प्रकृति जब चित्रकार बनती है, तब वह रंगों से नहीं, ऋतुओं से चित्र बनाती है। उसकी तूलिका बादलों में भीगती है, पर्वतों पर ठहरती है और नदियों में बहने लगती है। कहीं वह हिमालय के श्वेत मस्तक पर हिम का मुकुट सजाती है, तो कहीं समुद्र के गले में लहरों की माला डाल हिलोरे लेती है। परंतु मध्य भारत में उसने जो अनूठा चित्र रचा है, उसका नाम है-
‘विंध्य के माथे पर नर्मदा का तिलक’
तिलक केवल श्रृंगार नहीं होता। भारतीय संस्कृति में तिलक सम्मान है, मंगल, आस्था संकल्प, विजय चेतना और आत्मीयता का प्रतीक भी है। जब किसी के ललाट पर तिलक लगाया जाता है, तब केवल चंदन या रोली नहीं लगाईं जाती बल्कि उसके साथ शुभकामनाएँ, आशीर्वाद और विश्वास भी अंकित किये जाते हैं। शायद इसी कारण प्रकृति ने विंध्य के विशाल, गंभीर और तपस्वी मस्तक पर नर्मदा का तिलक अंकित किया है।
विंध्य को देखकर लगता है, जैसे मानो कोई प्राचीन ऋषि समाधि में बैठा हो। उसकी चट्टानों पर समय की असंख्य परतें जमी हैं। उसने ऋतुओं का आवागमन देखा है, सभ्यताओं का उत्थान और पतन देखा है, राजाओं के रथों की गर्जना सुनी है और साधकों की मौन तपस्या भी देखी है। वह कभी बोलता नहीं, किंतु उसकी नीरवता में इतिहास की अनगिनत कथाएँ गूँजती रहती हैं। ऐसे गंभीर तपस्वी के ललाट पर नर्मदा मुस्कान बनकर उतरती है। वह किसी चंचल बालिका की तरह कभी चट्टानों से टकराकर हँसती है, कभी शांत होकर गहरे ध्यान में डूब जाती है। उसकी हर लहर मानो विंध्य के मौन को शब्द देती है। पर्वत की स्थिरता और नदी की गति दोनों मिलकर जीवन का वह ऐसा दर्शन गढ़ते हैं, जिसमें ठहराव के साथ प्रवाह की भी आवश्यक है।
उषाकाल में जब सूर्य की पहली किरण नर्मदा के जल को स्पर्श करती है, तब जल सोने-सा दमक उठता है। लगता है, मानो किसी माँ ने अपने पुत्र के मस्तक पर चंदन और केसर का तिलक लगा दिया हो। संध्या के समय वही जल सिंदूरी आकाश का रंग समेट लेता है और विंध्य का माथा एक नए सौंदर्य से दीप्त हो उठता है। यह दृश्य केवल आँखों से नहीं देखा जाता, हृदय भी इसे अनुभव करता है। नर्मदा का प्रवाह केवल जल का प्रवाह नहीं है। वह लोकजीवन की स्मृतियों का प्रवाह है। उसके तटों पर जन्मे गीतों में खेतों की हरियाली है, मंदिरों की घंटियाँ हैं, संतों की वाणी है और नाविकों की पुकार भी है। उसकी धारा में इतिहास भी बहता है और भविष्य की आशाएँ भी। वह चलते-चलते गाँवों, नगरों, मनुष्यों और संस्कृतियों को अपने साथ जोड़ती जाती है। शायद इसी कारण भारतीयों ने नदियों को केवल जलधारा नहीं माना। उन्हें माँ और देवी कहकर अपने जीवन का आधार माना है। नदियों के प्रति यह श्रद्धा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। जो सभ्यता अपनी नदियों का सम्मान करती है, वही अपने भविष्य की रक्षा भी करती है। नर्मदा इसी सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक है।
आज विकास की अंधी की दौड़ में नदियाँ सिकुड़ रही हैं, जंगल विरल हो रहे हैं और पर्वतों का मौन विस्फोटों से टूटता जा रहा है, तब “विंध्य के माथे पर नर्मदा का तिलक” केवल एक सुंदर उपमा नहीं रह जाती है। वह एक चेतावनी भी बन जाती है। यदि यह तिलक धूमिल हो गया, तो यह नदी नहीं बचेगी। हमारी संस्कृति का एक उज्ज्वल प्रतीक भी खो जाएगा। प्रकृति का सौंदर्य केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि सँवारने की जिम्मेदारी भी है। विंध्य और नर्मदा का यह अद्भुत संबंध हमें सिखाता है कि शक्ति और संवेदना दोनों साथ-साथ चलता रहे, स्थिरता और प्रवाह एक-दूसरे का सम्मान करें, और मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका सहयात्री बनकर रहे।
“आज भी जब मेरे मन में ‘विंध्य के माथे पर नर्मदा के तिलक’ का भाव उभरता है, तब ऐसा लगता है कि जैसे भारत माता स्वयं ध्यानमग्न होकर बैठी हैं।” उनके मध्य भाग में विंध्य तपस्वी की तरह विराजमान है और नर्मदा ने उनके मस्तक पर आशीर्वाद, करुणा और जीवन का चिरंतन तिलक अंकित कर दिया है। यह तिलक मिटने के लिए नहीं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी स्मृतियों, संस्कृति और हमारी चेतना को आलोकित करने के लिए है। वास्तव में, विंध्य के माथे पर नर्मदा का तिलक प्रकृति का केवल एक दृश्य नहीं, भारत की आत्मा का उज्ज्वल हस्ताक्षर है।