शब्दों में भरकर संवेदना

शब्दों में भर संवेदना

मैं तुम्हारी पीड़ा तक पहुँची हूँ,

संदर्भों, साक्ष्यों और स्मृतियों के सहारे,
जहाँ इतिहास मौन था,

और साहित्य ने बोलना सीखा।

अन्याय की हर दीवार पर,

तुम्हारे जीवन की दरारें हैं,
जिनसे झाँकता है,

सदियों का दबा हुआ सच।

तुम्हारी जिजीविषा ने सिखाया,

संघर्ष केवल प्रतिरोध नहीं,
एक सतत रचना है,

मनुष्य बने रहने की

तुम्हारी आत्मकथा,

व्यक्ति की कथा नहीं,
समाज की आत्मस्वीकृति है,

जहाँ अपमान दर्ज होता है
और चेतना जन्म लेती है।

तुम साहस की ज्योति जलाते हो,

उस अँधेरे में,
जिसे व्यवस्था ने सामान्य कहा,
और मनुष्यता की धरा पर,

बराबरी का अर्थ लिखते हो
अपने लहू से, अपने शब्दों से।

तुम्हारे अनुभव,

हाशिये की भाषा नहीं,
जन से पूछा गया प्रश्न हैं,

कि साहित्य किसका है?
इतिहास किसका है?

और मनुष्य कौन है?

इसलिए यह शोध! केवल अध्ययन नहीं,
एक उत्तरदायित्व है,

तुम्हारे शब्दों को
संवेदना, सम्मान और ईमानदारी के साथ
पुनः पढ़ने का।

यह कविता !

उन्हीं आवाज़ों को समर्पित है
जिन्होंने,

ख़ामोशी तोड़कर शब्दों को हथियार बनाया
और आत्मकथा को
सामाजिक हस्तक्षेप बना दिया।

जय हिन्द

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