जोराम यालाम नाबाम का जन्म अरुणाचल प्रदेश के लोवर सुबानसिरी जिले के जोराम गाँव में हुआ था। उन्होंने वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान से स्कूली शिक्षा प्राप्त किया और राजीव गांधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, अरुणाचल प्रदेश से हिन्दी में एम ए और पीएच डी किया। अरुणाचल प्रदेश के बहुसंख्यक न्यीशी आदिवासी समुदाय से आनेवाली जोराम यालाम आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और अस्तित्व के प्रश्नों में गहरी दिलचस्पी रखती हैं। इन विषयों पर वे पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लिखती रही हैं। उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं-
‘साक्षी है पीपल’ (कहानी-संग्रह);
‘जंगली फूल’ (उपन्यास);
‘गाय-गेका की औरतें’ (संस्मरण);
‘न्यीशी समाज भाषिक अध्ययन’ (शोध) और
‘तानी कथाएँ: अरुणाचल के तानी आदिवासी समाज की विश्वदृष्टि
(लोक कथा विश्लेषण)
जंगली फूल (वे फूल जो मुरझाते नहीं हैं)
‘जोराम यालाम’ का यह पहला उपन्यास हैं। ‘जंगली फूल’ जो अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित है। यह अरुणाचल प्रदेश की 26 मुख्य जनजातीय वाला समाज हैं, जिनमें ‘निशी’ एक प्रमुख जनजाति है।
अरुणाचल प्रदेश की दक्षिणी दिशा में ‘लोवर-सुबानसिरी’ नामक जिला आबोतानी संस्कृति एवं समुदाय का गढ़ माना जाता है। आबोतानी जनजाति का संबंध प्रथम मानव पुरुष ‘तानी’ वंश से है। ‘आबोतानी’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘आबो’ का अर्थ है ‘पिता’ और ‘तानी’ का अर्थ है- ‘आदमी’। इस जनजाति को अरुणाचल में तानी के नाम से भी जाना जाता है। यालाम का ये उपन्यास इसी वंश के महानायक ‘तानी’ की कहानी है। इस किताब की भूमिका में श्री वीर भारत तलवार लिखते हैं कि- “निशी समाज में प्रचलित लोक कथाओं में एक प्रसिद्ध पुरखे तानी (पिता) को अनेक पत्नियाँ रखने वाले, प्रेमविहीन, बलात्कारी और आवारा व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है जो अपनी असाधारण बल-बुद्धि का इस्तेमाल भी सिर्फ औरतें हासिल करने के लिए करता है।” यालाम जो खुद निशी जनजाति से हैं। वे तानी के चरित्र की इस व्याख्या से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखती। वे अपने प्रथम उपन्यास के माध्यम से तानी का ‘जीवन से बड़ा’ चरित्र बुनती हैं। ऐसा करने की वजह भी यालाम खुद इस उपन्यास की प्रस्तावना में लिखती हैं। तानी की जो कथाएँ प्रचलित हैं, उस बारे में वे कहती हैं-
“सोचती हूँ कि क्या सच में वह इतना कायर, नीच, स्वार्थी और डरपोक था? अपने को बचाने के लिए वह इस हद तक जा सकता था? क्या वंश बढ़ा लेने मात्र से ही कोई अमर हो जाता है? कोई तो ऐसी वजह रही होगी जिसके चलते लोगों ने उसे ‘पिता’ कहा होगा। वरना उससे भी बड़े-बड़े भोगी आज भी हैं और हमेशा रहेंगे। वे कीड़े-मकोड़ों की तरह पैदा होते हैं और मर जाते हैं। भोग को उसने किस रूप में देखा होगा? क्या उसने उसमें प्रेम को ढूंढा होगा? क्या उसने प्रेम को सिर्फ और सिर्फ स्त्री-शरीर के ही रूप में जाना होगा?”
यही वह सवाल है, जो यालाम को इस उपन्यास को लिखने की प्रेरणा देती है। इस उपन्यास का यही मूल तत्व है। यालाम ने खुद प्रस्तावना में लिखा है कि ये कहानी काल्पनिक है, हाँ लेकिन कुछ पात्र और घटनाएँ लोक कथाओं से लिए गए हैं। यह उपन्यास मेरे खुराफाती मन की उपज है। कहानी का नायक बालक ‘दोन्यी तानी’ है जो कालांतर में ‘तानी’ और फिर ‘आबोतानी’ बनता है। वैसे तो यह उपन्यास इस वंश के पिता के बारे में है लेकिन इसमें स्त्री पात्रों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। यहाँ तक की इस वंश में सूर्य को भी पिता न मान कर ‘माँ’ माना गया है। यालाम अपने बारे में लिखती हैं। “याद नहीं पड़ता कि मैंने कभी कोई प्रेम कहानी लिखी हो” लेकिन इस उपन्यास के हर पात्र के मूल में प्रेम है। चाहे वह भाई-बहन के सूरत में हो, पति-पत्नी, मित्र या प्रेमी-प्रेमिका के रूप में। यालाम इन सभी पात्रों को गढ़ने और उनके मनोभावों को लिखने में पूर्णतया सफल रही हैं। प्रेम और विरह पर यालाम ने इस उपन्यास में जो पंक्तियाँ लिखी है, उन पर अलग से एक लेख लिखा जा सकता है। उपन्यास के शुरुआत में इस वंश की जीवन शैली और दोन्यी तानी के जन्म का विवरण है। कुछ पन्ने हैं जहाँ पाठक को उपन्यास के पात्रों से परिचित होने और उनके साथ तारतम्य बैठाने में थोड़ा समय लगता है, लेकिन इतना समय तो शहर के कोलाहल से अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ों तक के सफर में लगना ही था। कहानी और इसके पात्र पाठक को इस तरह अपने में बांध लेते हैं कि जैसे सारी घटनाएँ आँखों के सामने चलचित्र देख रहे हो, जिसे छोड़ कर जाना संभव नहीं।
यह एक ऐसे जनजाति की कहानी है जो कबीलों में रहते हैं। इस जनजाति ने खेती करना शुरू कर दिया लेकिन खेती सिर्फ मकई, मड़ुआ, तिल, ककड़ी, कद्दू आदि की होती है। एक बार खेती हो जाने के बाद ये कहीं और जा कर नए खेत में खेती करते हैं क्योंकि एक खेत में एक साल खेती कर लेने के बाद मिट्टी सख्त हो जाती है। दूसरी बार उसमें फसल नहीं होती। धान की खेती अभी शुरू नहीं हुई है। इसी धान की प्रजाति को इस कबीले तक लाने के लिए इस उपन्यास का नायक दूर-दूर की यात्राएं करता है। कबीले के लोग जनसंख्या वृद्धि पर ज़ोर देते हैं। एक मर्द कई पत्नियाँ रख सकता है हालांकि औरत के बदले जानवर का मूल्य चुकाना पड़ता है। इसलिए अधिक औरतें सिर्फ सम्पन्न लोग ही रख सकते हैं। तानी के पिता की भी चार पत्नियाँ हैं। तानी और उसकी बहन दोलियांग सबसे छोटी पत्नी की संतान हैं। तानी बचपन से ही वीर और पराक्रमी है और दोलियांग औषधियों की जानकार। बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु के पश्चात तानी को उसके पराक्रम की वजह से कबीले का सरदार चुन लिया गया। कबीलों में एक दूसरे से लड़ाई और एक दूसरे का साथ देने का प्रचलन था। ऐसे ही एक कबीले के आग्रह पर तानी वहाँ जाता है और उस कबीले के दुश्मन ‘ताप’ को उन लोगों की नज़रों में मार देता है जबकि तानी छल से ताप को बचाता है और बदले में ताप अपने मरने तक तानी का वफादार रहता है। तानी द्वारा ताप को मार दिए जाने से खुश उस कबीले का सरदार तानी की शादी अपनी पुत्री आसीन से कर देता है। तानी को उससे जुड़वा पुत्र होते हैं। उसी तरह किसी अन्य कबीले में एक कुरूप औरत जिसे सभी चुड़ैल कह कर उसपर अत्याचार करते हैं, तानी उसे कबीले वालों से बचाकर उसका उपचार करता है। चालीस वर्ष की वह कुरूप औरत तानी से प्रणय निवेदन करती है। जिसे पहले तो तानी ठुकरा देता है लेकिन जब रुंगिया अपने कुरूप होने की वजह से अपराध बोध से भर जाती है तो तानी उसके साथ संबंध बनाता है। इस एक बार के संबंध से रुंगिया ताउम्र तानी के प्रति स्नेह रखती है लेकिन शारीरिक चाह नहीं रखती।
धान के बीज की खोज में तानी बहुत दूर की यात्रा करता है। इस यात्रा के दौरान जंगल में उसकी मुलाक़ात ‘सिमांग’ से होती है। सिमांग 25 वर्ष की औरत है जो वहाँ के कबीले के सरदार की तीसरी पत्नी है। उसके दो बच्चे हैं। तानी के बल और कौशल से दोनों में प्रेम पनपता है। बहुत कठिनाइयों के बाद सिमांग अपने पति और बच्चों को छोड़ कर इस वचन के साथ तानी के साथ जाती है कि वह तानी के कबीले के लोगों को धान की खेती करना सीखा कर वापस आ जाएगी।
इधर तानी की अनुपस्थिति में उसके सौतेले भाई ने साजिश कर उसके जुड़वा बेटों को मार डाला और उसकी पत्नी आसीन से बलात्कार किया। आसीन इस सदमे से उबर नहीं पाती और कबीला छोड़ कर चली जाती है। रुंगिया, सिमांग और दोलियांग मिल कर तानी को संभालते हैं। तानी अपने बच्चों और पत्नी पर हुए अत्याचारों का बदला लेता है। कुछ दिनों बाद धान की खेती शुरू होती है और साथ ही शुरू होती है तानी के लिए नई वधू की तलाश। एक बहुत सम्पन्न कबीले के सरदार की पुत्री ‘याई’ से तानी का विवाह होता है जो खुद भी बहुत शक्तिशाली है। उसे अपनी संपत्ति, अपने साथ लाए गए आभूषण और दासियों का बहुत घमंड है। उसे ये बिलकुल बर्दाश्त नहीं कि रुंगिया और सिमांग उसके यहाँ रहें। वह इन दोनों को अपने घर से भगा देती है। सिमांग वापस अपने पति और बच्चों के पास लौट जाती है। याई से तानी को एक पुत्र होता है लेकिन तानी से मतभेद की वजह से याई, तानी को छोड़ देती है। वह अपने पुत्र को लेकर कहीं और चली जाती है। तानी एक बार फिर सिमांग के गाँव तक की यात्रा करता है, सिर्फ उसे ये कहने के लिए कि वह उससे प्रेम करता है। दोनों मिलते हैं, प्रेम का इजहार करते हैं और फिर अलग हो जाते हैं, कभी न मिलने के लिए।
दोलियांग चाहती है उसके भाई का वंश बढ़े। वो याई के पिता से मिलती है और उनकी दूसरी पुत्री ‘जीत’ को तानी के लिए मांगती है। तानी और जीत मिलते हैं, उनमें प्रेम होता है। शादी से पहले ही जीत तानी के पुत्र को जन्म देती है और फिर तानी से उसका विवाह हो जाता है।
इस उपन्यास में दोलियांग का चरित्र एक ऐसे बहन का है जो अपनी परवाह न करते हुए अपना जीवन सिर्फ अपने भाई की परछाई बनने में लगाती है। वह आजीवन कुंवारी रहकर अपने भाई और अपने कबीले के लिए काम करती है। आसीन, तानी की पत्नी जरूर है लेकिन वह उपहार स्वरूप तानी को मिली थी। तानी के जिस प्यार की वह अपेक्षा करती है वह प्यार उसे नहीं मिला। जब उसका बलात्कार हो जाता है तो फिर वह अपने आप को तानी के सामने लाने की बजाय, कबीला छोड़ कर चली जाती है। रुंगिया उम्र में तानी से बहुत बड़ी है। इनके बीच इकलौता शारीरिक संबंध परिस्थितिजन्य है और दोनों कभी प्रेम का इजहार नहीं करते। सिमांग से तानी को प्रेम तो है लेकिन वह विवाहित है और उसके दो बच्चे हैं। सिमांग से तानी का प्रेम शारीरिक नहीं है। याई तानी की पत्नी है लेकिन उसे तानी से प्रेम नहीं। उसे अपने वर्चस्व और अपना दबदबा बनाए रखना ज्यादा प्रिय है। यही वजह है कि यह रिश्ता टूट जाता है। इन सारे अधूरे प्रेम प्रसंगो से होते हुए अंत में तानी, जीत से मिलता है जो सर्वथा उसके अनुकूल है। इस तरह यालाम प्रचलित कथाओं के विपरीत तानी का चरित्र ऐसे गढ़ती हैं जहाँ वह कबीले की भलाई के लिए कई लड़ाई लड़ता है, अपने बच्चों की कुर्बानी देता है, जिसे कभी सच्चा प्रेम नहीं मिलता। तानी जो बलशाली है, दयालु है और कबीले का सच्चा सरदार होने की काबिलीयत रखता है। वह सही अर्थों में ‘आबोतानी’ है।
यदि इस उपन्यास के शिल्प की बात की जाय तो यालाम ने खुद लिखा है कि “मैंने कहानी को कुछ इस ढंग से लिखा है- मानो पाठक पढ़ नहीं रहे बल्कि मैं उनके सामने बैठकर स्वयं कहानी सुना रही हूँ।” उपन्यास में वार्तालाप कम हैं, कहानी में पात्रों के कुछ कहने/करने से पहले यालाम उस पल का ऐसा विवरण देती हैं जिससे पाठकों को, घटना के आँखों देखी होने का भ्रम होने लगता है। ऐसे में कहीं-कहीं जब कविता की पंक्ति आती है तो तारतम्यता टूटती है और पाठक उस काल से वापस वर्तमान में आ जाता है। बेहतर होता यदि ये कविताएं मूल भाषा में लिखी गई होतीं और हिन्दी में इसका अनुवाद किया गया होता। यह एक ऐसा उपन्यास है जो निशी जनजाति को जानने वालों के लिए अनमोल खज़ाना साबित होगा लेकिन आम पाठकों के लिए भी अपनी विषयवस्तु, शिल्प और कहानी ‘कहन’ की इस विधा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। आज जनजातीय, आंचलिक, आदिवासी साहित्य की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है और पाठकों के बीच इसकी स्वीकार्यता भी बढ़ी है। डा० जोराम यालाम को उनके इस सफल प्रयास के लिए बधाई और भविष्य में उनकी आने वाले कृतियों के लिए शुभकामनाएँ।