महादेवी वर्मा : ठकुरी बाबा (रेखाचित्र) भाग-1 Mahadevi Verma : Thakuri Baba

भक्तिन को जब मैंने अपने कल्पवास संबंधी निश्चय की सूचना दी तब उसे विश्वास ही न हो सका। प्रतिदिन किस तरह पढ़ाने आऊँगी, कैसे लौटूंगी, ताँगेवाला क्या लेगा, मल्लाह कितना माँगेगा, आदि-आदि प्रश्नों की झड़ी लगाकर उसने मेरी अदूरदर्शिता प्रमाणित करने का प्रयत्न किया।

मेरे संकल्प के विरुद्ध बोलना उसे और अधिक दृढ़ कर देना है, इसे भक्तिन जान चुकी है; पर जीभ पर उसका वश नहीं। इसी से अपने प्रश्नों की अजस्र वर्षा में भी मुझे अविचलित देखकर वह मुँह बिचकाकर कह उठी- ‘कल्पवास की उमिर आई तब उहौ हुइ जाई। का एकै दिन सब नेम-धरम समापत करै की परतिग्या है ?’

यह सब, मैं नियम-धर्म के लिए नहीं करती, यह भक्तिन को समझाना कठिन है, इसी से मैं उसे समझाने का निष्फल प्रयत्न करने की अपेक्षा मौन रहकर उसकी भ्रांति को स्वीकृति दे देती हूँ। मौन मेरी पराजय का चिह्न नहीं, प्रत्युत् वह जय की सूचना है, यह भक्तिन से छिपा नहीं, संभवतः इसी कारण वह मेरे प्रतिवाद से इतना नहीं घबराती जितना मौन से आतंकित होती है, क्योंकि प्रतिवाद के उपरांत तो मत-परिवर्तन सहज है; पर मौन में इसकी कोई संभावना शेष नहीं रहती।

अंत में भक्तिन- जैसे मंत्री की सलाह और सम्मति के विरुद्ध ही, सिरकी, बाँस आदि के गट्ठर समुद्रकूप की सीढ़ियों के निकट एकत्र हो गए और मल्लाह मिलकर विश्वकर्मा का काम करने लगे। बीच में दस फीट लंबी और उतनी ही चौड़ी साफ-सुथरी कोठरी बनी और उसके चारों ओर आठ फीट चौड़ा बरामदा बनाया गया। उत्तर वाला बरामदा मेरे पढ़ने-लिखने के लिए निश्चित हुआ और दक्षिण में भक्तिन ने अपने चौके का साम्राज्य फैलाया। पश्चिम वाले बरामदे में उसने सत्तू, गुड़ आदि रखने के लिए सींका टाँगा और धोती, कथरी आदि टाँगने के लिए अलगनी बाँधी। कोठरी का द्वार जिसमें खुलता था, वह अभ्यागतों के लिए बैठकखाना बना दिया गया। इस प्रकार सब बन चुकने पर भक्तिन का टाट और मेरी शीतल पाटी, उसकी धुँधली लालटेन और मेरा पीतल के दीवट में झिलमिलाने वाला दीया, उसकी राँगे-जैसी बाल्टी और मेरी लपट- जैसी चमकती हुई ताँबे की कलशी, उसकी हल्दी, धनिया, आटा, दाल आदि की भौतिकता से भरी मटकियाँ और मेरे न जाने कब के पुरातन तथा सूक्ष्म ज्ञान से आपूर्ण संस्कृत ग्रंथ आदि से वह पर्णकुटी एकदम बस गई।

तब भक्तिन का और मेरा कल्पवास आरंभ हुआ। हमारे आसपास और भी न जाने कितनी पर्णकुटियाँ थीं; पर वे काम चलाऊ भर कही जाएँगी ।

किसी समय इस कल्पवास का कितना महत्त्व रहा होगा, इसका अनुमान लगाने के लिए इसका आज का समारोह भी पर्याप्त है। संभवतः उस समय देश के विभिन्न खंडों में रहने वाले व्यक्तियों के मिलन, उनके पारस्परिक परिचय, विचारों के आदान-प्रदान तथा सांस्कृतिक समन्वय का यह महत्त्वपूर्ण साधन रहा होगा। ये नदियाँ इस देश की रक्तवाहिनी शिराओं के समान जीवनदायक रही हैं, इसी से इनके तट पर इस प्रकार के सम्मेलनों की स्थिति स्वाभाविक और अनिवार्य हो गई हो, तो आश्चर्य नहीं। आज इस संबंध में क्या और क्यों तो हम भूल चुके हैं; पर बिना जाने लीक पीटना धर्म बन गया है।

मुझे इस कल्पवास का मोह है, क्योंकि इस थोड़े समय में जीवन का जितना विस्तृत ज्ञान मुझे प्राप्त हो जाता है, उतना किसी अन्य उपाय से संभव नहीं । और जीवन के संबंध में निरंतर जिज्ञासा मेरे स्वभाव का अंग बन गई है।

गर्मियों में जहाँ-तहाँ फेंकी हुई आम की गुठली जब वर्षा में जम जाती है, तब उसके पास मुझसे अधिक सतर्क माली दूसरा नहीं रहता। घर के किसी कोने में चिड़िया जब घोंसला बना लेती है, तब उसे मुझसे अधिक सजग प्रहरी दूसरा नहीं मिल सकता। मेरे चारों ओर न जाने कितने जंगली पेड़-पौधे, पक्षी आदि मेरे सामान्य जीवन- प्रेम के कारण ही पनपते, जीते रहते हैं। जिसका दूध लग जाने से आँख फूट जाती है, वह थूहर भी मेरे सयत्न लगाए आम के पार्श्व में गर्व से सिर उठाए खड़ा रहता है। धँसकर न निकलने वाले काँटों से जड़ा हुआ भटकटैया, सुनहले रेशम के लच्छों में ढके और उजले कोमल मोतियों से जड़े मक्का के भुट्टे के निकट साधिकार आसन जमा लेता है।

न जाने कितनी बार सर्दी में ठिठुरते हुए पिल्लों की टिमटिमाती आँखों के अनुनय ने मुझे उन्हें घर उठा ले आने पर बाध्य किया है। पानी से निकले हुए जाल में मछलियों की तड़प, पक्षियों के व्यापारी के संकीर्ण पिंजरे में पंखों की फड़फड़ाहट, लोहे की काले कठघरे जैसी गाड़ी में बंदी और हाँफते हुए कुत्तों की करुण विवशता ने मुझे जाने कितने विचित्र कामों के लिए प्रेरणा दी है। ऐसा सनकी व्यक्ति मनुष्य जीवन के प्रति निर्मोही हो, तो आश्चर्य की बात होगी; पर उसकी, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु आदि के संबंध में बहुत कुछ जानने की इच्छा का सीमातीत हो जाना स्वाभाविक है।

मेरी इस स्वाभाविकता का अस्वाभाविक भार भक्तिन ही को उठाना पड़ता है। घोंसले से गिरे कूड़े-कर्कट को फेंकने के उपरांत पवित्र होकर वह सूर्य को अर्घ्य देने खड़ी हुई कि पिल्ले ने आँगन गंदा कर दिया। उसे भी धोने के उपरांत फिर स्नान करके वह शिवजी पर जल चढ़ाने चली कि भिखारी को सत्तू-गुड़ देने का आदेश हुआ। वह इस कर्तव्य को भी पूरा करने के उपरांत नाक बंद कर जप करने बैठी कि मैं किसी बीमार को देखने जाने के लिए प्रस्तुत हो, उसे पुकारने लगी। जीवन की ऐसी अव्यवस्था में भी वह उलाहना देना नहीं जानती। हाँ, कभी-कभी ओठ सिकोड़कर गंभीरता का अभिनय करती हुई वह कह बैठती है- ‘का ई विद्या का कौनिउ इमथान नाहिन बा ? होत तौ हमहूँ बुढ़ौती में एक ठौ साटीफिकट पाय जाइत, अउर का !’

अपनी कर्तव्यपरायणता के लिए सर्टीफिकेट न पा सकने पर भी भक्तिन उसका महत्त्व जानती है इसी कारण साधारण सी बीमारी में भी चिंतित हो उठती है- ‘हम मर जाब तो इनकर का होई, कउन बनाई – खियाई । कउन इनकर ई अजायब घर देखी-सुनी।’ भक्तिन को मृत्यु की चिंता करते-करते मेरे अजायबघर की व्यवस्था के लिए, उद्विग्न देखकर किसे हँसी नहीं आवेगी ?

धर्म में अखंड विश्वास होने के कारण भक्तिन के निकट कल्पवास बहुत महत्त्वपूर्ण है; पर वह जानती है कि मेरी ‘भानमती का कुनबा जोड़ने की प्रवृत्ति उसे मोह-माया के बंधन तोड़ने का अवकाश न देगी। गाँव के मेले से लेकर कल्पवास तक सब मेरे लिए पाठशाला हैं; पर इनमें मैं मोह बढ़ाना ही सीखती हूँ, विराग-साधन नहीं ।

संक्रांति के एक दिन पहले संध्या समय जब मैं योगदर्शन खोलकर बैठी, तब बिरल बदलियाँ बिजली के तार में गुँथ- गुँथकर सघन होने लगीं। भक्तिन ने चूल्हा सुलगाया ही था कि ग्रामीण यात्रियों का एक दल उस ओर के बरामदे के भीतर आ घुसा। मेरे लिए परम अनुगत भक्तिन संसार के लिए कठोर प्रतिद्वंद्वी है। वह भला इस आकस्मिक चढ़ाई को क्यों क्षमा करने लगी ?

आँधी के वेग के साथ जब वह चौके से निकलकर ऐसे अवसरों के लिए सुरक्षित शब्द- बाणों का लाघव दिखाने लगी, तब तो मेरा शीतलपाटी का सिंहासन भी डोल गया।

उठकर देखा – एक वृद्ध के नेतृत्व में बालक, प्रौढ़, स्त्री, पुरुष आदि की सम्मिश्रित भीड़ थी । गठरी मोटरी, बरतन, हुक्का चिलम, चटाई, पिटारा, लोटा-डोर सब गृहस्थी लादे-फाँदे यह अनियन्त्रित अभ्यागत मेरे बरामदे में कैसे आ घुसे, यह समझना कठिन था ।

मुझे देखकर जब भक्तिन की उग्र मुद्रा में अपराधी की रेखाएँ उभरने लगीं। और उसका कड़कड़ाता स्वर एक हल्की कंपन में खो गया, तब संभवतः अभ्यागतों को समझते देर नहीं लगी कि मैं ही उस फूस – सिरकी के प्रासाद की एकछत्र स्वामिनी हूँ।

यूथप वृद्ध ने दो पग आगे बढ़कर परम शांत, पर स्नेहसिक्त स्वर में कहा – ‘बिटिया रानी, का हम परदेसिन का ठहरै न दैहो ? बड़ी दूर से पाँय पियादे चले आइत हैं । ई तो रैन बसेरा है – ‘भोर भयो उठि जाना रे’ का झूठ कहित है ? हम तो बूढ़-बाढ़ मनई हैं। ऊपर समुंदरकूप के महराज ठहरे बरे कहत रहे, उहाँ चढ़े उतरे की साँसत रही। नीचे कौनिउ टपरी माँ तिल धेरै का ठिकाना नाहिन बा। अब दीया-बाती की बिरिया कहाँ जाई – कसत करी !’

वृद्ध के कंठस्वर और उसके कथन की आत्मीयता ने मुझे बलात् आकर्षित कर लिया। भक्तिन की दृष्टि में अस्वीकार के अक्षर पढ़कर भी मैंने उसे अनदेखा करते हुए कहा- ‘आप यहीं ठहरें बाबा मेरे लिए तो यह कोठरी ही काफी है। न होगा तो भक्तिन खाना बाहर बना लिया करेगी। इतना बड़ा बरामदा है, आप सब आ जाएँगे। रैन बसेरा तो है ही ।’

फिर जब मैं अपनी पुस्तकें और शीतलपाटी लेकर भीतर आ गई तथा दीया जलाकर पढ़ने बैठी, तब वे अपने-अपने रहने की व्यवस्था करने लगे।

भक्तिन मेरे आराम की चिंता के कारण ही दूसरों से झगड़ती है; पर जब उसे विश्वास हो जाता है कि अमुक व्यक्ति या कार्य से मुझे कष्ट पहुँचना संभव नहीं, तब उसकी सारी प्रतिकूलता न जाने कहाँ गायब हो जाती है। भीड़ से मेरी शांति भंग हो सकती है, इस संभावना ने उसे जो कठोरता दी थी, वह उस संभावना के साथ ही विलीन हो गई। वह सत्तू रखने के सींके के नीचे ईंट पत्थर का चूल्हा बनाकर कम-से-कम स्थान घेरने की चेष्टा करने लगी, जिससे उन आक्रमणकारियों को सुख से बस जाने का अवकाश मिल सके ।

उस रात तो मुझे नए संसार की व्यवस्था देखने का अवसर न प्राप्त हो सका। दूसरे दिन संक्रांति की छुट्टी थी। मुझमें इतनी आधुनिकता नहीं कि स्नान न करूँ और इतनी पुरातनता भी नहीं कि भीड़ के धक्कम धक्के में स्नान का पुण्य लूटने जाऊँ। सो मैं मुँह अँधेरे ही भक्तिन को जगाकर कोहरे के भारी आवरण के नीचे करवट बदल-बदलकर अपने अस्तित्व का पता देने वाली गंगा की ओर चली।

जब लौटी, तब कोहरे पर सुनहली किरणें ऐसी लग रही थीं, जैसे सफेद आबेरवाँ की चादर पर सोने के तारों की हल्की जाली टाँग दी गई हो ।

समुद्रकूप की सीढ़ियों के दक्षिण ओर बनी हुई मेरी बड़ी, पर कोलाहलशून्य पर्णकुटी आज पहचानी ही नहीं जाती थी। उसके नीचे बसी हुई, अस्थिर सृष्टि को देखकर जान पड़ता था कि किसी प्रशांत साधक के किसी असावधान श्वास के साथ इच्छाओं की चंचल भीड़ उसके निरीह हृदय के भीतर घुस पड़ी हो। निकट पहुँचकर मैंने अपनी कुटी की शांति भंग करने वालों का अच्छा निरीक्षण किया।

वृद्ध महोदय ने सेनानी के उपयुक्त आडंबर के साथ मेरे पढ़ने के बरामदे में अधिकार जमा लिया था। फटी और अनिश्चित रंगवाली दरी और मटमैली दुसूती का बिछौना लिपटा हुआ धरा था। उसके पास ही रखी हुई एक मैले फटे कपड़े की गठरी उसका एकाकीपन दूर कर रही थी। लाल चिलम का मुकुट पहने, नारियल का काला हुक्का बाँस के खंभे से टिका हुआ था। तूल की गोटवाला काला सुरती का बटुआ दीवार से लटक रहा था। खंभे और दीवार से बँधी डोरी की अलगनी पर एक धोती और रूई-भरी काली मिरजई स्वामी के गौरव की घोषणा कर रही थी। निरंतर तैल-स्नान से स्निग्ध लाठी का गाँठ- गठीलापन भी चिकना जान पड़ता था। पैताने की ओर यत्न से रखी हुई काठ और निवाड़ से बनी खटपटी कह रही थी कि जूते के अछूतपन और खड़ाऊँ की ग्रामीणता के बीच से मध्यमार्ग निकालने के लिए ही स्वामी ने उसे स्वीकार किया है।

सारांश यह है कि मेरे पुस्तकों के समारोह को लज्जित करने के लिए ही मानो बूढ़े बाबा ने इतना आडंबर फैला रखा था। वे संभवतः दातौन के लिए नीम की खोज में गए हुए थे, इसी से मैंने भेदिये के समान तीव्र दृष्टि से उनकी शक्ति के साधनों की नाप-जोख कर ली।

बरामदे की दूसरी ओर का जमघट कुछ विचित्र-सा था। एक सूरदास समाधिस्थ-जैसे बैठे थे। उनके मुख के चेचक के दाग, दृष्टि के जाने के मार्ग की ओर संकेत करते जान पड़ते थे। श्याम और दुर्बल शरीर में कंठ की उभरी नसों का तनाव ब था कि वे अपनी विकलांगता का बदला कंठ से चुका लेना चाहते हैं। सिरकी की टट्टी बाँधते समय बाँस का एक कोना कुछ बढ़कर खूँटी जैसा बन गया था, इसी से एक चिकारा और एक जोड़ मँजीरा लटक रहा था। सामान में एक चादर, टाट और ऐसी लुटिया भर थी, जिसके किनारे घिसते घिसते टेढ़े-मेढ़े और पैने हो गए थे।

टाट की सीमा से बाहर वीरासन से विराजमान और तिलक छाप से पांडित्य की घोषणा करते हुए एक प्रौढ़ एक रंगीन पिटारी खोले हुए थे। रूप-रंग में वह पिटारी शालग्राम या शंकर का बंदीग्रह जान पड़ती थी और संभवतः देवता का भार हल्का करने के लिए ही वे उन पर लदे चंदन घिसने के पत्थर और चंदन की अधघिसी मुठिया बाहर निकाल रहे थे। रामनामी चादर के एक टुकड़े पर जो पोथी – पत्रा धरा था, उसमें सबसे ऊपर हनुमान चालीसा का शोभित होना प्रकट कर रहा था कि उनके देवत्व को नित्य भूत-प्रेतों की आसुरी माया से लोहा लेना पड़ जाता है।

टाट का एक खूट दबाकर ठंडी बालू में बैठने का कष्ट भूलने का प्रयत्न करते हुए दो किशोर बालक, अनेक छेदों से चित्रित एक काली कमली में सिकुड़े बैठे थे। उसमें एक की दृष्टि, छप्पर से लटकती हुई संभवतः सत्तू-गुड़ जैसे मिष्ठान्नों की गठरी को हिप्नोटाइज कर रही थी और दूसरा चकित के समान पंडित के क्रिया-कलाप का तत्त्व समझने में लगा हुआ था।

एक और अधेड़ बाहर बैठकर धूप ले रहा था। एक पुरानी और झीनी चादर ने उसके दुबले शरीर के ढाँचे को छिपा रखा था; पर नोकदार कंधों का आभास और उभरी नसों वाले सूखे हाथ सच्ची कथा कह देते थे । कीचड़ से भरी हुई बेवाइयों से युक्त पैर कंकालशेष शरीर से पुष्ट जान पड़ते थे। मुख पर झुर्रियों के अक्षरों में भाग्य ने अनाड़ी बालक के समान इतना लिखा था कि अब उसका तात्पर्य पढ़ना कठिन था ।

स्त्रियों के डिपार्टमेंट की आर्थिक स्थिति भी इससे कुछ अधिक अच्छी नहीं जान पड़ी। बड़ी-सी गठरी के सहारे दो वृद्धाएँ सुमिरनी लिए ठंडी जमीन पर बैठी थीं, जिनमें एक ऊँघ रही थी और दूसरी अपने आसपास बसी सृष्टि के प्रति आवश्यक चौकन्नी लगती थी। ऊँघने वाली के पैरों में कसे हुए गोल चिकने कड़े और हाथ में चाँदी की एक-एक चपटी चूड़ी उसके मुंडित मुंड के भीतर छिपकर बची हुई शृंगारप्रियता का पता देते थे। दूसरी के गले में बँधे काले डोरे में पिरोए हुए रुद्राक्ष के दो बड़े-बड़े मनके स्त्री की आभूषण-परंपरा का पालन मात्र जान पड़ते थे ।

एक की आँखें माड़े से धुँधली, नाक ठुड्डी पर झुकी हुई और मुख के भाव में एक करुण उदासीनता थी। पर कानों को धोती से बाहर निकाले और ओठों को खोलती बंद करती हुई दूसरी, अपनी छोटी काली आँखों को घुमाकर तथा छोटी नाक के गोल नथनों को फुलाकर मानो चारों ओर बिखरे हुए रूप-रस-गंध-शब्द की खोज-खबर ले रही थी। निकट ही रखा एक बड़ा काशीफल और उससे टिका हुआ हँसिया दोनों विरागी हृदयों का भोजन के प्रति राग प्रकट कर रहा था और ऊपर छप्पर से बँधी रस्सी की फाँसी में झूलती हुई काली घी की हँडिया अपने चमकदार चिकनेपन से उन दोनों के बाह्य रूखेपन का विरोध कर रही थी ।

सफेद बूटेदार काली पुरानी धोती पहने हुए जो अधेड़ स्त्री, कोने में लोटे से खोली हुई डोर की अरगनी बाँधने में व्यस्त थी, उसे मैं नहीं देख सकी; पर अरगनी पर गुदड़ीबाजार लगाने के लिए जो फटे-पुराने कपड़े सँभाले खड़ी थी, उसने मेरे ध्यान को विशेष रूप से आकर्षित कर लिया। लाल किनारी की मटमैली धोती का नाक तक खींचा हुआ घूँघट ही उसे विशेषता नहीं देता, हाथ की मोटी कच्ची शर्बती रंग की चूड़ियाँ और पाँव के कुछ ढीले-पतले कड़े तथा दो-दो बिछुवे भी उसकी भिन्न सामाजिक स्थिति का परिचय दे रहे थे । घूँघट से बाहर निकले मुख के अंश की बेडौल चौड़ाई और उसमें व्यक्त सौम्य भाव में कुछ ऐसी खींच-खाँच थी कि न आँख उसे सुंदर कहती थी न मन उसे कुरूप मानता था ।

उसके एक ओर दो साँवली किशोरियाँ एक बड़े पिटारे में न जाने क्या खोज रही थीं। उनके गोल मुखों पर झूलती हुई उलझी रूखी और मैली लटें मानो दरिद्रता की कथा के अक्षर थीं। दूसरी ओर फटी दरी के टुकड़े पर एक काली-कलूटी बालिका फटा और तंग कुरता पहने सो रही थी। उसका बीच-बीच में काँप उठना सर्दी और नींद के संघर्ष की तीव्रता बताता था। एक अन्य बालक खंभे से टिककर बैठा हुआ, आँखें मलकर रोने की भूमिका बाँध रहा था। कुरते के अभाव में उसे एक पुराने धारीदार अँगोछे का परिधान मिल गया था, पर उसका, ऊपर टँगी हँडिया और नीचे रखी गठरी को देखकर रोना प्रकट करता था कि भीतर की शीत की मात्रा बाहर की शीत से अधिक हो गई है। पूर्व के कोने में पड़े हुए पुआल का गट्ठा और उस पर सिमटी हुई मैली चादर की सिकुड़न कह रही थी कि सोनेवालों ने ठंड से गठरी बनकर रात काटी है।

एक श्यामांगिनी युवती बाहर बालू में गड्ढे खोद-खोदकर चूल्हे बनाने में लगी थी। कुछ गोलाई लिए हुए लंबे, रूखे और उभरी हड्डियों वाले मुख पर छोटी नथ हिल-हिलकर कभी ओठ कभी कपोल का ऊपरी भाग छू लेती थी। सफेद बूटीदार लाल लहँगों की काली गोट फटकर जहाँ-तहाँ से उधड़ रही थी। पीली पुरानी ओढ़नी में से व्यक्त शरीर की दुर्बलता को जल्दी-जल्दी बालू निकालने में लगे हुए हाथों का फुर्तीलापन छिपा लेता था ।

भक्तिन दो उँगलियाँ ओठ पर स्थापित कर विस्मय के भाव से बड़बड़ाई- ‘अरे मोर बपई ! सगर मेला तो हिंयहि सिकिल आवा है। अब ई अजाबघर छाँड़ि के दूसरा मेला को देखे जाई ?’

उस पर एक क्रोधपूर्ण दृष्टि डालकर मैं अभ्यागतों से संभाषण का बहाना सोच ही रही थी कि घूँघट वाली के सहज स्वर ने मुझे चौंका दिया – ‘पाँ लागी दिदिया ! आपका तो हम पचै बड़ा कष्ट दिहिन है।’ पालाँगन के उत्तर में क्या कहा जाए, यह मेरी नागरिक प्रगल्भता भी न बता सकी, इसी से मैंने ‘नहीं, कष्ट काहे का जगह की कमी से आप ही लोगों को तकलीफ हुई’ कहकर शिष्टाचार की परंपरा का जैसे पालन किया।

फिर मैं अपनी कोठरी की व्यवस्था में लग गई और भक्तिन मोटे चावल और मूँग की दाल की खिचड़ी मिलाकर और काले तिल के लड्डू लेकर दान-परंपरा की रक्षा करने गई। वहाँ से लौटकर उसने खिचड़ी चढ़ाई।

खाने के समय भक्तिन को दिक करना मुझे अच्छा लगता है, क्योंकि इसके अतिरिक्त और किसी भी अवसर पर वह मेरी खुशामद नहीं कर सकती। उल्टे दस-पाँच सुनाने की कमर कसे प्रस्तुत रहती है।

गुड़ में बँधे काले तिल के लड्डू बहुत मीठे होने के कारण मैं नहीं खाती, इसी से भक्तिन मेरे निकट ‘मोदकं समर्पयामि’ का अनुष्ठान पूरा करने के लिए सफेद तिल धो-कूटकर और थोड़ी चीनी मिलाकर लड्डू बना लेती है। इस बार कल्पवास की गड़बड़ी में भक्तिन घर के देवता से अधिक महत्त्व बाहर के देवताओं को दे बैठी। मेले में देवताओं का तीन से तैंतीस कोटि हो जाना स्वाभाविक हो गया, अतः भक्तिन के लिए भी कुछ नहीं बच सका। घर की यह स्थिति भाँपकर ही मुझे कौतुक सूझा और मैंने बहुत गंभीर मुद्रा के साथ कहा- ‘मेरे लिए लड्डू लाओ।’

किंतु भक्तिन की उद्विग्नता देखने का सुख मिलने के पहले ही कल का परिचित कंठ-स्वर सुन पड़ा – ‘बिटिया रानी, का हमहूँ आय सकित है ?’ मैं तो छूतपाक मानती ही नहीं और भक्तिन अपनी बटलोई सहित कोयले की मोटी रेखा के भीतर सुरक्षित थी।

‘इधर निकल आइए बाबा’ – सुनकर वृद्ध दोनों हाथों में दो दोने सँभाले हुए सामने आ खड़े हुए। सिर का अग्रभाग खल्वाट होने के कारण चिकना चमकीला था; पर पीछे की ओर कुछ सफेद केशों को देखकर जान पड़ता था कि भाग्य की कठोर रेखाओं से सभीत होकर वे दूर जा छिपे हैं। छोटी आँखों में विषाद, चिंतन और ममता का ऐसा सम्मिश्रित भाव था, जिसे एक नाम देना संभव नहीं। लंबी नाक के दोनों ओर खिंची हुई गहरी रेखाएँ दाढ़ी में विलीन हो जाती थीं। ओठों में व्यक्त भावुकता को बिरल मूँछें छिपा लेती थीं और मुख की असाधारण चौड़ाई को दाढ़ी ने साधारणता दे डाली थी। सघन दाढ़ी में कुछ लम्बे सफेद बालों के बीच में छोटे काले बाल ऐसे लगते थे, जैसे चाँदी के तारों में जहाँ-तहाँ काले डोरे उलझकर टूट गए हों । स्फूर्ति के कारण शरीर की दुर्बलता और कुछ झुककर चलने के कारण लंबाई पर ध्यान नहीं जाता था। नंगे पाँव और घुटनों तक ऊँची धोती पहने जो मूर्ति सामने थी, वह साधारण ग्रामीण वृद्ध से अधिक विशेषता नहीं रखती।

बूढ़े बाबा मेरे लिए तिल का लड्डू, घी, आम के अचार की एक फाँक और दही लाए थे । अरुचि के कारण घी-रहित और पथ्य के कारण मिर्च- अचार आदि के बिना ही मैं खिचड़ी खाती हूँ, यह अनेक बार कहने पर भी वृद्ध ने माना नहीं और मेरी खिचड़ी पर दानेदार घी और थाली में एक ओर अचार रख दिया। दही का दोना थाली से टिकाकर अनुनय के स्वर में कहा – ‘ तनिक सा चीखौ तो बिटिया रानी ! का पढ़े-लिखे मनई यहै खाय के जियत हैं !’

उस दिन से उन अभ्यागतों से मेरे विशेष परिचय का सूत्रपात हुआ, जो धीरे-धीरे साहचर्य – जनित स्नेह में परिणत होता गया ।

मुझे सवेरे नौ बजे झूसी से उस पार जाना पड़ता था और वहाँ से ताँगे में यूनिवर्सिटी अकेले आना-जाना अच्छा न लगने के कारण मैं भक्तिन को भी इस आवागमन का आनंद उठाने के लिए बाध्य कर देती थी। जब तक मैं लौटने के लिए स्वतंत्र होती, तब तक भक्तिन नारद के समान या तो ताँगेवाले की आत्मकथा सुनकर उसकी भूलों पर निर्णय देती या अन्य परिचितों के यहाँ घूम-फिरकर संसार की समस्याओं का समाधान करती रहती ।

सवेरे आने की हड़बड़ी में खाने-पीने की व्यवस्था ठीक होना कठिन था और लौटने पर जलपान का प्रबंध होने में भी कुछ विलम्ब हो ही जाता था। मेरी असुविधा को उन ग्रामीण अतिथियों ने कब और कैसे समझ लिया, यह मैं नहीं जानती; पर मेरे पर्णकुटी में पैर रखते ही जलपान के लिए विविध, पर सर्वथा नवीन व्यंजन उपस्थित होने लगे ।

फूल के बड़े कटोरे में बाजरे का दलिया और दूध, छोटी थाली में सत्तू, गुड़ या पुए, रंगीन डलिया में मुरमुरे चने या भुने शकरकंद आदि के रूप में जो जलपान मिलता था, उसे पंचायती कहना चाहिए, क्योंकि सभी व्यक्ति अपने-अपने चौके में से मेरे लिए कुछ-न-कुछ बचाकर सीके पर रख देते थे । एक साथ इतना सब खाने के लिए मुझे जीवन की ममता छोड़नी होगी, यह बार-बार समझाने पर भी उनमें से कोई मानता ही न था ।

‘का दिदिया न चखिहैं’, ‘बिटिया रानी छुइ भर देतीं, तो हमार जियरा अस सिराय जात’, ‘दिदिया जीभ पै तनिक धर लेतीं, तो ई सब अकारथ न जात’ आदि अनुरोधों को सुनकर यह निश्चय करना कठिन हो जाता था कि किसे अस्वीकृति के योग्य समझा जावे। निरुपाय चना-गुड़ से लेकर बाजरे के पुए तक सब प्रकार के ग्रामीण व्यंजनों से मेरी शहराती रुचि का संस्कार होने लगा ।

जलपान के समारोह के उपरांत वे सब संध्या-स्नान, गंगा में दीपदान आदि के लिए तट पर और मैं उत्सुक और जिज्ञासु दर्शक के समान, उनका अनुसरण करती ।

कल्पवासी एक ही बार खाते और माघ के कड़कड़ाते जाड़े में भी आग न तापने के नियम का पालन करते। इन नियमों के मूल में कुछ तो लकड़ी का महँगापन और अन्न का अभाव रहता है और कुछ तपस्या की परंपरा ।

पर मुझे सर्दी में अलाव जलता हुआ देखना अच्छा लगता है। लकड़ी-कंडों का अभाव तो था ही नहीं। बस पर्णकुटी के बाहर बड़ा-सा ढेर लगाकर मैं होली जलाती और अतिथियों की गृहस्थी के साथ आई हुई एक पुरानी मचिया पर बैठकर तापती। उनके बच्चे, जो कल्पवास के कठोर नियमों से मुक्त थे और मेरी भक्तिन, जिसका कल्पवास परलोक से अधिक इस लोक से संबंध रखता था, आग के निकट बैठकर हाथ-पैर सेंकते। सच्चे कल्पवासी अपने और आग के बीच में इतना अंतर बनाए रखते थे, जितने में पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखने वाले चित्रगुप्त महोदय धोखा खा सकें।

इस विचित्र सम्मेलन का कार्यक्रम भी वैसा ही अनोखा था। कोई भजन सुनाता, कोई पौराणिक कथा कहता। कभी किंवदंतियों के नए भाष्य होते, कभी लोकचर्चा पर मौखिक टीकाएँ रची जातीं। कबीर की रहस्यमय उलटबाँसियों से लेकर अच्छा बैल खरीदने के व्यावहारिक नियम तक सब में उन ग्रामीणों की अच्छी गति थी, इसी से उनकी संगति न एक-रस जान पड़ती थी, न निरर्थक। इस संपर्क के कारण ही मैं उनकी जीवन कथा से भी परिचित होती गई।

बूढ़े ठकुरी बाबा भाटवंश में अवतीर्ण होने के कारण कवि और कवि होने के कारण मेरे सजातीय कहे जा सकते हैं। आधुनिक युग में भाट चारणों के कर्तव्य और आवश्यकता में बहुत अंतर पड़ चुका है, इसी से न कोई उनके अस्तित्व को जानता है और न उनके कवित्व व्यवसाय का मूल्य समझता है। अब तो उनका पैतृक धंधा व्यक्तिगत मनोविनोद मात्र रह गया है।

समय के प्रवाह को देखकर ही ठकुरी बाबा के पिता ने तुकबंदी के लिए मिली हुई प्रतिभा का उपयोग साधारण किसान बनने में किया और अपनी दिवंगत प्रथम पत्नी के दोनों सुयोग्य पुत्रों को भी नीतिशास्त्र में पारंगत बनाकर भावुकता के प्रवेश का मार्ग ही बंद कर दिया।

दूसरी नवोढ़ा पत्नी भी जब परलोकवासिनी हुई, तब उसका पुत्र अबोध बालक था; पर पिता ने प्रिय पत्नी के प्रति विशेष स्नेह-प्रदर्शन के लिए उसे साक्षात् कौटिल्य बनाने का संकल्प किया। इस शुभ संकल्प की पूर्ति के लिए जैसा भगीरथ प्रयत्न किया गया, उसे देखते हुए असफलता को दैवी ही कहा जाएगा।

संभवतः पति की नीतिमत्ता से भागकर परलोक में शरण पानेवाली माँ पुत्र को बचाने के लिए उस पर भावुकता की वर्षा करने लगी हो। हो सकता है कि कौटिल्य ने दूसरे कौटिल्य की संभावना से कुपित होकर उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी हो; पर यह सत्य है कि हठी बालक ने अपना पराया तक नहीं सीखा – नीति के अन्य अंगों की तो चर्चा ही क्या । हताश पिता ने इस कठोर शिक्षा का भार बड़े पुत्रों पर छोड़कर अपने जीवन से अवकाश ग्रहण किया ।

सौतेले भाई बड़े और गृहस्थीवाले थे, इसी से घर-द्वार सब उन्हीं के अधिकार में रहा और छोटा भाई चाकरी के बदले में भोजन वस्त्र पाता रहा। उसका कवित्व भाइयों के लिए लाभप्रद ही ठहरा, क्योंकि कोई भी कला सांसारिक और विशेषतः व्यावसायिक बुद्धि को पनपने ही नहीं दे सकती और बिना इस बुद्धि के मनुष्य अपने आपको हानि पहुँचा सकता है, दूसरों को नहीं ।

जब जात-बिरादरी में छोटे को अविवाहित रखने पर टीका-टिप्पणी होने लगी, तब भाइयों ने उसका एक सुशील बालिका से गठबंधन कर दिया और भौजाइयों ने देवरानी को सेवाधर्म की शिक्षा देना आरंभ किया।

दंपति सुखी नहीं हो सके, यह कहना व्यर्थ है । दासों का एक से दो होना प्रभुओं के लिए अच्छा हो सकता है, दासों के लिए नहीं। एक ओर उससे प्रभुता का विस्तार होता है और दूसरी ओर पराधीनता का प्रसार स्वामी तो साम-दाम-भेद द्वारा उन्हें परस्पर लड़ाकर दासता को और दृढ़ करते रहे हैं और दास अपनी विवश झुंझलाहट और हीन भावना के कारण एक-दूसरे के अभिशापों को विविध बनाकर उससे बाहर आने का मार्ग अवरुद्ध करते रहते हैं ।

देवर-देवरानी मिलकर यदि गृहस्थी बसा लेते, तो सेवा का प्रश्न कठिन हो जाता, इसी से भौजाइयाँ नई बहू की चुगली करके उसे पति के निकट अपराधिनी के रूप में उपस्थित करने लगीं। पत्नी की निर्दोषिता के संबंध में पति का मन विश्वास और अविश्वास के हिंडोले में झोंके खाता था; पर न उसने अपने विश्वास को प्रकट करके वधू को सांत्वना दी, न अविश्वास प्रकट करके अपने मन का समाधान किया।

गर्वीली पत्नी भी अपनी ओर से कुछ न कहकर अविराम परिश्रम द्वारा मन का आक्रोश व्यक्त करने लगी। ठकुरी बेचारे कवि ठहरे। शुष्क यथार्थता उनकी भाव – बोझिल कल्पना के घटाटोप में प्रवेश करने के लिए कोई रंध्र ही न पाती थी।

कहीं बिरहा गाने का अवसर मिल जाता, तो किसी के भी मचान पर बैठकर रात-रात भर खेत की रखवाली करते रहते। कोई बारहमासा वाला रसिक श्रोता मिल जाता, तो उसके बैलों का सानी-पानी करने में भी हेठी न समझते। कोई आल्हा ऊदल की कथा सुनना चाहता, तो मीलों पैदल दौड़े चले जाते। कहीं होली का उत्सव होता तो अपने कबीर सुनाने में भूख-प्यास भूल जाते ।

अपनी इस काव्य-वाचकता के कारण वे कोई और काम ठीक से न कर पाते थे । नागरिक शिष्ट- समाज के समान कोई उन्हें पचास रुपया फीस देकर गलेबाजी के लिए नहीं बुलाता था, इसी से अर्थ की दृष्टि से कवि ठाकुरदीन सुदामा ही रह गए। किसी ने मैली पिछौरी के खूँट में थोड़ा-सा तिल-गुड़ बाँध कर उदारता प्रकट की। किसी ने पथरौटी में सत्तू पर नमक के साथ हरी मिर्च रखकर आतिथ्य सत्कार किया। किसी ने सुलगे हुए कंडों पर दो भौरियाँ सेंकने का अनुरोध करके काव्य-मर्मज्ञता का परिचय दिया। इन पुरस्कारों को पाकर ठकुरी प्रसन्न न थे, यह कहना मिथ्यावाद होगा। उनकी काव्यजनित अकर्मण्यता भाइयों की उपेक्षा, भौजाइयों के व्यंग और पत्नी की मर्मपीड़ा का कारण थी, इसे भी वे नहीं जानते थे।

इस रेखचित्र के शेष भाग के लिए इसका भाग-2 अवश्य देखें

जय हिन्द

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