जिस गंगा की धारा ने
कालजयी गीत सुनाए हैं
जहाँ खेतों की हरियाली ने
जीवन के स्वर सजाए हैं।
यह वही है बिहार –
भारत के मस्तक पर
अनुभव का तिलक लगाए हैं।
भूतकाल में
यह भूमि केवल भूमि नहीं,
पुरखों की स्मृतियों का मान है
कण-कण में गूँजता इसके
अनगिनत इतिहास का गान है।
पाटलिपुत्र की वीथियों में
राजनीति ने आँखें खोलीं थी,
चाणक्य की चतुराई में
साम्राज्य की रेखाएँ बोलीं थी।
पाटलिपुत्र की गौरव गाथा से
मौर्यों का स्वर्णिम विस्तार हुआ,
चाणक्य की नीति में बसता,
राष्ट्र चिंतन का अमृत सार हुआ।
अशोक ने यहीं से खड़े होकर
रण-मद को त्यागा था,
मानवता के पथ पर चलने को
विश्व में संदेश जागा था।
नालंदा की प्राचीरों पर
ज्ञान सूर्य सा दमकता था,
दूर देशों से हर विद्यार्थी यहाँ
विद्या-पाने को आता था।
यहीं पर वैशाली ने
लोकतंत्र का दीप जलाया था,
जनमत की पहली धड़कन को
इतिहास ने शीश नवाया था।
विक्रमशिला के द्वारों पर
यहीं शास्त्रों का गान हुआ,
इसी पावन धरा पर बुद्ध को
अलौकिक ज्ञान हुआ।
सीता की करुणा, जनक की नीति
बुद्ध ने मधुर उपदेश दिया
इस धरती ने हर युग में
जगत को सर्वश्रेष्ठ संदेश दिया।
पर इतिहास का वैभव लेकर
इसने बहुत परीक्षा झेली,
कभी अकाल, बाढ़, विकराल
पीड़ा, गरीबी की दंश भी झेली।
वर्तमान में
कभी श्रमिक बनकर दूर गए
अपने ही घर के लाल,
कन्धों पर संसार उठाया,
मन में फिर भी नहीं मलाल।
आज वही बिहार खड़ा है
अपनी नव संकल्पों को लिए
विद्यालयों की शंख ध्वनि से
विज्ञानों की चाह लिए।
जगी जागृति गाँवों-नगरों में
जन-जन में उत्साह जगा
मेहनत ने अपने हाथों से
नवयुग का निर्माण रचा।
स्वप्न सजाते युवा यहाँ के,
पुस्तक, तकनीक, विचार लिए
कृषि में नवाचार लिए
उद्योगों का विस्तार किए।
स्त्री-शिक्षा, शक्ति, सम्मान
नव समाज का बने आधार,
हर घर में अवसर की ज्योति,
हर जीवन त्यौहार बने।
और कहे भविष्य-
जब फिर नालंदा-सा ज्ञान जागेगा
जब श्रम को उसका मान मिलेगा
जब खेतों में विज्ञान खिलेगा
जब हर बालक विद्यालय में मिलेगा।
पुनः बिहार उठेगा ऐसे
सूरज पूरब से उठता है जैसे
तब भारत के नव निर्माण में
स्वर्ण अध्याय फिर से खिलेगा
कहे भूगोल –
उत्तर में हिम का संदेश लिए
नेपाल की सीमाएँ हैं,
दक्षिण में पर्वत-शृंखलाओं की
शांत, पुरानी छायाएँ हैं।
बीचों-बीच जहाँ गंगा बहती,
जीवन का विस्तार लिए,
कोसी, गंडक, सोन, पुनपुन
अंचल में उपहार लिए।
मैदानों की उपजाऊ छाती,
धान, गेहूँ की स्वर्ण लहर,
आम्र-वाटिका, लीची की खुशबू,
मिट्टी का अनुपम अंतर।
पर इतिहास का वैभव लेकर भी
यह प्रदेश बहुत कुछ सहता है,
बाढ़ों की पीड़ा, श्रम पलायन,
कभी अभावों में रहता है।
फिर भी माथे पर शिकन नहीं,
आँखों में स्वप्न उजाले हैं,
मेहनत इसके रक्त में बहती,
हाथों में कर्म के छाले हैं।
सड़कों पर गति, नगरों में चेतन,
गाँवों में फिर मुस्कान जगी,
तकनीक, उद्योग, शिक्षा लेकर
नई दिशा की पहचान जगी।
बाहर गए उन्हीं संतानों ने
जग में परिश्रम का मान रखा,
हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा से
बिहार का ऊँचा स्थान रखा।
डॉक्टर, शिक्षक, सैनिक, वैज्ञानिक,
हर सीमा पर नाम लिखा,
मिट्टी की सौंधी खुशबू ने
हर दिल में सम्मान लिखा।
तेरे अतीत में दीप जले,
तेरे वर्तमान में शक्ति रहे,
तेरे भविष्य के हर पथ पर
उन्नति की उजली भक्ति रहे।