समय ना ठहरा है कभी, बदली कभी न चाल। जिसके जैसे कर्म हैं, उसका वैसा हाल ।। समय 'लेटिन' भाषा का शब्द है। समयका निर्माण सृष्टि के निर्माण के साथ हुआ होगा। समय पिछले युगों में था, इस युग में है और आनेवाले युग में भी रहेगा। जब तक सृष्टि रहेगा समय भी साथ… Continue reading समय समाज और साहित्य
Author: इंदु सिंह
लोकतंत्र का क्षरण : जब विरोध की भाषा गाली बन जाए
“असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, किंतु मर्यादा उसका प्राण है” भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यहाँ विचारों की विविधता को शक्ति माना गया है। यही कारण है कि इस देश में सरकारें बदलती हैं, नीतियाँ बदलती हैं, सत्ता बदलती है, परंतु लोकतंत्र की मूल भावना अक्षुण्ण रहती है। किंतु जब विरोध की… Continue reading लोकतंत्र का क्षरण : जब विरोध की भाषा गाली बन जाए
विंध्य के माथे पर नर्मदा का तिलक
प्रकृति जब चित्रकार बनती है, तब वह रंगों से नहीं, ऋतुओं से चित्र बनाती है। उसकी तूलिका बादलों में भीगती है, पर्वतों पर ठहरती है और नदियों में बहने लगती है। कहीं वह हिमालय के श्वेत मस्तक पर हिम का मुकुट सजाती है, तो कहीं समुद्र के गले में लहरों की माला डाल हिलोरे लेती… Continue reading विंध्य के माथे पर नर्मदा का तिलक
‘तिरस्कार’ और ‘संतप्त’ आत्मकथा में अभिव्यक्त दलित पीड़ा
दलित साहित्यकार सूरजपाल चौहान का जन्म 20 अप्रैल 1955 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद के फुसावाली नामक गाँव में हुआ था। उनके माता-पिता सिर पर मैला और जूठन उठाने का काम करते थे। इसी कार्य से उनके परिवार का गुजारा चलता था। उनके परिवार में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं था। लेखक की माँ ठाकुरों… Continue reading ‘तिरस्कार’ और ‘संतप्त’ आत्मकथा में अभिव्यक्त दलित पीड़ा
‘दोहरा अभिशाप’ आत्मकथा में अभिव्यक्त दलित स्त्री का संघर्ष
कौशल्या नंदेश्वर बैसंत्री की आत्मकथा 'दोहरा अभिशाप' में दलित महिलाओं के संघर्ष और जीवन उत्पीड़न की गाथा है। महिलाओं को समाज में अपने-आपको साबित करने के लिए ‘दोहरा संघर्ष’ करना होता है। 'दोहरा अभिशाप' आत्मकथा मात्र दलित महिलाओं की वेदना नहीं, समाज की संपूर्ण महिलाओं की वेदना है। यह आत्मकथा दलित समाज में महिला जीवन के तमाम… Continue reading ‘दोहरा अभिशाप’ आत्मकथा में अभिव्यक्त दलित स्त्री का संघर्ष
मुर्दहिया आत्मकथा में अभिव्यंजित स्त्री-जीवन
डॉ. तुलसीराम की आत्मकथा मुर्दहिया केवल एक दलित लेखक का जीवन वृत्त नहीं बल्कि यह भारतीय ग्रामीण समाज की सामाजिक, जातिगत और लैंगिक असमानताओं का गहन दस्तावेज भी है। तुलसीराम ने अपने जीवन के अनुभवों के माध्यम से यह दिखाया है कि दलित समाज में स्त्री पर दोहरा शोषण होता है। तुलसीराम ने अपनी बहुचर्चित… Continue reading मुर्दहिया आत्मकथा में अभिव्यंजित स्त्री-जीवन
‘मणिकर्णिका’ आत्मकथा की समीक्षा
'मणिकर्णिका' दलित समाज की त्रासदी और भारतीय समाज की विडम्बना का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आख्यान है। यह कृति समाज, संस्कृति, इतिहास और राजनीति की उन परतों को उघाड़ती है, जो अभी तक अनकहा और अनछुआ था। यह आत्मकथा बुद्धिजीवियों और भारतीय समाज को सच का आइना दिखाती है। आज 21वीं सदी में भी भारत की तस्वीर बदली… Continue reading ‘मणिकर्णिका’ आत्मकथा की समीक्षा
भारतीय भाषाओं के राष्ट्रीय कवियों में राष्ट्रीय एकता की भावना
'राष्ट्रीय एकता' भारत की 'आत्मा' है और 'राष्ट्रीयता' भारतियों की 'भावना'। राष्ट्रीयता शब्द अंग्रेजी भाषा के 'नैशनलिटी' (Nationality) शब्द का हिंदी रूपांतर है। जिसकी उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'नेशियो' (Natio) शब्द से हुई है। इस शब्द से 'जन्म' और 'जाति' का बोध होता है। राष्ट्रीयता सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक भावना है जो लोगों को एक सूत्र… Continue reading भारतीय भाषाओं के राष्ट्रीय कवियों में राष्ट्रीय एकता की भावना
ईश्वर के नाम पत्र
हे ईश्वर!मेरा चरण स्पर्श स्वीकार करे हे ईश्वर! बहुत दिनों से मेरे मन में अनेक प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे थे। मन अत्यंत व्याकुल और चिंतित था। समझ नहीं पा रही थी कि अपने अंतर्मन की बातें किससे कहूँ। लोगों से कहूँ तो वे शायद हँसेंगे, उपहास करेंगे या फिर उसे क्षणिक संवेदना समझकर भूल जाएँगे। तभी… Continue reading ईश्वर के नाम पत्र
वर्तमान युग में ‘अंधा युग’ गीतिनाट्य की प्रासंगिकता
वर्तमान युग में ‘अंधा युग’ गीतिनाट्य की प्रासंगिकता ‘अंधा युग’ अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक सूत्र में बाँधते हुए यह संकेत देता है कि क्रोध, घृणा, स्वार्थ और लालच जैसे गुण किसी भी सभ्यता को भीतर से खा जाता है। नाटक हमें यह समझाता है कि इतिहास बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन मनुष्य… Continue reading वर्तमान युग में ‘अंधा युग’ गीतिनाट्य की प्रासंगिकता