“नीर भरी संध्या की वेणु”

नीलिमा के नीरव आँगन में
किसने यह दीप जलाया है?
किसके करुण कपोलों से
अश्रु-मोती झर आया है?

शायद किसी विरही बादल ने
मन की पीड़ा गाई होगी,
या चाँदनी की मौन लहर ने
अंतर की वीणा छेड़ी होगी।

वन की पथराई छाया में
जब पवन सिसकियाँ भरता है,
तब लगता है कोई प्राची से
मूक व्यथा का पत्र धरता है।

ओ अज्ञात पथिक!
तुम्हारे चरणों की धूल कहाँ?
किस अनदेखे लोक की स्मृति
भर देती यह शून्य यहाँ?

कभी लगता तुम पावस बन
सूखे वन में उतर आते हो,
कभी शीतल चाँदनी बनकर
पीड़ा को स्वप्न सुनाते हो।

निशि की नीरव गोद तले
जब तारे दीप जलाते हैं,
मेरे अंतर के एकांत में
तुम्हारे स्वर गुनगुनाते हैं।

मैं खोजूँ किस दिशा तुम्हें-
इन निर्जन पथ की छाया में?
या उस अनंत आकाश-तट की
मूक, अलभ्य माया में?

यदि तुम मिल भी जाओ क्षण भर,
क्या यह विरह शेष न होगा?
शायद यही रहस्य तुम्हारा-
दुख ही जीवन का योग होगा।

इसलिए मैं अश्रु सँजोकर
मन का दीप जलाती हूँ,
तुम्हारी स्मृति के तम में ही
अपनी प्रभा पाती हूँ।

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