यह कविता उन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को समर्पित है, जिन्होंने वर्तमान समय में इस पार्टी को बनाया हैं। यह कविता उन लोगों को भी समर्पित है जिन्होंने इस ‘घिनौनी कीट’ को सोशल मिडिया पर बड़ी मात्रा में समर्थन दिया।
तेल चट्टा, काला साया,
गंदे कोनों और अँधेरी में पाया।
नाली, कूड़े, सीलन, गंदगी,
यही ‘कॉकरोच’ की है जिंदगी।
बासी भोजन, सड़ा निवाला,
देख ‘कॉकरोच’ को आए ओकाई (उलटी)।
रात ढले जब दुनिया सोती,
तब ‘कॉकरोच’ बिल से बाहर आते।
रसोई में चुपके आ जाते,
बर्तन, खाना छूकर गंध फैलाते।
गंदे पैरों की छाप छोड़ते,
कीटाणुओं के रिश्ते जोड़ते।
अंधियारे में दौड़ लगाते,
रोग और घिन दोनों फैलाते।
सफाई से ‘कॉकरोच’ को बैर बड़ा,
गंदगी में ‘कॉकरोच’ का है बसेरा ।
घर-द्वार को स्वच्छ हमेशा रखे कभी न इसको आने दे।