एन. गोपि के साहित्य में व्यक्त वृद्ध जीवन का समाजिक और मानसिक यथार्थ

आचार्य एन. गोपी तेलुगू भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित कविता संग्रह- ‘कालान्नी निद्र पोनीव्वनु’ के लिए इन्हें सन् 2000 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रसिद्ध कवि, साहित्यिक और आलोचक आचार्य एन. गोपि को प्रोफेसर कोठापल्ली जयशंकर पुरस्कार के लिए चुना गया है।

आचार्य एन. गोपी एक प्रसिद्ध लेखक हैं। इन्हें प्रोफेसर ‘जयशंकर’ के नाम से भी जाना जाता है। ये प्रख्यात भारतीय अकादमिक और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। इन्होंने तेलंगाना आन्दोलन में एक विचारक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसका उद्देश्य, एक अलग राज्य स्थापित करना था। 1952 ई. के शुरुआत से ही ये तेलंगाना राज्य के लिए सक्रिय रहे थे।

साहित्यिक योगदान: आचार्य एन. गोपी जी ने अब तक 56 पुस्तकें लिखी हैं। साहित्य के क्षेत्र में इनका योगदान बहुत ही प्रभावशाली रहा है। इन्होंने अब तक 26 कविता संग्रह, 7 निबंधों का संकलन, 5 आलोचना, 4 यात्रा-वृत्तान्त, 3 शोध-ग्रंथ, 1 अनुवाद तथा 4 अन्य ग्रंथ लिखा है। आपकी कविताओं का कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है। यहाँ तक कि जर्मन, फारसी और रुसी भाषाओं में भी इनकी रचनाओं का अनुवाद हुआ है। इन्होंने तेलुगू विश्वविद्यालय में कुलपति के रूप में कार्य किया था। पूर्व में आपने काकतीय विश्वविद्यालय और द्रविड़ विश्वविद्यालय दोनों के प्रभारी कुलपति के रूप में भी कार्य किया है। हाल में आप पोट्टी श्रीरामुलु तेलुगू विश्वविद्यालय (हैदराबाद) के वाइस-चांसलर टर्म को पूरा किया। आप मातृ-संस्था उस्मानिया विश्वविद्यालय (हैदराबाद) में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। आपने तेलुगू-कवि ‘वेमना’ पर शोध ग्रंथ लिखा, जो अत्यंत प्रमाणिक माना जाता है। कवि वेमना ‘कबीरदास’ के समान संत कवि थे। आपके निम्नलिखित कविता संग्रह पुरस्कृत हैं-

तंगेंडु पुलू- पीले फूल (Yellow Flower)

मैलु रायि- मील का पत्थर (Mile Stone)

चित्र दीपालु- रंगीन रोशनियाँ (Coloured Light)

वन्तेना- पुल (The Bridge)

कालान्नी निद्र पोनिव्वनु- मैं समय को सोने नहीं दूँगा (I Will not Let time to sleep

नानीलु- (नन्हें मुक्तक)

चुट्ट (इंडुरी)

एंडा पोडा (Sun Light) तथा

‘गोपि नानीलु’ (गोपि के नन्हें मुक्तक) प्रमुख हैं। 

आपकी लंबी कविता ‘जलगीतम्’ का अनुवाद हिंदी, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती आदि कई भाषाओं में हुआ है।  

प्रारंभिक जीवन: इनका जन्म 25 जून, 1948 ई. को तत्कालीन नलगोंडा जिले के भुवनगिरि में हुआ था। इन्होंने उस्मानिया विश्वविद्यालय से साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त की। इन्हें सन् 2000 में ‘कालान्नी निद्र पोनिव्वनु’ (समय को सोने नहीं दूँगा) कविता-संग्रह के लिए साहित्य अकादमी, नई दिल्ली का पुरस्कार प्राप्त हो चूका है। ‘वृद्धोपनिषद’ डॉ. एन. गोपि की एक काव्य संग्रह है। इस कविता संग्रह का हिंदी अनुवाद आर शांता सुंदरी ने किया है। 

मनुष्य के जीवन में साहित्य का विशेष स्थान है। साहित्य सामाजिक यथार्थ का प्रतिबिंब होता है। साहित्य का सृजन हमेशा जन समुदाय के भावनाओं को ध्यान में रखकर किया जाता रहा है। परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है। प्रत्येक देश और काल में परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता रहा है। इन्होंने साहित्य में समाज के प्रत्येक वर्ग के लोगों को अपना विषय बनाया है। साहित्य के माध्यम से ही समाज में व्याप्त घटनाओं, प्रवृत्तियों, परिस्थितियों आदि को चित्रित किया जाता है। विभिन्न विधाओं में साहित्य सृजन एवं विषय क्षेत्र बढ़ता गया है।

21वीं शदी में वृद्धों की संख्या बढ़ गई है। वैद्यकीय सुविधाएँ एवं आर्थिक संपन्नता के कारण वृद्धों की संख्या और उनकी आयु बढ़ रही है। दूसरी ओर बढ़ते उम्र के साथ उनकी समस्याएँ भी बढ़ रही है। वृद्ध जन समाज और अतीत के लिए अनुभवों के भंडार तथा श्रद्धा के पात्र हैं। समाज में यदि उन्हें उपयुक्त सम्मान मिले और उनके अनुभवों का लाभ उठाया जाए तो वे हमारी प्रगति में काफी मददगार हो सकते हैं। बुजुर्गों से परामर्श लेकर लाभ उठाने वाली युवा पीढ़ी नव निर्माण कर सकती है। इसके विपरीत जो युवा पीढ़ी अपने बड़े बुजुर्गों से परामर्श नहीं लेती है। वे धोखा भी खा सकते हैं। इस तरह की विपरीत कथाएँ रामायण और महाभारत में भी देखने को मिली थी।

जिस देश में रामायण का राम अपनी सौतेली माँ और वृद्ध पिता का मान रखने के लिए चौदह वर्ष के लिए वन चले गये थे। वहीं महाभारत में कौरव बुजुर्गों का कहना नहीं मानकर युद्ध की ओर हो गये और अपना सर्वनाश कर लिए जिसके फलस्वरूप महाभारत जैसा भयंकर विनाशकारी युद्ध हुआ। बुजुर्गों की भवनों उनके अनुभव और सम्मान में हम कह सकते हैं–

“स्वयं को वट वृक्ष बनाकर, हम जमाने को बाँटते रहे

मेरे अपने ही मुझे हर दिन, थोड़ा-थोड़ा काटते रहे।”

इतिहास गवाह है कि प्राचीन समय में हमारे वृद्धों की स्थिति आज के समय से ज्यादा अधिक सम्माननीय और उत्तम थी। परिवार और समाज में उनकी एक अलग पहचान होती थी। चाहे परिवार बड़ा हो या छोटा, डोर वृद्धों के हाथ में हुआ करती थी। परिवार में किसी तरह के भी काम-काज बिना बुजुर्गों के सलाह लिए नहीं किया जाता था। परिवार के लोग अपने घर के बुजुर्गों पर विश्वास करते थे। वे जो भी कहते या करते थे उसमें लोगों को विश्वास था कि इसमें हम सब की भलाई होगी। हमारे देश की संस्कृति में वृद्धों का स्थान परिवार और समाज में सर्वोच्च था। भारतीय समाज में संयुक्त परिवार की प्रणाली बहुत पुराने समय से ही चली आ रही है। संयुक्त परिवार के कारण भारत की कृषि प्रधान व्यवस्था, अर्थव्यवस्था, प्राचीन परम्पराएँ तथा आदर्श आदि पोषित और फलित होती रही है लेकिन समय के साथ हर क्षेत्र में परिवर्तन होता जा रहा है। परिस्थितियाँ बदल रही हैं संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार की संरचना बढ़ गई है और इसके साथ ही बुजुर्गों की असुरक्षा भी बढ़ गई है जिससे उनका सम्मान भी कम हो गया है।

भूमंडलीकरण के कारण समाज में हो रहे बदलाव का असर वृद्धों के जीवन पर भी पड़ रहा है। वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल बना देते है और जब उन बुजुर्गों को सहारे की जरूरत होती है, तब उन्हें सहारा देने वाला उनके बच्चे नहीं होते हैं और उन्हें वृद्धाश्रम में शरण लेनी पड़ती है। ‘वृद्धोंपनिषद्’ की पहली रचना ‘वृद्ध’ कविता में एन. गोपी जी ने लिखा है-

वृद्ध का अर्थ

बूढ़ा नहीं

वृद्धि पाने वाला है

वह वृद्धि

समय की प्रगति में ही नहीं

अनुभव की प्रगति में भी है

उम्र ढलने में ही नहीं

मन के बढ़ने में भी है

शिथिल होने वाला तो शरीर ही है

पर उसने हासिल जो किया

वह कुछ कम नहीं

पेड़ की

सफलता जैसी ही है यह भी।

यह है एक घिषणा सामर्थ्य

है जीवन तत्व को पकड़ लेने की कला।

बुढ़ापे का अर्थ

मृत्यु का सामीप्य ही नहीं

उसमें निहित

जीवन-रहस्य को

देखने का भी है।1 

स्वयं लेखक ने इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है- “मेरा मानना है कि बुढ़ापे का मूल्य बहुत अधिक है। यह इस जीवन की सार को पाने की दशा होती है। मेरी राय में वृद्ध का मतलब होता है, ज्ञान वृद्धि के लिए सहायता करते हुए मार्गदर्शन करना।”2 कवि ने अपनी ‘कृतज्ञता’ कविता में लिखा है-

बूढ़ा

कल के अखबार जैसा नहीं

पढ़कर परे रख दो।

कभी पुराना न पड़े

काव्य जैसा है।

जीवन के लंबे सफ़र में

कभी सुगंध कम न पड़ने वाले चंदन जैसा है।

कमजोर हो सकता है

पर समय के आगे सिर न झुकाने वाली

सूक्ति मुक्तावली जैसा है।

बूढ़ा हमारे घर के लिए

एक वरदान जैसा है।

अनुभवों के धागे से

तीनों कालों में बंधी गाँठ जैसा है।

हो सकता है प्यार शाश्वत न हो

पर स्वयं के लिए ही सही

हमें उसका आदर करना होगा

कल हमारी मंजिल भी वही होगी!

बूढ़े

रद्द किया गया खाता नहीं

हमारी कृतज्ञता की सीमा हैं।3

बुढ़ापे में स्थूल रूप से तीन तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, दैहिक, मानसिक और सामाजिक। इसके अलावा और भी न जाने अन्य कितनी समस्याएँ हैं। कवि ने अपनी ‘बुढ़ापे की प्रवेश’ कविता में इस स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा है-

बदन कांपने लगता है

ठंड से नहीं

पैर लड़खड़ाते हैं

जमीन उबड़-खाबड़ होने से नहीं

आँखें धुंधला जाती है

अँधेरे की वजह से नहीं

खूबसूरती बिगड़ जाती है

देखने वालों की गलती नहीं।

उच्चारण में खनक नहीं होती

भाषा का कोई दोष नहीं

पढ़ना कम हो जाता है

पुस्तकों के कमी के कारण नहीं

आँखों में पानी भर आता है

वर्षा की वजह से नहीं

प्यार उमड़ता है

स्वार्थ के कारण नहीं।

बाहर कोई नहीं है

अन्दर से चोर की तरह घुस आया बुढ़ापा

इससे उलझना नहीं

स्वागत करो दोस्ती का हाथ बढ़ाकर।4

मानव का जीवन काल तीन अवस्थाओं से होकर गुजरता है – शैशवावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था। शैशवावस्था में हम अपने माता-पिता पर निर्भर रहते हैं। यह जीवन का सबसे स्वर्णिम दिन होता है। युवावस्था में तो हम स्वयं के बलबूते पर जीने की कोशिश करते हैं लेकिन तीसरी और अंतिम अवस्था सबसे अधिक कष्टदायक होती है। यह उर्जा हीन और समस्या जनक होती है। कवि एन. गोपि जी ने अपनी एक कविता ‘तीन संसार’ में इस अवस्था की चर्चा करते हुए लिखा है-

बचपन

सपने जैसा सुनहरा

यौवन

सपनों में आने वाली कुंवारी

बुढ़ापा

ठंढे पड़ गए दूध का बरतन

बचपन

राजा की एक कहानी

यौवन

राजकुमारी की विरह व्यथा

बुढ़ापा

कभी न खत्म

होने वाली आत्मकथा

बचपन

पहली धूप की उषस

यौवन

सात रंगों का इंद्रधनुष

बुढ़ापा

अनुभवों का तेजस। 5

यहाँ मुझे ‘तीसरी कसम’ फिल्म की एक गीत याद आ रही है- इस गीत की मैंने बीच की पंक्तियों को लिया है- “लड़कपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया, बुढ़ापा देख कर रोया।” उसी तरह कवि एन. गोपि जी ने भी अपनी कविता ‘ढलती उम्र की गीत’ में लिखा है-

क्षितिज रेखा

हो जाती है जरा-सी धुंधली

साल

झरते जाते हैं पत्तों की तरह।

दोस्त मरते हुए

स्फूर्ति नक्षत्र बनकर रह जाते हैं यादों में।

दृश्यों पर

लगाए जाते है नए फ्रेम।

समझ में आ जाता है

कि दुनिया बदल रही है।

हमारे सवालों के

सही जवाब नहीं मिलते

हमारी बातों में

कुछ बन जाते खोटे सिक्के।

ढलती उम्र बदल देती है

बदन की प्राथमिकताएँ

मिट जाती है जीवित रहने और मर जाने के

बीच की विस्पष्ट रेखाएँ ।

बदलती जाती है

देशों की सीमाएँ

आन्दोलन के लिए

पैदा हो जाती है नयी जरूरतें।

कभी-कभी पता ही नहीं चलता

नीरस सूरज अनमना-सा उदित हुआ

एक समय था

जब परिवर्तन था प्रगति का प्रतीक

आज परिवर्तन का नाम सुनते ही

लगने लगा है डर

किसी को बुलाते हैं

पर सच में मालूम नहीं होता

किसे बुलाएँ

उम्र घेरने लगी

आसमान में बादल छा रहे हैं।6

‘अकेलापन’ कविता में कवि ने बुढ़ापे के अकेलापन को दर्शाते हुए जो कविता लिखी है। वह सत्य प्रतीत होता है-

अकेलेपन का मतलब

यह नहीं कि आसपास कोई न हो

होने पर भी न होने का आभास।

अकेलेपन का मतलब

यादों का

फंसकर भुलक्कड़पन की परतों में

छटपटाना।

पेड़ से गिरते पत्तों को गिरते हुए

गिनती गड़बड़ हो जाना

समय के कोने से

रेंगकर आती एक चींटी का

अचानक गायब हो जाना

नदी पर बने पुल का

चटककर टूट जाना

और नीचे अगाध का मुँह खोलना,

आज का सब कुछ

बीते कल में न दिखाई देना

अकेलापन का मतलब…

हम सभी जानते हैं और ‘वृद्धोंपदेश’ के कुछ शब्द में डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने भी लिखा है ‘महात्मा बुद्ध ने जिन चार दु:खों के साक्षात्कार के बाद अपना गृह त्याग किया था। उनमें से एक ‘जरा’ अर्थात ‘वृद्धावस्था’ भी था। शेष तीन दुःख थे- रोग, शोक और मरण। इस चारों दुखों से मनुष्य बच नहीं सकता है। कवि ने अपनी कविता ‘बेचारा! शरीर’ में लिखा है-

शरीर से बाहर निकलकर

उसी पर गौर कर रह हूँ

अजीब सा लगता है

बेचारा शरीर

बहुत बदल गया है

कितनी तकलीफें सही थी इस देह ने

बिलकुल कुम्हला गई है यह।8

मुझे 1971 के एक फिल्म ‘आनंद’ के एक मशहूर डायलॉग की बहुत याद आती है –

‘बाबू मोशाय’ जिंदगी लंबी नहीं ‘बड़ी’ होनी चाहिए।’

करीब 53 वर्ष पूर्व लिखी गई आनंद फिल्म की इस डायलॉग का अब मायने बहुत बदल गया है। अब तो मानव को जिंदगी लंबी और बड़ी दोनों चाहिए। सच में इस फिल्म की बातें आज प्रासंगिक हो रही है। हमारे देश में बुजुर्गों कि औसतन उम्र अब 70 वर्ष हो गई है और बुजुर्गों की तायदात भी तेजी से बढ़ रही है। भारत सरकार के ‘थिंक टैंक’ और ‘नीति आयोग’ के अनुसार देश में इस समय लगभग साढ़े दस करोड़ से ज्यादा बुजुर्ग हैं जो आनेवाले समय में पच्चीस करोड़ से अधिक हो जाएंगे। इस संबंध में भी कवि ने अपनी एक कविता ‘सत्तर साल’ में लिखी है-

सत्तर साल

मेरे हाथ बिना थके

चले थे बेचारे

वे अद्भुत कल्चर

बस जिंदगी इतनी-सी ही है?

ऐसा नहीं लगता

यादों के खजाने के साथ

अब बन गया हूँ करोड़पति 9

आज लोग स्वार्थी हो गए हैं। जिन वृद्धजनों के पास धन-संपति होता है उसे तो धन-संपति के लालच में घर वाले सेवा करते भी हैं लेकिन जिनके पास धन-संपति नहीं होती है उनकी तो हालत ही मत पूछिए। कहने में दुःख होता है एक कहावत है, “आज हमारी कल तुम्हारी देखो भईया पारा-पारी”। अर्थात आज हम हैं कल हमारे जगह तुम होगे और जो आज बोवोगे वही कल काटोगे लेकिन इस सत्य को लोग नजरंदाज कर देते हैं। परिवर्तन तो प्रकृति का नियम है और जीवन यात्रा के पथ पर सब को इस दौर से गुजरना ही होगा।

जिस तरह डोर से कटी हुई पतंग सहारा ढूंढती है। उसी तरह वृद्ध व्यक्ति को अपने आप में टूटकर सहारे की आकांक्षी होती है। इस स्थिति में उनको जो सहारा देता है वे उसपर अपना सर्वस्व लुटाकर उसका आश्रय स्वीकार कर लेते हैं। जिससे कि वह भी उसके प्रति उसी तरह आभारी बना रहे। जीवन भर कि व्यस्तता बुढ़ापे में आराम और शांति चाहती है। बुजुर्ग की बस एक ही अभिलाषा होती है – भर पेट भोजन और सम्मान। आज का समाज जाने अनजाने में विनाश की ओर बढ़ता जा रहा है। इसका मूल कारण कहीं न कहीं नैतिक पतन भी है। प्रेमचंद जी ने अपनी कहानियों में यह अहसास दिलाते हुए कहा है कि- “बुजुर्ग अपने बच्चों से कई उम्मीद रखते हैं। अतः आज की युवा पीढ़ी को उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने का प्रयास करना चाहिए। माता-पिता का ऋण चुकाया तो नहीं जा सकता है किन्तु उसकी सेवा सुश्रुषा करके ऋण को कुछ कम जरूर किया जा सकता है”। मनुस्मृति में भी इस बात का प्रमाण मिलता है कि- “बुजुर्गों का नित्य आशीर्वाद लेने एवं उनकी सेवा करने से आयु, विद्या, यश और बल इन चारों गुणों की वृद्धि होती है”।10  आज की युवा पीढ़ी को बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए न कि सिर्फ उनके संसाधनों का स्वार्थी बनकर इस्तेमाल करना चाहिए ।

बीज शब्द:

प्रवृत्ति – स्वभाव, आदत, व्यवहार

आकांक्षी – इच्छा, अपेक्षा रखने वाला

बाबू मोशाय – महान व्यक्ति

कुम्हला गई – मुरझा गई

उमड़ना – फैल जाना, छाना

सामर्थ्य – शक्ति, योग्यता

पारा-पारी” – बारी-बारी से

संदर्भ सूची:

1. ‘वृद्धोंउपनिषद्’ – ‘वृद्ध’-(कविता), एन. गोपी, ध्वनि प्रचुरणलु, हैदराबाद (2020), हिंदी अनुवाद आर शांता सुंदरी, पृ. सं. 17

2. ‘वृद्धोंउपनिषद्’ – ‘वृद्ध’-(कविता), एन. गोपी, ध्वनि प्रचुरणलु, हैदराबाद (2020), हिंदी अनुवाद आर शांता सुंदरी, भूमिका से

3. ‘वृद्धोंउपनिषद्’ – ‘कृतज्ञता’-(कविता), एन. गोपी, ध्वनि प्रचुरणलु, हैदराबाद (2020), हिंदी अनुवाद आर शांता सुंदरी, पृ. सं. 19

4. ‘वृद्धोंउपनिषद्’ – ‘बुढ़ापे का प्रवेश’-(कविता), एन. गोपी, ध्वनि प्रचुरणलु, हैदराबाद (2020), हिंदी अनुवाद आर शांता सुंदरी, पृ. सं. 23

5. ‘वृद्धोंउपनिषद्’ – ‘तीन संसार’-(कविता), एन. गोपी, ध्वनि प्रचुरणलु, हैदराबाद (2020), हिंदी अनुवाद आर शांता सुंदरी, पृ. सं. 22

6. ‘वृद्धोंउपनिषद्’ – ‘ढलती उम्र का गीत’-(कविता), एन. गोपी, ध्वनि प्रचुरणलु, हैदराबाद (2020), हिंदी अनुवाद आर शांता सुंदरी, पृ. सं. 25

7. ‘वृद्धोंउपनिषद्’ – ‘अकेलापन’-(कविता), एन. गोपी, ध्वनि प्रचुरणलु, हैदराबाद (2020), हिंदी अनुवाद आर शांता सुंदरी, पृ. सं. 27

8. ‘वृद्धोंउपनिषद्’ – ‘बेचारा शरीर’-(कविता), एन. गोपी, ध्वनि प्रचुरणलु, हैदराबाद (2020), हिंदी अनुवाद आर शांता सुंदरी, पृ. सं. 37

9. ‘वृद्धोंउपनिषद्’ – ‘सत्तर साल’-(कविता), एन. गोपी, ध्वनि प्रचुरणलु, हैदराबाद (2020), हिंदी अनुवाद आर शांता सुंदरी, पृ. सं. 41

10. ‘मनुस्मृति’ के एक श्लोक के अनुसार

11. https://www.thehindu.com (Telangana)

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