सफ़र की धूप में अब सहारा बनी है लाठी,
ज़िंदगी के मोड़ की किनारा बनी है लाठी।
कभी जो थामती थी उँगली किसी बच्चे की,
अब उसी हाथ की पुकार बनी है लाठी।
थके हुए कदमों को हर रोज़ सहलाती है,
दर्द के हर सफ़र की दुलार बनी है लाठी।
समय ने छीन ली रफ़्तार जब उम्र से,
धीमी चाल की अब धार बनी है लाठी।
नज़र के धुंध में, रास्ते भी अनजाने हैं,
हर अँधेरे में अब उजियार बनी है लाठी।
बूढ़ी आँखों के सपनों की साथी है यह लाठी।
यादों के उन गाँवों का सितार बनी है लाठी।