समकालीन हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन

भूमिका- भारत विभिन्नताओं में एकता का देश है। सदियों से भारतीय समाज में अनेक वर्ण, जाति, धर्म तथा संप्रदाय के लोग एक साथ मिलकर रहते आये हैं। आदिवासी समुदाय भी अनेक क्रिया-कलापों के साथ संगठित रूप से रहते हैं। आज भी बहुत से आदिवासी जंगलों पहाड़ों और दुर्गम प्रदेशों में रहकर अपना जीवन यापन करते… Continue reading समकालीन हिंदी उपन्यासों में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन

हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में पुरुष विमर्श : एक विवेचन

परिवर्तन, विकास, क्रांति ये प्रकृति के शाश्वत नियम हैं। हर युग में क्रांतियाँ और आंदोलन हुए हैं, आज भी हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे। जिसके फलस्वरूप व्यवस्था में परिवर्तन हुआ है और निरंतर विकास का मार्ग प्रसस्त होता रहा है। पृथ्वी पर जब से जीवन की उत्पति हुई है, तब से निरंतर… Continue reading हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ में पुरुष विमर्श : एक विवेचन

‘छायावाद’ में शैव दर्शन

छायावादी काव्य हिंदी साहित्य महत्त्वपूर्ण काव्य-आंदोलन है, जिसमें आत्मानुभूति, प्रकृति-सौंदर्य, रहस्यबोध, प्रेम, सौंदर्य और मानवीय चेतना के साथ भारतीय दार्शनिक परंपराओं का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। इनमें शैव दर्शन, विशेषतः कश्मीर शैव दर्शन, की छाप जयशंकर प्रसाद के काव्य में सबसे अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। प्रसाद की कामायनी को इस दृष्टि… Continue reading ‘छायावाद’ में शैव दर्शन

छायावाद के पुरोधा : मुकुटधर पाण्डेय

हिंदी साहित्य को पढ़ना और पढ़ाना जितना आसान समझा जाता है, असल में यह  उतना आसान है नहीं। हिंदी साहित्य में अनेक विधाएँ हैं। उन सभी विधाओं में काव्य और काव्य विधा में ‘छायावाद’ का तो कुछ कहना ही नहीं छायावाद हिंदी। छायावाद हिंदी साहित्य की अत्यंत समृद्ध, सौंदर्य शालिनी, सशक्त एवं कलात्मक काव्य धारा… Continue reading छायावाद के पुरोधा : मुकुटधर पाण्डेय

कोसी नदी : बिहार का शोक

कोसी नदी : बिहार का शोक मैं हिमालय की गोद में जन्मी,बर्फीली चट्टानों को चीरती,कहीं अरुण, कहीं सुनकोसी,कहीं तमोर बनकर बहती हूँमैं तीन धाराओं का संगम,पहाड़ों की बेटी हूँ। नेपाल की घाटियों से उतरजब मैदानों की ओर चली,अपने साथ हिम का पानी,पहाड़ों की मिट्टी,और सदियों की स्मृतियाँ लाई। मैं कोसी हूँ,किसी ने मुझे सप्तकोसी कहा,किसी… Continue reading कोसी नदी : बिहार का शोक

भारतीय परंपरा में मातृत्व शिक्षा और आत्मबोध

आज भारतीय पुराण-परंपरा की एक ऐसी विलक्षण नारी के विषय में अपने विचार प्रस्तुत करना चाहती हूँ, जिसका व्यक्तित्व केवल मातृत्व की गरिमा तक सीमित नहीं है। वह ज्ञान, आत्मबोध, वैराग्य, कर्तव्य और राजधर्म इन सभी को एक साथ जोड़ने वाली स्त्री थी। हम प्रायः मातृत्व को त्याग, ममता और वात्सल्य के संदर्भ में देखते… Continue reading भारतीय परंपरा में मातृत्व शिक्षा और आत्मबोध

मदालसा : राजकुमारी से आध्यात्मिक चेतना तक

मदालसा भारतीय पुराण-परंपरा में वर्णित एक ऐसी विलक्षण स्त्री हैं, जिनका चरित्र सौंदर्य, विवेक, वैराग्य, मातृत्व और आध्यात्मिक चेतना के अद्भुत समन्वय का परिचायक है। उनका उल्लेख मुख्यतः मार्कण्डेय पुराण में प्राप्त होता है। वे गन्धर्वराज विश्वावसु की पुत्री थीं। राजसी वैभव और सुख-सुविधाओं में पली-बढ़ी मदालसा केवल रूप-सौंदर्य की प्रतिमूर्ति नहीं थीं, बल्कि उच्च… Continue reading मदालसा : राजकुमारी से आध्यात्मिक चेतना तक

औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती है

औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है।रीतियों की कठोर भट्ठी में,रिवाजों की आँच परधीरे-धीरे पकाई जाती है। बचपन से ही कहना शुरू कर दिया जाता“धीरे बोलो, कम बोलो,जोर से मत हँसो, सिर झुकाकर चलो,बड़े सपने मत देखो।" उसे सभी सिखाते हैघर-आँगन की जिम्मेदारी,और भाई के हाथों मेंसौंप दी जाती है दुनिया सारी। बचपन से ही… Continue reading औरत पैदा नहीं होती बनाई जाती है

हिंदी साहित्य में कृष्ण भक्ति काव्य धारा

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा किया गया काल विभाजन: रचना: ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ (1929 ई०) 1. आदिकाल (वीरगाथा काल)  1050 विं सं 1375 विं सं 2. पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) 1375 विं सं 1700 विं सं 3. उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) 1700 विं सं 1900 विं सं 4. आधुनिक काल (गद्य काल) 1900 विं सं अब… Continue reading हिंदी साहित्य में कृष्ण भक्ति काव्य धारा

एक ख़ामोशी ही काफ़ी है

जब तक हम साथ हैं,तब तक सब कुछ सही हैथोड़ी हँसी, थोड़ी नाराज़गी,कुछ शिकवे, कुछ शिकायतें,कुछ अनकही-सी बातें...इन सबके बीचरिश्ता अभी ज़िंदा है। जब तक हम लड़ते हैं,एक-दूसरे से उलझते हैं,अपनी बात मनवाने की कोशिश करते हैं,तब तक समझोहम एक-दूसरे के लिएमहत्त्वपूर्ण हैं। जब तक गुस्सा है,तब तक परवाह है,जब तक शिकायत है,तब तक उम्मीद… Continue reading एक ख़ामोशी ही काफ़ी है