काव्यशास्त्र में ‘फैंटेसी’ शब्द यूनानी भाषा के ‘फैंटेसिया’ से बना है, जिसका अर्थ होता है- कोरी कल्पना, तृष्णा, कपोल कल्पना, भ्रम, दिवास्वपन आदि।
फैंटेसी की परिभाषाएँ-
मानविकी कोश के अनुसार – “फैंटेसी स्वप्न चित्र मूलक साहित्य है, जिसमे असंभाव्य संभावनाओं का प्राथमिकता दी जाती है।”
फ्रायड के अनुसार – “काव्य में शब्द बद्ध होने की प्रक्रिया फैंटेसी है।”
हडसन के अनुसार – “मनुष्य की वह क्षमता जो संभाव्य संसार की सर्जना करती है वह फैंटेसी कहलाती है।”
हरडर के अनुसार – “मनुष्य की वह क्षमता जो रचना के लिए सृजन प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त करती है वह फैंटेसी है।”
मुक्तिबोध के अनुसार – “फैंटेसी में मन की निगुढ़ वृतियों का अनुभूत जीवन की समस्याओं का इच्छित जीवन की स्थितयों व इच्छित विश्वासों का प्रक्षेप है।”
मुक्तिबोध के कथन से तीन बातों का बोध होता है:
1. फैंटेसी में मन के निगूढ़ तत्व उद्भासित होते है
2. अनुभूत जीवन समस्याएँ प्रक्षेपित होती है
3. इच्छित जीवन स्थितियाँ अथार्त जैसी जीवन स्थिति की हम कामना करते हैं वे इससे प्रक्षेपित होती है।
फैंटेसी की की विशेषताएँ:
> फैंटेसी कल्पना पर आधारित होती है।
> फैंटेसी बेतरतीब होती है।
> फैंटेसी अवचेतन में घटित होती है।
> फैंटेसीमन की द्वंदों को चित्रित करने की एक साहित्यिक तकनीक है।
> फैंटेसी अवचेतन में घटित होने वाली घटनाओं का बिंब है।
> मुक्तिबोध ने कानायानी को एक फैंटेसी माना है।
> यथार्थ से पलायन, स्वप्नों की दुनियाँ में खो जाना।
> दोष युक्त संसार के प्रति नवीन दृष्टिकोण से विचार करना। (मुक्तिबोध के अनुसार)
महत्वपूर्ण कथन:
डॉ. बच्चन सिंह के अनुसार – “फैंटेसी मनोविज्ञान का शब्द है इसका संबंध स्वप्न और अवचेतन मन से घटित होनेवाली घटनाओं की विघटित और बेतरतीब बिंबावालियों से है। साहित्य या काव्य में यह तकनीक के रूप में प्रयुक्त की जाती है।”
डॉ. बच्चन सिंह के अनुसार – “कामायनी में बिंबावालियों विश्रृंखलित और विघटित नहीं हैं। लज्जा सर्ग के सभी बिंब अच्छी तरह समायोजित और श्रृंखलाबद्ध हैं।”