स्मृतियों की छाँह में ‘दूसरा बचपन’

मनुष्य का जीवन एक वृत्त की भाँति है- जहाँ से यह आरंभ होता है, अंततः वहीं लौट आता है। बचपन से युवावस्था, फिर प्रौढ़ावस्था और उसके बाद जीवन जब ढलान की ओर बढ़ने लगता है, तब बुढ़ापा आता है, जिसे प्रायः लोग कहते हैं बच्चा और बूढ़ा एक जैसे होते हैं अथार्त दूसरा बचपन कहा जा सकता है। यह संज्ञा केवल शारीरिक दुर्बलता का संकेत नहीं है, बल्कि जीवन की उस अवस्था को दर्शाती है, जहाँ अनुभव गहरे हो जाते हैं, इच्छाएँ सिमट जाती हैं और भावनाएँ पुनः सरल हो जाती हैं।

बुढ़ापे में शरीर धीरे-धीरे शिथिल होने लगता है। आँखों की चमक मंद पड़ जाती है, कदमों की गति धीमी हो जाती है और स्मरण-शक्ति भी धीरे-धीरे साथ छोड़ने लगती है। ठीक वैसे ही जैसे बचपन में बच्चा दूसरों पर निर्भर रहता है, उसी प्रकार बुढ़ापे में भी मनुष्य को सहारे की आवश्यकता पड़ती है। यही कारण है कि इस अवस्था को दूसरा बचपन कहा जाता है। अंतर केवल इतना है कि बचपन के पास भविष्य की अनंत संभावनाएँ होती हैं, जबकि बुढ़ापे के पास बीते हुए जीवन की स्मृतियाँ।

इस अवस्था की सबसे बड़ी पूँजी अनुभव होता है। बुढ़ापे में व्यक्ति जीवन के सुख-दुःख, सफलता-असफलता, प्रेम-विरह सब कुछ देख चुका होता है। इसलिए उसकी बातों में परिपक्वता और सीख छिपी रहती है। यदि समाज और परिवार बुज़ुर्गों की बातों को ध्यानपूर्वक सुनें, तो अनेक भूलों से बचा जा सकता है। किंतु दुर्भाग्यवश, आधुनिक जीवन की तीव्र गति में हम इस अमूल्य अनुभव-संपदा की उपेक्षा करने लगे हैं।

भावनात्मक दृष्टि से बुढ़ापा अत्यंत संवेदनशील अवस्था होती है। थोड़ा-सा स्नेह, सम्मान और अपनापन बुज़ुर्गों के जीवन में नई ऊर्जा भर देता है। जैसे बच्चे छोटी-छोटी बातों में प्रसन्न हो जाते हैं, वैसे ही वृद्ध भी परिवार के साथ बैठकर बातचीत करने, बच्चों की हँसी सुनने और अपने पुराने दिनों को याद कर संतोष व सुख का अनुभव करते हैं। इसके विपरीत, जब उनकी उपेक्षा की जाती है और उन्हें अकेलेपन या बोझ होने का एहसास कराया जाता है, तब उनका मनोबल कमजोर होने लगता है।

अतः बुढ़ापा कोई अभिशाप नहीं, बल्कि जीवन का एक स्वाभाविक और सम्माननीय चरण है। हमें चाहिए कि हम अपने बुज़ुर्गों को दया का नहीं, बल्कि सम्मान का पात्र समझें। उनके दूसरे बचपन को सुरक्षित, स्नेहपूर्ण और गरिमामय बनाना ही एक सभ्य समाज की सच्ची पहचान है।

जय हिन्द

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