लोकतंत्र का क्षरण : जब विरोध की भाषा गाली बन जाए

“असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, किंतु मर्यादा उसका प्राण है”

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यहाँ विचारों की विविधता को शक्ति माना गया है। यही कारण है कि इस देश में सरकारें बदलती हैं, नीतियाँ बदलती हैं, सत्ता बदलती है, परंतु लोकतंत्र की मूल भावना अक्षुण्ण रहती है। किंतु जब विरोध की भाषा शालीनता छोड़कर अशिष्टता का रूप धारण कर ले, जब वैचारिक संघर्ष व्यक्तिगत अपमान में परिवर्तित हो जाए और जब सार्वजनिक मंचों पर गालियाँ विचारों का स्थान लेने लगें, तब यह केवल राजनीतिक गिरावट नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चरित्र के क्षरण का संकेत माना जाएगा।

लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को सरकार की आलोचना करने का अधिकार है। यदि सरकार की कोई नीति जनहित के प्रतिकूल प्रतीत होती है, तब उसका शांतिपूर्ण, तार्किक और संवैधानिक विरोध होना चाहिए। यही लोकतंत्र की सुंदरता है। परंतु यदि विरोध का माध्यम अश्लील भाषा, व्यक्तिगत अपमान, घृणा और अमर्यादित व्यवहार बन जाए, तो वह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा का उल्लंघन माना जाएगा।

हाल के दिनों में कुछ सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान देश के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रति तथा उनकी दिवंगत माता के संदर्भ में अत्यंत आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग सुनने को मिला। किसी भी व्यक्ति के राजनीतिक विचार चाहे जो हों, यह स्वीकार करना कठिन है कि किसी लोकतांत्रिक विमर्श में ऐसी भाषा का कोई स्थान हो सकता है। भारतीय संस्कृति में तो शत्रु के प्रति भी भाषा की मर्यादा बनाए रखने का आदर्श रहा है। हमारी सभ्यता ने सिखाया है कि मतभेद विचारों से होते हैं, परिवारों और दिवंगत व्यक्तियों के अपमान से नहीं।

इतिहास साक्षी है कि महान आंदोलनों की पहचान उनकी भाषा, अनुशासन और नैतिक शक्ति से होती है। महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध किया, पर उनकी वाणी में संयम था। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने व्यवस्था की कठोर आलोचना की, पर उनका सबसे बड़ा हथियार तर्क था। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने सत्ता परिवर्तन का आह्वान किया, किंतु व्यक्तिगत विद्वेष को कभी आंदोलन का आधार नहीं बनाया। यही लोकतंत्र की सर्वश्रेष्ठ परंपरा रही है।

आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कौन किस दल का समर्थक है। प्रश्न यह है कि क्या हम अपने सार्वजनिक जीवन में भाषा की गरिमा को बचाए रख पाएँगे या … ? क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को यही सिखायेंगे कि असहमति का उत्तर गाली होता है। तब वे संवाद की संस्कृति नहीं, बल्कि टकराव की संस्कृति को विरासत में पायेंगे। इससे सबसे अधिक क्षति किसी सरकार या किसी नेता की नहीं होगी, बल्कि लोकतंत्र की होगी। यदि किसी आंदोलन में कुछ लोग मर्यादा-विहीन आचरण करते हैं, तब उसके ऊपर व्यवहार की आलोचना और आवश्यक कानूनी कारवाई उचित है।

भारत की पहचान केवल आर्थिक विकास, वैज्ञानिक उपलब्धियों या सैन्य शक्ति से नहीं बनेगी। उसकी वास्तविक पहचान उसके नागरिकों के संस्कार, उनकी भाषा और लोकतांत्रिक आचरण से बनेगी। संसद की गरिमा, न्यायालय की गरिमा और संविधान की गरिमा तभी सुरक्षित रह सकती है, जब समाज अपनी वाणी की गरिमा को बनाए रखेगा। आज आवश्यकता किसी एक दल का पक्ष लेने या दूसरे का विरोध करने की नहीं, बल्कि उस भारतीय संस्कृति की रक्षा करने की है, जिसने हमें सिखाया है-

“सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय भी संयम से बोलो, क्योंकि शब्द केवल ध्वनि नहीं, वे चरित्र का परिचय होते हैं।”

लोकतंत्र की विजय चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिकों की सभ्यता से होती है। विरोध कीजिए, प्रश्न पूछिए, असहमति व्यक्त कीजिए, परंतु शब्दों को इतना पतित मत होने दीजिए कि वे स्वयं लोकतंत्र के सम्मान को आहत कर दें। क्योंकि जब भाषा मर्यादा खो देती है, तब राष्ट्र का नैतिक बल भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है।

“राष्ट्र की शक्ति उसकी सेना से सुरक्षित होती है, संविधान उसकी व्यवस्था को सुरक्षित रखता है, परंतु उसकी आत्मा उसके नागरिकों की वाणी और संस्कारों से सुरक्षित रहती है। यदि शब्द गिर जाते हैं, तो समाज भी देर-सबेर गिरने लगता है।”

जय हिन्द

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