हिंदी साहित्य में कृष्ण भक्ति काव्य धारा

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा किया गया काल विभाजन:

रचना: ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ (1929 ई०)

1. आदिकाल (वीरगाथा काल)  1050 विं सं 1375 विं सं

2. पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) 1375 विं सं 1700 विं सं

3. उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) 1700 विं सं 1900 विं सं

4. आधुनिक काल (गद्य काल) 1900 विं सं अब तक

भक्तिकाल का विकास दो शाखाओं में हुआ-

1. निर्गुण भक्ति शाखा 2. सगुण भक्ति शाखा

सगुण भक्ति दो भागों में विभाजित हुई-  

  1. रामभक्ति  2. कृष्णभक्ति

निर्गुण भक्ति दो भागों में विभाजित हुई-

  1. संत मत (ज्ञानाश्रयी 2. सूफी मत (प्रेमाश्रयी)

हिंदी साहित्य के काल विभाजन में दूसरे काल को भक्ति काल की संज्ञा दी गई है। भक्ति काल का समय संवत 1375 से लेकर सवत 1700 तक निर्धारित किया गया है। भक्ति काल में भक्ति भावना की प्रधानता होने के कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस काल को भक्ति काल का नाम दिया। इस काल को ‘हिंदी साहित्य का सवर्ण युग’ भी कहा जाता है।

कृष्ण काव्यधारा अत्यंत प्राचीन है। हिंदी साहित्य के उद्भव से पूर्व संस्कृत और अपभ्रंश साहित्य में कृष्ण-भक्ति से संबंधित अनेक रचनाएँ मिलती हैं। श्रीकृष्ण को विष्णु के अनेक अवतारों में से एक अवतार माना गया है। श्रीकृष्ण का उल्लेख वैदिक साहित्य में भी मिलता है। ऋग्वेद में कृष्ण का उल्लेख ऋषि अथवा रचयिता के रूप में प्राप्त होता है। ब्राह्मण ग्रंथों में कृष्ण आंगिरस द्वारा अपने शिष्य को दिए गए उपदेश और भगवद्गीता में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश में अद्भुत समानता दिखाई देती है। वैदिक साहित्य में कृष्ण को न तो अवतार माना गया है और न ही देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। वहाँ कृष्ण आंगिरस के शिष्य तथा देवकी के पुत्र के रूप में उल्लिखित हैं। इस प्रकार, कृष्ण की अवधारणा का विकास वैदिक साहित्य से लेकर पुराणों और भक्ति साहित्य तक क्रमशः विभिन्न रूपों में हुआ है।

वैदिक परंपरा से ही भागवत धर्म का उदय हुआ। इसी धर्म का विकसित रूप वैष्णव धर्म माना जाता है। महाभारत से पूर्व के साहित्य में कृष्ण का उल्लेख मुख्यतः एक मानव-चरित्र के रूप में मिलता है, जबकि महाभारत में श्रीकृष्ण को अवतार के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। महाभारत में कृष्ण देवत्व की महिमा से मंडित हैं और उन्हें नारायण के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। कृष्ण-काव्यों में उनके गोपाल रूप का विस्तृत वर्णन मिलता है। भागवत पुराण में श्रीकृष्ण के चरित का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। लौकिक साहित्य में भी श्रीकृष्ण का उल्लेख व्याकरण-ग्रंथों, चंपू-काव्यों और नाटकों में मिलने लगता है। भास, अश्वघोष और कालिदास की रचनाओं में कृष्ण का उल्लेख मिलता है। महाकवि माघ के ‘शिशुपाल वध’ में श्रीकृष्ण का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। गीतगोविंद जयदेव की प्रसिद्ध रचना है। कृष्ण-भक्ति काव्यधारा में गीतगोविंद का महत्वपूर्ण स्थान है। यह भक्ति और शृंगार के सुंदर समन्वय से निर्मित काव्य है। इसमें मुख्यतः तीन पात्र हैं। कृष्ण, राधा और राधा की सखी।

अपभ्रंश साहित्य की महत्वपूर्ण रचना स्वयंभू कृत ‘अरिष्टनेमि चरिउ’ में भी श्रीकृष्ण का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसी प्रकार आचार्य गुणभद्र द्वारा रचित ‘उत्तरपुराण’ भी कृष्ण-भक्ति काव्यधारा से संबंधित महत्वपूर्ण ग्रंथ है। हेमचंद्र के अनेक दोहों में श्रीकृष्ण का स्तुतिपरक चित्रण मिलता है। उनके कुछ दोहों में कृष्ण के लौकिक रूप का भी वर्णन हुआ है। इनमें श्रीकृष्ण द्वारा राधा के पयोधरों (जल या दूध को धारण करने वाला) को देखकर नृत्य करने का अत्यंत लौकिक एवं शृंगारपरक चित्रण मिलता है।

आदिकाल और कृष्णभक्ति काव्यधारा– आदिकाल में भी कृष्ण-भक्ति काव्य की एक क्षीण-सी परंपरा दिखाई देती है। चंदबरदाई के ‘पृथ्वीराज रासो’ में विष्णु के दशावतारों का वर्णन मिलता है। इसमें अन्य अवतारों का वर्णन अपेक्षाकृत संक्षिप्त है, जबकि कृष्णावतार का अपेक्षाकृत विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।

विद्यापति अपभ्रंश काव्य-परंपरा के अंतिम तथा लोकभाषा के आरंभिक महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं। उन्होंने कृष्ण-काव्य की रचना लोकभाषा में करने की सशक्त परंपरा को आगे बढ़ाया। विद्यापति अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे, किंतु राधा-कृष्ण की संयोग-लीला के भावपूर्ण चित्रण के लिए उन्होंने लोकभाषा मैथिली का चयन किया। उनकी पदावली में राधा-कृष्ण के प्रेम, विरह, मिलन और शृंगार का अत्यंत मार्मिक एवं भावपूर्ण चित्रण मिलता है। पदावली के मंगलाचरण में राधा-कृष्ण की वंदना करते हुए उन्होंने लिखा है-

नन्दक नन्दन कदम्ब तरु तर, धिरे-धिरे मुरली बजाव

समय संकेत निकेतन बइसल, बेरि-बेरि बोली पठाव

भक्तिकाल और कृष्ण भक्ति काव्यधारा

विद्यापति के बाद भक्तिकाल में वल्लभ संप्रदाय के साहित्य के अंतर्गत कृष्ण-भक्ति काव्य को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ। वल्लभ संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य वल्लभाचार्य थे। उन्होंने शंकराचार्य के मायावाद का खंडन करते हुए ब्रह्म के साकार एवं अवतारी स्वरूप के प्रति जनमानस में श्रद्धा और विश्वास उत्पन्न करने का कार्य किया। ब्रज क्षेत्र में कृष्ण-भक्ति का व्यापक प्रचार-प्रसार करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

वल्लभाचार्य और उनके पुत्र विट्ठलनाथ ने शुद्धाद्वैत दर्शन तथा भक्ति-मार्ग से संबंधित अनेक ग्रंथों की रचना की। इसी संप्रदाय से संबंधित आठ प्रमुख कृष्ण-भक्त कवि हुए- सूरदास, परमानंददास, कृष्णदास, नंददास, कुंभनदास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविंदस्वामी। इन आठों कवियों को सामूहिक रूप से ‘अष्टछाप’ के नाम से जाना जाता है।

अष्टछाप के कवियों ने श्रीकृष्ण के चरित और लीलाओं को विभिन्न भक्ति-भावों के माध्यम से अभिव्यक्त किया। भक्ति के ये प्रमुख रूप—शांत, दास्य, वात्सल्य, सख्य और मधुर—‘पंचभावोपासना’ के नाम से जाने जाते हैं। इन कवियों की रचनाओं में श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, समर्पण, वात्सल्य, सख्य-भाव और माधुर्य-भाव की विविध अभिव्यक्तियाँ देखने को मिलती हैं। अष्टछाप के कवियों में सूरदास का स्थान सर्वोपरि है। उन्होंने श्रीकृष्ण के बाल-चरित, वात्सल्य-भाव, राधा-कृष्ण प्रेम तथा विरह-मिलन का अत्यंत मार्मिक और प्रभावशाली चित्रण किया है।

सूरदास की भक्ति मुख्यतः सख्य-भाव से संबद्ध मानी जाती है। सूरदास के श्रीकृष्ण अपने भक्तों की पुकार सुनते ही उनकी सहायता के लिए दौड़े चले आते हैं। उनके कृष्ण अपने भक्तों के प्रति अत्यंत आत्मीय, करुणाशील और समर्पित हैं। वे भक्तों के कष्ट को अपना कष्ट समझते हैं और उनकी पीड़ा का निवारण करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। सूरदास के कृष्ण की भक्तवत्सलता को इन पंक्तियों में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुई है—

हम भक्तन के भक्त हमारे।
भक्तन काज लाज हिय धरिकै, पाय पयोद धाऊँ।
तहँ-जहँ पीर पड़ै भक्तन पै, तहँ-तहँ जाइ छुड़ाऊँ॥”

इन पंक्तियों में श्रीकृष्ण और भक्त के बीच स्थापित आत्मीय संबंध का अत्यंत मार्मिक चित्रण मिलता है। यहाँ ईश्वर केवल आराध्य या सर्वशक्तिमान नहीं हैं, बल्कि वे अपने भक्तों के सुख-दुःख में सहभागी होने वाले सखा और संरक्षक के रूप में हैं। सूरदास की भक्ति की यही आत्मीयता उनके कृष्ण-काव्य को विशिष्ट और प्रभावशाली बनाती है।

सूरदास द्वारा रचित बहुचर्चित कृष्ण-भक्ति काव्य सूरसागर है। इसमें भक्ति और शृंगार की त्रिवेणी प्रवाहित होती दिखाई देती है। सूरदास ने बालक श्रीकृष्ण के रूप, सौंदर्य, चपलता और बाल-सुलभ क्रियाओं का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया है। उनके काव्य में बालकृष्ण का रूप लौकिक होते हुए भी अलौकिक एवं दिव्य प्रतीत होता है। श्रीकृष्ण के बालरूप की ऐसी मनोहारी छवि देखकर देवताओं का मन भी तृप्त नहीं होता। सूरदास लिखते हैं—

शोभा कहत कहीं नहिं आवै।
अचवत अति आतुर लोचन-पुट, मन न तृप्ति को पावै॥”

माता यशोदा बालक श्रीकृष्ण को चलना सिखाती हैं। बालकृष्ण अभी ठीक प्रकार से चलना नहीं सीख पाए हैं। वे धरती पर अपने नन्हे-नन्हे पैर रखते हुए डगमगाते हैं और गिरते-संभलते आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। सूरदास ने इस दृश्य को अत्यंत स्वाभाविक और वात्सल्यपूर्ण ढंग से चित्रित किया है—

सिखवत चलन जसुमति मैया।
अरबराइ करि पानि गहावति, डगमगाइ धरति धरै पैयाँ॥”

इन पंक्तियों में बालकृष्ण की बाल-सुलभ चेष्टाओं के साथ-साथ माता यशोदा के वात्सल्य का भी अत्यंत सुंदर चित्रण हुआ है। कृष्ण के डगमगाते कदमों को देखकर यशोदा का स्नेह और ममता सहज ही अभिव्यक्त हो उठती है। यही वात्सल्य-भाव सूरसागर के कृष्ण-काव्य की प्रमुख विशेषताओं में से एक है।

अपने प्रतिबिंब को पकड़ने का प्रयास करना प्रत्येक बालक की स्वाभाविक बाल-सुलभ चेष्टा है। सूरदास ने बालकृष्ण की इसी सहज प्रवृत्ति का अत्यंत मनोहारी चित्रण किया है। नंद के मणि-जड़ित आँगन में बालक श्रीकृष्ण अपने प्रतिबिंब को देखकर उसे पकड़ने के लिए उसके पीछे दौड़ रहे हैं। इस दृश्य में बालकृष्ण की चंचलता, कौतूहल और निष्कपट बाल-मन का अत्यंत सुंदर चित्र उभरकर सामने आता है। सूरदास लिखते हैं—

किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।
मनि-मय कनक नंद के आँगन, बिंब पकरिबे धावत॥

कबहुँ निरखि हरि आपु छाहँ कौं, कर सौं पकरन चाहत ।
किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत ॥

इन पंक्तियों में सूरदास ने बालकृष्ण की बाल-सुलभ चेष्टा को इतनी स्वाभाविकता और जीवंतता के साथ प्रस्तुत किया है कि पाठक के सामने नंद के मणि-जड़ित आँगन में घुटनों के बल चलते और अपने ही प्रतिबिंब को पकड़ने के लिए दौड़ते बालकृष्ण का मनोहारी दृश्य साकार हो उठता है। बालकृष्ण की यह चपलता उनके बाल-स्वभाव की सहजता और वात्सल्य-रस की मनोरम अभिव्यक्ति है।

सूरदास ने बालक श्रीकृष्ण के विविध बाल-भावों और बाल-लीलाओं की अत्यंत सुंदर एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति की है। उनके काव्य में बाल-कृष्ण कभी अपनी नन्हीं-नन्हीं चेष्टाओं से सबका मन मोह लेते हैं, तो कभी अपनी भोली-भाली चतुराई से ऐसी बातें करते हैं कि सुनने वाला उनके बाल-सुलभ तर्क पर मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकता।

कभी वे अपने घर और पराए घर का भेद भूलकर गोपियों के घर में मक्खन चुराते हुए पकड़े जाते हैं और अपनी चतुराई से सफाई देते हैं—

मैं जान्यौं यह घर अपनो है, या धोखे से आयो।
देखत ही गोरस में चींटी, काढ़न को कर नायो॥”

इन पंक्तियों में बालकृष्ण की निश्छल शरारत, भोली चतुराई और बाल-मनोविज्ञान का अत्यंत मनोहारी चित्रण हुआ है। चोरी करते हुए पकड़े जाने पर भी कृष्ण जिस सहजता से अपना पक्ष प्रस्तुत करते हैं, उसमें बाल-मन की स्वाभाविक कल्पनाशीलता और तर्कशीलता दोनों दिखाई देती हैं। सूरदास ने बालकृष्ण को किसी अलौकिक देवता के रूप में नहीं, बल्कि एक सामान्य चंचल, नटखट और मनमोहक बालक के रूप में चित्रित किया है। यही उनकी बाल-लीलाओं को अत्यंत जीवंत और हृदयग्राही बनाता है।

कृष्ण की वर्षगाँठ के प्रसंग में भी सूरदास ने ब्रज के उल्लासपूर्ण वातावरण और माता यशोदा के वात्सल्य को अत्यंत सुंदरता से उकेरा है। कृष्ण की वर्षगाँठ पर माता यशोदा प्रसन्न होकर सखियों को आमंत्रित करती हैं, मंगलगान करवाती हैं और आँगन को चंदन तथा मोतियों से सजवाकर उत्सव की तैयारी करती हैं—

अरी मोरे लालन की आज बरसगाँठी,
सबै सखिन को बुलाइ मंगलगान करावौ।

चंदन आँगन लिपाई, मोतियन चौक पुराई,
उमगि आँगन आनंद सौं तूर बजावौ॥”

इस प्रसंग में केवल बालकृष्ण के जन्मदिन का उत्सव नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से ब्रज की सामुदायिक संस्कृति, लोकाचार और मातृ-वात्सल्य का भी सुंदर चित्र उभरता है। यशोदा का उल्लास, सखियों का मंगलगान, चंदन से लीपा हुआ आँगन, मोतियों से सजाया गया चौक और आनंद में बजते वाद्य- ये सभी तत्व मिलकर ब्रज के उत्सवधर्मी लोकजीवन को सजीव कर देते हैं।

इस प्रकार सूरदास के बाल-कृष्ण केवल लीला करने वाले ईश्वर नहीं हैं, बल्कि वे माँ की गोद में पलने वाले, शरारत करने वाले, रूठने-मनाने वाले और अपने सहज बाल-व्यवहार से पूरे ब्रज को आनंदित करने वाले बालक हैं। सूरदास की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उन्होंने कृष्ण के दिव्य व्यक्तित्व में बाल-सुलभ सहजता का ऐसा समन्वय किया है, जिसमें वात्सल्य, हास्य, चंचलता, निश्छलता और लोकजीवन सभी एक साथ अभिव्यक्त होते हैं।

आधुनिक काल में कृष्णभक्ति काव्यधारा

हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में भी कृष्णभक्ति काव्यधारा की सशक्त और समृद्ध परंपरा निरंतर विकसित होती रही।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की अनेक रचनाओं में कृष्ण का उल्लेख मिलता है। उन्होंने कृष्ण के संबंध में प्राचीन भक्ति-परंपरा और आधुनिक दृष्टि का सुंदर समन्वय किया।

बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ ने भ्रमरगीत की रचना की। इसमें कृष्ण के प्रति प्रेम, विरह तथा दैन्य-भाव की मार्मिक अभिव्यक्ति मिलती है।

अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने भी कृष्ण-चरित से संबंधित अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाएँ की हैं। प्रियप्रवास, कृष्ण-शतक, प्रेमाम्बुप्रवाह, प्रद्युम्न-विजय और रुक्मिणी-परिणय उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। विशेष रूप से प्रियप्रवास में कृष्ण-कथा को आधुनिक संवेदना और मानवीय दृष्टि के साथ प्रस्तुत किया गया है। हरिऔध ने कृष्ण के चरित्र को केवल धार्मिक आख्यान तक सीमित न रखकर उसे व्यापक मानवीय और सांस्कृतिक संदर्भ प्रदान किया।

जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ का उद्धव-शतक कृष्णभक्ति काव्य-परंपरा की उल्लेखनीय कृति है। यह एक सुंदर दूतकाव्य है, जिसमें कृष्ण-विरह, प्रेम और भक्ति की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। उद्धव और गोपियों के संवाद के माध्यम से कवि ने ज्ञान और प्रेम, तर्क और भक्ति के बीच के अंतर को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

इस प्रकार हिंदी साहित्य में कृष्णभक्ति काव्यधारा किसी एक काल, कवि या साहित्यिक प्रवृत्ति तक सीमित नहीं रही, बल्कि आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक निरंतर प्रवाहित होती रही है। युग परिवर्तन के साथ कृष्ण के स्वरूप, उनकी अनुभूति और उनकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति में परिवर्तन अवश्य आया, किंतु कृष्ण के प्रति प्रेम, भक्ति, सौंदर्य और मानवीय संवेदना की मूल चेतना अक्षुण्ण रही। भक्तिकाल में जहाँ कृष्ण मुख्यतः आराध्य और लीला-पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित हुए, वहीं आधुनिक काल में वे प्रेम, करुणा, मानवता, सौंदर्य और सांस्कृतिक चेतना के व्यापक प्रतीक के रूप में सामने आए।

अतः यह कहना उचित होगा कि कृष्णभक्ति काव्यधारा हिंदी साहित्य की एक ऐसी जीवंत परंपरा है, जिसने समय के साथ अपना रूप बदला, किंतु अपनी मूल संवेदना को सुरक्षित रखते हुए प्रत्येक युग के मनुष्य के हृदय से अपना संबंध बनाए रखा।

जय हिंद

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