एक ख़ामोशी ही काफ़ी है

जब तक हम साथ हैं,
तब तक सब कुछ सही है
थोड़ी हँसी, थोड़ी नाराज़गी,
कुछ शिकवे, कुछ शिकायतें,
कुछ अनकही-सी बातें…
इन सबके बीच
रिश्ता अभी ज़िंदा है।

जब तक हम लड़ते हैं,
एक-दूसरे से उलझते हैं,
अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं,
तब तक समझो
हम एक-दूसरे के लिए
महत्त्वपूर्ण हैं।

जब तक गुस्सा है,
तब तक परवाह है,
जब तक शिकायत है,
तब तक उम्मीद है,
जब तक रूठना है,
तब तक मनाने वाला भी है,
और जब तक आँसू हैं,
तब तक संवेदनाएँ बाकी हैं।

इसलिए
अपने साथी के गुस्से से मत डरना,
उसकी नाराज़गी से मत घबराना
डरना ही है
तो उसकी ख़ामोशी से डरना।

क्योंकि गुस्सा, कुछ कहता है,
नाराज़गी, कुछ चाहती है,

शिकायत, कुछ बदलना चाहती है
लेकिन ख़ामोशी…

ख़ामोशी तो, धीरे-धीरे
रिश्ते से उम्मीद, छीन लेती है।

जिस दिन
हम एक-दूसरे से
कहना-सुनना बंद कर देंगे,
जिस दिन
एक-दूसरे की बात
सुनने की इच्छा नहीं रहेगी,
जिस दिन
शिकायत करने का भी
मन नहीं करेगा
उस दिन समझ लेना,
कुछ भीतर से
टूट चुका है।

रिश्ते
एक दिन में नहीं मरते,
वे धीरे-धीरे
ख़ामोशी में बदलते हैं।

पहले बातें कम होती हैं,
फिर सवाल कम होते हैं,
फिर शिकायतें कम होती हैं,
फिर इंतज़ार कम होता है
और एक दिन
दो लोग साथ रहते हुए भी
एक-दूसरे से
बहुत दूर हो जाते हैं।

याद रखना
दूरी हमेशा मीलों में नहीं होती,
कभी-कभी
एक ही कमरे में बैठकर भी
दो लोग सदियों से दूर हो जाते हैं।

इसलिए
जब तक हम साथ हैं,
एक-दूसरे को सुनते रहे।

कभी तुम झुक जाना,
कभी मैं मान जाऊँ,
कभी तुम रूठ जाना,
कभी मैं मना लूँ
मगर संवाद का
यह रिश्ता मत टूटने देना।

हर बात का समाधान
तुरंत ज़रूरी नहीं,
लेकिन हर बात को
कहना ज़रूरी है।

क्योंकि
रिश्ते तर्क से नहीं,
संवाद से बचते हैं;
रिश्ते जीतने से नहीं,
एक-दूसरे को समझने से बचते हैं।

और प्रेम…प्रेम केवल
हाथ थामकर चलने का नाम नहीं,
प्रेम वह है
जहाँ हाथ छूट जाने के बाद भी
दिल कहे
“तुम वापस आ जाओ…”

इसलिए
बस इतनी-सी कोशिश करना
वह दिन कभी न आए
जब एक-दूसरे के सामने होकर भी
एक-दूसरे से दूर हो जाएँ।

वह दिन कभी न आए
जब आँखों में आँसू हों
और पूछने वाला कोई न हो।

वह दिन कभी न आए
जब दिल में बहुत कुछ हो
और कहने को
कुछ भी न बचे।

क्योंकि
शरीर से पास होना
सिर्फ़ साथ होना है,
मन से पास होना
सच्चा साथ है।

तो…

जब तक हम साथ हैं,
एक-दूसरे से कहते रहना,
रूठते रहना, मनाते रहना,
कभी हँसना, कभी रो लेना,
कभी बहस कर लेना-
पर…चुप मत होना।

क्योंकि
रिश्ते गुस्से से नहीं टूटते,
रिश्ते शिकायतों से नहीं टूटते
रिश्ते उस दिन टूटते हैं
जिस दिन
दो दिलों के बीच
बात करने की
आख़िरी वजह भी
ख़त्म हो जाती है।

जब तक साथ हैं,
एक-दूसरे को थामे रखना
क्योंकि ज़िंदगी बहुत छोटी है,
और अपनों से दूर जाने के लिए
एक ख़ामोशी ही काफ़ी है।

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