पता नहीं क्यों?
जिंदगी इतना, इम्तिहान क्यों लेती है?
खुशियों को राहें छीन, गम ही गम देती है
जो ढूँढ़ता है चैन, उसे वह भटकाती है
दिल के उजाले को, वह अक्सर धूँधला बनाती हैं
कभी आशाओं की दीप जलाती है
तो कभी वह आँसुओं से बुझाती है
हँसी के पल दिखाकर वह न जाने क्यों
दुःखों के सागर में डुबो देती है
मन में सपनों के राग वह हमेशा भर्ती है
कुछ ही पल में वह उस डोर को तोड़ देती है
ऐसा लगता है उसे और कोई काम नहीं
कभी आँसू, कभी दर्द- क्या यही तेरा इनाम है
फिर भी तुझसे कोई शिकवा नहीं ऐ जिंदगी
तेरी इन इम्तिहानों ने ही तो हमें गढ़ा है
तेरे इन संघर्षों में ही छीपा है असली सार
इन्हीं आँसुओं में छिपा है जीत का विश्वास।