भाषा सागर की तरह हमेशा बहती रहती है। यह रुकना नहीं जानती है। यही भाषा की स्वभाविक प्रकृति और प्रवृति है। भाषा एक सामाजिक शक्ति है, जिसे मनुष्य अपने पूर्वजों से सीखता है और अपने आने वाली पीढ़ियों को देता है। आने वाली पीढ़ी उसका आगे विकाश करती है। भारत एक विशाल देश है। यहाँ के लोग अलग-अलग कालों में अलग–अलग भाषाएँ बोलते और लिखते आ रहे हैं। संस्कृत हमारे देश की सबसे पुरानी भाषा है। जिसका प्रयोग हमारे पुराने ऋषि–मुनियों, विद्वानों, और कविओं ने किया है। संस्कृत को ‘आर्य’ भाषा या ‘देव’ भाषा भी कहते हैं। अनुमान लगाया जाता है कि यह ‘आर्य’ भाषा लगभग 3500 वर्ष पुरानी है। हमारी भाषा हिन्दी इसी ‘आर्य’ भाषा संस्कृत की उतराधिकारणी है। भाषा भावों तथा विचारों की अभिव्यक्ति एवं सम्प्रेषण का सर्वसुलभ और सशक्त साधन है। तात्विकरूप से भाषा ध्वनि प्रतीकों की एक व्यवस्था है, जिसके माध्यम से मानव समूह विचार विनिमय करता है। इन्हीं ध्वनि-प्रतीकों या शब्दों के भाव, भाषा द्वारा मानव समाज में प्रचलित होते हैं।
भाषा में मानव को बाँधने की अपूर्व शक्ति होती है। संस्कृत साहित्य में भाषा की इस शक्ति के संबंध में कहा गया है कि ‘शब्देश्वाश्रीता शक्ति विश्वस्यास्य निबंधिनी’ अथार्त “शब्द शक्ति ही सम्पूर्ण विश्व को एक साथ बांधती है।” हमारे देश की भाषायी स्थिति और उसमे हिन्दी के स्थान को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि आज हिन्दी ही हम भारतीयों के बीच राष्ट्रीय सम्पर्क की भाषा है। हिन्दी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे सिखना और व्यवहार में लाना अन्य भाषाओं की अपेक्षा अधिक सुविधाजनक और आसान है। हिन्दी भारत की सामान्य जनता की भाषा है, देश की एकता की सम्पर्क भाषा है, साधु-संतों की भाषा है। संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, शौरसेनी, मगधी, अवधी, ब्रज, अरबी, फारसी उर्दू आदि की शब्दों को आत्मसात कर हिन्दी भाषा समुच्चय बन गई है। हिन्दी का प्रयोग हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सभी करते है। हिन्दी साहित्य के अध्ययन से यह बात सिद्ध होता है कि सिद्धों, नाथों, संतों तथा अनेक पंथों के आचार्यों ने इसे अपने ज्ञान तथा उपदेश के प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाया था। अमीर खुसरो, मलिक मुहम्मद जायसी, रसखान आदि सूफी संतों तथा कवियों ने भी हिन्दी में काव्य रचनाएँ की थी। हिन्दी साहित्य में जहाँ उक्त विभूतियों का आपना महत्वपूर्ण स्थान है, वहाँ आधुनिक काल में भी अनेक साहित्यकार हैं जिन्होंने जाति और धर्म की दीवार को तोड़कर साहित्य निर्माण के विविध क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। ऐसे महापुरुषों में सैयद अमीर अली, बंदे अली फत्मी, और नबीबख्श फलक आदि के नाम गर्व के साथ याद किया जा सकता है। ऐसे ही मनीषियों को देखकर भारतेंदु ने यह लिखा था ‘इन मुसलमान कविजन पर, कोटिन हिंदू वारिये।’ हमारे देश की भाषायी स्थिति और उसमें हिन्दी के स्थान को देखकर यह स्पष्ट होता है कि हिन्दी आज भारतीयों के बीच राष्ट्रीय संपर्क की भाषा है।
भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में हिन्दी सारे देश की भाषा है। सच तो यह है कि आज हिन्दी सभी क्षेत्रीय सीमाओं को तोड़ चुकी है। पूरब से लेकर पश्चिम तक देश और विदेशों के सभी दिशाओं में हिन्दी गतिमान है। देश की केन्द्रीय शक्ति ज्यों-ज्यों मजबूत होती जाएगी हिन्दी और भी समृद्ध होगी। हमारी हिन्दी को राजनितिज्ञों से अधिक आम जनता का बल प्राप्त हुआ है। राष्ट्र की अवधारणा में तीन तत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है भाषा, संस्कृति एवं देश की भौगोलिक परिसीमा। भाषा में मानव को बांधने की अपूर्व शक्ति होती है। विचार-विनिमय मानव एकता का सबल सूत्र है। विचारों की एकता राष्ट्र के नागरिकों की सबसे बड़ी एकता होती है।
हिन्दी को भारतीय संविधान के अनुछेद 341(1) के तहद राजभाषा का दर्जा दिया गया है। हिन्दी हजारों वर्षो से हमारी संस्कृति की विरासत एवं साहित्यिक भाषा के साथ-साथ जनता के सम्पर्क भाषा के रूप में प्रचलित रही है। संस्कृत, पालि, प्राकृत आदि अन्य कई बोलियों को इसने अपने में आत्मसात किया है। जॉन बीम्स ने आधुनिक आर्य भाषाओं में हिन्दी को सर्वाधिक महत्व दिया है। उन्होंने हिन्दी के महत्व को प्रतिपादित करते हुए लिखा है कि “हिंदी का भाषाओं में वही स्थान होगा जो प्राचीन काल में संस्कृत का था।” श्री लोकेशचंद्र ने ठीक ही कहाँ है- “हिन्दी संस्कृत की वास्तविक रूप में उतराधिकारणी है।” और आधुनिक युग में भी इसका स्थान सबसे आगे होगा “हिन्दी भाषा ही नहीं, संस्कार भी है।” रूस में जन्मे, अबू इजराइल में बस चुके डा. गेनाडी स्लोपर्स के शब्दों में – ‘हिन्दी में बेहद मिठास है। यह भाषा बेहद भावपूर्ण और शब्दों की धनी है। एक ही शब्द के भीतर कई शब्दों का समावेश हो जाता है जो किसी दूसरी भाषा में नहीं मिलता।’ उदहारण स्वरूप – ‘विश्वविद्यालय’- इसके अन्दर विश्व, विधा और आलय यानी घर भी है। हिन्दी में गंगोत्री और प्रयागराज दोनों एक साथ समाए हुए हैंΙ हिन्दी, हिन्द, और हिंदुस्तान ये तीनों शब्द फारसी के हैं। हिन्दी भाषा का जन्म तो उतर भारत में हुआ लेकिन इसका नामकरण ईरानियों और मुसलमानों ने किया जैसे –‘’बच्चा हमारे घर में जन्म ले और नामकरण हमारे पड़ोसी करें।’ वस्तुतः हिन्दी किसी सम्प्रदाय या धर्म की भाषा नहीं है। इसलिए हिन्दी भाषा पर सब का एक समान अधिकार है। कवि जायसी ने हिन्दी के बारे में लिखा है कि-
“तुर्की, अरबी, हिन्दवी, भाषा तेती आहीΙ
जामे मारग प्रेम का, सबै सराहैं ताहि॥”
हिन्दी एक ऐसी भाषा है जो किसी भी देश के अधिकतर लोगों द्वरा बोली और समझी जाती है। भारत में संवैधानिक रूप से बाइस भाषाओं को मान्यता दी गई है। परन्तु हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है जो सम्पूर्ण देश को जोड़ने का काम करती है। स्वतंत्रता के पहले भी हिन्दी ने ही सभी स्वतंत्रता सेनानियों को अपने साथ जोड़ कर रखा जैसे महात्मागांधी, लालबहादुर शास्त्री, लाला लाजपत रॉय, जवाहर लाल नेहरू आदि। भारतीय संघ के रूप में हिन्दी आज हमारे देश में, उतर में हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्मदा की तलहटी तक और पूर्व में भागलपुर से लेकर पश्चिम में अमृतसर तक खड़ी बोली के रूप में फैली है। सच तो यह है कि आज हिन्दी सभी क्षेत्रीय सीमाओं को तोड़ चुकी है। चाहे पूरब हो या पश्चिम, देश हो या विदेश सभी दिशाओं में यह गतिमान है। संसार की सभी भाषाओं में हिन्दी को तृतीय स्थान प्राप्त है। भारत से बाहर वर्मा, लंका, मॉरीसस, त्रिनिनाद, फ़िजी, मलाया, पूर्वी अफ्रीका आदि देशों में हिन्दी बोलने वालों की संख्या तीन करोड़ से भी अधिक है। एशिया महादेश की सभी भाषाओं में हिन्दी ही एक ऐसी भाषा है, जो देश के बाहर बोली और लिखी जाती है। हिन्दी युग-युग से हमारे देश में विचार-विनिमय का माध्यम रही है। यह केवल उतर भारत की भाषा ही नहीं बल्कि दक्षिण भारत के कई प्राचीन आचार्यो जैसे वल्लभाचार्य, रामानुज, विट्ठल, रामानंद आदि ने भी हिन्दी के माध्यम से ही अपने सिद्धान्तों और मतों का प्रचार-प्रसार किया। हिन्दी भाषी राज्यों के संत कवियों ने भी जैसे- असम के शंकर देव, महाराष्ट्र के नामदेव और ज्ञानेश्वर, गुजरात के नरसी मेहता, बंगाल के चैतन्य महाप्रभु आदि इन सभी कवियों ने भी हिन्दी भाषा को ही अपने धर्म और साहित्य का माध्यम बनाया। अब्राहम ग्रियर्सन ने बिल्कुल ठीक कहा है ‘जिस भाषा की लिपि नहीं है वह बोली है।’ विश्व में लगभग 600 भाषाएँ हैं। सबसे प्रभावशाली भाषा अंग्रेजी के पास भी अपनी लिपि नहीं है। हिन्दी की अपनी एक वैज्ञानिक लिपि है। भाषा केवल भाषा नहीं होती, यह किसी भी समाज का ‘ज्योतिस्तंभ’ होती है, जो समाज और राष्ट्र को नए विचारों से जोड़ती है। विश्वास की सम्भावनाओं को जन्म देती है और संप्रेषित करती है। इस प्रकार हिन्दी आज किसी न किसी रूप में पुरे विश्व में प्रचलित है।
हमारी हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है क्योंकि हम जो बोलते है वही लिखते हैं और वही पढ़ते हैं। उच्चारण अगर सही होगा तो हम सुनकर आसानी से शुद्ध–शुद्ध लिख सकते हैं। इतनी वैज्ञानिकता दुनिया के किसी भी भाषा में नहीं है। हमें अपनी हिन्दी भाषा पर गर्व है। हिन्दी ने अनेक देशी-विदेशी शब्दों को अपनाया है। हिन्दी की पाचन शक्ति बहुत ही पुष्ट है। इस प्रकार हिन्दी ने अपने शब्द भंडार और अपनी अभिव्यक्ति को समृद्ध किया है। राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर जोड़ने का काम करती है अथार्त राष्ट्रभाषा का प्राथमिक कर्तव्य है देश के विभिन्न समुदायों के बीच भावात्मक एकता को स्थापित करना। राष्ट्रभाषा देश की सम्पर्क भाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होती है। फोर्ट विलियम कालेज में हिन्दी विभाग खोलकर अधिकारिओं को हिन्दी सिखाने की व्यवस्था की गई थी। सी.टी. मेटकाफ ने 1806 में अपने शिक्षा गुरु जॉन गिलक्रिस्ट को लिखा था कि ‘भारत के जिस किसी भी भाग में मुझे काम करना पड़ा, कलकता से लेकर कुमाऊँ तक, कुमाऊँ के पहाड़ों से लेकर नर्मदा नदी तक मैंने हिन्दी भाषा का आम व्यहार देखा है जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी है। मैं कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक या जावा से सिन्धु तक इस विश्वास से यात्रा करने की हिम्मत कर सकता हूँ कि मुझे हर जगह ऐसे लोग मिल जाएँगे जो हिन्दुस्तानी बोल लेते होंगे।’ हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मोदी जी ने कहा कि मैं देख रहा हूँ कि आनेवाले समय में भारत की भाषाओं का महत्व बढ़नेवाला है क्योंकि भारत जैसे-जैसे आगे बढ़ेगा, उसकी भाषाओं का महत्व बढ़ेगा। इसमें दो मत नहीं है कि व्यक्तित्व के विकाश में भाषा बहुत बड़ी ताकत है। किसी भी देश में कोई व्यक्ति मिल जाए और वह अपनी भाषा में पहला शब्द बोल दे तो तत्काल ही उससे हमारा जुड़ाव हो जाता है। आज जिस स्तर पर हिन्दी का विस्तार हो रहा है, उसे देखकर विश्वास होता है कि अपनी समरस प्रकृति के कारण हिन्दी पुरे विश्व को एक दिन अपना बना लेगी। हिन्दी की इसी शक्ति को पहचान कर ‘गूगल’ केंद्र सरकार के डिजिटल इंडिया अभियान के अंतर्गत भारतीय भाषाओँ में और अधिक चीजें ऑनलाइन लेने की तैयारी कर रहा है। हमारे भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने भी हिन्दी को देश की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना है।
अतः भारत जैसे विविधता वाले देश में जहाँ के लिए यह कहा जाता है कि-‘चार कोस पर भाषा बदले छः कोस पर पानी’ वहाँ पर सभी को एक सूत्र में बांधना आसान नहीं है, किन्तु सभी भाषाओं का मिश्रित रूप और संतों की वाणी से अलंकृत संवैधानिक भाषा हिन्दी राष्ट्रीय एकता और अखंडता को रखने में सक्षम है क्योंकि हिन्दी भाषा सद्भावना, प्रेम, श्रद्धा, अहिंसा, करुणा एवं मैत्री का प्रतीक है। अत: हम कह सकते हैं कि हिन्दी भारतमाता की भारती है, यह हमारे राष्ट्रीय एकीकरण का मूल मंत्र है।
जय हिन्द