आजकल सोशल मीडिया, विशेषकर यूट्यूब पर एक नई प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती जा रही है। कुछ लोग भगवान के चित्र, भजन और धार्मिक वीडियो का सहारा लेकर लोगों की भावनाओं का व्यापार कर रहे हैं।
वीडियो के बीच-बीच में आवाज़ आती है- “इस वीडियो को तुरंत लाइक करें, शेयर करें, सब्सक्राइब करें। ऐसा नहीं किया तो पाप लगेगा, भगवान नाराज़ हो जाएंगे, आपके जीवन में संकट आ जाएगा।” ज़रा सोचिए, क्या सचमुच ईश्वर इतने छोटे हो सकते हैं कि वे किसी के लाइक या सब्सक्राइब न करने पर नाराज़ हो जाएँ? क्या धर्म भय का नाम है? क्या भक्ति का अर्थ केवल किसी चैनल की लोक प्रियता बढ़ाना है?
ईश्वर तो करुणा, प्रेम, सत्य और निष्काम कर्म के प्रतीक हैं। वे मनुष्य के कर्म को देखते हैं, उसका चरित्र देखते हैं, उसके भीतर की मानवता देखते हैं। किसी वीडियो पर क्लिक करने या न करने से न पुण्य मिलता है, न पाप। रोज़गार कमाना बुरा नहीं है, लेकिनआस्था को हथियार बनाकर लोगों को भावनाओं का ब्लैकमेल करना निश्चित ही गलत है। धर्म लोगों को जोड़ने के लिए है, डराने के लिए नहीं। श्रद्धा प्रेरणा देती है, भय नहीं। यदि सचमुच समाज का भला करना चाहते हैं, तो लोगों को यह कहिए- किसी भूखे को भोजन कराइए, किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई में मदद कीजिए, एक पौधा लगाइए, किसी दुखी व्यक्ति का सहारा बनिए, अपने माता-पिता का सम्मान कीजिए। यही सबसे बड़ी पूजा है, यही सबसे बड़ा धर्म है।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प करें कि हम आस्था का सम्मान करेंगे, लेकिन उसके नाम पर होने वाले भावनात्मक शोषण का समर्थन कभी नहीं करेंगे। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को ऊँचा उठाना है, उसकी भावनाओं का व्यापार करना नहीं होता।
जय हिंद