैं और हिंदी महानदी’। हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के समय स्वाधीनता सेनानियों के बीच संपर्क का प्रमुख माध्यम रही थी। हिंदी विविधता में एकता का सूत्र है। हिंदी देश के सामाजिक, राजनीतिक, सांप्रदायिक एवं भाषाई समन्वय और सौहार्द का प्रतीक है।
हिंदी के महत्व को देखते हुए तकनीकी कंपनियाँ इस भाषा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं। यह खुशी की बात है कि सूचना प्रौद्योगिकी में हिन्दी का इस्तेमाल बढ़ रहा है। ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकें बड़े पैमाने पर हिंदी में लिखी जा रही है। सोशल मीडिया और संचार माध्यमों में हिंदी का प्रयोग निरंतर बढ़ रहा है। भाषा का विकास उसके साहित्य पर निर्भर करता है। आज के तकनीकी युग में विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी हिंदी में काम को बढ़ावा देना चाहिए ताकि देश की प्रगति में ग्रामीण जनसंख्या सहित सबकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके। इसके लिए यह अनिवार्य है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी ज्ञान से संबंधित साहित्य का सरल अनुवाद किया जाए। इसके लिए राजभाषा विभाग ने सरल हिंदी शब्दावली भी तैयार की है। राजभाषा विभाग द्वारा राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन योजना के द्वारा हिंदी में ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों के लेखन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे हमारे विद्यार्थियों को ज्ञान-विज्ञान संबंधी पुस्तकें हिंदी में उपलब्ध होंगी। हिन्दी भाषा के माध्यम से शिक्षित युवाओं को रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध हो सकेंगे। इस दिशा में निरंतर प्रयास भी जरूरी है। भाषा वही जीवित रहती है, जिसका प्रयोग जनता करती है। भारत में लोगों के बीच संवाद का सबसे बेहतर माध्यम हिंदी है। इसलिए इसको एक-दूसरे में प्रचारित करना चाहिये। इस कारण हिन्दी दिवस के दिन उन सभी से निवेदन किया जाता है कि वे अपने बोलचाल की भाषा में भी हिंदी का ही उपयोग करें। हिंदी भाषा के प्रसार से पूरे देश में एकता की भावना और मजबूत होगी।
भारतीय भाषाओं और हिंदी के विकास के लिए संविधान में आठवीं अनुसूचि एवं कुल 11 अनुच्छेद राजभाषा से संबंधित हैं। जिसमें अनुच्छेद 351 (भाग-17) अत्यंत महत्वपूर्ण है। अनुच्छेद 120 (भाग-5) में संसद में बोली जानेवाली भाषा का प्रावधान है। इसमें जो प्रमुख तीन बातें हैं उन तीनों में दूसरा था- ‘आगामी 15 वर्षों तक यानी 1965 तक अंग्रेजी बोलने की छुट दी गई थी।’ इस प्रावधान से यह उम्मीद की गई थी कि इन 15 वर्षों में हिंदी पूर्णरूप से कार्यालयों में प्रयोग होने लगेगी लेकिन विभिन्न कारणों से आजतक यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सका।
हिंदी विभिन्न भाषाओं के प्रचलित शब्दों को अपने में समाहित करके सही मायनों में भारत की संपर्क भाषा होने की भूमिका निभा रही है। हिंदी ने तेलुगु से कुचीपुड़ी और मोरम शब्दों को ग्रहण किया तो तमिल से ‘पिल्ला’ और ‘पंडाल’ जैसे शब्द अपनाए। इसी तरह ‘चाल’ (छोटा कमरा) मलयालम का शब्द है। ‘छाता’ बांग्ला और ‘हड़ताल’ गुजराती का शब्द है। ये शब्द हिंदी में खूब प्रचलित हैं। हिंदी में श्री, श्रीमती, राष्ट्रपति, मुद्रास्फीति जैसे शब्द मूलतः मराठी भाषी बाबूराव विष्णु पराड़कर के चलाए हैं। कोई भाषा नीर भरी नदी तभी बनती है, जब वह दूसरी भाषाओं से स्रोत ग्रहण करे। इससे वह समृद्ध भी बनती है। हिंदी समेत कई भाषाओं में एक मुहावरा है- ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात।’ तेलुगु में भी यह मुहावरा है। उसका हिंदी अनुवाद होगा- ‘तू मेघ-मेघ, मैं तारा-तारा।’ ऐसे मुहावरों को उसके मूल रूप में स्वयं में समाहित करने की चलन से हिंदी और सशक्त होगी। हिंदी को पूरे देश में राजभाषा के रूप में पूरी तरह स्वीकार्यता तभी मिलेगी, जब हम सभी स्थानीय भाषाओं को भी सम्मान देंगे। भाषा राजकीय उत्सवों से नहीं, बल्कि जन सरोकारों और लोक परंपराओं से समृद्ध होती है। हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति इसकी वैज्ञानिकता, मौलिकता, सरलता और स्वीकार्यता है।
हिंदी सर्वसुलभ और सहज ग्रहणीय भाषा है। उसका स्वरूप समावेशी है और लिपि देवनागरी विश्व की सबसे पुरानी एवं वैज्ञानिक लिपियों में से एक है। हिंदी आधुनिक भी है और पुरातन भी। हिंदी के ये गुण ही उसे एक भाषा के स्तर से ऊपर एक संस्कृति होने का सम्मान दिलाता है। राजभाषा हिंदी के माध्यम से देश की जनता की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक अपेक्षाओं को पूरा करने वाली योजनाओं को आखिरी सिरे तक पहुंचाना सरकारी तंत्र का प्रमुख कर्तव्य है और उसकी सफलता की कसौटी भी। यदि हम चाहते हैं कि हमारा लोकतंत्र निरंतर प्रगतिशील रहे और अधिक सशक्त बने तो हमें संघ के कामकाज में हिंदी और राज्यों के कामकाज में उनकी प्रांतीय भाषाओं का प्रयोग करना होगा। हिंदी को उसके वर्तमान स्वरूप तक पहुंचाने में सभी प्रदेशों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
अनेक हिंदीतर भाषियों ने भी हिंदी की सेवा की है। केरल के प्रथम हिंदी प्रचारक मलयालम भाषी एम.के दामोदरन उण्णि थे। मलयालम भाषी जी. गोपीनाथन, दंद्रहासन, एन चंद्रशेखरन नायर, एन.ई विश्वनाथ अय्यर और के.सी अजय कुमार की हिंदी सेवा को हम भूल नहीं सकते। इसी कड़ी में सुब्रह्मण्य भारती, सुमति अय्यर और पी. जयरामन जैसे तमिलभाषियों, बीवी कारंत और नारायण दत्त जैसे कन्नड़भाषियों, मोटूरि सत्यनारायण, भीमसेन निर्मल, बाल शौरि रेड्डी और यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद जैसे तेलुगुभाषियों ने भी हिंदी की जो सेवा की उसे याद रखना चाहिए। अनेक मराठी भाषियों जैसे सखाराम गणेश देउस्कर, लक्ष्मण नारायण गर्दे, माधव राव सप्रे, बाबूराव विष्णु पराड़कर, प्रभाकर माचवे, चंद्रकांत वांडिवडेकर, राहुल बारपुते ने हिंदी की अनन्य सेवा की। राजा राममोहन राय, श्याम सुंदर सेन, अमृतलाल चक्रवर्ती, चिंतामणि घोष, क्षितिंद्र मोहन मित्र, शारदा चरण मित्र, रामानंद चट्टोपाध्याय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, नलिनी मोहन सान्याल, सुनीति कुमार और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे बांग्ला भाषियों ने भी हिंदी की खूब सेवा की है। टैगोर ने तो विश्वभारती में हिंदी भवन की स्थापना कर हजारीप्रसाद द्विवेदी को हिंदी शिक्षक नियुक्त किया था। महात्मा गांधी ने हिंदी को भारतीय चिंतन-धारा का स्वाभाविक विकास क्रम माना था। हिंदी भाषा का प्रश्न उनके लिए स्वराज का प्रश्न था। हिंदी का महत्व हमारे संविधान निर्माताओं ने प्रारंभ में ही स्वीकार किया और उसकी सर्वग्राह्यता को ध्यान में रखते हुए ही संविधान सभा ने 14 सितंबर, 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में अंगीकार किया।
हिंदी ने राष्ट्रीय एकता का मार्ग तो प्रशस्त किया ही, उसे यह भी बोध कराया कि भारत का विकास और राष्ट्रीय एकता की रक्षा प्रादेशिक भाषाओं के पूर्ण विकास से ही संभव है। सहयोग और सहकार के लक्ष्य की प्राप्ति हिंदी के माध्यम से ही संभव होती रही है। विविधता और बहुभाषिकता भारत की विशेषता है। विभिन्न भाषाओं के साथ हिंदी का सहज संबंध विकसित हुआ है। हिंदी और भारतीय भाषाओं का पारस्परिक आदान-प्रदान संगठित एवं योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाने की आवश्यकता है। हिंदी और भारतीय भाषाओं के बीच पारस्परिक साझेदारी विकसित होने पर देशवासियों के बीच तालमेल बेहतर होगा। इसके साथ ही हिंदी और भारतीय भाषाओं के बीच अन्योन्याश्रित संबंध का संधान करना होगा। हिंदीतर भाषाओं के साथ हिंदी की भाषिक और अर्थपरक समझ का विकास होने पर अखिल भारतीय बोध का विस्तार होगा। अतः हम सभी को अपनी संविधान सम्मत सभी भाषाओँ का पूर्ण सम्मान करते हुए राष्ट्रीय भावना और एकता को परिपुष्ट करने के लिए राजभाषा हिंदी को उसके पद पर सही अर्थों में निष्ठापूर्वक स्थापित करने का संकल्प लेना होगा।
“है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी-भरी
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी।”
भारत सरकार हिंदी भाषा के विकास में कई कार्य रही है, जिससे कि हिंदी के विकास में भारत की एकता और अखंडता को और भी अधिक विकसित किया जा सके। वर्तमान में सरकार ने मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे प्रोफेसनल कोर्स हिंदी में शुरू की है। मध्यप्रदेश के सभी 13 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हिंदी में पढ़ाई की शुरुआत हो चुकी है। सरकार ने डिजिटल इडिया भाषिक मिशन की शुरुआत की है। इंटरनेट के बढ़ते इस्तेमाल ने हिंदी भाषा के उज्जवल भविष्य की नई राह दिखाई है। गूगल के अनुसार भारत अंग्रेजी भाषा में जहाँ विषयवस्तु निर्माण के रफ़्तार 19 फीसदी है तो वहीं हिंदी में ये आंकड़े 94 फीसदी है। हिंदी को नई सूचना-प्रौद्योगिकी की जरूरतों के मुताबिक़ ढाला जाए तो यह इस भाषा के विकास में बेहद उपयोगी सिद्ध होगा। इसके लिए सरकारी और गैर सरकारी संगठनों पर प्रयास किया जाना चाहिए साथ ही निजी स्तर पर भी लोगों को अधिक से अधिक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त हिंदी भाषियों को गैर हिंदी भाषियों के साथ खुले दिल से स्वीकार करना चाहिए जिससे उनकी भाषा संस्कृति को समझना होगा तभी वो भी हिंदी को खुले मन से स्वीकार करने के लिए तैयार होंगे। तभी भारत की एकता और अखंडता में भाषा का विकास संभव हो सकेगा। भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक भी है।
बहुत सरल, सहज और सुगम भाषा होने के साथ हिंदी विश्व की संभवतः सबसे वैज्ञानिक भाषा है, जिसे दुनिया भर में समझने, बोलने और चाहने वाले लोग बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। यह विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है, जो हमारे पारंपरिक ज्ञान, प्राचीन सभ्यता और आधुनिक प्रगति के बीच एक सेतु भी है। विदेश मंत्रालय द्वारा ‘‘विश्व हिंदी सम्मेलन’’ और अन्य अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के माध्यम से हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाने का कार्य किया जा रहा है। इसके अलावा प्रत्येक वर्ष सरकार द्वारा ‘‘प्रवासी भारतीय दिवस’’ मनाया जाता है। इसमें विश्व भर में रहने वाले प्रवासी भारतीय भाग लेते हैं। विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीयों की उपलब्धियों के सम्मान में आयोजित इस कार्यक्रम से भारतीय मूल्यों का विश्व में और अधिक विस्तार हो रहा है। विश्वभर में करोड़ों की संख्या में भारतीय समुदाय के लोग एक संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी को एक नई पहचान मिली है। यूनेस्को की सात भाषाओं में हिंदी को भी मान्यता मिली है। आज संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में भी हिंदी की गूंज सुनाई देने लगी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने 1977 में हिंदी में भाषण दिया था। 2014 में हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में ही भाषण दिया था। विश्व हिंदी सचिवालय विदेशों में हिंदी का प्रचार-प्रसार करने और संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के लिए कार्यरत है। उम्मीद है कि हिंदी को शीघ्र ही संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा भी प्राप्त हो सकेगा। आज वैश्वीकरण के दौर में, हिंदी विश्व स्तर पर एक प्रभावशाली भाषा बनकर उभरी है। आज पूरी दुनिया में 175 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा पढ़ाई जा रही है।
वैश्विकरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी की भूमिका सार्थक हो तथा उसका प्रयोग बढ़ सके इसके लिए पहली आवश्यकता हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के मानकीकरण की है। केन्द्रीय हिंदी निदेशालय ने जो लिपि का मानकीकरण किया है उसका उपयोग निदेशालय के अलावा कहीं नहीं होता है। विश्व में हिंदी का प्रसार हो, हिंदी अध्ययन-अनुसन्धान की दिशा में प्रगति हो, इसके लिए आवश्यक है कि हिंदी का संदर्भ ग्रंथ तैयार किए जाएँ। सूचना क्रांति के युग में हिंदी को भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में अपनी भूमिका का महत्व बताना होगा। अतः इसे कंप्यूटर की भी भाषा बनाना होगा। हिंदी में ऐसे सॉफ्टवेयर विकसित करना होगा जिससे वैश्विक स्तर पर सूचनाओं का अदान-प्रदान करना और भी आसानी और सहजता से हो सके। भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में हम अपने यहाँ के उत्पादों में ‘लेबलिंग’ हिंदी में करेंगे तो निश्चित ही हिंदी का प्रचार-प्रसार होगा। इसके अलावा अनुवादक और अनुवाद के उपकरण, मुद्रण-टंकण, आशुलेखन, हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन, तथा उनकी सुलभ बिक्री-वितरण आवश्यक होना चाहिए। विश्वभाषाओं से संबंधित द्विभाषी, त्रिभाषी और बहुभाषी शब्दकोशों, विश्वकोषों का संपादन प्रकाशन भी आवश्यक है। हिंदी के वैश्विक विकास के लिए ठोस भूमि तैयार करना आवश्यक है, जिससे हिंदी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचानी जाए। इस दिशा में विश्व स्तर पर कार्य हो रहा है और प्रगति भी दिख रही है लेकिन हमें निरंतर अपनी इस यात्रा पर आगे बढ़ते रहना है। संयुक्तराष्ट्र संघ हिंदी में नियमित रूप से एक साप्ताहिक कार्यक्रम प्रस्तुत करता है जो उसकी वेबसाइट पर उपलब्ध है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को प्रतिष्ठित करने के लिए भारतीय संस्कृति संबंध परिषद् (आई सीसीआर) महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। आज हिंदी बारह से अधिक देशों में बहुसंख्यक समाज की मुख्य भाषा है। इसके अलावा छह देशों- फिजी, गुआना, सूरीनाम, टोबोक त्रिनिनाद तथा अरब अमीरात में हिंदी को अल्पसंख्यक भाषा के रूप में संवैधानिक दर्जा प्राप्त है।
— धीरज कुमार रघुवंशी
जय हिन्द