‘मणिकर्णिका’ आत्मकथा की समीक्षा

मणिकर्णिका दलित समाज की त्रासदी और भारतीय समाज की विडम्बना का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आख्यान है। यह कृति समाज, संस्कृति, इतिहास और राजनीति की उन परतों को उघाड़ती है, जो अभी तक अनकहा और अनछुआ था। यह आत्मकथा बुद्धिजीवियों और  भारतीय समाज को सच का आइना दिखाती है। आज 21वीं सदी में भी भारत की तस्वीर बदली नहीं है। यह किसी एक व्यक्ति की आत्मकथा नहीं, अपितु पूरे दलित साहित्य की पीड़ा का यथार्थ और उनकी भोगी हुई अनुभूति है।

दलित आत्मकथाएँ केवल आत्म विश्लेषण या आत्मवृत्तान्त नहीं है, अपितु ‘स्व’ का सामूहिक एवं सामाजिक रूपान्तरण है। डॉ. तुलसीराम द्वारा रचित ‘मुर्दहिया’ मात्र एक आत्मकथा नहीं है, बल्कि लेखक के व्यक्तिगत-पारिवारिक जीवन के साथ-साथ आस-पास के सभी वर्गों-जातियों के सामाजिक-सांस्कृतिक सम्बन्धों और उनकी जटिलताओं की भी रचनात्मक अभिव्यक्ति है। हिन्दू समाज और घर-परिवार में उपेक्षा, अनादर और अपमान झेलते हुए एक बालक के जीवन की यह यथार्थ कृति है। मुर्दहिया हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त जातिगत भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न, घृणा, धार्मिक जड़ता, कर्मकाण्ड, अन्धविश्‍वास और विद्रूप परम्पराओं की परतों को बारीकी से उघाड़ती है। तमाम सामाजिक-आर्थिक विषमताओं एवं जटिलताओं की सच्‍चाइयों से गुँथी हुई यह आत्मकथा समता, मैत्री, प्रेम और करुणा का मानस रचती है।

तुलसीराम की दूसरी आत्मकथा ‘मणिकर्णिका’ है। ‘मणिकर्णिका’ बनारस का वह घाट है, जहाँ मुर्दे को अंतिम संस्कार के लिए इस आस में लाया जाता है कि यहाँ से उसे सीधे स्वर्ग मिलेगा। यह भी कहा जाता है कि शिव जी की पत्नी पार्वती के कानों में पहनी जानेवाली मणि इसी जगह गंगा में खो गई थी जिसके कारण इस घाट का नाम ‘मणिकर्णिका’ पड़ा। वैसे तो बनारस के बारे में एक और धारणा प्रचलित है कि यहाँ कोई भूखा नही रहता, पर यहाँ आते ही डॉ. तुलसीराम ने इस मान्यता को स्वयं ध्वस्त होते हुए देखा है। उन्हें यहाँ एक-दो दिन की भूख नहीं बल्कि लगातार पूरे नौ दिनों तक भूख सहने पर मजबूर होना पड़ा। गंगा के घाट में भूखों की लंबी कतार देखकर उनके मन से अचानक आवाज़ आई कि-

“गंगा पापी का पाप तो धो सकती है, पर भूख को नही।”1

डॉ. तुलसीराम ‘मणिकर्णिका’ में बनारस के प्रसिद्ध घाटों और मंदिरों का चित्रण और यहाँ के पंडों के पाखंड और कारोबार का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि वे कैसे कृष्ण की भक्ति का

बखान करते हुए तथा भूत उतारने के बहाने महिलाओं का शोषण करते हैं। इससे स्पष्ट होता है है कि लेखक सिर्फ व्यक्तिगत पीड़ा का वर्णन नहीं करते हैं बल्कि समाज में धर्म के नाम पर  अन्धविश्वास की आड़ में गरीबों और दलितों के शोषण को उजागर करते हैं।

‘मुर्दहिया’ गाँव का श्मशान है और मणिकर्णिका बनारस का। तुलसीराम मृत्यु को केंद्र में रखकर जीवन की कथा कहने वाले अपने शीर्षकों से पाठक को चकित और सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं। मैनेजर पांडेय के अनुसार- “मृत्यु पर जीवन संघर्ष के विजय की कथा है ‘मणिकर्णिका’।2

‘मणिकर्णिका’ तुलसीराम के दस साल तक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में छात्र रूप में बीताये जीवन के विभिन्न अनुभवों और उनके सोच-विचार की प्रक्रिया की विकास कथा है। वे लिखते हैं बनारस केवल सांस्कृतिक नगरी ही नहीं, वह हर तरह के रुढ़िवाद और अंधविश्वासों की नगरी है। बहुत पहले कबीर ने बनारस में प्रचलित अंधविश्वास का खंडन अपने जीवन और कविता दोनों में किया था। बनारस में यह अंधविश्वास है कि जो काशी में मरता है वह मोक्ष प्राप्त करता है। इसलिए देश के अमीर और सुविधा संपन्न लोग जीवन के अंतिम समय में केवल मरने के लिए काशी में आकर रहते हैं। कबीरदास कहते हैं कि अगर काशी में रहकर ही मुक्ति पाना है तो फिर भक्ति का क्या उपयोग है। उन्होंने लिखा है-

“जौ कबीर काशी मरिहैं, रामहिं कौन निहोरा?3

यह कहते हुए कबीर काशी छोड़कर ‘मगहर’ चले जाते हैं, जहाँ के बारे में यह प्रचलित है कि वहाँ मरने वाला अगले जन्म में गदहा होता है। तुलसीराम ने अपनी आत्मकथा मणिकर्णिका में हर तरह के रुढ़िवादी और अंधविश्वास का खंडन किया है। उन्होंने एक जगह लिखा है- “भूत बैठाने वाले अअंधविश्वासी विद्या के चलते लोग उनपर खूब धन लुटाते थे। ‘पिशाच मोचन’ में एक पोखरा था, जिसमें भूतों की गठरी को फेंका जाता था। पोखरे के भींटे पर एक-दो छोटे-छोटे दुर्गा मंदिर थे, जो पूर्णरूप से लाल रंग से रंगे होने के कारण भयोत्पादक लग रहे थे। अन्यथा यहाँ भूतों के डेरे जैसे अन्य कोई निशानी नहीं थी, जो कुछ यहाँ था वह घोर अंधविश्वास।”4

भारत में आज भी शहरों में जाति दंश का सामना करना पड़ता है। तुलसीराम को किराये में कमरा नहीं मिलता था और मिल भी जाता था तब किरायदार को दलित जानकार उसे सामान के साथ बाहर निकाल दिया जाता था। तुलसीराम ने लिखा है- “जातीय यथार्थ के कारण बार-बार

नए कमरे की तलाश में मैं दोहरा जीवन जीने लगा था। मैं विश्वविद्यालय में दलित और शहर में ‘शर्माजी’ बन जाता था।”5

तुलसीराम बी.एच.यू के छात्र होते हुए घूमते रहते थे। एक बार वे पढ़ाई के लिए पैसा जुटाने की चिंता में आसनसोल चले गए। वहाँ उनके गाँव के कई लोग कोयला खदानों में मजदूरी करते थे। उन्होंने कोइलियरी के मजदूरों के जीवन और तबाही के विषय में भी लिखा है। उन्होंने इस प्रसंग में बंगाल के प्रसिद्ध कवि सुकांत भट्टाचार्य की प्रसिद्ध कविता ‘हे महाजीवन’ की ये पंक्तियाँ उद्धरित की है-

“भूख के राज में पृथ्वी गद्यमय है,

पूर्णिमा का चाँद मानों झुलसी हुई रोटी है।”6

मणिकर्णिका में उन्होंने केदारनाथ अग्रवाल, तुलसीदास, ग़ालिब, शेक्सपियर की अनेक कविताओं और गीतों को उद्धृत किया है। इन्होंने बहुत ही कठिन जीवन जिया था। वे एक दो दिन नहीं बल्कि पुरे नौ दिनों तक भूखे रहे थे। तुलसीराम उन दिनों को याद करते हुए लिखते हैं- 1968 वर्ष का वह दिन हम नहीं भूलेंगे, जब मैं नौ दिनों तक लगातार भूखा रहा। उस समय नौ दिनों तक मैं एक चाय सुबह और दूसरी चाय शाम को पीकर गुजारा करता था। वह चाय भी उधार की होती थी।बनारस की प्रवृत्ति, संस्कृति और विकृति का सामना करते हुए तुलसीराम उन लोगों को नहीं भूले, जो उनके प्रेरणादायक सहयोगी, साथी और सहकर्मी थे। वे लोग थे, राहुल जी, गोरख पांडेय, धूमिल और बनारस के एक उर्दू शायर नजीर बनारसी। तुलसीराम ने मणिकर्णिका में अपने लेखक बनने की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया है। वे कहते हैं “मेरा लेखकीय अभियान संपादक के नाम पत्र से शुरू हुआ।” एक बार लेखक कई छात्रों के साथ आगरा गए। वहाँ उन्होंने ताजमहल को देखकर एक कविता लिखी-

 “कितना अद्भुत ताजमहल, तू यमुना तट पर फैला है,

 चाहे कोई कुछ भी समझे, तू मजनू की लैला है।”7

बाद में जब मार्क्सवादी सोच उनपर हावी हुई तब प्यार की निशानी मजदूर की निशानी में बदल गई। फतेहपुर सीकरी पहुँचते-पहुँचते उन्होंने चार लाइन फिर लिखी-

“जिनकी हड्डी पसली से हैं, बनी ताज की दीवारें,

रखते ही पग झनझन करती आहें उनकी चीत्कारें।”8

‘मणिकर्णिका’ के अंतिम में तीन प्रेम कथाएँ है, जिनका संबंध तुलसीराम के जीवन से है। इन तीनों प्रेम कथाओं की नायिकाएँ उत्पलवर्णा, टामुन और सबीहा है। ये तीनों प्रेमकथाएँ अधूरी और असफल रहीं लेकिन वे अत्यंत आकर्षक और मोहक थी, जिनमें तुलसीराम की अपार सहृदयता व्यक्त हुई है। हमें ऐसा लगता है कि दुनिया में असफल प्रेम कथाएँ अमर प्रेम कथा बन जाती हैं। जैसे- लैला-मजनू, हीर-राँझा और शिरी-फरहाद की प्रेम कथाएँ। प्रेम में जो उदात्तता होती है वह सफलता में नहीं होती। तुलसीराम की भी ये प्रेम कथाएँ उदात्त प्रेम कथाएँ हैं।

‘मणिकर्णिका’ का एक महत्वपूर्ण अध्याय हिंदी क्षेत्र में नक्सलवाद पर केन्द्रित है। मार्क्सवादी बनने के आरंभिक दौर के इतिहास को सुभाष मुखोपाध्याय द्वारा कलकत्ता में विस्तार से समझने के बाद वे निष्कर्ष निकालते हैं कि- “कुल मिलाकर मुझे अनुभूति हुई कि सारा मामला आदिवासियों से ही जुड़ा था, जिसकी जड़ में भूमि विवाद था। यह भूमि विवाद बढ़ते-बढ़ते सशस्त्र क्रांति में बदल गया।”9 मणिकर्णिका में 70 के दशक की विभिन्न राजनीतिक धाराओं, मार्क्सवाद, समाजवाद, नक्सलवाद का दर्शन और खासकर उनके समकालीन इतिहास का ऐसा रोचक और सजीव चित्रण है, जो आज की पीढ़ी के लिए अन्यत्र दुर्लभ है। इसमें राम मनोहर लोहियाजयप्रकाश नारायण, राज नारायण और इंदिरा गाँधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं का छात्र राजनीति पर असर का भी विवरण है।

इस आत्मकथा में वर्ग, जाति, दलित-समाज के परिप्रेक्ष्य में कम्युनिष्ट पार्टी व मार्क्सवाद की सीमाओं संबंधी लेखक के विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं जो यह दर्शाते हैं कि पश्चिमी या विदेशी सिद्धांत या विचार प्रणालियाँ भारत की बहुस्तरीय, बहुलतावादी तथा जटिल सामाजिक संरचना में ज्यों का त्यों नहीं रोपे जा सकते हैं। भारतीय जीवन की समस्याओं की वैचारिकी व सिद्धांत का इसी भूमि से जन्म लेना जरुरी है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा है- “धीरे-धीरे क्लास (वर्ग) तथा कास्ट (जाति) की अवधारण समस्याजनक होकर सामने आने लगी है। व्यावहारिक रूप में मुझे यहाँ अनुभव होने लगा है कि मार्क्स जिस मजदूर-वर्ग की बात करते थे, उसका अधिसंख्य हिस्सा भारत में सामाजिक भेदभाव का शिकार दलित-समाज से आता था। शायद कम्युनिष्ट पार्टी का ध्यान इस प्रश्न पर नहीं जाता था। मुझे आज भी आश्चर्य होता है कि भारत में कम्युनिष्ट आन्दोलन के लगभग 90 साल पूरे होने जा रहे हैं, किंतु कम्युनिष्ट पार्टी ने कभी, कोई राष्ट्रीय स्तर पर जाति-व्यवस्था विरोधी आन्दोलन नहीं चलाया। इसका परिणाम यह हुआ कि समय बीतने के साथ ही दलितों के बीच कम्युनिष्ट पार्टी का आधार लगभग समाप्त हो गया। इन तमाम नकारात्मक परिस्थितियों का प्रभाव यह पड़ा कि दलित भी सवर्णों की तरह जातिवादी राजनीति में व्यस्त हो गए। परिणामस्वरूप जातिवाद जितना शक्तिशाली इस समय है, उतना वह पहले न था।”10

तुलसीराम की आत्मकथा की श्रेष्ठता पर प्रकाश डालते हुए नामवर सिंह ने कहा है-“दलित साहित्य बहुत लिखा जा चुका है, लेकिन मुझे मणिकर्णिका बहुत आकर्षित करती है, क्योंकि ‘मुर्दहिया में भोजपूरी बोली ज्यादा आई है, खड़ीबोली के व्यवहार में। ‘मुर्दहिया’ ग्राम कथा के समान है। उस पर फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ की बोली का असर है। ‘मणिकर्णिका’ की भाषा ‘साधु भाषा’ के रूप में आई है। यथा अवसर कहीं-कहीं भोजपुरी बोली का प्रयोग मिलता है। वह ऐसा दलित साहित्य है, जो चुनौति देता है, दलितों को भी और गैर-दलितों को भी कि दलित जीवन के बारे में कैसे उच्च कोटि की साहित्यिक रचना की जा सकती है। अंत में मैं यही कहूँगा कि तुलसीराम जी ने ऐसी रचना लिखी है कि उनका पैर छूकर प्रणाम करने का मन करता है।”11

आत्मकथा की दुनिया में ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ की लोकप्रियता ने यह विचार करने के लिए बाध्य कर दिया है कि भारत में जमीनी सच्चाइयों गुप्त और चुप भाषा में नहीं बल्कि प्रांजल और प्रखर भाषा में रचकर ही बड़े समुदाय में पहुँचा जा सकता है। ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ मन को बेचैन करनेवाली अत्मकथा है। यह केवल एक व्यक्ति की विकास यात्रा नहीं है, बल्कि यह भारत के सामाजिक और राजनितिक इतिहास के एक विशेष कालखंड का दस्तावेज है।

अतः ‘मुर्दहिया’ के पश्चात ‘मणिकर्णिका’ तुलसीराम के जीवन का दूसरा पडाव है, जिसमें उनका यथार्थपरक जीवनवृत्त संचित है। यह ग्रन्थ तुलसीराम के जीवनोत्कर्ष को जानने का सबसे सशक्त तथा विश्वसनीय साधन है।

संदर्भ सूची:

1. डॉ. तुलसीराम ‘मणिकर्णिका’ राजकमल प्रकाशन, सातवाँ संस्करण 2023, पृ.सं. 42

2. तुलसीराम: व्यक्तित्त्व और कृतित्व, तुलसीराम की आत्मकथा: ‘अनुभव और सोच का संगम’, पृ.सं.139

3. डॉ. तुलसीराम ‘मणिकर्णिका’, कबीर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ.सं. 79

4. डॉ. तुलसीराम ‘मणिकर्णिका’, राजकमल प्रकाशन, सातवाँ संस्करण 2023,  पृ.सं. 17

5. डॉ. तुलसीराम ‘मणिकर्णिका’ राजकमल प्रकाशन, सातवाँ संस्करण 2023, पृ.सं 41

6. डॉ. तुलसीराम ‘मणिकर्णिका’, राजकमल प्रकाशन, सातवाँ संस्करण 2023, पृ.सं. 24

8. डॉ. तुलसीराम ‘मणिकर्णिका’, राजकमल प्रकाशन, सातवाँ संस्करण 2023, पृ.सं. 85

8. डॉ. तुलसीराम ‘मणिकर्णिका’, राजकमल प्रकाशन, सातवाँ संस्करण 2023, पृ.सं. 85

9. डॉ. तुलसीराम, ‘मणिकर्णिका’ राजकमल प्रकाशन, सातवाँ संस्करण 2023, पृ.सं. 108,109

10. डॉ. तुलसीराम, ‘मणिकर्णिका’ राजकमल प्रकाशन, सातवाँ संस्करण 2023, पृ.सं. 171      

11. बहुजन वैचारिकी- तुलसीराम, विशेषांक, जनवरी, 2016, पृ.सं. 19

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