- जायसी के अक्षय कीर्ति का आधार है ‘पद्मावत’ जिसके पढ़ने से यह प्रकट हो जाता है कि जायसी का हृदय कैसा कोमल
और ‘प्रेम की पीर’ से भरा हुआ था। क्या लोकपक्ष में, क्या अध्यात्म पक्ष में, दोनों ओर उसकी गूढत, गंभीरता और सरसता विलक्षण दिखाई देती है।
- पद्मावत में प्रेमगाथा की परंपरा पूर्ण प्रौढ़ता को प्राप्त मिलती है। यह उस परंपरा में सबसे अधिक प्रसिद्ध ग्रंथ है।
- इसकी कहानियों में भी विशेषता है। इसमें इतिहास और कल्पना का योग है।
- चितौड़ की महारानी पद्मिनी या पद्मावती का इतिहास हिंदू ह्रदय के मर्म को स्पर्श करनेवाला है।
- जायसी ने यद्यपि इतिहास प्रसिद्ध नायक और नायिका ली है, पर उन्होंने अपनी कहानी का रूप वही रखा है जो कल्पना के उत्कर्ष द्वारा साधारण जनता के हृदय में प्रतिष्ठित था। इस कहानी का पूर्वार्ध तो बिलकुल कल्पित है और उत्तरार्द्ध ऐतिहासिक आधार पर है।
पद्मावती की कथा संक्षेप में:
- सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन की कन्या पद्मावती रूप और गुण से जगत में अद्वितीय थी। उसके योग्य वर कहीं नहीं मिलता था।
- उसके पास हीरामन नाम का एक सुआ (तोता) था जिसका वर्ण (रंग) सोने के सामान था और जो पूरा वाचाल और पंडित था।
- एक दिन वह पद्मावती के उसके वर न मिलने के विषय में कुछ कह रहा था कि राजा ने सुन लिया और बहुत कोप किया। सूआ राजा के डर से एक दिन उड़ गया। पद्मावती ने सुनकर बहुत विलाप किया।
- सूआ वन में उड़ता-उड़ता एक बहेलिया के हाथ में पड़ गया जिसने बाजार में लाकर उसे चितौड़ के एक ब्राह्मण के हाथ बेच दिया। उस ब्राह्मण को एक लाख देकर चितौड़ के राजा रतनसेन ने उसे ले लिया। धीरे-धीरे रतनसेन उसे बहुत चाहने लगा।
- एक दिन राजा शिकार को गया तब उसकी रानी नागमती ने, जिसे अपने रूप का बड़ा गर्व था आकर सूए से पूछा कि ‘संसार में मेरे समान सुंदरी भी कहीं है? इस पर सुआ हँसा और उसने सिंहल की पद्मावती का वर्णन करके कहा कि उसमें और तुममें दिन और अँधेरी रात का अंतर है।
- रानी ने इस भय से कि कहीं यह सुआ राजा से भी पद्मिनी के रूप की प्रशंसा करे, उसे मारने की आज्ञा दे दी। पर चेरी (दासी) ने उसे राजा के भय से मारा नहीं, अपने घर छिपा रखा। लौटने पर जब सूए के बिना राजा रतनसेन बहुत व्याकुल और क्रुद्ध हुआ तब सुआ लाया गया और उसने सारी व्यथा कह सुनाई।
- पद्मिनी के रूप का वर्णन सुनकर राजा मूर्छित हो गया और अंत में वियोग से व्याकुल होकर उसकी खोज में घर से जोगी होकर निकल पड़ा। उसके आगे-आगे राह दिखानेवाला वही हीरामन सूआ था और साथ में सोलह हजार कुँवर जोगियों के वेश में थे।
- कलिंग से जोगियों का यह दल बहुत से जहाज़ों में सवार होकर सिंहल की ओर चला और अनेक कष्ट झेलने के उपरांत सिंहल पहुँचा। वहाँ पहुँचने पर राजा तो शिव के एक मंदिर में जोगियों के साथ बैठकर पद्मावती का ध्यान और जप करने लगा और हीरामन सूए ने जाकर पद्मावती से यह सब हाल कहा। राजा के प्रेम की सत्यता के प्रभाव से पद्मावती प्रेम में विकल हुई।
- श्रीपंचमी के दिन पद्मावती शिवपूजन के लिए उस मंदिर में गई, पर राजा उसके रूप को देखते ही मूर्छित हो गया, उसका दर्शन अच्छी तरह न कर सका। जागने पर राजा बहुत अधीर हुआ। इस पर पद्मावती ने कहला भेजा कि समय पर तो तुम चुक गए; अब तो इस दुर्गम सिंहलगढ़ पर चढ़ सको तभी मुझे देख सकते हो। शिव से सिद्धि प्राप्त कर राजा रात को जोगियों सहित गढ़ में घुसने लगा पर सवेरा हो गया और पकड़ा गया।
- राजा गंधर्वसेन की आज्ञा से रतनसेन को सूली देने ले जा रहे थे कि इतने में सोलह हजार जोगियों ने गढ़ को घेर लिया।
- महादेव, हनुमान, आदि सारे देवता जोगियों की सहायता के लिए आ गए। गंधर्वसेन की सारी सेना हार गई। अंत में जोगियों के बीच शिव को पहचानकर गंधर्वसेन उनके पैरों पर गिर पड़ा और बोला कि ‘पद्मावती आपकी है जिसको चाहे दीजिए।’ इस प्रकार रतनसेन के साथ पद्मावती का विवाह हो गया और दोनों चित्तौड़गढ़ आ गए।
- रतनसेन की सभा में राघवचेतन नामक एक पंडित था। जिसे यक्षिणी सिद्ध थी। और पंडितों को नीचा दिखाने के लिए उसने एक दिन प्रतिप्रदा को द्वितीया कहकर यक्षणी के बल से चंद्रमा दिखा दिया। जब राजा को यह कारवाई मालुम हुई तब उसने राघवचेतन को देश से निकाल दिया।
- राघव राजा से बदला लेने के और भारी पुरस्कार की आशा से दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन के दरबार में पहुँचा और उसने दान में पाए हुए पद्मावती के कंगन को दिखाकर उसके रूप को संसार के ऊपर बताया।
- अलाउद्दीन ने पद्मिनी को भेज देने के लिए राजा रतनसेन को पत्र भेजा, जिसे पढ़कर राजा अत्यंत क्रुद्ध हुआ और लड़ाई की तैयारी करने लगा। कई वर्ष तक अलाउद्दीन चितौड़ घेरे रहा, पर उसे तोड़ न सका। अंत में उसने छलपूर्वक संधि का प्रस्ताव भेजा। राजा ने उसे स्वीकार करके बादशाह की दावत की।
- राजा के साथ शतरंज खेलते समय अलाउद्दीन ने पद्मिनी के रूप की एक झलक सामने रखे हुए दर्पण में देख पाई, जिसे देखते ही वह मूर्छित होकर गिर पड़ा। प्रस्थान के दिन जब राजा बादशाह को बाहरी फाटक तक पहुँचाने गया तब अलाउद्दीन के छिपे हुए सैनिकों द्वारा पकड़ लिया गया और दिल्ली पहुँचाया गया।
- पद्मिनी को जब यह समाचार मिला तब वह बहुत व्याकुल हुई; पर एक वीर क्षत्राणी के समान अपने पति के उद्धार का उपाय सोचने लगी।
- गोरा, बादल नामक दो वीर क्षत्रिय सरदार 700 पालकियों में सशस्त्र सैनिक छिपाकर दिल्ली पहुँचे और बादशाह के पास यह संदेश भेजा कि पद्मिनी अपने पति से थोड़ी देर मिलकर तब आपके हरम में जाएगी। आज्ञा मिलते ही एक ढकी पालकी राजा की कोठरी के पास रखी गई और उसमें से एक लोहार निकलकर राजा की बेड़ियाँ काट दी। रतनसन पहले से ही तैयार सवार होकर निकल आए। शाही सेना पीछे आते देखकर वृद्ध गोरा तो कुछ सिपाहियों के साथ उस सेना को रोकता रहा और बादल रतनसेन को लेकर चित्तौर पहुँच गया।
- चितौड़ आने पर पद्मिनी ने रतनसेन से कुंभलनेर के राजा देवपाल द्वारा दूती भेजने की बात कही जिसे सुनते ही राजा रतनसेन ने कुंभलनेर को जा घेरा। लड़ाई में देवपाल और रतनसेन दोनों मारे गए।
- रतनसेन का शव चितौड़ लाया गया। उसकी दोनों रानियाँ नागमती और पद्मावती हँसते-हँसते पति के शव के साथ चिता में बैठ गई। पीछे जब सेना सहित अलाउद्दीन चितौड़ में पहुँचा तब वहाँ राख के ढेर के सिवा कुछ नहीं मिला। जैसा कि कहा जा चूका है प्रेमगाथा की परंपरा में पद्मावत सबसे प्रौढ़ और सरस है।
- प्रेममार्गी सूफी कवियों की और कथाओं से इस कथा में यह विशेषता है कि इसके ब्यौरों से भी साधना के मार्ग, उसकी कठिनाइयों और सिद्धि के स्वरुप आदि की जगह-जगह व्यंजना होती है, जैसा की कवि ने स्वयं ग्रंथ की समाप्ति पर कहा है-
- तन चितउर, मन राजा कीन्हा ।
हिय सिंघल, बुधि पदमिनि चीन्हा ॥
गुरू सुआ जेइ पंथ देखावा ।
बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा?
नागमती यह दुनिया-धंधा ।
बाँचा सोइ न एहि चित बंधा ॥
राघव दूत सोई सैतानू ।
माया अलाउदीं सुलतानू ॥
- यद्यपि पद्मावत की रचना संस्कृत प्रबंधकाव्यों की सर्गबद्ध पद्धति पर नहीं है, फ़ारसी की मसनवी शैली पर है, पर शृंगार वीर आदि के वर्णन चली आती हुई भारतीय कव्यपरंपरा के अनुसार ही है। इसका पूर्वार्द्ध तो एकांत प्रेममार्ग का ही आभास देता है, पर उत्तरार्द्ध में लोकपक्ष का भी विधान है।
- पद्मिनी के रूप का जो वर्णन जायसी ने किया है वह पाठक को सौंदर्य की लोकोत्तर भावना में मग्न करनेवाला है। अनेक प्रकार के अलंकारों की योजना उसमें पाई जाती है। यहाँ कुछ पद देखते है-
- सरवर तीर पद्मिनी आई।
खोंपा छोरि केस मुकलाई॥
ससि-मुख अंग मलयगिरि बासा।
नागिन झाँपि लीन्ह चहुँ पासा॥
ओनई घटा परी जग छाहाँ।
ससि कै सरन लीन्ह जनु राहाँ॥
भूलि चकोर दीठि मुख लावा।
मेघ घटा महँ चन्द देखावा॥
- पद्मिनी के रूप के वर्णन में जायसी ने कहीं-कहीं उस अनंत सौंदर्य की ओर, जिसके विरह में यह सारी सृष्टि व्याकुल सी है, बड़े सुंदर संकेत किये हैं-
- बरुनी का बरनौ इमि बनी।
साधे बान जानु दुइ अनी ॥
उन्ह बानन्ह अस को जो न मारा।
बेधि रहा सगरौ संसारा ॥
गगन नखत जो जाहिं न गने।
वै सब बान ओही के हने ॥
धरती बान बेधि सब राखी।
साखी ठाढ देहिं सब साखी ॥
रोवँ रोवँ मानुष तन ठाढे।
सूतहि सूत बेध अस गाढे ॥
बरुनि-बान अस ओपहँ, बेधे रन बन-ढाख ।
सौजहिं तन सब रोवाँ, पंखहि तन सब पाँख ॥
- इसी प्रकार योगी रतनसेन के कठिन मार्ग के दर्शन में मार्ग के विघ्नों (काम, क्रोध आदि विकारों) की व्यंजना की हैं-
- ओहि मिलान जौ पहुँचै कोई।
तब हम कहब पुरुष भल सोई॥
है आगे परबत कै बाटा।
बिषम पहार अगम सुठि घाटा॥
बिच बिच नदी खोह औ नारा।
ठावहिं ठाँव बैठ बटपारा ॥
हनुवँत केर सुनब पुनि हाँका।
दहुँ को पार होइ, को थाका ॥
अस मन जानि सँभारहु आगू।
अगुआ केर होहु पछलागू ॥
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने नागमती के विरह वर्णन को हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि घोषित किया है। इस विरह वर्णन ने शुक्लजी को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने जायसी को अपनी ‘त्रिवेणी’ में स्थान दिया।
जय हिन्द