
यह घटना लद्दाख के मिनिमार्ग चेक पोस्ट पर पर्यटकों और सुरक्षा कर्मियों के बीच हुई तीखी बहस को लेकर है। वीडियो के वायरल होने के बाद मामला सोशल मीडिया पर चर्चा में है। करीब पाँच घंटे की देरी से यात्रियों में नाराजगी बढ़ी। ट्रैफिक नियंत्रण और सुरक्षा जाँच को लेकर पर्यटकों में असंतोष दिखा।
वीडियो में एक महिला पर्यटक सुरक्षा कर्मियों से तीखी बहस करती नजर आती है। महिला ने सुरक्षा पाबंदियों और लंबे इंतजार पर सवाल उठाए। उसने बहस के दौरान “हम Gen Z हैं।” कहते हुए अपनी नाराजगी जताई। इस घटना ने संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा नियमों, पर्यटकों के व्यवहार और ट्रैफिक प्रबंधन को लेकर बहस छेड़ दी है। हम gen Z हैं। हमारे TEX से फौजियों की सैलरी आती है, उसने सेना के जवानों के साथ ये कैसा सलूक किया?
आज के दौर में ‘जेन-जी’ शब्द केवल एक पीढ़ी की पहचान भर नहीं रह गया है, कई बार यह अपने व्यवहार को सही ठहराने का एक सुविधाजनक बहाना भी बनता दिखाई देता जा रहा है। कुछ लोग हर असहमति, हर आक्रामकता और हर अनुशासनहीनता को ‘जेन-जी’ की स्वतंत्र सोच का नाम दे रहे हैं। यह प्रवृत्ति कुछ वैसी ही है, जैसे कभी लोग अपनी हैसियत जताने के लिए बात-बात पर कहा करते थे- “जानते नहीं हो कि मेरा बाप कौन है?” फर्क सिर्फ इतना है कि तब पहचान पिता के नाम से जताई जाती थी और आज पीढ़ी की पहचान Gen Z के नाम से हो रही है।’ दुःख की बात है कि ये अपने आप को Gen Z कहकर परिचय दे रहे हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में महिला पर्यटक सुरक्षाबलों द्वारा लगाए गए बैरिकेड के सामने उनसे बहस करती दिखाई दे रही है। आगे जाने की अनुमति न मिलने पर वह कथित रूप से सड़क पर धरना देने की धमकी भी देती है। वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर व्यापक प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह वीडियो कारगिल के एक चेकपॉइंट का बताया जा रहा है, जहाँ सुरक्षा कारणों से आवाजाही नियंत्रित की जा रही थी। आगे जाने से रोके जाने पर महिला पर्यटक नाराज हो गई और सुरक्षाबलों से बहस करने लगी। इसी दौरान उसने कथित रूप से कहा- “हम जेन-जी हैं, यह बकवास बर्दाश्त नहीं करेंगे।”
‘क्या जेन-जी होना नियमों और मर्यादाओं से ऊपर होने का प्रमाणपत्र है? क्या अपनी बात रखने की स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि हम सुरक्षा में तैनात जवानों से किसी भी लहजे में बात करें? क्या आधुनिकता का अर्थ केवल अधिकारों की मांग करना है, या अपने कर्तव्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों को समझना भी है? जेन-जी को तकनीक, नए विचारों, प्रश्न करने की प्रवृत्ति और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए जाना जाता है। यह निश्चित रूप से सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है। लेकिन स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच एक महीन रेखा होती है। अपनी बात कहना अधिकार है, लेकिन दूसरे के सम्मान को ठेस पहुँचाना अधिकार नहीं। सवाल करना लोकतांत्रिक चेतना है, लेकिन कानून और सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देना आधुनिकता नहीं।
सीमा पर या संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात सुरक्षाबल किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत सुविधा के लिए नहीं, बल्कि हजारों लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। ऐसे में किसी सुरक्षा निर्देश से असहमति हो सकती है, उसका उचित तरीके से विरोध भी किया जा सकता है, लेकिन अपमानजनक भाषा या धमकी किसी भी पीढ़ी की पहचान नहीं हो सकती। ‘जेन-जी’ होने पर गर्व कीजिए, आधुनिक सोच रखिए, सवाल कीजिए, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाइए, लेकिन यह भी याद रखिए कि सभ्यता की पहचान इस बात से नहीं होती कि हम कितनी ऊँची आवाज में अपनी बात कहते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि असहमति के क्षण में भी हम कितना संयम और सम्मान बनाए रखते हैं। पीढ़ी बदलने से संस्कारों की आवश्यकता समाप्त नहीं होती। आधुनिकता हमें अधिक स्वतंत्र बनाए, लेकिन असभ्य नहीं।
उस औरत को हम Gen-Z की नहीं मानते, जिसने हमारी फ़ौज को गालियाँ दीं और हमारे सैनिकों के बारे में आपत्तिजनक बातें कहीं। तुम लोग शायद नहीं जानते कि हमारे फ़ौजी और उनके परिवार कितनी कठिनाइयों, त्याग और पीड़ा के साथ अपना जीवन जीते हैं। सीमा पर तैनात सैनिक अपने परिवार से दूर रहकर देश की सुरक्षा के लिए दिन-रात अपना कर्तव्य निभाते हैं। वह महिला यह कह रही थी कि फ़ौजियों को हमारे टैक्स के पैसे से तनख्वाह मिलती है। अरे, अपने देश के बारे में थोड़ी जानकारी तो रखो- कौन टैक्स देता है और कौन नहीं, यह जानना भी जरूरी है। फ़ौजी केवल देश की रक्षा ही नहीं करते, वे स्वयं भी टैक्स देते हैं और बिजली-पानी जैसे बिलों का भुगतान भी करते हैं। आम नागरिकों की तरह वे भी अपने निजी जीवन और आर्थिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ वे अपने परिवार और जीवन की परवाह किए बिना देश की सीमाओं पर डटे रहते हैं। इसलिए फ़ौजियों के बारे में बोलने से पहले उनके त्याग, कर्तव्य और संघर्ष को समझना चाहिए। देश की रक्षा करने वाले सैनिकों का अपमान किसी भी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकता।
सिविलियन कई तरीकों से अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं और अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं, लेकिन फ़ौजी के लिए उसका कर्तव्य ही उसकी पहली पहचान है। वह अपने निर्धारित दायित्व से अलग कोई दूसरा काम करके अपनी आमदनी नहीं बढ़ा सकता। यहाँ तक कि उसे कई बार मुफ़्त में एक कप चाय भी कोई नहीं देता। यह बात मैं अपने अनुभव से कह रही हूँ।
मैंने फ़ौजी का जीवन बचपन से देखा है। मैं एक फ़ौजी की पोती, फ़ौजी की बेटी, फ़ौजी की पत्नी और फ़ौजी की माँ भी हूँ। इसलिए फ़ौज और फ़ौजी परिवारों की कठिनाइयों को मैंने केवल सुना नहीं, बल्कि जिया और सहा है। फ़ौजी जीवन में अनुशासन, त्याग, जिम्मेदारी और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। आज की सुविधाभोगी पीढ़ी शायद उन परिस्थितियों की कल्पना भी न कर सके। तुम तथाकथित Gen-Z हो, हड़ताल कर सकते हो, विरोध कर सकते हो और अपने मन की बात कह सकते हो। यह तुम्हारा अधिकार है। लेकिन अधिकारों के साथ जिम्मेदारियाँ भी आनी चाहिए। किसी को भी देश की रक्षा करने वाले सैनिकों का अपमान करने या उनके त्याग को छोटा बताने का अधिकार नहीं है।
हमने फ़ौज में यह भी देखा है कि यदि किसी फ़ौजी की पत्नी या बच्चे से कोई गलती होती है, तो कई परिस्थितियों में उसका प्रभाव फ़ौजी की सेवा और अनुशासन पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि फ़ौजी परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने आचरण के प्रति अधिक सजग रहता है। फ़ौजी का जीवन केवल उसका अपना जीवन नहीं होता; उसके साथ उसके पूरे परिवार की जिम्मेदारी और अनुशासन भी जुड़ा होता है।
फ़ौजी होना केवल नौकरी करना नहीं है; यह अपने जीवन, अपने परिवार की सुविधाओं और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं से ऊपर देश के प्रति कर्तव्य को रखना है। इसलिए फ़ौजी के त्याग को समझे बिना उसके बारे में कोई टिप्पणी करने से पहले सौ बार सोचना चाहिए।
जय हिंद