औरत पैदा नहीं होती,
बनाई जाती है।
रीतियों की कठोर भट्ठी में,
रिवाजों की आँच पर
धीरे-धीरे पकाई जाती है।
बचपन से ही कहना शुरू कर दिया जाता
“धीरे बोलो, कम बोलो,
जोर से मत हँसो, सिर झुकाकर चलो,
बड़े सपने मत देखो।”
उसे सभी सिखाते है
घर-आँगन की जिम्मेदारी,
और भाई के हाथों में
सौंप दी जाती है दुनिया सारी।
बचपन से ही ओढ़ा दिए जाते हैं
उसे मर्यादा के भारी वस्त्र,
उसकी उड़ान नापी जाती है,
उसके कदम तौले जाते हैं।
वह सीखती है-
सब का दुःख अपना मानना,
अपने आँसू चुपचाप पी जाना,
अपने हिस्से का आकाश
दूसरों के नाम कर देना।
फिर भी वही औरत
माँ बनकर सृष्टि सँवारती है,
बेटी बनकर घर महकाती है,
बहन बनकर विश्वास जगाती है,
पत्नी बनकर पीड़ा छिपाती है।
लेकिन कब तक?
जब वह पूछती है-
मेरे सपनों पर पहरा क्यों?
मेरी आवाज़ पर ताला क्यों?
मेरे होने का निर्णय
दूसरे करेंगे, ऐसा क्यों?
मैं मिट्टी नहीं
जिसे मनचाहा आकार दे दो,
मैं कठपुतली नहीं, जिसकी डोर,
अपने हाथ में लेकर नाचाओं ।
मैं भी मानव हूँ,
मेरी भी अपनी पहचान है।
मेरे भीतर भी
सपनों का आसमान है।
औरत पैदा नहीं होती-
उसे बनाया जाता है;
लेकिन अब वह स्वयं
अपने व्यक्तित्व की शिल्पकार बनेगी।
वह अपनी राह स्वयं चुनेगी,
अपने निर्णय स्वयं करेगी।
अब वह परंपराओं की कैदी नहीं,
परिवर्तन की पहली दस्तक बनेगी।
जिस दिन समाज
उसे इंसान की तरह देखेगा,
उस दिन न कोई
औरत बनाई जाएगी,
न कोई औरत टूटेगी
वह जन्म लेगी बस,
अपने पूरे अस्तित्व के साथ।
जय हिन्द