दरकती दीवारों में अब घर नज़र नहीं आता,
रिश्तों में पहले-सा वो असर नज़र नहीं आता।
हर शख़्स के चेहरे पर मुस्कान तो है लेकिन,
आँखों में किसी के अब संवेदना नज़र नहीं आता।
आँगन में कभी गूँजती थीं हँसी की किलकारियाँ,
अब घर में कोई हँसता हुआ नज़र नहीं आता।
दीवार उठी ऐसी कि दिल बाँट दिए उसने,
अब एक ही छत के नीचे अपना नज़र नहीं आता।
कुछ ख़्वाब समय की धूल में ऐसे दफ़न हुए,
टूटे हुए ख़्वाबों का मुक़द्दर नज़र नहीं आता।
बूढ़ी हुई आँखों में प्रतीक्षा की नमी है,
दरवाज़े पर बच्चों का अब आना नज़र नहीं आता।
बुनियाद में रिश्तों की मोहब्बत ही नहीं है,
इसलिए कोई घर मुकम्मल नज़र नहीं आता।
इंसान ने ऊँचाई तो छू ली है बहुत, मगर,
इंसान को इंसान का दुख अब नज़र नहीं आता।
दरकती हुई दीवारें ये कहती हैं सबसे,
पत्थर के मकानों में घर नज़र नहीं आता।