डॉ. गोपालराय के महत्वपूर्ण कथन

  • “प्रकृति ने शेखर और शशि को भाई-बहन बनाकर नहीं प्रेमी-प्रेमिका बनाकर भेजा था।”
  • यह एक क्लासिक रोमांटिक उपन्यास है। अपने बंध, चित्रण, वर्ण शिल्प और शैली में यह क्लासिक है और परांगत ऊष्मा में रोमांटिक।”
  • उपन्यास साहित्य की प्रमुख विधाओं में से एक है।
  • 20वीं शताब्दी के अंत के साथ ही हिंदी उपन्यास की उम्र लगभग 130 वर्ष की हो चुकी है। बड़े ही बेमालूम ढंग से 1870 ई. में पं. गौरीदत्त की देवरानी जेठानी की कहानी के रूप में इसका जन्म हुआ, जिसकी तरफ लगभग सौ वर्षों तक किसी का ध्यान भी नहीं गया।
  • इस दृष्टि से सौभाग्यशाली लाला श्रीनिवास दास का परीक्षागुरु (1882) रहा, जिसे हिंदी का प्रथम उपन्यास होने का गौरव प्राप्त हो गया। आज भी इस लकीर को पीटने वालों की कोई कमी नहीं है।
  • प्रस्तुत पंक्तियों के लेखक ने पुष्ट तर्कों के आधार पर देवरानी जेठानी की कहानी को हिंदी के प्रथम उपन्यास के रूप में स्वीकार किया है और 1870 ई. से 2000 ई. तक की अवधी में हिंदी उपन्यास के ऐतिहासिक विकास को समझने का प्रयास किया है।
  • ‘रानी केतकी की कहानी’ मध्यकालीन प्रेमाख्यानों के ढंग की गद्यकथा है।
  • कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ है कि इसमें पहली बार परंपरा से हटकर कथा कहने का प्रयास किया गया है। कथाकार ने पुराने आख्यान लेखकों की तरह किसी राजा, सेठ, सामंत या शूरवीर की कथा न कहकर साधारण मध्यवर्गीय वैश्य परिवार की देवरानी-जेठानी की कहानी कही है।
  • देवरानी जेठानी की कहानी केवल स्त्री-शिक्षा की कहानी नहीं है, वरन यह उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यवर्गीय बनिया समाज के जीवन का प्रतिनिधि, यथार्थ चित्र भी है।
  • गोपाल राय ने लिखा है- प्रेमचंद ने समकालीन मध्यवर्गीय समाज को जो अनेक प्रकार के अंतर्विरोधों, तर्कहीन  सामाजिक मान्यताओं तथा परंपरागत रूढ़ नैतिक धारणाओं से ग्रस्त था आलोचनात्मक दृष्टि से देखा है। उसका अध्ययन विश्लेषण किया तथा उसे अपने कथा संसार के माध्यम से प्रस्तुत किया।
  • सेवासदन में प्रेमचंद ने पहली बार पति से विद्रोह करनेवाली और प्रतिक्रिया में वेश्यावृत्ति अपना लेने वाली स्त्री के प्रति सहानुभूति व्यक्त की है। सुमन को कोई जबरदस्ती वेश्या नहीं बनाता है। वह स्वयं वेश्यावृत्ति अपनाती है। सामाजिक मजबूरियाँ उसे वेश्या बनाती है। वह वेश्या बनकर अपने पति से ही नहीं, पूरे समाज से प्रतिशोध लेती है। वेश्या के रूप में भी सुमन सदन को अपने प्रेमजाल में फंसने से रोककर अपने सामाजिक विवेक का परिचय देती है। यह भी उसका समाज के मुख पर एक तमाचा ही है।
  • प्रेमचंद की नारी पात्र अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति बेचैन तो है, पर वे विद्रोह की दिशा में बहुत दूर तक नहीं जा पाते। वस्तुतः प्रेमचंद अपने नारी विषयक विजन में अंतर्विरोध के शिकार हैं।
  • शेखर एक जीवनी के प्रौढ़ पात्र भी पूरी विश्वसनीयता के साथ उभरे हैं, क्योंकि ये उपन्यासकार के निजी और प्रामाणिक अनुभव की उपज हैं। इस प्रकार अज्ञेय ने उपन्यास को मानव चरित्र-चित्रण का चित्र बनाने की प्रेमचंद की अपेक्षा को पुर्णतः पूरा कर दिया।
  • शेखर एक जीवनी को प्रायः मनोवैज्ञानिक उपन्यास की संज्ञा दी गई है पर यह उस ढंग का मनोवैज्ञानिक उपन्यास नहीं है जैसे डोरोथी रिचर्डसन मार्शल प्रू, वर्जिनिया इफ या जेम्स जॉयस के उपन्यास हैं। इसका कोई भी पात्र असामान्य मानसिकता से ग्रस्त नहीं है। मनोवैज्ञानिक शब्दावली में मनोविश्लेषण शेखर एक जीवनी का उद्देश्य नहीं है। शेखर असाधारण जरुर है, पर उसकी मनोदशा असामान्य मनोविज्ञान के अध्ययन की वस्तु नहीं है।
  • शेखर के बारे में- वह अजन्मा पात्र है, जिसके मन में विकास का अध्ययन उपन्यासकार का अभिप्रेत है। यह मानवता के संचित अनुभवों के प्रकाश में एक क्रांतिकारी पात्र द्वारा स्वयं को पहचानने की कोशिश है। यह चेतना प्रवाह को शब्दबद्ध करने का प्रयास नहीं, वरन् स्मृतियों के प्रलेखन, अतीत के पुनर्भोग और स्वतंत्रता की तलाश में भटकते एक असाधारण पात्र के बैचेनी का आलेख है।
  • अज्ञेय ने पहली बार शेखर एक जीवनी में काल की रैखिक या ऐतिहासिक गति को तोड़ा और पात्रों के बाह्य या मानसिक व्यापार को सुपरिचित समयानुक्रम से विछिन्न कर ताश के फेट दिए गए पत्तों की तरह या टूटी हुई माला के बेतरतीब मनको के रूप में प्रस्तुत किया है।
  • प्रेमचंद और जैनेंद्र के बाद अज्ञेय ने ही हिंदी भाषा को एक साथ परिनिष्ठित और सर्जनात्मक भाषा के उत्कर्ष पर पहुँचाने का काम किया।
  • शेखर एक जीवनी में औपन्यासिक भाषा को भी उत्कर्ष की एक मंजिल प्राप्त हुई। सर्जनात्मक भाषा के उत्कर्ष पर पहुँचाने का काम किया।
  • अज्ञेय की संस्कृतनिष्ठ पर स्वाभाविक और प्रौढ़, भाषा हिंदी गद्य को उत्कर्ष पर पहुँचाती है। वह परिवेश और पात्रों के रूपाकार के अंकन में जितनी समर्थ है, उससे भी अधिक पात्रों की संवेदना और चिंतन मूर्त करने में मनोवैज्ञानिक उपन्यास की भाषा कविता की भाषा के बहुत निकट पहुँचती है, एक जीवनी की भाषा अनेकत्र इसे प्रमाणिक करती है। मौन की भाषा की एक उल्लेखनीय विशेषता मानी जाती है, शेखर एक जीवनी में बहुत सफलता के साथ प्रयुक्त हुई है।
  • बाणभट्ट की आत्मकथा गोपाल राय लिखते हैं, इस उपन्यास ने सबसे पहले अपने शिल्प से पाठकों को चौकाया और आकर्षित किया।
  • यद्यपि राहुल जी भी, सिंह के सेनापति में, इस शिल्प का प्रयोग कर चुके थे, पर बाणभट्ट की आत्मकथा के शीर्षक में जो चमत्कार और अनोखापन है वह सिंह सेनापति में नहीं।
  • सजग पाठक को इस सच्चाई को जानने में देर नहीं लगती कि मिस कैथराइन उपन्यास की एक पात्र है जिसकी कथा के माध्यम से उपन्यासकार की प्रेम संवेदना अभिव्यक्त हुई है। वस्तुतः मिस कैथराइन ही बाणभट्ट की आत्मकथा की चंद्रधती या भट्टनी हैं और बाणभट्ट की प्रेम संवेदना स्वयं उपन्यासकार की ही प्रेम संवेदना है, जिसे कथासंसार का रूप देनेवाली मिस कैथराइन बतायी गई हैं।
  • बाणभट्ट की आत्मकथा का कथासंसार इतिहास पर आधारित है, पर उसमे इतिहास बहुत कम और कल्पना तथा लोकश्रुति से प्राप्त प्रसंगों का बाहुल्य है।
  • नागर (अमृतलाल नागर) जी के ऐतिहासिक उपन्यासों में ‘मानस का हंस’ का स्थान शीर्षस्थ है। गोस्वामी तुलसीदास की जीवनी और व्यक्तित्व को आधार बनाकर उपन्यास लिखना एक ऐसा दुसाध्य सृजनकर्म था जिसे सफलतापूर्वक संपन्न कर नागर जी अनायास ही हिंदी उपन्यास साहित्य  में विशिष्ठ स्थान के अधिकारी बन गए हैं।
  • यह काम दुसाध्य इसलिए था कि एक ओर तो गोस्वामी जी की कोई प्रमाणिक जीवनी उपलब्ध नहीं है और दूसरी ओर उनके जैसे भक्त और महाकवि से तादाम्य स्थापित करना, उनकी काया  में प्रवेश कर उनकी आत्मा की ऊँचा से बोलना किसी साधारण प्रतिभा के बूते की बात न थी।
  • अमृतलाल नागर ने इस उपन्यास में अपनी प्रतिभा, अनुभूति सामर्थ्य और शिल्प कौशल से इन दोनों ही समस्याओं पर विजय प्राप्त की है।
  • इतिहास और चमत्कारपूर्ण किंवदन्तियों से बचते हुए नागर जी ने परंपरा की रचनाओं में उपलब्ध संकेतों के आधार पर तुलसी का व्यक्त्तित्व पढ़ने का प्रयास किया है। उपन्यास में तुलसी के जन्म से लेकर उनकी मृत्यु तक का जो जीवन चरित प्रस्तुत हुआ है, यह इतना सजीव, तर्कसंगत और सुसंबद्ध है कि कदाचित ऐतिहासिक तथ्य न होते हुए भी यह पुर्णतः यथार्थ बन गया है।
  • इस जीवन चरित में मोहिनी प्रसंग, विवादास्पद होते हुए भी, तुलसी के चरित्र को बहुत ऊँचाई पर पहुँचा देता है। मोहिनी प्रसंग मानस का हंस का एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग है, जिसमे तुलसी का अपनी ही कमजोरियों से संघर्ष को उनको उदात्त और मार्मिक बनाता है।
  • तुलसी के भक्त रूप को प्रतिष्ठित करने के लिए उपन्यासकार ने उनकी भक्ति-भावना और भक्तिविरोधी सभी तत्त्वों- काम, अर्थ, यश, मोह और अहंता के बीच संघर्ष और उन पर भक्ति के विजय का चित्रण किया है।
  • इस चित्रण में मनिवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि का गंभीर परिचय मिलता है। तुलसी का कवि भी रामभक्ति के प्रति समर्पित है और वह अपने स्वतंत्र अस्तित्व के लिए सदा संघर्ष करते रहने पर भी अंततः अपने को राम भक्ति में ही लय कर देता है। तुलसी के इस रूप का नागर जी ने अभूतपूर्व तल्लीनता और सफलता के साथ चित्रण किया है।
  • मानस का हँस गोस्वामी तुलसीदास की कल्पित, किंतु यथार्थ, जीवनी ही नहीं, अपने समय का सांस्कृतिक इतिहास भी है।
  • इसके कथासंसार में यद्यपि राजनीतिक घटनाएँ भी अनुस्यूत हैं, पर उपन्यासकार का उद्देश्य उनके माध्यम से सांस्कृतिक परिवेश को सजीव बनाना ही है। काशी का सांस्कृतिक परिवेश उपन्यास में इतना सजीव है कि उपन्यासकार की सर्जनात्मक प्रतिभा का कायल होना पड़ता है। कट्टर ब्राह्मणवादी व्यवस्था से तुलसी का संघर्ष तत्कालीन सांस्कृतिक परिवेश के द्वंदात्मक रूप को सामने लाता है।
  • सामाजिक बिडंम्बनाओं के विरुद्ध तुलसी का व्यक्तिगत प्रतिरोध तथा विदेशी शासन के अत्याचारों का सामना करने के लिए जनता को सजग और शक्तिशाली बनाने की तुलसीदास की योजना उपन्यासकार की मौलिक उपलब्धि है।
  • अज्ञेय ने रेणु के उपन्यासों में अखंड मानवी विश्वास की चिनगारी सुलगती देखी है। मैला आँचल में यह चिनगारी डॉ. प्रशांत के मेरीगंज में ही रहकर प्यार की खेती करने के संकल्प तथा विश्वनाथ प्रसाद द्वारा अपनी जमीन का एक हिस्सा मेरीगंज के भूमिहीन किसानों में बाँट देने के निश्चय में दिखाई देती है। यह चिंगारी प्रकृतितः प्रेमचंद के आदर्शवाद से बहुत भिन्न नहीं है।
  • विश्वनाथ प्रसाद का भूमि-वितरण तो लगभग प्रेमचंद के प्रेमाश्रम के सामान ही है। यह भी एक आरोपित यथार्थ है जिसके पीछे कोई वैज्ञानिक विचारधारा नहीं है। इसे करुणा की अंतः सलिला कहकर गौरवान्वित करने की कोई सार्थकता नहीं है। विश्वनाथ प्रसाद के ह्रदय परिवर्तन में करुणा के स्थान पर दया का भाव अधिक है और गहराई में जाने पर वह एक तरह की चालाकी ही प्रतीत होती है।
  • डॉ. प्रशांत के व्यक्तित्व में करुणा की यह अंतः सलिला है, पर इस प्रकार की करुणा तब तक कारगर नहीं होती जब तक अन्यायी पक्ष के पार्टी के प्रति आक्रोश या घृणा का भाव न हो। डॉ. प्रशांत में इस प्रकार का कोई आक्रोश है ही नहीं, अतः संदेह होता है कि उसके प्यार की खेती का संकल्प व्यावहारिक रूप में सफल होगा भी।
  • मैला आँचल की एक उल्लेखनीय विशेषता इसका वैविध्यपूर्ण कथासंसार है। इसमें लगभग 300 पात्र हैं। इनमें 165 पात्र तो मेरीगंज गाँव के ही हैं। शेष पात्र मेरीगंज के बाहर के हैं जो मेरीगंज की जिंदगी को अपने आसपास अथवा पूरे देश की जिंदगी से जोड़ते हैं।
  • मैला आँचल में एक भी ऐसा पात्र नहीं, जिसे केन्द्रीय कहा जा सके, नायक कहा जाने लायक पात्र तो इसमें कोई है ही नहीं। लगभग आधा दर्जन पात्र डॉ. प्रशांत, विश्वनाथ प्रसाद, कालीचरण, बालदेव, कमली, लक्ष्मी आदि किंचित प्रमुखता प्राप्त करते हैं, पर वे सब मिलकर भी मैला आँचल की पूरी कहानी या कथ्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते।
  • वस्तुतः रेणु ने अपने कथ्य के अनुरूप ही अपने पात्रों का संसार भी निर्मित किया है। चूँकि मेरीगंज इस संसार के केंद्र में है, अतः इसके आधे से अधिक पात्र या तो मेरी गंज के निवासी हैं या मेरीगंज उनका प्रमुख कार्यक्षेत्र है। एक पिछड़े अंचल को उसकी समग्रता में प्रस्तुत करने के लिए पात्रों में जितना अधिक वैविध्य लाया जा सकता है, उतने की कोशिश रेणु ने की है।
  • मेरीगंज जातियों के आधार पर अनेक टोलों में बँटा हुआ है। इनमे से कुछ टोले पिछड़ी जातियों के हैं, जिनके लोग निहायत गरीब, अशिक्षित, अन्धविश्वासी और बौद्धिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं। उपन्यासकार ने इस वर्ग से लगभग सौ पात्रों का चयन किया है, जिनके नामकरण से लेकर व्यक्तित्व रचना तक उसमे अत्यंत सावधानी का परिचय दिया है।
  • मेरीगंज के विभिन्न जातियोंवाले टोलों के विशिष्ट सामूहिक चरित्र निर्माण में रेणु ने अद्भुत अवलोकन क्षमता और सर्जनशीलता का परिचय दिया है।
  • कालीचरण मैला आँचल का सर्वाधिक सक्रीय और जीवंत पात्र है। वह हिंदी उपन्यास में गोबर और बलचमना की परंपरा की अगली कड़ी है।
  • कालीचरण पिछड़े और उपेक्षित अंचल की नयी पीढ़ी के विद्रोह को मुखरित करता है।
  • आलोचकों ने एक स्वर में मेरीगंज को मैला आँचल के नायक के रूप में स्वीकार किया है। सर्वप्रथम नलिन विलोचन शर्मा ने मेरीगंज को एक पात्र के रूप में देखने की दृष्टि प्रदान की थी। मैला आँचल से अपेक्षाकृत प्रमुख पात्र सात, गौण पात्र तीस और मात्र उल्लेखित होने योग्य पात्र लगभग 200 हैं पर प्रमुख पात्रों में से एक भी पात्र नायक की संज्ञा पाने लायक नहीं है। प्रशांत और कालीचरण दोनों नायक बनते-बनते रह गए हैं।
  • मेरीगंज पूरे उपन्यास की कथा पर हावी रहता है। उपन्यासकार ने किसी पात्र को मेरीगंज से बड़ा नहीं बनने दिया है। अतः यह मानना असंगत नहीं है कि मैला आँचल में मेरीगंज की कल्पना एक पात्र के रूप मर सी गई है। मेरीगंज ही मैला आँचल का विषय है अतः उसकी प्रस्तुति उपन्यास के केन्द्रीय पात्र के रूप में, उसे स्पष्ट और संपूर्ण व्यक्तित्व प्रदान करते हुए की गई है।
  • अंत में रेणु के प्रसंग में दो बातों का उल्लेख आवश्यक है। प्रथम यह कि रेणु हिंदी में आंचलिक उपन्यास के जन्मदाता के रूप में प्रसिद्ध हैं। यद्यपि ऐतिहासिक दृष्टि से इस मान्यता को चुनौती दी जा सकती है, पर उपन्यास में आंचलिक के तत्त्व को उन्होंने ऐसी सर्जनात्मक सार्थकता प्रदान की जो उनके पहले या बाद में फिर नहीं दिखाई पड़ी। इस दृष्टि से रेणु आंचलिक उपन्यास के प्रतिष्ठापक कहे जा सकते हैं। आंचलिक उपन्यास का आन्दोलन तो उनसे आरंभ हुआ माना जाता है।
  • राग दरबारी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के एक कस्बानुमा गाँव शिवपाल गंज की कहानी है। उस गाँव की जिंदगी का दस्तावेज, जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ग्राम विकास और गरीबी हटाओ के आकर्षक नारों के बावजूद घिसट रही है। इस जिंदगी का चित्रण इसके पूर्व नागार्जुन, रेणु, रामदरश मिश्र, शिवप्रसाद सिंह आदि भी कर चुके थे, पर श्रीलाल ने इसे एक्सरे के रूप में देखा और बड़ी निर्ममता के साथ इसका चित्रण किया।
  • प्रेमचंद के जमाने का ग्रामीण किसान गरीब और असहाय होते हुए भी कतिपय मूल्यों से जुड़ा हुआ था। उसके चरित्र में सहजता, सरलता और धर्म भाव था। पर आजादी के दो दशक बाद वह वैसा नहीं रह गया। राजनीति की गंदगी गाँवों में भी पहुँच गयी। पंचायतों, ग्राम सभाओं, सहयोग समितियों और स्कूलों-कॉलेजों की प्रबंध समितियों के चुनाव में वे सभी हथकंडे और घृणित उपाय काम में लाये जाने लगे, जो विधान सभा या संसद के चुनावों में लाये जाते थे। चोरी, डकैती, शोहदागीरी, गवन, भ्रष्टाचार आदि के मामलों में गाँव शहरों से होड़ लेने लगे। राग दरबारी में इस यथार्थ का चित्रण तफसील से किया गया है।
  • पर उपन्यास के रूप में राग दरबारी एक असफल कृति है। इसका कारण उपन्यास और व्यंग्य जैसे दो परस्पर विरोधी अनुशासनों को एक दूसरे से जोड़ने का प्रयास है। व्यंग्य के लिए कथा का उपयोग लाभदायक होता है। पर उसके उपन्यास का ढाँचा भारी पड़ता है।
  • राग दरबारी का उपन्यासकार भी ग्रामीण कस्बाई जिंदगी का आलोचक अधिक बन गया है, उसका अनुभूति प्रेरित सर्जक कम। अतः बहुत सी स्थितियाँ और प्रसंग आत्यंतिक रूप से उपहासप्रद बन गए हैं।
  • यशपाल उपन्यासकार के रूप में, अज्ञेय की तरह ही, आतंकवादी राजनीतिक आन्दोलन की उपज थे, पर अज्ञेय का आतंकवाद जहाँ किसी विचारधारा के अभाव में फल्गु नदी की तरह किसी निश्चित लक्ष्य पर पहुँचने के पहले ही बिखर गया वहाँ यशपाल का आतंकवाद मार्क्सवाद में विलीन हो गया।
  • दूसरे भाग देश का भविष्य में डॉ. गोपाल राय के शब्दों में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के दशक में देश के विकास और भावी निर्माण में बुद्धिजीवियों और नेताओं की प्रगतिशील और प्रतिगामी भूमिका का यथार्थ अंकन किया गया है।
  • कृष्णा सोबती के प्रथम मुक्कमल उपन्यास जिंदगीनामा (1979) में उनका भाषा यह प्रयोग अस्वाभाविक और असर्जनात्मक हो गया है। हर भाषा की तरह हिंदी में भी अन्य किसी भाषा का मिश्रण एक सीमा तक ही सर्जनात्मक होता है।
  • कृष्णा सोबती ने जिंदगीनामा में परिनिष्ठित हिंदी को पंजाबी प्रयोगों से आक्रांत कर दिया है, जिससे वह हिंदी के पाठकों के लिए प्रायः अबोधगम्य, बोझिल और कृत्रिम हो गई है। यथार्थवाद के किसी भाषा को इस सीमा तक विरूपित नहीं किया जा सकता कि वह अपनी पहचान ही खो दे।
  • जिंदगीनामा के आरम्भ में छपे वक्तव्य के अनुसार यह एक ऐसा इतिहास है, जो लोकमानस के भगीरथी के साथ बहता, पनपता और फैलता है और जन सामान्य के सांस्कृतिक पुख्तापन में ज़िंदा रहता है।
  • जिंदगीनामा बीसवीं शताब्दी के प्रथम पंद्रह वर्षों में पंजाब के किसानों-ग्रामीणों के जीवन का चित्रण है। यह जिंदगी निखालिस यथार्थ के रूप में सामने आती है; पंजाबी किसानों की मेहनत-मशक्कत से भरी अक्खड़ संतुष्ट और मुक्त जिंदगी, जिसमे महाजन का शोषण और पुलिस का आतंक भी कोई ज्यादा हलचल नहीं पैदा करता। साम्प्रदायिक भेदभाव से रहित, सहयोग और सद्भाव, हँसी-ख़ुशी और छोटे-मोटे ग़मों से भरे दिन-रात, ब्रिटिश शासन की अजेयता के प्रति आस्था आदि के छोटे-छोटे यथार्थ और प्यारे चित्र उपन्यास में भरे पड़े हैं। उपन्यास के अंतिम हिस्से में प्रथम विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश सरकार द्वारा जवानों की सेना में जबरन भर्ती और युद्धकोश की वसूली से उत्पन्न आशंका, आतंकवादियों की छुटपुट हरकतों और उनके प्रति ब्रिटिश हुकूमत के दमनकारी रवैये आदि के उल्लेख भी प्राप्त होते हैं।
  • इस प्रकार जिंदगीनामा अपने शीर्षक की सार्थकता तो प्रामाणित करता है, पर इसमें वह विजन नहीं है जो किसी उपन्यास को महान या पुरस्करणीय बनाता है। इसका कथासंसार चित्रों के अलबम के रूप में है, जिसमे कोई लय या प्रवाह नहीं है। संवेदनात्मक गहराई और तीव्रता के अभाव के कारण औपन्यासिक संसार बबूल के जंगल सा प्रतीत होता है।
  • मानवीय संबंधों की मोहकता, कटुता, जटिलता या किसी प्रकार की वैचारिक चिंता की कमी के कारण उपन्यास अनाकर्षक हो गया है। लोकगीतों, बालगीतों, किस्सा-कहानियों, चुटकुलों आदि के बहुल प्रयोग कोई गहरा प्रभाव पैदा नहीं करते। लोक-प्रथाओं के अनावश्यक विवरण भी उचकाने वाले हैं। आँचलिक बोध अनावश्यक रूप से उपन्यास पर हावी हैं।
  • जिंदगीनामा में दृश्यों का ही एकाधिपत्य है। पर ये दृश्य, दृश्य कम, वार्तालाप अधिक हैं। इन्हें जोड़ने वाले कथाकार की भूमिका रंग-निर्देशक जैसी हैं। इसके फलस्वरूप कथा-रस तो बाधित हुआ ही है, प्रयोग की कोई सार्थकता भी प्रमाणित नहीं होती।
  • आपका बंटी में मन्नू भंडारी ने तलाकशुदा पति-पत्नी और उनकी शिशु संतान को केंद्र में रखकर उसके चारो ओर की स्थितियों का ऐसा जाल बुना तथा उसकी वास्तविकता का ऐसा चित्र प्रस्तुत किया है जो संवेदनशील और विचारवान को झकझोर देता है।
  • दाम्पत्य संबंध का विघटन और नये सिरे से, नये संबंध बनाकर जीने की चुनौती और त्रासद हो जाती है जब इसके बीच कोई संवेदनशील बाल संतान आ खड़ी होती है।
  • मन्नू भंडारी ने इस आधुनिक जटिल स्थिति का गहारी संवेदनशील और तीखे बोध के साथ अंकन किया है। इस स्थिति की मूल संवेदना तो बंटी की पीड़ा ही है। अपने माता-पिता के संबंध विच्छेद और उनके नये सिरे से दाम्पत्य संबंध शुरू करने के कारण अनचाहे अस्तित्व में परिणत हो गया है, पर तलाकशुदा पति-पत्नी में नये संबंधों की मांग और संतान के प्रति संवेदनशीलता के तनाव का अंकन भी गहरी मनोवैज्ञानिक समझ के साथ किया गया है। विषय के प्रामाणिक बोध और संवेदनशीलता के साथ शिल्प और भाषा के सर्जनात्मक उपयोग ने आपका बंटी को श्रेष्ठ उपन्यासों की पंक्ति में अवस्थित कर दिया है।
  • नरेटर तथा बंटी शकुन आदि पात्रों के अवलोकन बिन्दुओं का मिश्रण और स्थानान्तरण, विशेषकर बंटी की संवेदना से उसके आसपास की स्थितियों को देखना-महसूसना, पाठक के लिए बड़ा ही मर्मस्पर्शी अनुभव है।
  • गोपालराय के अनुसार हिंदी उपन्यास में विवाहपूर्व प्रेम का अंकन भी रहस्यकथा उपन्यास से ही आरंभ होता है।
  • नूतन ब्रह्मचारी उपन्यास का पूरानाम नूतन ब्रह्मचारी एक सहृदय के हृदय का विकास है। इसमें विनायक राव नाम का बालक केंद्रीय पात्र है जो नूतन ब्रह्मचारी और सहृदय है। उसके चरित्र का विकास प्रस्तुत करना ही उपन्यास का लक्ष्य है।
  • गोपालराय के अनुसार नूतन ब्रह्मचारी की कथा तब की है जब भारत पर अंग्रेजों का एकक्षत्र राज नहीं था। उस समय पिंडारी लूट-पाट करते थे। इस उपन्यास में ब्रह्मचारी विनायक के सद्व्यवहार के माध्यम से डाकुओं का हृदय परिवर्तन दिखाया गया है।
  • नूतन ब्रह्मचारी की ऐतिहासिक कथावस्तु के आधार पर डॉ. गोपालराय ने बालकृष्ण भट्ट को प्रथम ऐतिहासिक उपन्यासकार माना है।
  • गोपालराय के अनुसार राधाकृष्णदास द्वारा रचित ‘निस्सहाय हिंदू’ हिंदी का पहला ऐसा उपन्यास है जिसमे मुस्लिम समाज का अंकन हुआ है। यह गोवध-निवारण हेतु लिखा गया उपन्यास है।
  • ‘चंद्रकांता’ का प्रकाशन हिंदी उपन्यास के इतिहास में एक ऐसी घटना है, जिसने उपन्यास के स्वरुप में अभूतपूर्व परिवर्तन ला दिया। मानो एक पहाड़ी नदी मैदान में उतर आई हो।
  • गोपालराय के अनुसार ‘भिखारिणी’ उपन्यास में जाति-भावना के द्वंद्व में प्रेम की पराजय और त्रासदी का चित्रण हुआ है।
  • गोपालराय के अनुसार ‘निरुपमा’ में निराला ने अपने समय के आर्थिक एवं वैचारिक रूप से पिछड़े, रूढ़िगत संस्कारों में जकड़े ग्रामीण समाज का बड़ा तल्ख़ चित्रण किया है।
  • गोपालराय के अनुसार ‘हृदय की परख’ उपन्यास में विवाहपूर्व प्रेम और फलस्वरूप माता-पिता बन जाने वाले प्रेमियों तथा अवैध संतान की समस्याओं का चित्रण किया गया है।
  • गोपालराय के अनुसार ‘वैशाली की नगरवधू’ में बौद्ध साहित्य की सुप्रसिद्ध पात्र अम्बपाली के चित्रण को केंद्र में उस काल की ब्राह्मण, बौद्ध और जैन संस्कृतियों के मध्य टकराव तथा मगध, काशी, कोशल और गणराज्य वैशाली के राजनीतिक संघर्षों का अंकन हुआ है।
  • गोपालराय के अनुसार, ‘इलाचंद्र जोशी’ को हिंदी में मनोवैज्ञानिक उपन्यास का पुरस्कर्ता माना जा सकता है। यों तो जैनेंद्र कुमार ने उपन्यास में सामाजिक प्रश्नों की तुलना में मनोवैज्ञानिक स्थितियों का अधिक महत्त्व देने की पहल की, पर शुद्ध मनोवैज्ञानिक समस्याओं को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखने की पहली कोशिश जोशी जी ने नहीं की।
  • डॉ. गोपालराय के अनुसार इसमें विश्वविद्यालय परिसर की पृष्ठभूमि में एक असफल वैवाहिक जीवन और मध्यवर्गीय सामाजिक जीवन के मूल्यों के दबाव में प्रेम के बाद अंत का चित्रण है।
  • डॉ. गोपालराय ने लिखा है- “व्यक्ति के आतंरिक जीवन, मानसिक द्वंद्व, मूल्यविषयक संघर्ष आदि को अधिक गहराई और सर्जनात्मकता के साथ उपन्यास का विषय बनाने का श्रेय जैनेंद्र कुमार को है।
  • गोपालराय के अनुसार ‘भूले-बिसरे चित्र’ में तीन पीढ़ियों (1890-1930) की सोच और मानसिकता के बदलाव, पुरानी पीढ़ी के साथ नई पीढ़ी के संघर्ष, औपनिवेशिक शासन के प्रति बुद्धिजीवी वर्ग के मोहभंग और विद्रोह का अंकन किया गया है।
  • डॉ. गोपालराय ने लिखा है कि वर्मा जी के पूर्व हिंदी में, सही अर्थों में ऐतिहासिक उपन्यास का अभाव था। (भगवतीचरण वर्मा)
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में, वैज्ञानिक इतिहास-बोध के साथ बुंदेलखंड अंचल के जातीय गौरव की गाथा इन उपन्यासों में पूरी मार्मिकता के साथ प्रस्तुत हुई है।
  • वृंदावनलाल वर्मा कृत ‘झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को डॉ. गोपालराय ने ब्रिटिश कालीन भारतीय इतिहास पर आधारित हिंदी का पहला उपन्यास माना है।
  • अनामदास का पोथा उपन्यास को आख्यान भी कहा गया है। डॉ. गोपालराय के अनुसार अनामदास का पोथा का लक्ष्य औपनिषदिक् आध्यात्म चिंतन का पुनराख्यान नहीं वरण उसको आज की जिंदगी के अनुरूप व्याख्या है।
  • राहुल संकृत्यायन के ऐतिहासिक उपन्यासों के संदर्भ में डॉ. गोपालराय लिखते हैं- इनमें इतिहास कम, ऐतिहासिक यथार्थ अधिक है। ऐतिहासिक व्यक्तियों और उनसे संबद्ध घटनाओं के ब्योरेवार वर्णन कम हैं। उन्होंने ऐतिहासिक यथार्थ पर अधिक बल दिया है।
  • गोपालराय लिखते हैं कि वस्तुतः ‘पानी के प्राचीर’ और ‘जल टूटता’ उपन्यासकार के एक ही संपूर्ण जीवन के अंग हैं। इस विजन में घाघरा-ताप्ति का वह अभावग्रस्त और अभिशप्त ग्रामीण क्षेत्र है जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सुखी जीवन के सपने देख रहा था।
  • डॉ. गोपालराय ने निर्मल वर्मा को अस्वाद, निराला, अलगाव बोध, संत्रास भाव और मन की अंधकार भरी गुफा भटकने वाली चेतना का उपन्यासकार कहा है।
  • गोपालराय के शब्दों में- “यह (उसने कहा था) हिंदी की पहली कहानी है जिसमे एक तरफ पंजाब की पृष्ठभूमि है तो दूसरी तरफ फ़्रांस की जमीन पर लड़े जा रहे प्रथम विश्व युद्ध की युद्ध और प्रेम के साथ चलनेवाली संवेदना। चित्रण की दृष्टि से यह कहानी आज भी हिंदी में अकेली है।”
  • गोपालराय के शब्दों में- “कानों में कंगना तत्कालीन सामंती परिवेश में पत्नी और वेश्या के प्रति प्रेम की टकराहट पर आधारित भावुकता पूर्ण कहानी है, जो मन में (किरण) के प्रति करुणा उत्पन्न करती है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- “आकाशदीप संवाद शैली में आरंभ होनेवाली हिंदी की पहली कहानी है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- “आकाशदीप की कहानियों का परिवेश अपने समय का यथार्थ न होकर इतिहास है। काल्पनिक कथाओं का रूमानी परिवेश है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ अभिव्यक्ति की दृष्टि से हिंदी की प्रथम कहानी है।
  • डॉ. गोपालराय के अनुसार- “राही कहानी अपनी सीमित कलेवर में जन-कल्याण, गरीबों की सेवा और गुमराह लोगों की के पथ प्रदर्शन का संदेश बखूबी मुखरित करती है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- “सिक्का बदल गया में वतन छोड़ने की सशक्त अभिव्यक्ति हुई है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- “पिता पीढ़ियों की सोच और जीने के तौर-तरीकों की खाई को व्यक्त करनेवाली कहानी है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- “दुलाईवाली चुहलबोधम की  कहानी है, जिसमें मध्यमवर्ग के आर्थिक अभावों का भी चित्रण है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- ‘तीसरी कसम’ आँचलिक परिवेश में रचित चित्रात्मक कहानी है, जिसमें प्रेम की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- “लाल पान की बेगम’ गाँवों में बसी निश्छल एवं उदात्त मानवीय भावनाओं की कहानी है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- “परिंदे प्रेम की टीस से युक्त अंतर्मन की पीड़ा को चित्रित करनेवाली मार्मिक कहानी है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- “चीफ की दावत पुरातन पीढ़ी के प्रति आधुनिक पीढ़ी की मूल्यहीनता का यथार्थवादी चित्रण है।”
  • डॉ. गोपालराय के शब्दों में- “देश के विभाजन के समय पाकिस्तान से हिन्दुस्तान आनेवाली ट्रेनों के दहशद अविश्वास और निश्चय भरे यात्रियों की मानसिकता की यह कहानी है।” (अमृतसर आ गया)

              जय हिन्द

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