रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (उर्वशी- तृतीय अंक) इकाई-5

उर्वशी: यह रामधारी सिंह 'दिनकर' द्वारा रचित एक काव्य नाटक है। यह 1961 ई० में प्रकाशित हुआ था। इस काव्य में दिनकर ने उर्वशी और पुरुरवा के प्राचीन आख्यान को एक नये अर्थ से जोड़ना चाहा है। इसके लिए 1972 ई० में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला था। इस कृति में पुरुरवा और उर्वशी दोनों अलग-अलग तरह की प्यास लेकर आये हैं। पुरुरवा धरती पुत्र है और उर्वशी देवलोक… Continue reading रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (उर्वशी- तृतीय अंक) इकाई-5

चरणामृत और पंचामृत

चरणामृत मंदिर में या घर पर जब भी कोई पूजा-पाठ होती है, तो चरणामृत या पंचामृत जरुर दिया हैं। मगर बहुत लोग इसकी महिमा और इसके बनने की प्रक्रिया को नहीं जानते होंगे। ‘चरणामृत’ का अर्थ है, भगवान के चरणों का अमृत जल। पंचामृत का अर्थ है पांच अमृत यानि पांच पवित्र वस्तुओं से बना… Continue reading चरणामृत और पंचामृत

जायसी ग्रंथावली (संपादक- रामचंद्र शुक्ल) ‘नागमती वियोग खंड’ (इकाई- 5)

मलिक मुहम्मद जायसी भक्तिकाल के निर्गुण प्रेमाश्रयी धारा के कवि थे। जायसी का जन्म सनˎ1500ई० के आसपास माना जाता है। वे उत्तर प्रदेश में ‘जायस’ स्थान के रहने वाले थे। उन्होंने स्वयं इस दोहे में कहा है, “जायस नगर मोर अस्थानू। नगरक नांव आदि उदयानू। तहाँ देवस दस पहुने आएउं। भा वैराग बहुत सुख पाएऊँ।।” … Continue reading जायसी ग्रंथावली (संपादक- रामचंद्र शुक्ल) ‘नागमती वियोग खंड’ (इकाई- 5)

‘कितनी नावों में कितनी बार’ (कविता) – सच्चितानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (इकाई-5)

यहकविता अज्ञेय जी की 1962 से 1966 के बीच की रचित कविताओं का संग्रह है। इस कविता के लिए उन्हें (1978) में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इस कविता में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि व्यक्ति कई बार सत्य की खोज में भटक जाता है। वह सत्य को अपने पास खोजने… Continue reading ‘कितनी नावों में कितनी बार’ (कविता) – सच्चितानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (इकाई-5)

‘हरि घास पर क्षण भर’ (कविता) –सच्चितानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (इकाई-5)

‘हरि घास पर क्षण भर’ अज्ञेय जी की एक प्रमुख कविता संग्रह है। इस कविता संग्रह में ‘हरि घास पर क्षण भर’ भी एक कविता है। यह कविता इलाहाबाद में 14 औक्तुबर 1949 में रची गई थी। अज्ञेय प्रयोगवादी कवि थे अतः उनकी कविताओं में प्रयोग का होना स्वाभाविक है। यह कविता अज्ञेय की नई… Continue reading ‘हरि घास पर क्षण भर’ (कविता) –सच्चितानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ (इकाई-5)

हनुमान चालीसा की रचना

श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार । बरनौ रघुवर बिमल जसु, जो दायक फल चारि।। बुद्धिहीन तनु जानि के, सुमिरौ पवन कुमार। बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहुं कलेश विकार।। हनुमान चालीसा की रचना हिन्दी साहित्य के महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने किया था। तुलसीदास जी के द्वारा रचित हनुमान चालीसा में… Continue reading हनुमान चालीसा की रचना

रश्मिरथी (खण्डकाव्य) – रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : इकाई-5

     ‘रश्मिरथी’ 1952 ई० में प्रकाशित हुआ था। रश्मिरथी का अर्थ ‘सूर्य का सारथी’ होता है। यह एक प्रसिद्ध ‘खण्डकाव्य’ है। यह खड़ीबोली में लिखा गया है। रश्मिरथी में कर्ण के चरित्र के सभी पक्षों का चित्रण किया गया है। दिनकर ने कर्ण को महा भारतीय कथानक से ऊपर उठाकर उसे नैतिकता और विश्वसनीयता की… Continue reading रश्मिरथी (खण्डकाव्य) – रामधारी सिंह ‘दिनकर’ : इकाई-5

प्रथम रश्मि (कविता) – सुमित्रानंदनपंत : इकाई-5

‘प्रथम रश्मि’ कविता 1919 में लिखी गई थी। यह कविता ‘वीणा’ (1927ई०) काव्य संग्रह में संग्रहीत है। प्रथम रश्मि कविता में कवि ने सुबह की प्रथम किरण के साथ प्रकृति में होने वाले स्वाभाविक बदलाव का बड़ा ही सुंदर और मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया है। प्रथम रश्मि के आने से पहले जैसे पूरा विश्व स्तब्ध… Continue reading प्रथम रश्मि (कविता) – सुमित्रानंदनपंत : इकाई-5

परिवर्तन (कविता) – सुमित्रानंदन पंत: इकाई-5

‘परिवर्तन’ यह कविता 1924 में लिखी गई थी। कविता रोला छंद में रचित है। यह एक लम्बी कविता है। यह कविता ‘पल्लव’ नामक काव्य संग्रह में संकलित है। परिवर्तन कविता को समालोचकों ने एक ‘ग्रैंड महाकाव्य’ कहा है। स्वयं पंत जी ने इसे पल्लव काल की प्रतिनिधि रचना मानते हैं। परिवर्तन को कवि ने जीवन… Continue reading परिवर्तन (कविता) – सुमित्रानंदन पंत: इकाई-5

द्रुत झरों जगत के जीर्ण पत्र (कविता) – सुमित्रानंदन पंत : (इकाई-5)

(जन्म- 20 मई 1900 ई० - निधन 28 दिसंबर 1977) सुमित्रानंदन पंत का जन्म- 20 मई 1900 ई० को कौशाम्बी ग्राम में हुआ था।पिता का नाम गंगा दत्त और माता का नाम सरस्वती देवी था।   निधन- 28 दिसंबर 1977 को इलाहाबाद में हुआ था। सुमुत्रानंदन पंत के उपनाम: इनका बचपन का नाम गोसाईदत्त था। छायावाद… Continue reading द्रुत झरों जगत के जीर्ण पत्र (कविता) – सुमित्रानंदन पंत : (इकाई-5)