दलित साहित्यकार सूरजपाल चौहान का जन्म 20 अप्रैल 1955 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के फुसावाली नामक गाँव में हुआ था। उनके माता-पिता सिर पर मैला और जूठन उठाने का काम करते थे। इसी कार्य से उनके परिवार का गुजारा चलता था। उनके परिवार में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं था। लेखक की माँ ठाकुरों के मुहल्ले में बेगार के रूप में काम करती थी।
एक बार की बात है। लेखक की माँ बीमार पड़ गई थी। इस कारण लेखक को सफाई करने के लिए अपनी माँ की जगह पर जाना पड़ता है। वहाँ लेखक को एक बड़े मैदान में झाड़ू लगाना पड़ता है, जिस कारण उनके कमर में दर्द होने लगता है। लेखक के नाक, कान, सिर मिट्टी से भर जाते हैं, तब लेखक मन में सोचते हैं कि शायद माँ इस रोज तरह की पीड़ा के कारण ही बीमार पड़ जाती है। उन्हीं दिनों सूरजपाल को एक और नया अनुभव हुआ- जूठन संकेलने का। लेखक की माँ सूरजपाल को इस कार्य के लिए उपयुक्त समझती है। बालक सूरजपाल भी यह सुनकर मन ही मन खुश होता है। वे दोनों जब जूठन संकेलन के लिए हाते है तब देखते है कि बाराती सब खाना खा रहे थे। लेखक और उसकी माँ चौखट के बाहर खड़े उनकी ओर ललचाई आँखों से देख रहे थे। जूठन उठाने वालों की नजर उस कुत्ते की तरह होती है जो उसके समानंतर उसका प्रतिद्वंदी बनकर खड़ा होता है। एक आदमी जैसे ही खाना खाकर उसकी ओर फेंकता है, वैसे ही लेखक की माँ और एक कुत्ता दोनों झपटते हैं। यह दृश्य भारतीय संस्कृति द्वारा प्रदत्त सामाजिक व्यवस्था पर घोर प्रहार है। ऐसी संस्कृति जहाँ आदमी के स्वाभिमान का हनन कर उसे पशुओं की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देती है। इसका मुख्य कारण गरीबी और जाति पर आधारित वर्ण व्यवस्था है। लेखक ने ठीक ही कहा है कि- “जब रूखे निवालों के भी लाले हों और आदमी-आदमी के हाथों नारकीय जीवन जीने को विवश हो तब वह स्वयं में और पशुओं में अंतर नहीं कर पाता है।”1 भूख और गरीबी जैसी यातनाएँ सहने का स्तर लोगों के लिए कल्पनीय हो सकता है लेकिन यह भी भंगी जाति का यथार्थ है, इसलिए लेखक ने कहाँ है- “जब-जब बसीठों (सवर्ण) के घरों में शादी-ब्याह का कार्यक्रम होता, हमारे भंगी मोहल्ले में त्योहार जैसा माहौल उत्पन्न नहो जाता था। ऐसा जान पड़ता था, मानों हमारे मोहल्ले में ही किसी के यहाँ ब्याह-बरात हो।”2
सूरजपाल चौहान छोटे थे तभी उनकी माँ का देहांत हो गया था। रोजी-रोटी के तलाश में उनके पिता 1966 में दिल्ली चले गए। वे अपने साथ सूरजपाल को भी ले गए। वहाँ उन्हें सफाई कर्मचारी का नौकरी मिल गया। सूरजपाल को उनके पिता ने शिक्षा के लिए स्कूल में दाखिला दिलवा दिया। उनकी आमदनी अधिक नहीं थी। इस कारण उनके पिता ने उनका दाखिला नगर निगम के स्कूल में करवाया। सूरजपाल चौहान समाज और काल पर पकड़ रखनेवाले विलक्षण साहित्यकार थे। उनके लेखन में जाति व्यवस्था का विरोध नहीं, बल्कि लक्ष्य के तौर पर दिखाई देता है। उन्होंने दलित साहित्य और वैचारिकी को समृद्ध करने के लिए कहानी, कविता, नाटक विधा के अलावा वैचारिकी और इतिहास परक लेखन किया। सरकारी कार्यालयों में भोगे यथार्थ को उन्होंने निर्भीकता से प्रस्तुत कर सवर्णों की खोखली नीति, पाखंडी वृत्ति और उनके द्वारा किये गए अत्याचारों पर बेबाकी से प्रकाश डाला है। उन्होंने सच्चाई व ईमानदारी से दलित वर्ग में मौजूद भेदभाव के प्रपंच पर अपनी लेखनी चलाई है। किंतु उन्हें प्रसिद्धि ‘तिरस्कृत’ और ‘संतप्त’ आत्मकथा से मिली। सन् 2000 में ‘तिरस्कृत’ अनुभव प्रकाशन गाजियाबाद से प्रकाशित हुई थी।
दयाशंकर त्रिपाठी ने लिखा है- “वे जिस अधिकार के साथ सवर्ण-समाज का नंगापन उघारते हैं, उसी प्रकार वे दलित समाज की हकीकतों और कमजोरियों से भी हमें साक्षात्कार करवाते हैं।”3
वे बजरंग बिहारी तिवारी की ‘धोका’ कहानी की भूमिका में लिखते है-“….प्रतिबद्धता प्रायः कुछ चीजों को छुपा ले जाती है। दुनिया भर पर रौशनी डालती हैं, फटकारती है लेकिन खुद को कभी प्रकाश-वृत्त में नहीं लाती, स्वयं का परीक्षण नहीं करती। सूरजपाल चौहान के लिए प्रतिबद्धता सहूलियत भरा मामला नहीं है। वे जितना ‘औरों’ के प्रति निर्मम है उतना ही अपने और ‘अपनों’ के प्रति कठोर भी। ‘अंतर’, ‘एकता का ढ़ोल’ और ‘धोखा’ जैसी लघुकथाएँ यही बात साबित करती है।”4
सूरजपाल चौहान की आत्मकथा ‘तिरस्कृत’ दलित जीवन की सच्चाइयों को उद्घाटित करती है। समाज में व्याप्त जाती प्रथा पर आधारित ऊँच-नीच, भेद-भाव, शोषण और तिरस्कार को उघारकर रख देती है। ब्राह्मनवाद ने किस तरह से दलितों का शोषण किया है, उन प्रक्रियाओं को उन्होंने उद्घाटित करते हुए दलित जीवन का प्रमाणिक चित्र प्रस्तुत किया है। दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टि सिकुड़ती मानवता को उभारा है। सूरजपाल चौहान का संबंध भारतीय समाज व्यवस्था में सबसे नीची भंगी जाति से है। इस जाति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सबसे ख़राब है। दलितों में दलित होना इस बात की ओर संकेत करता है कि इस जाति का शोषण बड़े पैमाने पर हुआ है। इस शोषण-उत्पीड़न में कई जातियाँ सम्मिलित रही हैं। इनके शोषण-उत्पीड़न में सवर्ण जातियों के साथ कुछ दलित जातियाँ (अनुसूचित जातियाँ) भी शामिल रही हैं और आज भी हैं। यह दलित समाज की एक हृदय विदारक सच्चाई है।
शिक्षा व ज्ञान किसी समाज व समुदाय के विकास में मुख्य कारक हैं। ज्ञान पर एकाधिकार करके व शूद्रों को ज्ञान से वंचित रखकर ही ब्राह्मणवाद पर अपना वर्चस्व स्थापित करने में कामयाब हुआ था। ब्राह्मणवादी वर्चस्व को समाप्त करने के लिए ज्ञान व शिक्षा प्राप्त करना अत्यंत जरूरी है, इसलिए दलित चिंतकों चाहे जोतिबा फूले हों या फिर डा. भीमराव आम्बेडकर उन्होंने शूद्रों को ज्ञान व शिक्षा प्राप्त करने के लिए विशेष रूप से प्रेरित किया। शासन-सत्ता को इसकी व्यवस्था करने पर जोर दिया। वर्चस्वी वर्ग भी शिक्षा, ज्ञान व इससे पनपने वाली चेतना की शक्ति को भली-भांति समझता है। उसे यह अच्छी तरह से मालूम है कि दलितों को सेवक बनाए रखने के लिए उसका अशिक्षित एवं अज्ञानी होना पहली शर्त है। इसलिए वह दलितों को शिक्षा नहीं देना चाहता था। सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों की दलितों के प्रति पूर्वाग्रह-ग्रसित मानसिकता और व्यवहार से यह प्रकट होता है। दलित वर्ग से सम्बन्ध रखने वाले विद्यार्थियों को बेवजह प्रताड़ित करना व उनको शिक्षा प्राप्त करने के लिए हतोत्साहित करने की घटनाएँ समाज में घट रही हैं। सूरजपाल चौहान के अनुभव भी इसे पुष्ट करते हैं। जातिगत संकीर्णता व पूर्वाग्रह से ग्रसित शिक्षकों के दिल में विद्यार्थियों के साथ समान रूप से व्यवहार करने की भावना पैदा नही होती, बल्कि उनके प्रति शत्रुवत व्यवहार किया जाता है। “जाति का पुछल्ला ब्रह्मराक्षस की तरह सदैव मेरे पीछे लगा रहा। संस्कृत विषय पढ़ाने वाले अध्यापक वेदपाल शर्मा मुझे समय-समय पर जाति का ओछापन याद दिलाते रहे। मैं तड़प उठता था। उस द्रोणाचार्य की बातें सुनकर। एक दिन उन्होंने अपने साथी अध्यापकों से मेरी ओर संकेत कर कहा था यदि देश के सारे चूहड़े-चमार पढ़-लिख गए तो गली-मौहल्लों की सफाई और जूते बनाने का कार्य कौन करेगा?”5
शहर के स्कूल का अध्यापक दलितों को ‘सफाई व जूते बनाने’ के लिए अनपढ़ रखना चाहता है, तो गाँव का अध्यापक दलितों को खेतों में ’सीरी-साझी’ लगाने के लिए। अध्यापक की इस टिप्पणी से दलितों के प्रति ऐसा अमानवीय व्यवहार करने और उनको शिक्षा से वंचित रखने के कारणों को समझा जा सकता है। दलित जातियों के विद्यार्थियों के प्रति सवर्ण मानसिकता के रोगी अध्यापकों द्वारा कई रूपों में प्रताड़ना दी जाती है, उनको अन्य विद्यार्थियों से दूर बैठा दिया जाता है, जिससे उनमें हीन-भावना तो पैदा करता ही है, साथ ही यह धारणा भी पैदा करता है कि शिक्षा उनके लिए नहीं है, इसलिए उन पर ध्यान नहीं दिया जाता। इस तरह वे पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं। बाद में यह सिद्ध कर दिया जाता है कि ज्ञान प्राप्त करना उनके बस की बात ही नहीं, जो दिमाग ‘विद्या’ को प्राप्त करने के लिए चाहिए वे इनके पास है ही नहीं। इस तरह एक अघोषित साजिश की तरह दलितों की प्रतिभा व क्षमता की संभावनाओं को दबा दिया जाता है।
“हम तीन भंगी मौहल्ले के बालक गाँव की पाठशाला में पढ़ रहे सभी बच्चों से दूर पीपल के नीचे बैठने को कहा जाता। वहीं पास में एक गंदी नाली थी, जिसमें गाँव के सवर्ण लोगों के मौहल्ले की गंदगी बहती रहती थी। मैं, श्रीपाल और रामखिलाड़ी सारा-सारा दिन हाथों में तख्तियाँ लिए बैठे रहते। कभी किसी मास्टर का ध्यान आ जाता तो हमारी घोटा लगी तख्तियों पर पैंसिल से हरफ खींच जाता और हम उन हरफों पर खड़िया पोत लिया करते थे। कई माह तक हम तीनों के परिवार के सदस्य इसे ही स्कूल जाना और पढ़ना समझते रहे।”6 एक बार की बात है- सरकार से मिलने वाले वजीफे के लिए कालेज के सूचना-पट्ट पर दलित छात्रों की सूची लगी हुई थी। उसमें मेरा नाम भी था। मेरे नाम पर नजर पड़ते ही अनुपम जैन तुरन्त बोला- अरे चौहान, क्या तुम राजपूत नहीं हो- तुम शड्यूल्ड कास्ट हो क्या? अनुपम के ये शब्द सुनकर मैं बुरी तरह झेंप गया था। मेरे मुँह से बोली नहीं निकला। मैं अचकचा कर रह गया था उस समय। अबे, देखो चूहड़े भी ‘ठाकुर’ व ‘राजपूत’ बनने लगे।’ अनुपम मुँह बिचकाकर और बड़बड़ाता क्लास-रूम की ओर बढ़ गया।’7 जब शिक्षा देने वाले अध्यापकों के मन में तथा साथ शिक्षा ग्रहण कर रहे सहपाठियों के दिल में दलित शिष्यों व सहपाठियों के प्रति इतनी घृणा है तो वे इस अपमानजनक वातावरण में कितनी शिक्षा ग्रहण करेंगे और व्यक्तित्व का कितना विकास होगा इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। दलित परिवारों के बच्चे स्कूल में दाखिला लेते हैं लेकिन जल्दी ही स्कूल छोड़ देते हैं। इसके अन्य कारणों के साथ शिक्षा संस्थानों का ऐसा माहौल भी जिम्मेदार है।
गाँव में हम-उम्र के बच्चों के साथ खेलने पर लेखक की पिटाई का प्रसंग इस ओर संकेत करता है। मैं एक दिन अपने हम-उम्र बालकों के साथ कंचे खेल रहा था। लोधों का बनवरिया, काछी का श्यामू और ठाकुर का बीरू। सबके सब खेलने में मग्न थे। ठाकुर प्रताप बड़ा परेशान था कि उसका बीरू भरी दुपहरी में कहाँ चला गया। वह उसे खोजता हुआ वहाँ आ धमका, जहाँ हम चारों कंचे खेल रहे थे। ठाकुर प्रातप ने नीम के पेड़ से एक संटी तोड़कर चार-पाँच अपने लड़के को जमा दी। बीरू को पिटते देख बनवरिया और श्यामू भाग खड़े हुए। उन दोनों को देख मैं जैसे ही वहाँ से भागने लगा कि तुरन्त ठाकुर ने मुझे आगे से आकर धर दबोचा। सटाक-सटाक संटियों की बरसात कर दी। मेरा कान ऐंठते हुए ठाकुर ने कहा – साले भंगिया के मेरे छोरा के संग खेलतु है…ठौर मार दूंगा।’ ठाकुर अपने बेटे बीरू को घसीटते हुए कुएं की ओर ले गया। मैं दीवार के सहारे टिका डबडबाई आँखों से सब देख रहा था। ठाकुर ने कुएं से एक बाल्टी पानी खींचा और नीम की टहनी पानी में डुबोकर बीरू को छींट देने लगा। बीरू रोते-रोते कह रहा था- मो पै पानी क्यों डारि रहे हो?’ अरे! चुप नालायक, भंगिया के संग खेलकर अपने आप कू अपवित्र कर लीनों और फिर पूछत है कि पानी के छींटे क्यों डारि रहे हो?’ ठाकुर प्रताप ने बीरू के मुँह पर एक थप्पड़ लगाते हुए कहा था।’8
बीरू को पिटने का समझ नहीं आ रहा, अपवित्र होने की भाषा समझ नहीं आ रही, लेकिन ठाकुर की पिटाई लेखक और बीरू दोनों को ही समझाने की कोशिश कर रही है कि उनमें समानता नहीं है। एक में श्रेष्ठता का तो दूसरे में हीनता का भाव पैदा करने की प्रयोगशाला की तरह है।
सूरजपाल चौहान अपनी दो आत्मकथाएँ ‘तिरस्कृत’ और ‘संतप्त’ लिखकर हिंदी दलित साहित्य में हलचल मचा दी है। इन दोनों रचनाओं में लेखक को समाज ने जो यातनाएँ दी है। लेखक की उन यातनाओं को पढ़ते हुए पाठकों की आत्मा काँप जाती है। और साथ में समकालीन दलित आन्दोलन और दलित लेखकों की दोहरी भूमिकाओं, दोहरे चहरे को भी बेनकाब कर देती है।
प्रो. काशीनाथ सिंह लेखक के भुक्त भोगी वेदना के विषय में लिखते है कि- “….’तिरस्कृत’ यदि तिरस्कृत होने की आत्मकथा है तो ‘संतप्त’ तिरस्कृत होने के संताप की। तिरस्कृत अपने गाँव से, अपने मुहल्लों से, अपने स्कूल से और कॉलेजों से, अपने कार्यालयों और अफसरों से। इन सारे तिरस्कारों का मुकाबला किया जा सकता है बशर्ते परिवार साथ हो, भाई साथ हो, रिश्तेदार, नातेदार साथ हों। लेकिन उस संताप का कोई क्या करे जिसे तमाम लोगों के सिवा पत्नी और बेटे तक के तिरस्कार ने दिया हो!”9
वे आगे कहते है- “सच पूछिए तो ये दोनों आत्मकथाएँ जुड़वाँ हैं। पैदा जरुर आगे पीछे हुई हैं लेकिन हैं जुडवाँ। तिरस्कार की पीड़ा महसूस करनी हो तो संतप्त पढ़िए और उसकी वजहें जाननी हो, तो ‘तिरस्कार’ पढ़िए। ईमानदारी दोनों में है लेकिन यदि ‘साहस’ स्सत्म्कथा की बुनियादी शर्त हो तो वह सिर्फ ‘संतप्त’ में है- दु:साहस की हद तक ! इस अर्थ में यह हिंदी की अकेली, बेबाक, बेजोड़ और ‘बोल्ड’ आत्मकथा कही जाएगी”10
संदर्भ सूचि:
1. सूरजपाल चौहान, ‘तिरस्कृत’, अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद पृ.सं. 16
2. सूरजपाल चौहान, ‘तिरस्कृत’, अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद पृ.सं. 17
3. सूरजपाल चौहान, ‘तिरस्कृत,’ भूमिका, वह दिन जरूर आएगा, पृ.सं. 17
4. बजरंग बिहारी तिवारी भी ‘धोखा’ कहानी संग्रह की भूमिका, पृ.सं. 9
5. सूरजपाल चौहान, ‘तिरस्कृत’, अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद पृ.सं. पृ.सं.16
6. सूरजपाल चौहान, ‘तिरस्कृत’, अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद पृ.सं. पृ.सं. 29
7. सूरजपाल चौहान, ‘तिरस्कृत’, अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद पृ.सं. पृ.सं.17
8. सूरजपाल चौहान, ‘तिरस्कृत’, अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद पृ.सं. 29
9. सूरजपाल चौहान ‘संतप्त’ की भूमिका, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
10. सूरजपाल चौहान ‘संतप्त’ की भूमिका, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली