“करुणा की दीपशिखा : महादेवी”

वेदना की वीणा पर
सजाया जिसने संगीत जीवन का

शब्दों में आँसू पिरोकर
मानवता का दीप जलाया।

वह स्वर थी नीरव पीड़ा का,
वह करुणा की गहरी धारा थी,
हिंदी के नभ में चाँद बनी
वह काव्य-गगन की तारा थी।

मृदुल भाव की मंद बयार,
संवेदना का अमर उजाला,
हर पंक्ति में झरता दिखता
हृदय का निर्मल नीर निराला।

नारी के मौन संतापों को
जिसने स्वर देना सिखलाया,
अधिकारों की अग्निशिखा बन
बंधन का तम भी मिटाया।

‘यामा’ की गूँज आज भी
मन के मंदिर में बजती है,
हर पीड़ित के अंतर में
उनकी करुणा फिर सजती है।

हे साहित्य की तपस्विनी!
तुम शब्दों की साधना हो,
हिंदी की उज्ज्वल परंपरा में
तुम अमर ज्योति-प्रभा हो।

वेदना को जिसने वंदन किया,
दुख को जिसने गान बनाया
वह महादेवी, हिंदी की
आत्मा बनकर जग में छाया।

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.