“जब किसी मनुष्य को उसकी जाति के कारण पानी भरने का अधिकार भी न मिले, जब उसके श्रम का सम्मान न हो, जब उसके जीवन का मूल्य उसके जन्म से तय किया जाए- तब यह केवल एक व्यक्ति का दुःख नहीं, बल्कि पूरे समाज की विफलता है। ऐसे समय में साहित्य मौन नहीं रह सकता। और जब साहित्य बोलता है, तो उसकी आवाज़ प्रेमचंद की कलम बन जाती है।”
“साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, उसका मार्गदर्शक भी है।”
मुंशी प्रेमचंद ने अपने कथा-साहित्य में भारतीय समाज की उस पीड़ा को स्वर दिया है, जिसे सदियों तक दबाकर रखा गया था। उन्होंने किसान की करुणा, स्त्री की वेदना, मजदूर की विवशता और सबसे बढ़कर उस दलित समाज की अस्मिता, अपमान और संघर्ष को शब्द दिए, जिसे समाज ने मनुष्य मानने में भी संकोच किया। उनकी कहानियों और उपन्यासों में केवल करुणा का चित्रण नहीं मिलता है, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था पर भी वे प्रश्न चिह्न लगाते हैं, जिसने मनुष्य को जन्म के आधार पर ऊँच-नीच में विभाजित कर दिया।
प्रेमचंद स्वयं दलित समाज से नहीं थे, फिर भी उन्होंने दलित जीवन की करुणा, संघर्ष और सामाजिक अपमान को अत्यंत निकटता से अनुभव किया तथा उसे अपनी कहानियों और उपन्यासों में सशक्त स्वर प्रदान किया। प्रेमचंद दलित जीवन को साहित्य के केंद्र में लाने वाले पहले लेखक थे। छूत-अछूत और दलित समस्या पर जिस गहरी संवेदना से प्रेमचंद ने लिखा है उतना किसी और ने नहीं। प्रेमचंद के सामने यह बात साफ़ थी कि यह समस्या मूलतः हिन्दू समाज की समस्या है।
आधुनिक दलित विमर्श के अनेक विद्वान यह मानते हैं कि प्रेमचंद का दृष्टिकोण मूलतः सहानुभूतिपूर्ण, मानवतावादी और गाँधीवादी था। फिर भी यह निर्विवाद है कि हिंदी साहित्य में दलित जीवन को केंद्र में लाने और उसकी पीड़ा को व्यापक रूप से समाज के सामने रखने का ऐतिहासिक कार्य प्रेमचंद ने ही किया। उनकी रचनाएँ आज भी सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना के लिए प्रेरित करती हैं तथा भारतीय समाज को आत्ममंथन के लिए विवश करती हैं।
यहाँ हमने प्रेमचंद द्वारा लिखित दलित जीवन से संबंधित कुछ कहानियों और उपन्यासों को लिया है।
1. ठाकुर का कुआँ: यह प्रेमचंद की प्रसिद्ध सामाजिक यथार्थवादी कहानी है। प्रेमचंद ने ‘ठाकुर का कुआँ’ कहानी के माध्यम से हमारे समाज में व्याप्त जातिप्रथा की सबसे घृणित परंपरा छुआछूत के कारण तिरस्कार, अपमान और मानवीय अधिकारों से वंचित जीवन जी रहे अछूतों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति को बयान किया है। ‘ठाकुर का कुआँ’ स्वच्छ पानी के लिए तरसते अछूत जीवन की ऐसी कहानी है। जो यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या अछूतों को हमारे समाज में स्वच्छ पानी पीने का भी अधिकार नहीं है।
यह कहानी पानी की समस्या को लेकर है। अछूत पति-पत्नी, जोखू और गंगी पानी की समस्या से जूझ रहे है। ‘जोखू ने जैसे लोटा मुँह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आई। गंगी से बोला- यह कैसा पानी है? मारे बास के पिया नहीं जाता। गला सूखा जा रहा है और तू सड़ा पानी पिलाए देती है! जोखू बहुत दिनों से बीमार है। वह प्यास से बेहाल है। गंगी कल रात जो पानी लायी थी, तब उसमें बास नहीं थी। गंगी उसे पानी पीने से रोक देती है। उसे डर है कहीं जोखू और ज्यादा बीमार न हो जाए। वह ताज़ा पानी भर लाने की बात करती है। लेकिन जोखू उसे मना करता है कि ठाकुर के कुएँ पर कौन चढ़ने देगा। नाहक हाथ पांव तुड़वा आयेगी। इसलिए उसे वह चुपचाप बैठी रहने के लिए कहता है। वह जानता है कि गंगी ठाकुर या साहू के कुएँ पर जाकर पानी नहीं ला सकती है। गंगी जिद करती है कि वह कम से कम मांगकर ही एक लोटा पानी ले आएगी। वह देर तक इंतजार करती है। जब ठाकुर जैसे ही घर के अन्दर चला जाता है। तब वह लपककर कुएँ से पानी लाने चली जाती है। एक घड़ा पानी भी वह खींच लेती है। लेकिन जैसे ही वह पानी का घड़ा जगत पर रखती है वैसे ही ठाकुर का दरवाजा खुलता है। गंगी देखती है कि शेर से भी भयंकर मुँह वाला ठाकुर दरवाजे पर खड़ा है। दशहत के मारे गंगी के हाथ से रस्सी छूट जाती है और घड़ा पानी में गिरने की आवाज सुनाई देती है। गंगी पूरी ताकत से कुंए की जगत से कुद कर भागती हुई घर पहुँचती है। अंततः वह पानी प्राप्त करने में असफल हो जाती है। घर आकर देखती है कि, पति जोखू लोटा मुँह को लगाए वही मैला गंदा पानी पी रहा है।1 यह कहानी जाति प्रथा की जकड़न उसकी अमानुषिकता और अछूतों की दीनहीन स्थिति को उजागर करती है। इस कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने तत्कालीन समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता और सामाजिक अन्याय पर तीखा प्रहार किया है।
2. घासवाली: इस कहानी के मुख्य तीन पात्र है- मुलिया उसका पति महावीर और जमींदार-
चैनसिंह
‘घासवाली’ मुंशी प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध और यथार्थवादी कहानी है। इस कहानी में सामाजिक अपमान, स्त्री के स्वाभिमान और उसके साहस का सुंदर चित्रण मिलता है। इस कहानी की मुख्य पात्र मुलिया है, जो गरीब होने के बावजूद अपनी मर्यादा और आत्मसम्मान की रक्षा करती है।
इस कहानी की मुख्य पात्र मुलिया है, जो एक गरीब दलित (चमार) परिवार की सुंदर, स्वाभिमानी और मेहनती स्त्री है। वह अपने पति महावीर के साथ जीवन-यापन के लिए जंगल से घास काटकर बाजार में बेचती है। गाँव का जमींदार चैनसिंह मुलिया के सौंदर्य पर मोहित हो जाता है। वह अपने सामंती अधिकार और ऊँची जाति के अहंकार के बल पर मुलिया को अपनी वासना का शिकार बनाना चाहता है। एक दिन वह मुलिया का हाथ पकड़कर उससे अनुचित व्यवहार करता है। किंतु मुलिया निर्भीक होकर उसका विरोध करती है और उसे कठोर शब्दों में फटकारती हुई कहती है- “मुझसे दया माँगते हो, इसलिए न कि मैं चमारिन हूँ, नीच जाति की हूँ और नीच जाति की औरत जरा-सी घुड़की-धमकी और जरा सी लालच से तुम्हारी मुट्ठी में आ जायेगी। कितना सस्ता सौदा है। ठाकुर हो न, ऐसा सस्ता सौदा क्यों छोड़ने लगे? जाओ अब मुझे कभी न छेड़ना नहीं तो अच्छा नहीं होगा।” किसी स्त्री का सम्मान उसकी जाति या गरीबी से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और मानवता से होता है।
“मुलिया सिर उठाकर चैनसिंह कि ओर देख कर चुभते हुए स्वर में बोली। तुमसे एक बात कहूँ, बुरा तो न मानोगे? तुम्हारा ब्याह हो गया है या नहीं? चैनसिंह ने दबी जबान से कहा- ब्याह तो हो गया। अगर मेरा पति तुम्हारी औरत से इसी तरह बातें करता, तो तुम्हें कैसा लगता? तुम उसकी गर्दन काटने के लिए तैयार हो जाते कि नहीं? बोलो क्या समझते हो कि महावीर चमार है तो उसकी देह में लहू नहीं है, उसे लज्जा नहीं है उसे मर्यादा का विचार नहीं है?” मुलिया ने उसी गर्व से भरे हुए स्वर में कहा- “जाओ अब मुझे कभी नहीं छेड़ना, नहीं तो अच्छा नहीं होगा”
“घासवाली” कहानी एक दलित स्त्री का स्वाभिमान, सामाजिक समानता और मानवीय मूल्यों की कहानी है। मुलिया का चरित्र भारतीय नारी के साहस, स्वाभिमान और नैतिक शक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। है।2
3. सद्गति: इस कहानी में मुख्य चार पात्र है-दुखी चमार, पत्नी झुरिया बेटी धनिया और पंडित
घासीराम,
‘सद्गति’ मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक मर्मस्पर्शी और हृदयविदारक कहानी है। इस कहानी में भारतीय समाज की छुआछूत, जातिगत भेदभाव और शोषित वर्ग की लाचारी को बेनकाब किया गया है। इस कहानी के मुख्य पात्र दुखी चमार, पंडित घासीराम और झुरिया हैं।
दुखी जात का चमार है। वह अपनी बेटी धनिया के विवाह के लिए साईत-शगुन निकलवाने के लिए गाँव के पंडित घासीराम के पास जाना चाहता है। पंडित घासीराम बिना दक्षिणा लिए मुहूर्त नहीं निकालते है। दुखी को यह सब मालूम था। पंडित दुखी को खाली हाथ देखते ही भगा देते। गरीब दुखी के पास पंडितजी को देने के लिए कुछ था भी नहीं है। इसलिए उसने सोचा पंडितजी के गईया के कुछ घास लेकर चलते है। इसलिए वह सुबह से घास काटने में लगा हुआ था। वह जल्दी से घास लेकर पंडितजी के पास जाना चाहता था कि कही पंडितजी निकल न जाए। इसलिए वह सुबह नाश्ता भी नहीं करता है। उसने सोचा वहाँ से आकर नाश्ता कर लूँगा। दुखी अपनी पत्नी को बोल दिया था कि पंडितजी के आने बाद जो भी सामग्री की जरुरत हो उसे तुम तैयार करके रखना। घासीराम दुखी को देखते ही उसके आने का कारण पूछते है। दुखी आने का कारण बताता है। पंडित जी कहते है कि मेरे पास अभी समय नहीं है। शाम तक समय मिलेगा तो आ जाऊँगा। पंडित जी की बात सुनकर दुखी जिद्द करता है। वह कहता है यह घास कहाँ रख दूँ। इसे गईया के सामने रख दे और जरा झाड़ू लेकर द्वार साफ़ कर दे। यह बैठक भी कई दिनों से लीपी नहीं गई। इसे भी लीप दे। तबतक मैं भोजन कर लूँ। फिर आराम करके चलूँगा। हाँ, यह लकड़ी भी चीर देना। खलिहान में चार खाँची भूसा पड़ा है उसे भी उठाकर भुसौली में रख देना। दुखी सुबह से खाया नहीं था। उसे भी भूख लगी थी। दुखी भूख दबाकर लकड़ी फाड़ने लगा। दुखी तो घास छिलने वाला था उसे लकड़ी चीरने का अभ्यास नहीं था। लकड़ी के गाँठ पर कुल्हारी भरते-मारते उसके हाथ से कुल्हाड़ी छूट पड़ी और वह भी चक्कर खा कर गिर जाता है। भूखा प्यास थका हुआ शरीर जवाब दे दिया।
दुखी की मृत्यु के बाद पंडित और उनकी पत्नी असमंजस में पड़ जाते हैं कि एक दलित का शव उनके घर के सामने पड़ा है। छुआछूत के भय से कोई उसे हाथ लगाने को तैयार नहीं होता। पंडित स्वयं रस्सी से बाँध कर दुखी के शव को घसीटकर गाँव से बाहर ले जाते हैं। वहाँ से लौटकर स्नान तथा शुद्धिकरण करते हैं। दुखी का यही जीवन पर्यंत की भक्ति, सेवा और निष्ठा का पुरस्कार था।
‘सद्गति’ प्रेमचंद की सबसे प्रभावशाली दलित-चेतना प्रधान कहानियों में से है। प्रेमचंद का संदेश स्पष्ट है कि मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं है तथा जाति और छुआछूत पर आधारित समाज कभी न्यायपूर्ण नहीं हो सकता।3
4. कफन: इस कहानी में मुख्य तीन पात्र हैं- घीसू, उसका पुत्र माधव, माधव की पत्नी बुधिया
‘कफ़न’ मुंशी प्रेमचंद की सर्वाधिक चर्चित और यथार्थवादी कहानियों में से है। कहानी में घिसू और माधव दोनों कामचोर पिता-पुत्र है।
घीसू और उसका बेटा माधव झोपड़ी के द्वार पर अलाव के सामने बैठे थे। अंदर माधव की जवान पत्नी बुधिया प्रसव वेदना से पछाड़े खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। बाप-बेटा खेत में से खोदकर लाये हुए आलू को भुनकर खा रहे थे।दोनों में से कोई भी उठकर उसकी सहायता के लिए नहीं जाता क्योंकि उसे डर है कि दूसरा ज़्यादा आलू न खा जाए। पूरी रात बुधिया दर्द से कराहती रहती है और अंत में उसकी मृत्यु हो जाती है।
बुधिया की मृत्यु के बाद गाँव के लोग उसके अंतिम संस्कार के लिए चंदा देते हैं, ताकि उसके लिए कफ़न खरीदा जा सके। बुधिया के मर जाने के बाद कफन का चंदा हाथ में आते ही दोनों बाप-बेटा की नियत बदलने लगती है। कफन की बात पर दोनों एकमत हो जाते हैं। और बातें करते है कि लाश उठाते-उठाते रात हो जायेगी। रात को कफन कौन देखता है? कफन लाश के साथ ही जल जाता है। कफन लिये बिना ही, ये दोनों उस चंदे के पैसे से शराब, पूड़ियों, चटनी आदि स्वादिष्ट भोजन पर खर्च कर देते हैं। अपने तृप्ति से ही वे दोनों बुधिया की सद्गति की कल्पना करते हैं- हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे सुख नहीं मिलेगा। जरूर मिलेगा। भगवान तुम अंतर्यामी हो। उसे बैकुण्ठ ले जाना। अपनी आत्मा की प्रसन्नता पहले जरूरी है, संसार और भगवान की प्रसन्नता की जरूरत है भी तो बाद में। बुधिया बिना कफ़न के ही दफ़ना दी जाती है, जबकि घीसू और माधव नशे में डूबे अपने दुःख और अभाव को भूलने का प्रयास करते हैं।
प्रेमचंद ने इस कहानी के माध्यम से यह दिखाया है कि लगातार शोषण, भूख और निर्धनता मनुष्य को इतना विवश कर देती है कि उसके नैतिक मूल्य और मानवीय संवेदनाएँ भी क्षीण हो जाती हैं। इस प्रकार, ‘कफ़न’ सामाजिक यथार्थ, वर्ग-विषमता और मानवीय त्रासदी का अत्यंत सशक्त दस्तावेज़ है। 4
5. मंदिर: इस कहानी में मुख्य तीन पात्र है– सुखिया विधवा स्त्री, सुखिया का बीमार बेटा और मंदिर का पुजारी
‘मंदिर’ दलित-चेतना प्रधान कहानी है। इस कहानी में प्रेमचंद ने छुआछूत, जातिगत भेदभाव, धार्मिक आडंबर और सामाजिक असमानता का मार्मिक चित्रण किया है। कहानी की मुख्य पात्र सुखिया एक दलित (चमार) विधवा स्त्री है। उसका छोटा पुत्र गंभीर रूप से बीमार पड़ जाता है। अपने पुत्र के स्वस्थ होने की कामना से सुखिया भगवान की पूजा करने और मंदिर में दर्शन करने का निश्चय करती है। वह पूजा की सामग्री लेकर मंदिर पहुँचती है, किंतु मंदिर का पुजारी और वहाँ उपस्थित लोग उसे दलित जाति होने के कारण मंदिर में प्रवेश नहीं करने देते है। वे मानते हैं कि उसके मंदिर में प्रवेश करने से मंदिर अपवित्र हो जाएगा। सुखिया अपने पुत्र के प्राण बचाने के लिए बार-बार विनती करती है, परंतु उसकी करुण पुकार का किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। एक रात वह अपने पुत्र को गोद में लेकर चोरी-छिपे मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास करती है। तभी लोग उसे पकड़ लेते हैं और उसके साथ कठोर व्यवहार करते हैं। इस धक्का-मुक्की और अपमान के बीच उसका बीमार पुत्र दम तोड़ देता है।
अपने पुत्र की मृत्यु से व्यथित सुखिया समाज की अमानवीयता पर प्रश्न उठाती है। वह पूछती है कि यदि भगवान सबके हैं, तो किसी मनुष्य को उनके मंदिर में जाने से क्यों रोका जाता है? उसकी पीड़ा समाज की जातिगत संकीर्णता और धार्मिक पाखंड को उजागर कर देती है। ‘मंदिर’ कहानी के माध्यम से प्रेमचंद ने अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव और धार्मिक रूढ़ियों पर तीखा प्रहार किया है।5
6. दूध का दाम: इस कहानी के मुख्य तीन पात्र हैं– भूंगी- दलित स्त्री, जमींदार- महेशनाथ,
‘दूध का दाम’ प्रेमचंद की महत्वपूर्ण दलित-चेतना प्रधान कहानी है। इस कहानी में उन्होंने जातिगत भेदभाव, सामाजिक विषमता, शोषण और मानवता के दोहरे मापदंड का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।
इस कहानी की मुख्य पात्र भूँगी एक दलित (भंगी) स्त्री है। गाँव के जमींदार महेशनाथ के घर पुत्र का जन्म होता है, लेकिन उसकी पत्नी अपने बच्चे को दूध नहीं पिला पाती है। ऐसे समय में भूँगी अपने नवजात शिशु की उपेक्षा करके जमींदार के पुत्र को अपना दूध पिलाती है और उसे अपने बच्चे की तरह पालने में योगदान देती है।
कुछ समय बाद भूँगी की मृत्यु हो जाती है। उसका अपना पुत्र मंगल अनाथ हो जाता है। वही जमींदार परिवार, जिसके बच्चे को भूँगी ने अपने दूध से जीवन दिया था, मंगल के साथ केवल उसकी दलित जाति के कारण भेदभावपूर्ण व्यवहार करता है। उसे घर के भीतर स्थान नहीं मिलता, जूठा भोजन दिया जाता है और उसे अपमान सहना पड़ता है। वह स्नेह और सम्मान का अधिकारी नहीं बन पाता।
कहानी के अंत में प्रेमचंद यह प्रश्न उठाते हैं कि- जिस स्त्री का दूध ऊँची जाति के बच्चे के लिए पवित्र था, उसी स्त्री का अपना पुत्र समाज के लिए अछूत और तिरस्कृत क्यों है? यही प्रश्न कहानी का सबसे मार्मिक और विचारोत्तेजक पक्ष है।6
प्रेमचंद के दलित-जीवन से संबंधित प्रमुख उपन्यास :
1. रंगभूमि (1925): उर्दू में यह ‘चौगान-ए-हस्ती’ से रचित है।
डॉ. शैलेश जैदी के लिखा है – “रंगभूमि हिंदी का प्रथम उपन्यास है, जिसमें फैलते हुए औद्योगिक जीवन की लपेट में एक जीते-जागते क़स्बे के उजड़ जाने की कथा लिपिबद्ध की गई है।”7
* इस उपन्यास में शासक और अधिकारी वर्ग के अत्याचारों का चित्रण है यह प्रेमचंद का सबसे
महत्वपूर्ण दलित-चेतना प्रधान उपन्यास माना जाता है।
* इसका नायक एक अंधा सूरदास है, जो पूँजिपति वर्ग के शोषण का विरोध करता है
* अंत में सूरदास क्लार्क की गोली से मारा जाता है। किंतु नैतिक रूप से वह विजयी
सिद्ध होता है। उसका संघर्ष समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है।
2. कर्मभूमि (1932):
यह उपन्यास काशी और उसके आसपास के ग्रामीण और शहरी जीवन की पृष्ठभूमि पर आधारित एक राजनीतिक और सामाजिक उपन्यास है।
इस उपन्यास में भी अछूतों के साथ होने वाले सामाजिक भेदभाव का चित्रण मिलता है। इसमें किसान और मजदूर वर्ग की समस्याओं के माध्यम से दलित जीवन की कठिनाइयों को उभारा गया है। इसके अतिरिक्त प्रेमचंद ने मजदूरों के आवास, सामाजिक रूढ़ियों, शिक्षा, किसानों, परिवार तथा स्त्री-समस्याओं पर भी गंभीरता से विचार किया है।
उपन्यास में अछूतों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार प्राप्त नहीं है। मंदिर में होने वाली कथा का आकर्षण उन्हें वहाँ तक तो ले आता है, किंतु जैसे ही वे मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं, उन्हें अपमान और हिंसा का सामना करना पड़ता है। ब्रह्मचारी का कथन तत्कालीन समाज की संकीर्ण मानसिकता को उद्घाटित करता है- “बात क्या है, यहाँ लोग भगवान की कथा सुनने आते हैं कि अपना धर्म भ्रष्ट करने आते हैं? भंगी, चमार जिसे देखो घुसा चला आता है। ठाकुरजी का मंदिर न हुआ, सराय हुई।” इस अमानवीय व्यवहार के कारण निर्दोष अछूतों को मारपीट और अपमान सहना पड़ता है। प्रेमचंद इस प्रसंग के माध्यम से धार्मिक आडंबर और जातिगत भेदभाव पर तीखा प्रहार करते हैं।
अछूतों की दयनीय स्थिति का मार्मिक चित्रण करते हुए शांतिकुमार कहते हैं—
“तुम तन-मन से दूसरों की सेवा करते हो, पर समाज में तुम्हारा कोई स्थान नहीं। तुम समाज की बुनियाद हो, तुम्हारे ऊपर समाज खड़ा है, फिर भी तुम अछूत हो। तुम मंदिरों में नहीं जा सकते।”
उपन्यास में शांतिकुमार और सुखदा सामाजिक परिवर्तन के वाहक के रूप में सामने आते हैं। वे अछूतों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करते हैं तथा मंदिर-प्रवेश आंदोलन का नेतृत्व करते हैं। संघर्ष, त्याग और अनेक लोगों के बलिदान के उपरांत अंततः अछूतों को मंदिर-प्रवेश का अधिकार प्राप्त होता है।गाँव में किसानों और अछूतों दोनों की समस्याओं का प्रतिनिधित्व करती है। गांव में दरिद्रता छाती पीट-पीटकर कर रो रही थी। उनके बच्चे स्कूलों में पढ़ भी नहीं सकते थे। अज्ञान और शिक्षा का साम्राज्य था। अछूतों को चेतना और सुशिक्षा की आवश्यकता थी। अमर उनमें सुशिक्षा का प्रचार करता है और उन्हें लिखना-पढ़ना सीखना है। उनके मन में सम्मान और स्वाभिमान की भावना जाग्रत करता है। 8
इस प्रकार ‘कर्मभूमि’ में प्रेमचंद ने अछूत-समस्या को केवल सामाजिक यथार्थ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसके समाधान के लिए जन-जागरण, संगठन और संघर्ष की आवश्यकता पर भी बल दिया है।
3. गोदान (1936):
मुंशी प्रेमचंद ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ‘गोदान’ में छुआछूत और जातिगत विषमता की समस्या को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।
उपन्यास में पंडित दातादीन अपने ब्राह्मणत्व पर अत्यधिक गर्व करता है, किंतु उसका आचरण उसकी कथनी के विपरीत है। वह होरी जैसे निर्धन किसान को ऊँचे ब्याज पर धन उधार देकर उसका आर्थिक शोषण करता है। दूसरी ओर उसका पुत्र मातादीन, दलित युवती सिलिया चमारिन के साथ अवैध संबंध स्थापित करता है। आर्थिक विवशता के कारण सिलिया उसके शोषण का शिकार बनती है। मातादीन अपनी कामवासना की पूर्ति करता है, किंतु गर्भवती होने के बाद भी उसे सामाजिक सम्मान देने के स्थान पर उससे घर का सारा काम करवाता रहता है।
सिलिया के प्रसंग के माध्यम से प्रेमचंद ने दलित जीवन की पीड़ा और सवर्ण समाज के दोहरे चरित्र को उजागर किया है। वे यह प्रश्न उठाते हैं कि जो व्यक्ति एक दलित स्त्री का शारीरिक शोषण करता है, वह केवल जन्म के आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ ब्राह्मण कैसे कह सकता है? इसी संदर्भ में सिलिया का पिता हरखू जाति-व्यवस्था की विडंबना पर तीखा प्रहार करता है। वह साफ करता है- “सिलिया कन्या की जात है। किसी न किसी के घर तो जाएगी ही। हमारी सारी बिरादरी बनने को तैयार है। इस पर हमें कुछ नहीं कहना है। मगर उसे जो कोई भी रखे, हमारा होकर रहे, तुम हमें ब्राह्मण नहीं बना सकते, मुद्दा है हम तुम्हें चमार बना सकते हैं। हमें ब्राह्मण बना दो हमारी सारी बिरादरी बनने को तैयार है। जब यह समरथ नहीं तो फिर तुम भी चमार बानो, हमारे साथ खाओ-पिओ, हमारे साथ उठो बैठों। हमारी इज्जत लेते हो तो अपना धर्म हमें दो।”9
प्रेमचंद स्वयं छुआछूत और जातिगत भेदभाव के समर्थक नहीं थे। महात्मा गांधी के हृदय-परिवर्तन के सिद्धांत से प्रभावित होकर उन्होंने उपन्यास में मातादीन के चरित्र का परिवर्तन दिखाया है। अंततः मातादीन यह स्वीकार करता है-
“मैं ब्राह्मण नहीं, चमार ही रहना चाहता हूँ। जो अपना धर्म से मुँह मोड़े, वही चमार है।”
इस प्रकार ‘गोदान’ केवल किसान जीवन का महाकाव्य नहीं, बल्कि भारतीय समाज में व्याप्त जातीय विषमता, छुआछूत और दलित अस्मिता के प्रश्नों को गंभीरता से उठाने वाला एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक उपन्यास भी है।
(i) आधुनिक दलित विमर्श में प्रेमचंद
आधुनिक दलित साहित्य ने प्रेमचंद की आलोचना भी की गई है और सम्मान भी। ओमप्रकाश वाल्मीकि, शरणकुमार लिंबाले, कँवल भारती, डॉ. धर्मवीर आदि विद्वानों ने प्रेमचंद की सीमाओं की ओर संकेत करते हुए लिखा है- “दलितों के द्वारा दलितों के जीवन पर लिखा गया साहित्य ही दलित साहित्य।” किसी गैर दलित या सवर्ण द्वारा लिखा गया दलित साहित्य नहीं है। उनकी दृष्टि में वह सहानुभूति या दया का साहित्य है, चेतना का नहीं, चाहे प्रेमचंद का हो या निराला का।10 लेकिन यह भी सत्य है कि हिंदी कथा-साहित्य में दलित जीवन की चर्चा का प्रारंभ प्रेमचंद से ही माना जाता है।
1. प्रेमचंद ने अपने साहित्य कथा में दलितों को दया का पात्र नहीं बनाया है-
प्रेमचंद ने अपने कथा-साहित्य में दलित पात्रों को केवल करुणा या सहानुभूति का विषय नहीं बनाया। उन्होंने उन्हें समाज के सक्रिय, जीवंत और मानवीय पात्रों के रूप में चित्रित किया। उनकी कहानियों में दलितों की पीड़ा का वर्णन अवश्य है, परंतु वह केवल पाठक की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्था को उजागर करने के लिए। प्रेमचंद का मानना था कि दलितों को दया नहीं, बल्कि समान अधिकार, सम्मान और न्याय मिलना चाहिए।
2. प्रेमचंद ने दलितों को संवेदनशील, संघर्षशील और स्वाभिमानी मनुष्य के रूप में प्रस्तुत किया है-
प्रेमचंद के दलित पात्र अपने आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा के प्रति सजग हैं। वे अन्याय और अपमान का प्रतिरोध करते हुए कठिन परिस्थितियों में भी अपने स्वाभिमान को बनाए रखते हैं। ‘ठाकुर का कुआँ’ की गंगी, ‘घासवाली’ की मुलिया, ‘मंदिर’ की सुखिया और ‘दूध का दाम’ की भूँगी जैसे पात्र साहस, संघर्ष और आत्मगौरव के प्रतीक हैं। इन पात्रों के माध्यम से प्रेमचंद ने यह सिद्ध किया कि मनुष्य की श्रेष्ठता उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, कर्म और मानवीय गुणों से निर्धारित होती है।
3. प्रेमचंद का उद्देश्य सामाजिक परिवर्तन का सशक्त उपकरण है-
प्रेमचंद का साहित्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सशक्त उपकरण था। उन्होंने जातिवाद, छुआछूत, शोषण, आर्थिक विषमता और सामाजिक अन्याय जैसी कुरीतियों पर तीखा प्रहार किया। उनकी कहानियाँ समाज को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती हैं और समानता, न्याय तथा मानवता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की स्थापना का संदेश देती हैं। प्रेमचंद का विश्वास था कि साहित्य का दायित्व समाज को सही दिशा देना है। इसलिए उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से दलितों, किसानों, मजदूरों और वंचित वर्गों की आवाज़ को मुखर किया तथा एक समतामूलक और मानवीय समाज की कल्पना प्रस्तुत की।
(ii) समकालीन संदर्भ में प्रेमचंद का कथा साहित्य आज भी प्रसांगिक है-
1. आज भी जातीय भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ-
भारतीय संविधान ने सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार प्रदान किया है तथा अस्पृश्यता को कानूनी रूप से समाप्त घोषित किया है। इसके बावजूद आज भी समाज के अनेक क्षेत्रों में जातिगत भेदभाव विभिन्न रूपों में विद्यमान है। ग्रामीण क्षेत्रों में मंदिर प्रवेश, सार्वजनिक जलस्रोतों के उपयोग, सामाजिक मेल-जोल और वैवाहिक संबंधों में जाति का प्रभाव अब भी देखा जा सकता है। कई स्थानों पर दलितों के विरुद्ध हिंसा, सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव तथा आर्थिक और शैक्षिक अवसरों में असमानता जैसी घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रहती हैं।
यद्यपि शिक्षा, शहरीकरण, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक आंदोलनों ने इस स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन लाया है, फिर भी जातिगत पूर्वाग्रह पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। आज भी सामाजिक न्याय की स्थापना के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। ऐसे समय में प्रेमचंद की कहानियाँ हमें यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि वास्तविक विकास केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और मानवीय सम्मान की स्थापना से संभव है।
2. इसलिए प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं –
प्रेमचंद का साहित्य केवल अपने समय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि हर युग के समाज के लिए एक नैतिक और सामाजिक मार्गदर्शक है। उन्होंने जिन समस्याओं- जैसे जातिवाद, छुआछूत, सामाजिक विषमता, आर्थिक शोषण, स्त्री-असमानता और मानवीय गरिमा के प्रश्न—को अपनी कहानियों में उठाया था, वे आज भी अनेक रूपों में हमारे समाज के सामने विद्यमान हैं। इसलिए उनका साहित्य आज भी उतना ही सार्थक और प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था।
‘सद्गति’, ‘ठाकुर का कुआँ’, ‘मंदिर’, ‘दूध का दाम’, ‘घासवाली’ और ‘कफ़न’ जैसी कहानियाँ आज भी सामाजिक चेतना को जागृत करती हैं। ये रचनाएँ हमें यह सिखाती हैं कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान जाति, धर्म या वर्ग से नहीं, बल्कि मानवता, समानता, न्याय और करुणा से होती है। प्रेमचंद का साहित्य पाठकों में सामाजिक संवेदनशीलता, नैतिक चेतना और परिवर्तन की आकांक्षा उत्पन्न करता है।
आज जब भारतीय समाज समावेशी विकास, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब प्रेमचंद की रचनाएँ हमें याद दिलाती हैं कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है; समाज की मानसिकता में परिवर्तन भी उतना ही आवश्यक है। यही कारण है कि प्रेमचंद आज भी हिंदी साहित्य के सबसे प्रासंगिक कथाकार माने जाते हैं और उनका साहित्य वर्तमान तथा भविष्य, दोनों के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है।
(iii) प्रेमचंद के दलित साहित्य की विशेषता
* प्रेमचंद स्वयं दलित नहीं थे, फिर भी उन्होंने दलितों की समस्याओं को गंभीर मानवीय संवेदना के साथ चित्रित किया। प्रेमचंद दलित पात्रों को केवल पीड़ित नहीं दिखाते, बल्कि उन्हें स्वाभिमानी, संघर्षशील और मानवीय गरिमा से युक्त व्यक्तियों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनका उद्देश्य समाज में समानता, न्याय और मानवता की स्थापना करना था।
* दलित आत्मकथा का आधार “स्वानुभूति” (अपने अनुभव) है, जबकि प्रेमचंद के साहित्य का आधार “सहानुभूति” और सामाजिक यथार्थ का गहरा अवलोकन है। दलित आत्मकथा भीतर से बोलती है, जबकि प्रेमचंद का साहित्य बाहर से देखकर भी भीतर की पीड़ा को समझने और समाज तक पहुँचाने का प्रयास करता है।
निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि दलित आत्मकथा और प्रेमचंद का दलित साहित्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। दलित आत्मकथाएँ दलित समाज की प्रत्यक्ष, स्वानुभूत और संघर्षपूर्ण आवाज़ हैं, जबकि प्रेमचंद का साहित्य उस पीड़ा को समाज के सामने लाकर सामाजिक चेतना और परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है।
समापन- “प्रेमचंद का दलित जीवन दर्शन केवल साहित्य का विषय नहीं, बल्कि भारतीय समाज के आत्ममंथन का दस्तावेज़ है। उन्होंने हमें यह सिखाया कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति नहीं, उसका मानवत्व है। अंत में मैं प्रेमचंद को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपनी बात समाप्त करती हूँ।