अविकारी शब्द या अव्यय:
ऐसे शब्द जिनके स्वरुप में लिंग, वचन, काल, पुरुष एवं कारक आदि के प्रभाव से कोई विकार नहीं होता अथार्त परिवर्तन नहीं होता है। वे अविकारी शब्द कहलाते हैं।
अविकारी को ही ‘अव्यय’ कहते हैं। ‘अव्यय’ दो शब्दों के मिलने से बना है- अ + व्यय = अव्यय। ‘अ’ का अर्थ होता है- (नहीं) और ‘व्यय’ का अर्थ (खर्च या परिवर्तन) होता है।
प्रयोग या अर्थ के आधार पर शब्द दो तरह के होते है।
1. व्ययी या विकारी शब्द
2. अव्यय या अविकारी शब्द
नोट: कारक, काल, वचन, लिंग के आधार पर जिनका रूप
बदल जाता है, उसे ‘व्ययी’ या ‘विकारी’ शब्द कहते है।
नोट: कारक, काल, वचन, लिंग के आधार पर जिनका रूप
नहीं बदलता है, उसे ‘अव्यय’ या ‘अविकारी’ शब्द कहते है।
‘अव्यय’ शब्द का अर्थ ही है कि जिस शब्द का कुछ भी व्यय नहीं होता हो। अतः अव्यय वे शब्द हैं जिनके रूप में लिंग-वचन-काल आदि व्याकरणिक कोटियों के प्रभाव से कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे-
आज, कल, तेज, धीरे, अरे, ओह, किन्तु, पर, ताकि आदि अव्यय शब्दों के उदाहरण हैं।
अव्यय के निम्नलिखित भेद होते हैं:
- क्रियाविशेषण (adverb)
- संबंधबोधक (post position)
- समुच्चयबोधक अव्यय (conjuction)
- विस्मयादिबोधक अव्यय (intesjec tions
- निपात
1. क्रियाविशेषण अव्यय:
वे अविकारी (अव्यय) शब्द (जिसमें परिवर्तन नहीं हो) जो क्रिया की विशेषता को प्रकट करते है। उन्हें क्रियाविशेषण अव्यय कहते है। क्रिया की विशेषता प्रायः चार प्रकार से बताई जाती है। क्रिया किस रीति से संपन्न हो रही है, जैसे- धीरे-धीरे, तेजी से, कहाँ घटित हो रही है; जैसे यहाँ, वहाँ; कब घटित हो रही है; शाम को, सुबह को, रात को। इसके अलावा क्रिया की मात्रागत विशेषता भी थोड़ा, बहुत, काफी आदि शब्दों से बताई जा सकती है। इन्हीं आधारों क्रियाविशेष्ण के चार भेद होते हैं-
क्रियाविशेषण अव्यय के चार भेद हैं:
(i) रीतिवाचक या बोधक क्रियाविशेषण:
(ii) कालवाचक या बोधक क्रियाविशेषण
(iii) स्थानवाचक या बोधक क्रियाविशेषण
(iv) परिमाणवाचक या बोधक क्रियाविशेषण
रीतिवाचक या बोधक क्रियाविशेषण:
रीति का अर्थ है- ‘ढंग’ या ‘विधि’। जिस शब्द से क्रिया के घटित होने की विधि या रीति संबंधित विशेषता का पता चलता है। वे रीतिवाचक क्रियाविशेषण कहलाते हैं।
रीतिवाचक क्रियाविशेषण की पहचान करने के लिए क्रिया पर ‘कैसे’/किस प्रकार’ के प्रश्न करना चाहिए। इसके उत्तर में जो शब्द प्राप्त होता है वही रीतिवाचक क्रियाविशेषण है। रीतिवाचक क्रियाविशेषण के शब्दों के अन्य उदाहरण हैं- अचानक, तेजी से, भली-भाँति, जल्दी से आदि।
उदाहरण:
1. गाड़ी प्लेटफार्म पर अचानक आ गई।
2. मैं उनसे भली-भाँति परिचित हूँ।
3. वह ईमानदारी से काम करता है।
4. मैं अवश्य परीक्षा में पास हो जाऊँगा।
(2) स्थानवाचक क्रिया विशेषण:
क्रिया के घटित होने के स्थान के विषय में बोध कराने वाले क्रियविशेषण शब्द को स्थानवाचक क्रियाविशेषण कहते हैं। जैसे- यहाँ, वहाँ, इधर, उधर, नीचे, ऊपर बाहर, भीतर आसपास, घर में, स्टेशन पर आदि। ये दो प्रकार के होते हैं-
1. स्थितिबोधक- जिस शब्द से क्रिया-स्थल के कहीं स्थित होने का बोध हो, उसे स्थिति बोधक स्थानवाचक क्रियाविशेषण कहते हैं। जैसे- ऊपर की ओर, नीचे, आर-पार, भीतर, बाहर, सर्वज्ञ, पास, दूर, यहाँ, वहाँ आदि।
2. दिशाबोधक- जिस स्थानवाचक क्रिया विशेषण से कार्य स्थान की दिशा का बोध हो, उसे दिशाबोधक क्रिया विशेषण कहते हैं। जैसे- ऊपर की ओर, नीचे की तरफ, चारों ओर, इधर-उधर, दाएँ-बाएँ आदि।
स्थानवाचक क्रिया विशेषणों की पहचान के लिए क्रिया पर ‘कहाँ’ प्रश्न करना चाहिए। इसके उत्तर में जो शब्द प्राप्त होगा, वही स्थानवाचक क्रिया विशेषण है। जैसे- ‘कमला ऊपर बैठी है’- वाक्य में यह पूछा जाए- कहाँ बैठी है? तो उत्तर मिलेगा ‘ऊपर’। अतः ‘ऊपर’ स्थानवाचक क्रिया विशेषण है।
(3) कालवाचक या बोधक क्रियाविशेषण अव्यय:
वे शब्द जो क्रिया के घटित होने के काल अथार्त समय का बोध कराता हैं। उसे कालवाचक क्रियाविशेषण अव्यय कहते हैं।
यदि किसी भी वाक्य में कोई भी समय सूचक शब्द आए तो उस वाक्य में काल बोधक क्रियाविशेषण होता है। जैसे-
आजकल, कभी, प्रतिदिन, रोज, सुबह, अक्सर रात को, चार बजे, हर साल आदि।
इसकी पहचान के लिए क्रिया पर ‘कब’ प्रश्न करना चाहिए। इसके उत्तर में जो शब्द प्राप्त होगा, वह कालवाचक क्रियाविशेषण है। जैसे-
गुरु जी अभी आए हैं- इस वाक्य में पूछा जाए- कब आए हैं? तो इसका उत्तर होगा ‘अभी’। अतः ‘अभी’ कालवाचक क्रियाविशेषण है।
कालवाचक क्रिया विशेषण तीन प्रकार का होता है–
1. काल बिंदु वाचक- प्रातः, सायं, आज, अब, जब, कभी, कल आदि।
2. अवधि वाचक- हमेशा, लगातार, आजकल, सदैव, दिनभर, नित्य आदि।
3. बारंबारता वाचक- नित्य, रोज, हर बार, बहुधा, प्रतिदिन आदि।
(4) परिमाणवाचक क्रियाविशेषण
जिन क्रियाविशेषणों से क्रिया के परिणाम या मात्रा से संबंधित विशेषता का पता चलता है उसे परिमाणवाचक क्रियाविशेषण अव्यय कहते है। इन शब्दों से यह पता चलता है कि क्रिया किस मात्रा में हुई अतः इसकी पहचान के लिए क्रिया पर ‘कितना/कितनी’ प्रश्न करना चाहिए। उदाहरण
वह दूध बहुत पीता है
मैं जितना खाता हूँ उतना मोटा होता हूँ
वह थोड़ा ही चल सकी
नोट: यदि मात्रा सूचक शब्द क्रिया के साथ आए तो ही परिमाणवाचक क्रियाविशेषण माना जाएगा और यदि मात्रा सूचक शब्द किसी संज्ञा के स्थान पर आए तो परिमाणवाचक विशेषण माना जाएगा।
क्रियाविशेषण की रचना दो प्रकार से होती है-
1. मूल क्रिया विशेषण- कुछ शब्द मूलतः ही क्रियाविशेषण होते हैं, अथार्त किसी अन्य शब्द अथवा प्रत्यय के योग के बिना ही प्रयोग में लाये जाते हैं। जैसे-
आज, कल, यही, इधर, ऊपर, नीचे, ठीक चाहे आदि
2. यौगिक क्रिया विशेषण- कुछ क्रिया विशेषणों की रचना किसी दूसरे शब्द में प्रत्यय लगाकर होती है। इन्हें यौगिक क्रिया विशेषण कहते हैं। जैसे- यथा+शक्ति- यथाशक्ति, प्रेम+पूर्वक- प्रेमपूर्वक, स्वभाव+तः- स्वभावतः, अन+जाने- अनजाने, दिन+रात – दिनरात, धीरे-धीरे, रातभर आदि।
विशेष नोट- यद्यपि क्रिया विशेषण अविकारी शब्द हैं तथापि कभी-कभी क्रियाविशेषण शब्दों में भी कुछ परिवर्तन आ जाता है। जैसे-
(क) आम अच्छा पका है। लीची अच्छी पकी है।
(ख) कोट अच्छा धुला है। साड़ी अच्छी धुली है।
2. संबंधबोधक (Post Position)
संबंधबोधक वे विकारी शब्द है जो संज्ञा या सर्वनाम के बाद प्रयुक्त होकर वाक्य के अन्य संज्ञा और सर्वनाम शब्दों के साथ संबंध का बोध कराते हैं, जैसे-
1. बच्चे पिताजी के साथ मेले गये थे।
2. मैंने घर के सामने कुछ पेड़ लगाए हैं।
3. पार्क के चारों ओर लोग इकट्ठे हो गए थे।
4. उसने पोस्ट ऑफिस के निकट कार खड़ी कर दी।
5. वह घर के भीतर घुसा बैठा है।
6. आप के अलावा कौन रूपया देता।
7. लड़की की तरफ नजर डालो और कहो कि क्या यह चोर है।
उपर्यक्त वाक्यों में यह देखा जा सकता है कि ‘के साथ’, ‘के सामने’, ‘के चारों ओर’, ‘के निकट’, ‘के भीतर’, ‘के अलावा’, ‘कि तरफ’ आदि ऐसे शब्द रूप हैं जो वाक्य में आए दो संज्ञा/सर्वनाम रूपों (रेखांकित) के मध्य संबंध स्थापित कर रहे हैं। इसे ही संबंधबोधक अव्यय कहा जाता है। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-
- से भीतर,के भीतर, की ओर ,की तरफ
- के बिना, के अलावा, के बगैर
- के बदले, की जगह
- के बारे में, के विषय में
- के साथ, के संग
- से लेकर, से तक
- के विपरीत, के अनुसार, के अनुकूल आदि।
उपर्युक्त उदाहरणों में ‘से पहले, के भीतर, की ओर आदि कुछ ऐसे संबंधबोधक हैं जो क्रियाविशेषणों की तरह काल, स्थान, दिशा आदि का बोध कराते हैं, जैसे-
1. लड़की घर के भीतर सो रही है।
2. घर के सामने मंदिर है।
‘लड़की भीतर है’ तथा ‘सामने मंदिर है’ वाक्यों में ‘भीतर’ ‘सामने’ क्रियाविशेषण शब्द है।
अतः यह ध्यान रखना होगा कि अव्यय शब्द दो संज्ञा/सर्वनामों के बीच संबंध बताते हैं वे संबंधबोधक कहे जाते है तथ जो शब्द संबंधबोधक क्रियाविशेषणों की भाँति स्थान, दिशा काल आदि का बोध कराते हैं वे क्रियाविशेष्णात्मक संबंधबोधक कहलाते हैं।
संबंधबोधक अव्ययों का प्रयोग तीन प्रकार से किया जाता है-
विभक्तिसहित- जैसे-
1.घर के आगे आम का पेड़ है। 2. दर्द के मारे वह कराह रहा है।
विभक्तिरहित- जैसे- उसने जीवनपर्यंत अपना वचन निभाया।
उभयविभक्ति – (इसमें विभक्ति सहित और विभक्ति रहित दोनों प्रकार से किया जाता है) जैसे-
पत्र द्वारा सूचित करो। (विभक्ति रहित)
उसे पत्र के द्वारा सूचना भेजी गई। (विभक्ति सहित)
3. समुच्चयबोधक या योजक-
समुच्चय का अर्थ है– जोड़ने वाला। इसी कारण इसे योजक भी कहते हैं। दूसरे शब्दों में- दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को परस्पर मिलाने (जोड़ने) अथवा अलग करने वाले शब्दों को समुच्चयबोधक या योजक कहते हैं। जैसे-
(क)जोड़ने का कार्य- और, तथा, एवं
मामाजी और पिताजी।
(ख) विरोध बताने का कार्य- लेकिन, मगर, किन्तु, परन्तु
आना चाहता था परन्तु नहीं आ सका।
(ग) कारण, परिणाम आदि बताने का कार्य- इसलिए, इस कारण, अतः,
क्योंकि, ताकि
मैं दिल्ली जा रहा हूँ अतः आपसे न मिल सकूँगा।
(घ) विकल्प बताने का कार्य- या, अथवा, चाहे
तुम जाओगे या वह जाएगा।
1. समुच्चयबोधक या योजक शब्दों के प्रमुख दो भेद हैं-
1. समानाधिकार समुच्चयबोधक (Coordinate Conjunctions)
2. व्यधिकरण समुच्चयबोधक (Subordinate Conjunctions)
1. समानाधिकार समुच्चयबोधक (Coordinate Conjunctions)
वे योजक शब्द जो दो सामान अधिकार वाले (स्तर वाले) अंशों को जोड़ने का कार्य करते हैं, जैसे- किन्तु, और, या, अथवा आदि।
* जोड़ने का कार्य: और, तथा, एवं
1. भारत और लक्ष्मण राम के छोटे भाई थे।
2. शीला आएगी तथा मोहन भी आएगा।
* विरोधदर्शक: पर, परंतु, अपितु, बल्कि, लेकिन, किन्तु, मगर
1. वह पढता तो है परन्तु पास नहीं हो पाता।
2. सबका आदर करो मगर किसी से डरो नहीं।
* विकल्प: या, अथवा, या-या, नहीं तो, ना कि, अन्यथा
1. या तो राम आएगा या लक्ष्मण।
2. परिश्रम काटो अन्यथा सफल न हो सकोगे।
* परिणामदर्शक: इसलिए, अतः, फलतः, नहीं तो, अन्यथा
1. मेहनत नहीं की इसलिए फेल हो गए।
2. मेहनत की थी इसलिए पास हो गया।
2. व्यधिकरण समुच्चयबोधक (Subordinate Conjunctions)
वे योजक शब्द जिनमें एक अंश मुख्य होता है और एक गौण या जो एक मुख्य वाक्य में एक या एकाधिक आश्रित उपवाक्यों को जोड़ने का कार्य करते हैं, वे व्यधिकरण समुच्चयबोधक कहे जाते हैं, जैसे- चूँकि, इसलिए, यद्यपि, तथापि, कि, मानो, क्योंकि, यहाँ तक कि, जिससे कि, ताकि आदि।
* हेतुबोधक: क्योंकि, इसलिए, चूँकि, इस प्रकार
1. मैं वहाँ इसलिए गया था कि तुम मिल जाते।
* संकेतबोधक: यद्यपि…..तथापि, यदि…..तो, चाहे…..तो भी
1. यदि तुम चाहों तो नौकरी कर सकते हो।
* स्वरुपबोधक: अथार्त, मानो, यानि, यहाँ तक
1. ऐसा लग रहा था मानों बादल छ गए।
* उद्देश्यबोधक: ताकि, जिसमें, कि
1. वह दिन-रात पढ़ता है जिससे कि परीक्षा में प्रथम आ सके।
4. विस्मयादीबोधक (द्योतक) (Interjections)
विस्मयादिबोधक (विस्मय + आदि + बोधक)वे अविकारी शब्द जो घृणा, क्रोध, हर्ष, शोक, शाबासी, धन्यबाद, संबोधन, भय, विस्मय मनोभावों आदि का बोध कराते हैं, उन्हें विस्मयादीबोधक अव्यय कहते हैं। जैसे- अरे, ओह, हाय, उफ़ आदि। इसमें किसी विशेष अर्थ की सूचना नहीं दी जाति बल्कि ये शब्द तो स्वतः ही किसी विशेष परिस्थिति में मुँह से निकल जाती है।
विस्मयादिबोधक अव्यय की तालिका इस प्रकार हैं-
1. विस्मय/आश्चर्य – क्या ! अरे ! सच ! ओह ! ऐ !
2. शोक/पीड़ा/ग्लानि – उफ़ ! हाय ! हाय राम ! ओह माँ !
3. हर्ष/उल्लास – अहा ! वाह ! क्या खूब ! बहुत अच्छा ! अति सुंदर !
4. तिरस्कार/ घृणा- धिक् ! छि: छि: ! धिक्कार ! हट ! धत्
5. प्रशंसा- शाबाश ! सुंदर ! अति सुंदर !
6. चेतावनी- सावधान ! बचो होशियार ! अरे ! हटो ! खबरदार !
4. क्रोधबोधक अव्यय – अरे ! खामोश ! चुप !
5. स्वीकृति/सहमति- अच्छा ! बहुत अच्छा ! ठीक !
6. संबोधन/आह्वान- हे ! अजी ! हाँजी ! ओजी ! अरे ! सुनो जी !
7. संवेदना- हाय ! तौबा-तौबा ! राम-राम
5. निपात या अवधारक अव्यय:
कुछ अव्यय शब्द वाक्य में किसी शब्द या पद के बाद लगकर उसके अर्थ में विशेष प्रकार का बल ला देते हैं, इन्हें ‘निपात’ कहा जाता है। विशेष प्रकार का बल या अवधारणा देने के कारण इनको अवधारक शब्द भी कहा गया है। प्रमुख निपात इस प्रकार है- ही, भी, तो, तक, मात्र, भर।
1. ही- आपको ही करना होगा। यह काम मुझे ही क्यों परेशान करते हो।
2. भी- हम भी चलेंगे जल्दी क्या है। वह भी तो चल रही हमारे साथ।
3. तो- तुम तो जाओगे ही, मुझे भी निकालोगे। यह काम कर तो लेने दो।
4. तक- वह मुझसे बोली तक नहीं। खबर तक नहीं दी तुमने।
5. मात्र- शिक्षा मात्र से ही सब कुछ नहीं मिल जाता।
6. भर- मैं उसे जानता भर हूँ।
जय हिन्द