लब्जों को बयाँ करती ‘आँखें’

ये आँखें…
दो लकीरें नहीं,
आत्मा की दरारें हैं-
जहाँ से दर्द
बिना आवाज़ किए रिसता है।

कोरों पर जमे आँसू
कभी गिरते नहीं,
बस नमक बनकर
अंदर ही अंदर जख़्मों को कुरेदते हैं।

हमने गौर किया है-
जब कोई बहुत गहराई से मुस्कुराता है,
तो उसकी आँखें क्यों नम हो जाती हैं?
क्योंकि वहाँ सत्य रहता है,
और सत्य अक्सर अकेला होता है।

इन आँखों ने देखा है-
टूटते भरोसे की धीमी आवाज़ को
जो काँच के चटकने से भी अधिक तीखी थी,
और महसूस किया है
रिश्तों का वह खालीपन
जो भीड़ में भी गूँजता रहता है।

रात जब अपने अँधेरी आँचल में
सारी दुनिया को सुला देती है,
तब ये आँखें जागती हैं-
हर अधूरी बातों को
दुबारा जीने के लिए।

पलकों के पीछे
एक पूरा खाली श्मशान है,
जहाँ दफ्न हैं-
कुछ सपने, कुछ वादे, कुछ रिश्ते
और कुछ लोग…
जो कभी थे ही नहीं ।

ये आँखें थक चुकी हैं-
हर बार “ठीक हूँ मैं” का चोला पहनते-पहनते,
हर बार अपने ही दर्द को
खुद से छुपाते-छुपाते।

और सबसे ज्यादा दर्द
तब होता है,
जब कोई इन्हें पढ़ नहीं पाता-
क्योंकि इनकी भाषा
बस खामोशी है।

ये आँखें…
अब रोती भी नहीं,
शायद आँसूओं ने भी
इनका साथ छोड़ दिया है,
या फिर दर्द इतना गहरा है
कि बहने की हिम्मत ही नहीं रही।

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